बांग्लादेश को मान्यता देने पर कैसे मजबूर हुआ था पाकिस्तान?

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश के दौरे पर ज़ुल्फ़ीकार अली भुट्टो और उनके साथ शेख मुजीब-उर रहमान
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

1971 की जंग को भारत और पाकिस्तान का युद्ध कहना चाहिए या बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध?

पाकिस्तान इसे भारत के साथ जंग कहता है. वो इसे बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम नहीं कहता है. भारत की किताबों में भी इसे भारत-पाकिस्तान जंग के रूप में ही देखा जाता है लेकिन भारत को बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध कहने में भी कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन अब इसे लेकर क्या विवाद है?

दरअसल, छह दिसंबर को बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ अब्दुल एके मोमेन ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय प्रेस क्लब में भारत के साथ राजनयिक रिश्ता कायम होने के 50 साल पूरे होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था, ''पाकिस्तान, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध को भारत-पाकिस्तान के बीच का युद्ध दिखाने की कोशिश करता है. लेकिन यह बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध था, जिसमें भारत ने केवल मदद की थी. छह दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता भी दे दी थी.''

मोमेन ने बांग्लादेश को तत्काल मान्यता देने के लिए भारत और भूटान को धन्यवाद दिया. बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने कहा कि भारत की मान्यता के बाद रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अगले ही दिन युद्धविराम के लिए वोट किया था.

डॉ मोमेन ने कहा, ''एक दिन ऐसा भी आएगा जब भारत और बांग्लादेश के लोगों को आवाजाही के लिए वीज़ा की ज़रूरत नहीं होगी. भरोसा बढ़ने के कारण दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का यह स्वर्णकाल है. दोनों देशों के नागरिकों के बीच भी संबंध बहुत गहरे हैं और दोनों देशों की सरकारें इस और मज़बूत करना चाहती हैं.''

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इमेज कैप्शन, 1974 में ज़ुल्फ़ीकार अली भुट्टो बांग्लादेश के दौर पर गए थे

लेकिन बांग्लादेश क्यों चाहता है कि 1971 की जंग को भारत-पाकिस्तान का युद्ध ना कहा जाए?

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो सुशांत सरीन कहते हैं, ''तथ्यात्मक रूप से ये बिल्कुल सही बात है कि जंग बांग्लादेश बनाने के लिए हुई थी. भारत भी बांग्लादेश के समर्थन में था और उसने इस युद्ध को लड़ा. भारत ने बांग्लादेश बनाने में मदद की. हालाँकि भारत में भी इसे भारत और पाकिस्तान की जंग के तौर पर ही देखा जाता है लेकिन भारत की सरकार को 1971 की जंग को मुक्ति संग्राम कहने में कोई गुरेज़ नहीं है.''

सुशांत सरीन कहते हैं, ''बांग्लादेश के विदेश मंत्री की आपत्ति सही है क्योंकि पाकिस्तान इसके ज़रिए दिखाना चाहता है कि उसकी सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान में कोई जुल्म नहीं ढाया और ये हिन्दुओं की साज़िश थी. इसीलिए पाकिस्तान चाहता है कि वो इस जंग को भारत बनाम पाकिस्तान दिखाए और ईस्ट पाकिस्तान में अपने जुल्म को ढँक दे.''

''अभी बलूचिस्तान में जो कुछ भी हो रहा है, इसके लिए वहाँ की सरकार ही ज़िम्मेदार है लेकिन वो भारत की साज़िश बता देता है. पाकिस्तान कभी स्वीकार करना नहीं चाहता है कि बांग्लादेश का बनना उसके अत्याचार की कहानी है. ऐसे में बांग्लादेश के विदेश मंत्री का यह कहना बिल्कुल सही है कि 1971 की जंग भारत-पाकिस्तान का युद्ध नहीं बल्कि बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम था.''

इंदिरा गांधी

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कई देशों में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं, ''1971 की जंग भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी लेकिन इसका मक़सद बांग्लादेश बनाना था. युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान ने वेस्टर्न फ्रंट से की. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने युद्ध में जाने का फ़ैसला लिया. वेस्टर्न फ़्रंट से हमने अपने बचाव के लिए लड़ाई शुरू की ताकि पाकिस्तान को आगे नहीं बढ़ने दिया जाए.''

''लेकिन ईस्टर्न फ़्रंट पर जो जंग शुरू हुई, उसका एक राजनीतिक मक़सद था. वो राजनीतिक मक़सद था- बांग्लादेश बनाना. वेस्टर्न फ़्रंट पर मक़सद था, पाकिस्तान को पीछे धकेलना. जंग का फ़ैसला युद्ध मैदान में ही होता है और वो मैदान ईस्टर्न फ़्रंट था. हमने जंग जीती और उसका राजनीतिक मक़सद भी पूरा हुआ. ऐसे में तकनीकी रूप से ये सही बात है कि 1971 का युद्ध भारत-पाकिस्तान के बीच नहीं बल्कि बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम था.''

