नवंबर, 1975: बांग्लादेश के इतिहास के कुछ अशांत और खून-खराबे वाले दिन

    • Author, मीर साबिर
    • पदनाम, बीबीसी बांग्ला

बांग्लादेश की आज़ादी के महज चार साल बाद साल 1975 के नवंबर के पहले हफ़्ते में बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान की सपरिवार हत्या के बाद देश में अराजकता का जो माहौल पैदा हुआ था, सात दिनों की खूनी घटनाएं उसी का नतीजा थीं.

बाएं से- खालिद मुशर्रफ, कर्नल ताहिर और जियाउर रहमान
इमेज कैप्शन, बाएं से- खालिद मुशर्रफ, कर्नल ताहिर और जियाउर रहमान

तख्तापलट-जवाबी तख्तापलट की शुरुआत

15 अगस्त, 1975 के हत्याकांड के बाद खांडकर मुश्ताक अहमद ने इससे जुड़े प्रमुख लोगों के साथ राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली. लेकिन खांडकर मुश्ताक के सामने रहने के बावजूद हत्याकांड में सीधे शामिल सेना के अधिकारी काफी ताकतवर थे.

उस समय राष्ट्रपति जियाउर रहमान को सेना प्रमुख बनाने के बावजूद शेख मुजीबुर रहमान के हत्या में शामिल कुछ मेजर बंगभवन से सेना के ज्यादातर मामले नियंत्रित कर रहे थे.

इसके तीन महीने बाद ही नवंबर के प्रथम सप्ताह में जो तख्तापलट और जवाबी तख्तापलट होने जा रहा था उसकी पृष्ठभूमि सत्ता के इस खूनी तरीके से पाला बदलने के कारण ही तैयार हुई थी.

तख्तापलट की कई वजहों के चर्चा में रहने के बावजूद सेना के कई तत्कालीन अधिकारी मानते हैं कि 15 अगस्त को बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की सपिरवार हत्या के बाद सेना में जो अराजकता पैदा हुई थी, नवंबर का तख्तापलट और जवाबी तख्तापलट उसी का एक नतीजा था.

सेना में कई लोग कनिष्ठ सैन्य अधिकारियों द्वारा शक्ति के प्रदर्शन को स्वीकार नहीं कर सके. इसके अलावा एक और संघर्ष था, जो बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के समय से शुरू हुआ था.

सेना की अंदरूनी कलह

ऑडियो कैप्शन, शेख़ मुजीबुर रहमान: एक क्रांतिकारी से राष्ट्रपिता तक

मुक्ति युद्ध के दौरान बांग्लादेश सेना के तीन अधिकारी काफी लोकप्रिय हुए थे.

सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर सखावत हुसैन बताते हैं कि युद्ध के बाद से इन तीन अधिकारियों ने सेना के भीतर अपने प्रभाव के तीन क्षेत्र बनाए थे.

ब्रिगेडियर हुसैन उस समय ढाका में 46 ब्रिगेड में मेजर स्तर के एक प्रमुख स्टाफ अफसर थे. वह जिन तीन सैन्य अधिकारियों के बारे में बात कर रहे हैं वे थे जियाउर रहमान, खालिद मोशर्रफ और केएम शफीउल्लाह.

ब्रिगेडियर हुसैन कहते हैं, "यह द्वंद्व या टकराव पहले भी था. लेकिन 15 अगस्त के बाद यह सतह पर आ गया. जनरल शफीउल्लाह लगभग बाहर हो गए और जनरल जिया भीतर आए. जनरल जिया के दायरे में आने के बाद उनके और ब्रिगेडियर खालिद के बीच टकराव और तेज हो गया."

ऑडियो कैप्शन, बांग्लादेश के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन

15 अगस्त के हत्याकांड के करीब दस दिन बाद मेजर जनरल केएम शफीउल्लाह को सेना प्रमुख के पद से हटा दिया गया. बीबीसी के साथ बातचीत में उनका कहना था कि उसके बाद से वे परिदृश्य में नहीं था और ज्यादातर सेना प्रमुख वाले आवास में नजरबंद के तौर पर ही रह रहे थे.

