बांग्लादेश चुनावः पश्चिमी देशों की सक्रियता के बीच भारत की लंबी चुप्पी पर चर्चा

शेख हसीना और नरेंद्र मोदी

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    • Author, राकिब हसनत
    • पदनाम, बीबीसी बांग्ला, ढाका

बांग्लादेश में आगामी संसदीय चुनावों को लेकर पश्चिमी राजनयिक लंबे समय से देश की राजधानी ढाका में हैं लेकिन पड़ोसी देश भारत लंबे समय तक ख़ामोश रहा.

भारत के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को इस पर चुप्पी तोड़ी और कहा कि बांग्लादेश के लोग तय करेंगे कि चुनाव कैसे होंगे.

भारतीय विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने उम्मीद जताई, "शांति बनी रहेगी, कोई हिंसा नहीं होगी और वहां चुनाव योजना के मुताबिक़ होंगे."

उन्होंने कहा, "बांग्लादेश के लोग जिस तरह निर्णय लेते हैं, चुनाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया वैसी ही होनी चाहिए."

बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त देब मुखर्जी का कहना है, "भारत इस मुद्दे पर चुप रहा क्योंकि भारत इस तरह के मुद्दों पर सीधे बात करना पसंद नहीं करता."

उनका मानना ​​है कि भारत चाहेगा कि बांग्लादेश में होने वाले अगले चुनावों पर किसी भी तरह से सवाल न उठाया जाए और यह संदेश विदेश मंत्रालय के बयान में सामने आया है.

हालांकि, बांग्लादेश के पूर्व विदेश सचिव तौहीद हुसैन का कहना है कि भारत ने हमेशा सार्वजनिक रूप से नहीं बल्कि आंतरिक रूप से अपनी बात कही है.

उनका कहना है, "भारत भले ही सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहे, वह हमेशा से आंतरिक रूप से अपने तरीक़े से चीज़ें करता रहा है."

अरिंदम बागची

संयोग से, बांग्लादेश के 2014 और 2018 के चुनावों में भारतीय राजनयिकों की भूमिका बहुत हद तक सार्वजनिक थी.

बांग्लादेश में विपक्ष की बीएनपी पार्टी ने 2014 चुनावों का बहिष्कार किया था और 2018 के चुनाव में अवामी लीग ने लगभग सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी

विपक्षी बीएनपी के कई नेता मानते हैं, "भारत का इकतरफ़ा समर्थन इसके लिए ज़िम्मेदार था."

इन्हीं कारणों से बांग्लादेश के राजनीतिक हल्कों में वहां होने वाले चुनावों में भारत की भूमिका को लेकर उत्सुकता है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

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गुरुवार को एक संवाददाता सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि भारत को उम्मीद है कि बांग्लादेश में चुनाव योजनाबद्ध और शांतिपूर्ण तरीक़े से होंगे.

हालांकि, उन्होंने बांग्लादेश के विपक्षी दलों की कार्यवाहक या निष्पक्ष सरकार की अगुवाई में चुनाव कराने की मांग पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा, "बांग्लादेश के लोग ये तय करेंगे कि उनके यहां चुनाव कैसे होंगे."

ढाका में पश्चिमी देशों के राजनयिकों की गतिविधियों और टिप्पणियों के बारे में उन्होंने कहा, "पूरी दुनिया इस पर टिप्पणी कर सकती है, लेकिन भारत तो भारत है और बांग्लादेश के साथ हमारे विशेष संबंध हैं. बांग्लादेश में जो कुछ भी होता है, हम उसमें शामिल होते हैं क्योंकि इसका असर हम पर भी पड़ता है... अपने यहां होने वाले चुनाव का फै़सला बांग्लादेश के लोग करेंगे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया इसी तरह होनी चाहिए."

बागची ने कहा, "देखिए, वहां कई गतिविधियां हो रही हैं, लोग शायद इन्हीं पर टिप्पणी कर रहे हैं."

उन्होंने ये भी कहा कि भारत बांग्लादेश के हालात पर नज़र रखे हुए है. उन्होंने कहा, "वहां हमारा एक उच्चायोग है. हमें उम्मीद है- चुनावों के दौरान शांति होगी, कोई हिंसा नहीं होगी और चुनाव योजना के अनुसार होंगे."

विश्लेषक क्या कहते हैं?

तौहीद हुसैन

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भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में बांग्लादेश से जुड़ा सवाल पत्रकार गौतम लाहिड़ी ने पूछा था.

गौतम लाहिड़ी बांग्लादेश की राजनीति और भारत-बांग्लादेश मामलों के विश्लेषक भी हैं.

बीबीसी बांग्ला से उन्होंने कहा कि उन्हें बांग्लादेश चुनाव पर टिप्पणी करने के मामले में भारतीय प्रवक्ता सतर्क लगे.

लाहिड़ी कहते हैं, "कूटनीति के क्षेत्र में, बहुत कुछ नहीं कहा जाता है.उन्होंने कहा-भारत को उम्मीद है कि चुनाव शांतिपूर्ण, स्वतंत्र और हिंसा मुक्त होंगे. लेकिन ध्यान दें कि दो साल पहले भी भारत चुनावों की बात कर रहा था. हालांकि प्रवक्ता ने इस शब्द का उल्लेख नहीं किया था, अब यह जानना मुश्किल है कि जानबूझकर किया गया था या अनजाने में?"