राकेश सूद कहते हैं, ''पाकिस्तान किस मक़सद से इसे भारत-पाकिस्तान की जंग कहता है, इसे बांग्लादेश को ख़ुद ही बताना चाहिए. दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध हैं. दोनों देश इस्लामिक मुल्कों के संगठन ओआईसी के सदस्य हैं. दोनों में कोई दुराव नहीं है.''

इंदिरा गांधी

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बांग्लादेश पाकिस्तान संबंध

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर रहमान पाकिस्तान को लेकर बहुत सख़्त रहे हैं. यहाँ तक कि शेख मुजीब-उर रहमान ने बांग्लादेश को मान्यता दिए बिना पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़ीकार अली भुट्टो (बाद में प्रधानमंत्री) से बात करने से इनकार कर दिया था. पाकिस्तान भी शुरू में बांग्लादेश की आज़ादी को ख़ारिज करता रहा.

लेकिन पाकिस्तान के तेवर में अचानक परिवर्तन आया. फ़रवरी 1974 में ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस का समिट लाहौर में आयोजित हुआ. तब भुट्टो प्रधानमंत्री थे और उन्होंने मुजीब-उर रहमान को भी औपचारिक आमंत्रण भेजा. पहले मुजीब ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया लेकिन बाद में इसे स्वीकार कर लिया.

वीडियो कैप्शन, सऊदी ने पाकिस्तान के लिए उठाया बड़ा कदम

इस समिट के बाद भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच एक त्रिकोणीय समझौता हुआ. 1971 की जंग के बाद बाक़ी अड़चनों को सुलझाने के लिए तीनों देशों ने नौ अप्रैल, 1974 को समझौते पर हस्ताक्षर किए. पाकिस्तान 28 अगस्त, 1973 के भारत-पाकिस्तान समझौते में निर्दिष्ट ग़ैर-बंगालियों की सभी चार श्रेणियों को स्वीकार करने के लिए सहमत हुआ. पाकिस्तानी विदेश और रक्षा मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी किया गया. इस बयान में कहा गया कि पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश में किसी भी तरह का अपराध किया है तो यह खेदजनक है. जून 1974 में भुट्टो ढाका गए. इस दौरे में बांग्लादेश ने संपत्तियों के बँटवारे का मुद्दा उठाया. इस दौरे से दोनों देशों के संबंध में जमी बर्फ़ पिघली.

बांग्लादेश

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22 फ़रवरी 1974 को पाकिस्तान ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी थी. भुट्टो ने यह मान्यता ओआईसी समिट में ही देने की घोषणा की थी. ज़ुल्फ़ीकार अली भुट्टो ने मान्यता की घोषणा करते हुए कहा था, ''अल्लाह के लिए और इस देश के नागिरकों की ओर से हम बांग्लादेश को मान्यता देने की घोषणा करते हैं. कल एक प्रतिनिधिमंडल आएगा और हम सात करोड़ मुसलमानों की तरफ़ से उन्हें गले लगाएंगे.''

मान्यता देने के एक दिन बाद बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीब-उर रहमान लाहौर पहुँचे और एयरपोर्ट पर उनके स्वागत में भुट्टो खड़े थे. इससे पहले शेख मुजीब और भुट्टो की मुलाक़ात जनवरी, 1972 में हुई थी. तब भुट्टो राष्ट्रपति थे और उन्होंने 10 महीने से जेल में बंद मुजीब को मुक्त किया और उन्हें बांग्लादेश जाने की अनुमति दी थी.

वीडियो कैप्शन, ‘भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश एक देश बन जाएं तो’

पाकिस्तान पर मुस्लिम देशों का दबाव था कि वो बांग्लादेश को स्वीकार करे और मान्यता दे. मिस्र, इंडोनेशिया और सऊदी अरब का काफ़ी दबाव था. इनका कहना था कि इस्लामिक दुनिया में एकता होनी चाहिए और इसके लिए ज़रूरी है कि पाकिस्तान बांग्लादेश को स्वीकार करे.

बांग्लादेश को मान्यता देने पर भुट्टो ने कहा था, ''मैं ये नहीं कहता कि मुझे यह फ़ैसला पसंद है. मैं ये नहीं कह सकता कि मेरा मन ख़ुश है. यह कोई अच्छा दिन नहीं है लेकिन हम हक़ीक़त को नहीं बदल सकते. बड़े देशों ने बांग्लादेश को मान्यता देने की सलाह दी लेकिन हम सुपरपावर और भारत के सामने नहीं झुके. लेकिन ये अहम वक़्त है. जब मुस्लिम देश बैठक कर रहे हैं, तब हम नहीं कह सकते कि दबाव में हैं. ये हमारे विरोधी नहीं हैं, जो बांग्लादेश को मान्यता देने के लिए कह रहे हैं. ये हमारे दोस्त हैं, भाई हैं.''

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