बांग्लादेश की बदहाली से बेहतरी तक पहुँचने की कहानी

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- Author, मोअज़्ज़म हुसैन
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला, लंदन
स्वतंत्र बांग्लादेश के नेता शेख़ मुजीब-उर रहमान पाकिस्तान से रिहा होने के तुरंत बाद आठ जनवरी 1972 को लंदन पहुँचे.
10 जनवरी को ढाका के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने जानना चाहा, ''नुरुल इस्लाम कहां हैं? उन्हें खबर भिजवाइए.''
ढाका को एक ज़रूरी संदेश भेजा गया कि नूरुल इस्लाम उनके आने तक इंतज़ार करें.
नूरुल इस्लाम, जिन्हें शेख़ मुजीब ढूंढ रहे थे, उनके सबसे क़रीबी और सबसे विश्वसनीय आर्थिक सलाहकारों में से एक थे. हार्वर्ड में पढ़े लिखे प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम उस समय अमेरिका में विश्व बैंक की नौकरी करने की तैयारी में थे.
नुरुल इस्लाम ने कहा, "मैं तब अपने परिवार को लेने के लिए ढाका आया था. लेकिन फिर मैं नहीं लौट सका. बंगबंधु ने मुझसे कहा, आपको योजना आयोग की ज़िम्मेदारी संभालनी होगी."
महज 42 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर इस्लाम को ऐसी अहम ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जिसे दुनिया के बहुत कम अर्थशास्त्रियों को निभाने का मौक़ा मिलता है. उन्हें एक नव स्वतंत्र राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को एकदम शून्य से तैयार करने की परिकल्पना करनी थी.
"जब बंगबंधु छह बिंदुओं के आधार पर स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, तो मैं उनके सलाहकारों में से एक था. हम 1969 से इन छह बिंदुओं पर दिन-रात काम कर रहे थे. पूर्वी पाकिस्तान जिस आर्थिक असमानता का शिकार था, हमारा काम उसको उजागर करना था."
प्रोफ़ेसर इस्लाम अब अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में सेवानिवृत्त जीवन बिता रहे हैं. उन्होंने बीबीसी बांग्ला को दिए एक लंबे टेलीफ़ोन साक्षात्कार में याद किया कि कैसे स्वतंत्र बांग्लादेश की युद्ध से प्रभावित अर्थव्यवस्था की यात्रा शुरू हुई थी.
बांग्लादेश के पहले योजना आयोग के अन्य तीन सदस्य के रूप में उन्होंने जिन्हें अपने साथ लिया था, वे उस समय बांग्लादेश के तीन प्रसिद्ध युवा अर्थशास्त्री थे रहमान सुभान, अनीसुर रहमान और मुशर्रफ़ हुसैन.

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प्रोफ़ेसर इस्लाम ने कहा, "मैं गर्व से कह सकता हूँ कि योजना आयोग बांग्लादेश में पहला सरकारी संस्थान था, जहाँ हमने बांग्लादेश के सबसे प्रतिभाशाली और समझदार लोगों को एकत्र किया था."
विश्व बैंक की नकारात्मक रिपोर्ट
सितंबर 1972 में युद्धग्रस्त बांग्लादेश पर जारी विश्व बैंक की पहली रिपोर्ट में एक औसत बांग्लादेशी के जीवन का वर्णन इस प्रकार किया गया था:
"बांग्लादेश में 80 प्रतिशत लोग कृषि कार्य में लगे हुए हैं. औसतन एक किसान के पास डेढ़ एकड़ जमीन है. वह गाँव के किसी अमीर आदमी से और एक एकड़ जमीन पट्टे पर ले लेता है. उसके पास एक बैल है, जिससे वह खेत जोतता है. उसकी एकमात्र संपत्ति वह धान है, जिसे वह सारा साल अपने खाने के लिये सुरक्षित रखता है.''
''अन्य किसी भी तीज-त्योहार या सामाजिक कार्य के लिए उसे अपने रिश्तेदारों या साहूकारों से उच्च ब्याज पर उधार लेना पड़ता है. उसकी हालत चूंकि ऐसी है कि चादर से पैर ढंकता है तो सिर खुलता है और सिर ढंकता है तो पैर खुल जाते हैं, इसलिये वह किसी तरह सिर्फ़ ब्याज ही चुका पाता है, मूल राशि नहीं चुका पाता."
बांग्लादेश बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. मोहम्मद फरासुद्दीन कहते हैं, उस समय बाक़ी दुनिया बांग्लादेश के बारे में जो सोचती थी, विश्व बैंक की इस रिपोर्ट में वही बात प्रतिध्वनित हो रही थी. 1973 में वह तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मुजीब रहमान के निजी सचिव थे.