शफीकुल्लाह नवंबर के घटनाक्रम को खालिद मुशर्रफ और जियाउर रहमान के आपसी टकराव के नतीजे के तौर पर देखते हैं.

उनका कहना था, "भविष्य अंधकरामय देख कर खालिद मुशर्रफ ने जियाउर रहमान को हटा देना चाहते थे. उनको हटा कर घर में ही नजरबंद कर दिया गया था और खुद ही चीफ ऑफ स्टाफ का पद ग्रहण किया. लेकिन आखिर वे इस पद पर नहीं रह सके औऱ उसी घटना के कारण सात तारीख को जियाउर रहमान ने ताहिर को साथ लेकर खालिद मुशर्रफ के इस गुट को हटा दिया."

उनका कहना था कि परिदृश्य में नहीं रहने के बावजूद उनको इस बात का आभास हो रहा था कि सेना में तनाव पनप रहा है. खालिद मोहम्मद के नेतृत्व में तख्तापलट की पृष्ठभूमि वहीं से तैयार हुई थी.

सेना की अंदरूनी कलह

साल 1975 ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) सखावत हुसैन ढाका में मेजर की हैसियत से पोस्टेड थे
इमेज कैप्शन, साल 1975 ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) सखावत हुसैन ढाका में मेजर की हैसियत से पोस्टेड थे

मुक्ति युद्ध के दौरान बांग्लादेश सेना के तीन अधिकारी काफी लोकप्रिय हुए थे.

सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर सखावत हुसैन बताते हैं कि युद्ध के बाद से इन तीन अधिकारियों ने सेना के भीतर अपने प्रभाव के तीन क्षेत्र बनाए थे.

ब्रिगेडियर हुसैन उस समय ढाका में 46 ब्रिगेड में मेजर स्तर के एक प्रमुख स्टाफ अफसर थे. वह जिन तीन सैन्य अधिकारियों के बारे में बात कर रहे हैं वे थे जियाउर रहमान, खालिद मोशर्रफ और केएम शफीउल्लाह.

ब्रिगेडियर हुसैन कहते हैं, "यह द्वंद्व या टकराव पहले भी था. लेकिन 15 अगस्त के बाद यह सतह पर आ गया. जनरल शफीउल्लाह लगभग बाहर हो गए और जनरल जिया भीतर आए. जनरल जिया के दायरे में आने के बाद उनके और ब्रिगेडियर खालिद के बीच टकराव और तेज हो गया."

वीडियो कैप्शन, 1971 की जंग में बीएसएफ़ ने जीत का रास्ता कैसे तैयार किया था?

15 अगस्त के हत्याकांड के करीब दस दिन बाद मेजर जनरल केएम शफीउल्लाह को सेना प्रमुख के पद से हटा दिया गया. बीबीसी के साथ बातचीत में उनका कहना था कि उसके बाद से वे परिदृश्य में नहीं था और ज्यादातर सेना प्रमुख वाले आवास में नजरबंद के तौर पर ही रह रहे थे.

शफीकुल्लाह नवंबर के घटनाक्रम को खालिद मुशर्रफ और जियाउर रहमान के आपसी टकराव के नतीजे के तौर पर देखते हैं.

उनका कहना था, "भविष्य अंधकरामय देख कर खालिद मुशर्रफ ने जियाउर रहमान को हटा देना चाहते थे. उनको हटा कर घर में ही नजरबंद कर दिया गया था और खुद ही चीफ ऑफ स्टाफ का पद ग्रहण किया. लेकिन आखिर वे इस पद पर नहीं रह सके औऱ उसी घटना के कारण सात तारीख को जियाउर रहमान ने ताहिर को साथ लेकर खालिद मुशर्रफ के इस गुट को हटा दिया."

उनका कहना था कि परिदृश्य में नहीं रहने के बावजूद उनको इस बात का आभास हो रहा था कि सेना में तनाव पनप रहा है. खालिद मोहम्मद के नेतृत्व में तख्तापलट की पृष्ठभूमि वहीं से तैयार हुई थी.

तख्तापलट और तीन नवंबर का जेल हत्याकांड

सैयद नज़रुल इस्लाम, ताजुद्दीन अहमद (बाएं से)
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समाप्त

तीन नवंबर के कुछ शुरुआती पलों में बांग्लादेश के इतिहास को बदलने वाली दो घटनाएं हुईं. इनमें से एक था तख्तापलट और दूसरा ढाका जेल में हुआ एक हत्याकांड.