हालांकि, भारत और बांग्लादेश के विश्लेषक भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की टिप्पणियों को प्रारंभिक टिप्पणियां ही मान रहे हैं.

कुछ जानकारों का मानना ​​है कि ढाका में जिस तरह पश्चिमी देश काम करते हैं, वह भारतीय राजनयिकों के काम करने का तरीक़ा नहीं है, ख़ासकर बांग्लादेश के मामले में.

बांग्लादेश में होने वाले चुनाव को लेकर एक बार फिर अमेरिका और रूस के बीच विरोधाभासी रुख़ सामने आ रहा है. लेकिन दोनों ही देशों के साथ भारत के क़रीबी संबंध हैं.

दूसरी ओर, भारत के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी चीन ने स्पष्ट रूप से अवामी लीग सरकार की स्थिति के प्रति समर्थन व्यक्त किया है.

बांग्लादेश

बांग्लादेश के पूर्व विदेश सचिव तौहीद हुसैन कहते हैं, "कई कारणों से, भारत ने इस मामले में सार्वजनिक रूप से कोई सक्रियता नहीं दिखाई है, लेकिन आंतरिक रूप से उनकी गतिविधियां बंद नहीं हुई हैं."

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "भारत सतर्क रहेगा, लेकिन आख़िर में वही करेगा जो उसके हित में होगा. लेकिन हमें नहीं पता कि भारत बांग्लादेश के भीतर क्या कर रहा है. लेकिन ऐसा सोचने का भी कोई कारण नहीं है कि वो बांग्लादेश में अपने हितों के कारण चुप है."

उन्होंने ये भी कहा कि भारतीय प्रवक्ता अरिंदम बागची ने प्रेस ब्रीफ़िंग में जो कहा वो भारत की शुरुआती और औपचारिक टिप्पणी है.

बांग्लादेश में विपक्षी राजनेताओं सहित कई लोगों का मानना ​​है कि भारत के एकतरफा समर्थन के कारण अवामी लीग सरकार 2014 और 2018 के चुनावों में सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रही थी.

बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त देब मुखर्जी का कहना है कि भारत ने 2014 में चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया था, लेकिन क्योंकि कुछ पश्चिमी देश चुनाव में बाधा डालना चाहते थे, इसलिए भारत ने इसके ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया था.

उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की टिप्पणियों के संदर्भ में बीबीसी बांग्ला से कहा, "मुझे लगता है कि भारत चाहेगा कि अगले चुनाव को लेकर कोई संदेह न रहे. भारत हमेशा सीधे टिप्पणी नहीं करता और फिर हर बात सार्वजनिक तौर पर कही भी नहीं जा सकती. लेकिन यह याद रखना चाहिए कि भारत के हित यहां कई पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक हैं और यही कारण है कि दोनों सरकारें जो करेंगी वह द्विपक्षीय रूप से करेंगी."

उन्होंने कहा "इसलिए पश्चिम सक्रिय है लेकिन भारत चुप है."

अमेरिका और रूस के झंडे

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश के चुनावों को लेकर अमेरिका और रूस ने विरोधी रुख अपनाया है

बांग्लादेश में इस साल के आख़िर में आम चुनाव होने हैं.

हालांकि, पिछले दो चुनावों की तरह, यह चुनाव कैसे होंगे इस पर सरकार और विपक्ष के बीच गहरी असहमति है.

विपक्षी बीएनपी और समान विचारधारा वाली पार्टियां शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के इस्तीफ़े के बाद एक ग़ैर-पक्षपातपूर्ण सरकार के तहत चुनाव के लिए आंदोलन कर रही हैं.

दूसरी ओर, सत्तारूढ़ अवामी लीग ने स्पष्ट कहा है कि अगला चुनाव संविधान के मुताबिक़ यानी प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के नेतृत्व में होगा.

दोनों पक्षों के राजनीतिक कार्यक्रमों के कारण समय-समय पर देश में हिंसा होती रही है. लेकिन इस बीच, पश्चिमी राजनयिक पिछले कई महीनों से चुनावों को लेकर काफी सक्रिय हैं.

यहां तक ​​कि अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने पहले ही अपनी नई वीज़ा नीति की घोषणा कर दी है और कहा है कि देश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में बाधा डालने वाले किसी भी व्यक्ति को वीज़ा नहीं देगा. इस घोषणा के प्रत्यक्ष प्रभाव के रूप में, विपक्षी दल अपना काम करने में सक्षम हैं और ढाका समेत देशभर में कार्यक्रम कर रहे हैं.

ढाका में अमेरिकी राजदूत पीटर हास चुनाव-संबंधित दलों के साथ नियमित बैठकें कर रहे हैं और कई अन्य पश्चिमी राजनयिक भी यहां काफ़ी सक्रिय हैं.

लेकिन इन सभी घटनाओं के बावजूद बांग्लादेश का सबसे क़रीबी पड़ोसी देश भारत, बांग्लादेश की राजनीति पर काफ़ी समय से चुप्पी साधे हुए था.

आख़िरकार गुरुवार को अपनी नियमित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने बांग्लादेश के चुनाव पर टिप्पणी की.

अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों की तरह अगर भारत भी किसी समय बांग्लादेश के चुनाव में शामिल हो जाता है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि स्थिति एक नया आयाम ले लेगी.

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