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विश्व बैंक की पहली रिपोर्ट बहुत ही नकारात्मक थी. इसके बाद एक अमेरिकी राजनयिक जॉनसन ने भी कहा कि यह राष्ट्र लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा, इसकी अर्थव्यवस्था अत्यंत दयनीय है. इसी राजनयिक के इस वक्तव्य को ग़लती से हेनरी किसिंजर का बता कर उल्लेख किया जाता है. लेकिन सबसे नुक़सानदायक वक्तव्य था विश्व बैंक के प्रतिनिधि, जस्ट फॉलन और उनके एक सहयोगी का. उन लोगों ने लिखा था: "इसका भूगोल ठीक है, लेकिन अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है. इस देश की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने में दो सौ साल लग जाएंगे."
विश्व बैंक की व्यापक रूप से उद्धृत उस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि यदि बांग्लादेश का विकास संभव है, तो अफ्ऱीका सहित दुनिया के किसी भी देश का विकास संभव है.
सोवियत संघ की सहायता
प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम और उनके सहयोगियों ने ढाका के सचिवालय में अपने कार्यालय में काम शुरू कर दिया. आयोग के तीसरे सदस्य प्रोफ़ेसर अनीसुर रहमान ने सात फ़रवरी को अपने सहयोगियों को एक नोट भेजा.
"हमने मुक्ति युद्ध जीत लिया है. अब दूसरा युद्ध सामने है: पुनर्वास और पुनर्निर्माण का, अर्थव्यवस्था को फिर से पुनर्जीवित करने का, लोगों के लिए खाद्यान्न की व्यवस्था करने का."
प्रोफ़ेसर अनीसुर रहमान अब ढाका में रिटायर जीवन जी रहे हैं. एक लंबी निजी बातचीत में उन्होंने योजना आयोग में अपने अनुभव के बारे में बहुत बात की, लेकिन कोई आधिकारिक साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया. हालांकि, उन्होंने अपने संस्मरण, "पौथे जा पेयेची" में लिखा है कि इस चुनौती से निपटने के लिए प्रशासन में उस समय जिस दृढ़ता की ज़रूरत थी, वह नहीं दिखाई पड़ी थी.
अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन में नई सरकार के सामने पहली चुनौती चटगांव और चालना बंदरगाहों को फिर से शुरू करना था. युद्ध के दौरान इन दोनों बंदरगाहों में जिस तरह बारूदी सुरंगें बिछायी गई थीं, उसके कारण वे जहाजों की आवाजाही के लिए बहुत ही ख़तरनाक स्थिति में थे. बंदरगाह चैनलों में बहुत से डूबे हुए जहाज भी फँसे हुए थे.
ऐसे समय में, प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम को इन दोनों बंदरगाहों को फिर से शुरू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र से बातचीत करने के लिए कहा गया था.
"हमारा कारोबार तब पूरी तरह ठप था क्योंकि बंदरगाहों का उपयोग नहीं हो पा रहा था. बंगबंधु ने मुझे संयुक्त राष्ट्र से बात करने के लिए कहा था. वह नहीं चाहते थे कि बंदरगाहों को बारूदी सुरंगों से मुक्त करने के काम में किसी बड़ी ताक़त का सहयोग लिया जाए क्योंकि वह देश की सुरक्षा के बारे में चिंतित थे."
लेकिन चटगांव बंदरगाह से बारूदी सुरंगें हटाने के काम में संयुक्त राष्ट्र से कोई मदद नहीं मिली, मदद मिली सोवियत संघ से.
"जब बंगबंधु अपनी पहली यात्रा पर सोवियत संघ गए, तो मैं भी उनके साथ था. उन लोगों ने कहा, ''आप चटगांव बंदरगाह क्यों नहीं खोलते, आपका कारोबार बंद है.'' फिर उन्होंने व्लादिवोस्तोक से एक बड़ा दल चटगांव भेजा. उन लोगों ने काम बहुत जल्दी ही पूरा कर लिया था,'' प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने बताया.
समाजवाद बनाम विदेशी सहायता
लेकिन नई सरकार में तब विभिन्न तरह की वैचारिक खींचतान दिखाई पड़ने लगी थी. राष्ट्र की नीति में समाजवादी व्यवस्था की बात स्पष्ट रूप से कही गई है, लेकिन विश्व बैंक जैसे दानदाता विदेशी प्रतिष्ठान विदेशी सहायता के लिए बेताब बांग्लादेश पर तरह-तरह की शर्तें थोपना चाह रहे थे.
ढाका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर एम.एम. आकाश तब एक बिल्कुल युवा स्वतंत्रता सेनानी थे, जो अभी-अभी युद्ध से लौटे थे.
"बांग्लादेश के सामने रास्ता चुनने का सवाल था. क्या मुझे समाजवाद के रास्ते पर चलना चाहिए या पूंजीवाद के रास्ते पर. अमेरिका, विश्व बैंक और यहाँ तक कि भारत भी नहीं चाहता था कि बांग्लादेश उस समय पूरी तरह समाजवाद को अपनाए. उस समय बांग्लादेश अजीब तनाव में था."