आधी रात के बाद कालिद मुशर्रफ के नेतृत्व में हुए तख्तापलट में तत्कालीन सेना प्रमुख जियाउर रहमान को बंदी बना लिया गया.

ढाका कैंटोनमेंट से एक इन्फैंट्री यूनिट बंग भवन का घेराव करने पहुंची और सेना की एक अन्य यूनिट ने रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया.

ब्रिगेडियर सखावत हुसैन बताते हैं कि बंगभवन के चारों ओर सेना के इतने जवान थे कि भीतर मौजूद मेजर डालिम और मेजर नूर समेत सेना के तमाम अधिकारी कोई जवाबी कार्रवाई नहीं कर सके. उस दौरान आसमान में युद्धक विमान भी उड़ान भरते नजर आए.

वह बताते हैं, "जब बंगभवन के ऊपर दो या तीन लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी तो उनलोगों ने मान लिया कि उनके पास अब समय नहीं बचा है और उनको आत्मसमर्पण करना होगा."

उस दिन सुबह से ही सुलह की एक कोशिश चल रही थी. मेजर डालिम और मेजर नूर ने कई बार कैंटोनमेंट जाकर खालिद मुशर्रफ के साथ मुलाकात की. दिन भर चली बैठकों के कई दौर के बाद शाम को यह तय हुआ कि उन लोगों को देश छोड़ कर जाना होगा.

वीडियो कैप्शन, मास्टरजी के नाम से मशहूर हैं मेगनभाई पटेल

उसी रात को बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या में शामिल सेना के कई अधिकारियों को लेकर एक विमान को थाईलैंड जाने की अनुमति दे दी गई.

दूसरी ओर, उसी रात केंद्रीय जेल में एक हत्याकांड हो गया. कुछ सैन्य अधिकारियों ने 1971 की प्रवासी सरकार के अस्थायी राष्ट्रपति सैयद नजरुल इस्लाम, प्रधानमंत्री ताजुद्दीन अहमद, तत्कालीन सरकार के वित्त मंत्री एम मंसूर अली और गृह मंत्री एएचएम कमरुज्जमा की हत्या कर दी.

ढाका केंद्रीय जेल के तत्कालीन जेलर अमीनुर रहमान ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में बताया कि रात को एक से डेढ़ बजे के बीच एक पिकअप वैन में सेना के कुछ अधिकारी जेल के गेट पर पहुंचे. उस समय आईजी (प्रिजन) का फोन पाकर वे भी वहां पहुंचे. उसके कुछ देर बाद उनके दफ्तर के फोन की घंटी बज उठी.

रहमान बताते हैं, "फोन उठाते ही दूसरी ओर से कहा गया कि प्रेसीडेंट आईजी साहब से बात करेंगे. बातचीत खत्म होते ही आईजी साहब ने बताया कि प्रेसीडेंट ने फोन किया था. उन्होंने कहा कि आप वही करें जो सेना के अधिकारी चाहते हैं."

उसके बाद आईजी ने अमीनुर रहमान के हाथ में चार लोगों का नाम लिखा एक कागज पकड़ा कर कहा कि इन सबको एक जगह इकठ्ठा करो.

रहमान ने बताया, "सैयद नजरुल इस्लाम और ताजुद्दीन एक कमरे में थे और बाकी दो लोग दूसरे कमरे में. तो मैंने कमरा खोला कर उनको बाहर निकाला. मैंने सोचा कि बातचीत करेंगे तो परिचय करा देता हूं. मंसूर अली साहब सबसे दक्षिण की ओर थे. उनका परिचय देने के लिए महज म..... का उच्चारण करते ही गोली मार दी. गोली मारने के बाद वह लोग खुले गेट से दौड़ कर बाहर भाग गए."

सखावत हुसैन बताते हैं कि इस जेल हत्याकांड की खबर तत्काल नहीं फैली. इसकी सूचना सैन्य अधिकारियों तक चार नवंबर को सुबह पहुंची.

तख्तापलट और तीन नवंबर का जेल हत्याकांड

कैप्टन एम मंसूर अली और एएचएम कमरुज़्ज़मान (बाएं से)
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तीन नवंबर के कुछ शुरुआती पलों में बांग्लादेश के इतिहास को बदलने वाली दो घटनाएं हुईं. इनमें से एक था तख्तापलट और दूसरा ढाका जेल में हुआ एक हत्याकांड.

आधी रात के बाद कालिद मुशर्रफ के नेतृत्व में हुए तख्तापलट में तत्कालीन सेना प्रमुख जियाउर रहमान को बंदी बना लिया गया.

ढाका कैंटोनमेंट से एक इन्फैंट्री यूनिट बंग भवन का घेराव करने पहुंची और सेना की एक अन्य यूनिट ने रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया.

ब्रिगेडियर सखावत हुसैन बताते हैं कि बंगभवन के चारों ओर सेना के इतने जवान थे कि भीतर मौजूद मेजर डालिम और मेजर नूर समेत सेना के तमाम अधिकारी कोई जवाबी कार्रवाई नहीं कर सके. उस दौरान आसमान में युद्धक विमान भी उड़ान भरते नजर आए.

वह बताते हैं, "जब बंगभवन के ऊपर दो या तीन लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी तो उनलोगों ने मान लिया कि उनके पास अब समय नहीं बचा है और उनको आत्मसमर्पण करना होगा."

उस दिन सुबह से ही सुलह की एक कोशिश चल रही थी. मेजर डालिम और मेजर नूर ने कई बार कैंटोनमेंट जाकर खालिद मुशर्रफ के साथ मुलाकात की. दिन भर चली बैठकों के कई दौर के बाद शाम को यह तय हुआ कि उन लोगों को देश छोड़ कर जाना होगा.

उसी रात को बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या में शामिल सेना के कई अधिकारियों को लेकर एक विमान को थाईलैंड जाने की अनुमति दे दी गई.

वीडियो कैप्शन, भारतीय सेना के बागी जनरल शाबेग सिंह की कहानी. Vivechana

दूसरी ओर, उसी रात केंद्रीय जेल में एक हत्याकांड हो गया. कुछ सैन्य अधिकारियों ने 1971 की प्रवासी सरकार के अस्थायी राष्ट्रपति सैयद नजरुल इस्लाम, प्रधानमंत्री ताजुद्दीन अहमद, तत्कालीन सरकार के वित्त मंत्री एम मंसूर अली और गृह मंत्री एएचएम कमरुज्जमा की हत्या कर दी.

ढाका केंद्रीय जेल के तत्कालीन जेलर अमीनुर रहमान ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में बताया कि रात को एक से डेढ़ बजे के बीच एक पिकअप वैन में सेना के कुछ अधिकारी जेल के गेट पर पहुंचे. उस समय आईजी (प्रिजन) का फोन पाकर वे भी वहां पहुंचे. उसके कुछ देर बाद उनके दफ्तर के फोन की घंटी बज उठी.

रहमान बताते हैं, "फोन उठाते ही दूसरी ओर से कहा गया कि प्रेसीडेंट आईजी साहब से बात करेंगे. बातचीत खत्म होते ही आईजी साहब ने बताया कि प्रेसीडेंट ने फोन किया था. उन्होंने कहा कि आप वही करें जो सेना के अधिकारी चाहते हैं."

उसके बाद आईजी ने अमीनुर रहमान के हाथ में चार लोगों का नाम लिखा एक कागज पकड़ा कर कहा कि इन सबको एक जगह इकठ्ठा करो.

रहमान ने बताया, "सैयद नजरुल इस्लाम और ताजुद्दीन एक कमरे में थे और बाकी दो लोग दूसरे कमरे में. तो मैंने कमरा खोला कर उनको बाहर निकाला. मैंने सोचा कि बातचीत करेंगे तो परिचय करा देता हूं. मंसूर अली साहब सबसे दक्षिण की ओर थे. उनका परिचय देने के लिए महज म..... का उच्चारण करते ही गोली मार दी. गोली मारने के बाद वह लोग खुले गेट से दौड़ कर बाहर भाग गए."