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पूर्वी पाकिस्तान के अनेक बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों के मालिक पश्चिमी पाकिस्तान के पूंजीपति थे. बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद इन उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के बारे में ज़्यादा बहस नहीं हुई. लेकिन मतभेद पैदा हुए विदेशी सहायता प्राप्त करने के मामले में.
माना जाता है कि तत्कालीन वित्त मंत्री ताजुद्दीन अहमद विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मदद लेने के ख़िलाफ़ थे. इसी तरह एक बार वह और योजना आयोग के उपाध्यक्ष, प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम खाद्य सहायता मांगने अमेरिका गए.
"जब हम वॉशिंगटन गए, तो उन्होंने हमें लंबा चौड़ा भाषण दिया. कहा, तुमलोग पाकिस्तान के साथ सुलह कर लो. ताजुद्दीन साहब तो बिल्कुल हैरान रह गए. हम मदद मांगने गये थे और वे कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ सुलह कर लो."
विश्व बैंक भी उस समय कुछ ऐसे मुद्दे उठा रहा था, जिससे बांग्लादेश काफ़ी नाराज़ था. उनमें से एक पाकिस्तान को विश्व बैंक द्वारा दिए गए ऋण की देनदारी बाँट लेने का सवाल था.
प्रोफ़ेसर इस्लाम ने कहा, "उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान को दिए गए क़र्ज़ की ज़िम्मेदारी हमें भी लेनी होगी. हमने कहा था कि हम इसे क्यों लें, उन्होंने हमारी संपत्ति चोरी छिपे पश्चिमी पाकिस्तान भेज दी है. तब उन्होंने कहा कि यह आपका आंतरिक मामला है. हमें क़र्ज़ की राशि चुकानी होगी. "
अंत में, यह निर्णय लिया गया कि बांग्लादेश केवल उन परियोजनाओं के लिए क़र्ज़ का केवल एक हिस्सा चुकाएगा, जो पूरी हो चुकी हैं.
भूमि सुधार के मुद्दे पर सरकार और योजना आयोग के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो रही थी. आयोग के सबसे 'अतिवादी' सदस्य के रूप में पहचाने जाने वाले प्रोफ़ेसर अनीसुर रहमान को भूमि सुधार प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने का काम सौंपा गया था.
प्रोफ़ेसर रहमान ने अपने संस्मरणों में सरकार के साथ अपनी असहमति का विस्तृत विवरण दिया है. योजना आयोग द्वारा भूमि स्वामित्व की सीमा निर्धारित करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें अधिकतम सीमा को दस एकड़ करने का प्रस्ताव था. लेकिन अवामी लीग के भीतर से ही इसका कड़ा विरोध हुआ.
"प्रस्ताव कैबिनेट से वापस नहीं आया. देश के मुख्य क्षेत्र कृषि क्षेत्र में प्रगतिशील सुधारों के प्रस्ताव की मूक मृत्यु यह स्पष्ट करती है कि देश राजनीतिक नेतृत्व द्वारा किए गए वादे के अनुसार समतावाद और समाजवाद की ओर नहीं बढ़ रहा है." प्रोफेसर अनीसुर रहमान ने अपनी पुस्तक ''पौथे जा पेयेची'' में इस घटना का विवरण इसी तरह दिया है.
उन्होंने आगे लिखा है, "मैंने सुना है कि ताजुद्दीन ने इस प्रस्ताव की ज़ोरदार सिफ़ारिश की थी और फिर निराशा की स्थिति में वापस आ गया और एक दोस्त को यह कहते हुए रो पड़ा कि 'भूमि सुधार नहीं हुआ'."
पहले पहल रुपया जिस तरह छपा था