सखावत हुसैन बताते हैं कि इस जेल हत्याकांड की खबर तत्काल नहीं फैली. इसकी सूचना सैन्य अधिकारियों तक चार नवंबर को सुबह पहुंची.

सक्रिय हुई जसद जन वाहिनी

 प्रोफ़ेसर अनवर हुसैन उस दौर में ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस फोर्स के प्रमुख थे
इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर अनवर हुसैन उस दौर में ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस फोर्स के प्रमुख थे

तीन नवंबर के बाद के कुछ दिनों के दौरान जातीय समाजतांत्रिक दल या जसद जन वाहिनी को सक्रिय होते देखा गया. कर्नल ताहिर के नेतृत्व में इस जन वाहिनी ने अगले तख्तापलट में अहम भूमिका निभाई थी.

कर्नल ताहिर के भाई और जन वाहिनी के तत्कालीन ढाका महानगर प्रमुख अध्यापक अनवर हुसैन बताते हैं कि कर्नल ताहिर को जियाउर रहमान से ही खालिद मुशर्रफ के नेतृत्व में तख्तापलट की सूचना मिली. उन्होंने कहा, "जियाउर रहमान ने तीन नवंबर की सुबह कर्नल ताहेर को फोन किया था. उन्होंने ताहिर से कहा कि उन्होंने मुझे बंदी बना लिया है. मेरी जान खतरे में है."

हुसैन बताते हैं कि जियाउर रहमान का मुख्य टेलीफोन कनेक्शन काट दिया गया था. लेकिन एक समानांतर लाइन चालू रहने की वजह से वे फोन कर सके थे.

कर्नल ताहिर ने वर्ष 1972 में सेना से इस्तीफा दिया था. इसके बाद वे सीधे जसद की राजनीति के साथ जुड़ गए. इसी दौरान सैन्य कर्मियों को लेकर सैन्य संगठन और जन वाहिनी का गठन किया गया. हालांकि उस समय यह मामला सार्वजनिक नहीं था.

प्रोफेसर अनवर हुसैन बताते हैं कि तीन नवंबर को ही कर्नल ताहिर हुसैन नारायणगंज से ढाका पहुंचे और उसके बाद से ही सैन्य संगठन के सदस्यों सहित सेना के जवान उनसे मिलने आने लगे. खालिद मुशर्रफ ने सत्ता भले अपने हाथों में ले ली थी, वे जल्दी किसी सरकार का गठन नहीं कर सके. इसी बीच, अस्पष्ट तरीके से जेल हत्याकांड हो गया. कुल मिला कर कई दिन सरकार विहीन हालत में ही गुजरे थे.

वह कहते हैं, "इस दौरान जसद, जन वाहिनी और ताहिर सैन्य कर्मियों के साथ लगातार बातचीत करते रहे. पांच और छह नवंबर को जन वाहिनी और सक्रिय और संगठित होने लगी. कर्नल ताहिर के नेतृत्व में तख्तापलट की योजना बनने लगी."

वीडियो कैप्शन, जब मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों ने भारतीय पायलट की जान बचाई. Vivechna

सखावत हुसैन बताते हैं कि छह तारीख की शाम को कैंटोनमेंट के भीतर जन वाहिनी के नाम पर पर्चे बांटने के बाद यह साफ हो गया था कि वह कुछ करने जा रही है.

उस पर्चे की एक प्रति ब्रिगेडियर सखावत ने भी देखी थी. उसमें खालिद मुशर्रफ, शफायत जमील और कर्नल हुदा को भारतीय जासूस के तौर पर प्रचारित किया गया था.

इस बीच, न्यायमूर्ति अबू सादात मोहम्मद सईम को राष्ट्रपति के तौर पर शपथ दिलाई गई. लेकिन यह बात पूरी तरह साफ नहीं थी कि प्रशासन और सेना में वास्तव में क्या चल रहा है.

वह बताते हैं, "कहीं कोई होमवर्क नहीं था. सब अपने तरीके से काम कर रहे थे. इस अराजक परिस्थिति में छह तारीख की रात को जब सेना के जवानो के बीच वह पर्चा बांटा गया तो यह साफ हो गया था कि कैंटोनमेंट के भीतर जन वाहिनी नामक एक ताकत काम कर रही है."