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लेकिन उस समय बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति इतनी विकट थी कि बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन का सदस्य बनने के लिए जो चंदा देने की ज़रूरत पड़ती है वह भी ख़ज़ाने में नहीं था.
बांग्लादेश बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ मोहम्मद फ़रासुद्दीन ने कहा, "बांग्लादेश ने केवल 18 डॉलर से शुरुआत की थी. पाकिस्तानी जाने से पहले केंद्रीय बैंक के ढाका कार्यालय में 18 डॉलर छोड़ गए थे. लेकिन इस स्थिति में भारत बड़ी मदद के साथ आगे आया. स्वीडन और कनाडा ने भी मदद की. इन दोनों देशों ने सोना भी दिया और डॉलर भी दिए. उन्होंने सोना इसलिए दिया था क्योंकि सोने के बिना पैसा नहीं छापा जा सकता,''
इस प्रकार, बांग्लादेश कुछ मित्र देशों के सहयोग से आईएमएफ़ का सदस्य बना.
आज़ादी की लड़ाई के बाद से ही बहुत से लोग पाकिस्तानी मुद्रा पर बांग्लादेश की मुहर लगाकर उसका बांग्लादेश की मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे. लेकिन मार्च 1972 में पाकिस्तान सरकार ने उनके करेंसी नोटों को अप्रचलित घोषित कर दिया. उसी समय बांग्लादेश में भी इस मुद्रा की जगह बांग्लादेशी नोट छापने की पहल की गई.
मोहम्मद फरासुद्दीन ने कहा, "जहाँ तक मुझे याद है, 1972 के अंत में भारत और ब्रिटेन से बांग्लादेशी टका के नोट छपवाने की व्यवस्था की गई थी."
बांग्लादेशी मुद्रा के साथ एक और संकट 1975 में पैदा हुआ था. इससे पहले के दो वर्ष जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं थीं, तब दुनिया के कई हिस्सों में मुद्रास्फीति चरम पर थी. ऐसे समय में, सरकार ने बांग्लादेश में एक सौ टका के नोटों को अप्रचलित घोषित करने का फैसला किया.
डॉ मोहम्मद फरासुद्दीन ने कहा, "सरकार को संदेह था कि बांग्लादेश में सौ टका के जितने नोटों के प्रचलन में होने की बात थी, उसकी तुलना में दस गुना अधिक नोट बाज़ार में थे."

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आठ अप्रैल 1975 को सरकार ने सख़्त गोपनीयता में निर्णय लिया कि एक सौ टका के नोट अप्रचलित हो जाएंगे. उस दिन दोपहर बाद यह घोषणा कर दी गई.
"सभी संबंधित लोग दोपहर के बाद से ही बंगबंधु के कार्यालय में आने लगे. मुझे बताया गया कि जो लोग अंदर जाएंगे, वे फिर बाहर नहीं आ सकेंगे. बांग्लादेश बैंक के गवर्नर आए, वित्त मंत्री मल्लिक साहब आए. कोई टेलीफ़ोन भी नहीं कर पाएगा. बंगबंधु के पास केवल एक लाइन से ही फ़ोन जायेगा, मैं उनका टेलीफ़ोन ऑपरेटर हूं."
दोपहर तीन बजे के कुछ देर बाद ही एक सौ रुपए के नोट को अप्रचलित घोषित कर दिया गया. तय हुआ कि केवल आठ सौ रुपये तक ही तुरंत बदले जाएंगे.
क्यूबा को जूट निर्यात को लेकर संकट
जूट तब बांग्लादेश की कृषि अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद था. नई सरकार जूट के निर्यात के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रही थी. बांग्लादेश का कच्चा जूट मूलत: पाकिस्तान की जूट मिलों में जाता था, लेकिन देश की आज़ादी के बाद पाकिस्तान को जूट भेजना बंद कर दिया गया.
प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने कहा, "ऐसे समय में क्यूबा ने हमसे जूट मांगा. हमने तुरंत मौक़े का लाभ उठाया. जूट की एक खेप बहुत जल्द क्यूबा भेज दी गई."
लेकिन इस मामले में, नव स्वतंत्र बांग्लादेश शीत युद्ध में लिप्त दो महान शक्तियों के बीच संघर्ष का शिकार हो गया और उसे उसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी.

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एक दिन ढाका में अमेरिकी राजदूत हड़बड़ाते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम के पास पहुँचे.
"उन्होंने मुझसे कहा, 'आप लोग क्या कर रहे हैं? आप लोग क्यूबा के साथ व्यापार कर रहे हैं? क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में क़ानून है कि जो देश क्यूबा के साथ व्यापार करते हैं, तो उस देश को कोई सहायता नहीं दी जाती. क्यूबा को जूट निर्यात अभी बंद करना होगा, नहीं तो हम आप लोगों को कोई मदद नहीं दे सकेंगे."
आज़ादी के बाद बांग्लादेश में यह बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति थी. देश भर में भयंकर अकाल के बीच अमेरिकी सरकार की खाद्य सहायता के साथ दो जहाज तब बांग्लादेश के रास्ते में थे.
बांग्लादेश ने जल्दबाजी में क्यूबा को जूट का निर्यात बंद करने का फ़ैसला किया. अमेरिकी सरकार को उस निर्णय की सूचना देते हुए पत्र भी भेजा गया. लेकिन कोई विशेष लाभ नहीं हुआ.
प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने कहा, "अमेरिकी राजदूत ने मुझे बताया कि चटगांव बंदरगाह में अभी भी क्यूबा के लिए एक शिपमेंट है. जब तक आप इसे रोक नहीं देते, तब तक मदद करना संभव नहीं है."
बांग्लादेश बैंक के पूर्व गवर्नर मोहम्मद फरासुद्दीन ने कहा कि इस संकट की जो क़ीमत बांग्लादेश को चुकानी पड़ी, उसके दूरगामी परिणाम हुए थे.

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"मुझे लगता है कि 1974 में बांग्लादेश में जो अकाल पड़ा था, उसका मुख्य कारण यही था. वह सहायता अंत तक नहीं मिली और देश के शेयरधारक और कालाबाज़ारियों ने इसका फ़ायदा उठाया था."
हालांकि, योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम की इस बारे में राय अलग है.
"इस अकाल के बारे में बहुत तरह की दलीलें दी गई हैं, लेकिन वह एक राजनीतिक बहस है. वास्तव में, तब करने के लिए कुछ भी नहीं था. क्योंकि 1973 में कई बार बाढ़ आई और सूखा पड़ा था. अनाज की भारी कमी हो गई थी. फिर जब 1974 की शरद ऋतु आई, तब देश में अनाज नहीं था, सरकार के पास भी नहीं था, और निजी भंडार में भी नहीं था."
प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की बढ़ती क़ीमतें, बढ़ती परिवहन लागत, बढ़ती महंगाई सब मिलाकर स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर थी और उस अकाल से बचना लगभग असंभव था.
उन्होंने उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मुजीब-उर रहमान के साथ अपनी एक मुलाक़ात का ज़िक्र किया.

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"मैं एक दिन बंगबंधु के पास गया और देखा कि वह बहुत उदास बैठे हैं. तब उन्हें समझ आ रहा था कि स्थिति बहुत गंभीर है. उन्होंने कहा, देखिये, दुनिया के किसी भी देश में जब अकाल पड़ता है, तो भयानक स्थिति होती है. लेकिन मैं क्या करूं, यहाँ कुछ करने को नहीं है. लोग यह नहीं समझेंगे कि यह मेरे सामर्थ्य से बाहर की बात है. वे मुझे दोष देंगे. पूरी दुनिया में यही होता है."
योजना आयोग की विदाई
सरकार के भीतर वैचारिक संघर्ष के अलावा, योजना आयोग के सदस्यों और मंत्रियों और नौकरशाहों के बीच भी तनाव पैदा हो रहा था. ऐसी स्थिति में प्रोफ़ेसर अनीसुर रहमान ने योजना आयोग छोड़ने का फैसला किया.
बांग्लादेश की पहली पंचवर्षीय योजना का मसौदा 1973 के उत्तरार्ध में तैयार हो गया था. प्रोफ़ेसर रहमान ने उसी साल अक्टूबर में योजना आयोग से इस्तीफ़ा दे दिया.
मार्च 1975 में प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने भी योजना आयोग छोड़ दिया और अकादमिक जगत में लौट गए.

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जिस अर्थव्यवस्था की शुरुआत उन लोगों ने की थी, अब 50 वर्ष बाद उस बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आज जिस स्थिति में पहुँच गई है, उसके बारे क्या आप लोगों ने कभी कल्पना की थी?
"नहीं, हमने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी," प्रोफ़ेसर नूरुल इस्लाम ने कहा.
"दो चीज़ों ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को आज की स्थिति में पहुँचने में मदद की है. एक है प्रवासियों द्वारा भेजा गया पैसा. दुनिया भर में फैल गए लाखों बांग्लादेशियों द्वारा बांग्लादेश को भेजी गई बड़ी राशि ने अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.
''दूसरा वस्त्र उद्योग है. बांग्लादेश अब चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक है. यह भी एक बड़ी उपलब्धि है. बांग्लादेश में एक दिन ऐसा कुछ हो जाएगा, ऐसा तो तब हम कल्पना तक नहीं कर पाए थे."
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