जनवाहिनी के विद्रोह की मूल योजना छह नवंबर की शाम को बनी.

प्रोफेसर हुसैन बताते हैं, "एक विशाल हॉल में सेना के करीब 60-70 लोग थे. वहां जनवाहिनी के स्थानीय नेतृत्व में कर्नल ताहिर और उनके बाद नंबर दो पर रहे हसनुल हक इनु और मैं खुद भी था. वहीं सबकी जिम्मेदारी बांट दी गई."

उन्होंने बताया कि दलगत तौर पर जसद का फैसला था कि पूरी तैयारी के साथ नौ नवंबर को तख्तापलट होगा. लेकिन कैंटोनमेंट की परिस्थिति लेकिन जब कैंटोनमेंट का माहौल और गरमा गया तो उसी रात को विद्रोह का निर्णय लिया गया.

सात नवंबर का जवाबी तख्तापलट

सात नवंबर के तख्तापलट के बाद की एक तस्वीर जो दैनिक बांग्ला अख़बार में छपी थी

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जवाबी तख्तापलट 7 नवंबर की रात को ही शुरू हो गया.

केएम शफीउल्लाह बताते हैं, "सैनिकों नारे लगा रहे थे कि सिपाही-सिपाही भाई-भाई, जेसीओ छोड़ कर दूसरा रैंक नहीं. जवानों में एक हताशा पैदा हो गई थी. उनकी सोच थी कि अधिकारी उनका इस्तेमाल कर ऊपर पहुंचे हैं. लेकिन किसी को उनकी कोई फिक्र नहीं है. जियाउर रहमान को उसी रात आजाद करा लिया गया."

सात तारीख की रात को कैंटोनमेंट से गोलीबारी की आवाजें आने लगीं. विद्रोहियों ने कई सेना अधिकारियों की हत्या कर दी. जन वाहिनी जियाउर रहमान को बाहर नहीं निकाल सकी. फोर बंगाल और टू फील्ड रेजिमेंट ने उनको रात के समय बाहर निकाला.

सखावत हुसैन बताते हैं कि अगले दिन सुबह उन्होंने जन वाहिनी के सदस्यों और कुछ सैन्यकर्मियों के साथ कर्नल ताहिर को सैन्य आवास में देखा था.

उसके बाद जियाउर रहमान के साथ बातचीत के दौरान दोनों के कुछ गरमा-गरम बहस भी हुई. वह कहते हैं, "ताहिर चाहते थे कि जियाउर रहमान रेडियो पर जन वाहिनी की तेरह-सूत्री मांगों की घोषणा करें और कहें कि उन्होंने यह तमाम मांगे मान ली हैं. लेकिन वे नहीं गए. उन्होंने इससे पहले ही अपना भाषण रिकॉर्ड कर रेडियो स्टेशन भेज दिया था. यहीं से ताहिर और जिया का अलगाव हुआ.

वीडियो कैप्शन, जनरल इंदर गिल, जिन्होंने सैम मानेकशॉ से टक्कर ली थी. Vivechna

ब्रिगेडियर सखावत हुसैन बताते हैं, "सात नवंबर को तख्तापलट के समय जवानों के साथ कई लोग सिविल ड्रेस में हथियारों के साथ हिस्सा लेते देखे गए थे."

प्रोफेसर हुसैन बताते हैं कि इस तख्तापलट में जन वाहिनी अपने असैनिक सदस्यों को शामिल नहीं कर सकी थी. उनका कहना था, "जसद जिस मकसद से इस विद्रोह में शामिल हुआ था उसके नाकाम होने की यह भी एक वजह थी."

यह तय हुआ था कि सेना के जवान जियाउर रहमान को कैंटोनमेंट से एलीफैंट रोड ले आएंगे. कर्नल ताहिर समेट जसद के नेता वहीं एक मकान में रह रहे थे. लेकिन वह लोग ऐसा नहीं कर सके.

प्रोफेसर हुसैन बताते हैं, "जन वाहिनी के साथ जुड़े सेना के जवानों ने ही जियाउर रहमान को आजाद कराया था. जियाउर रहमान ने उनसे कहा था कि कर्नल ताहिर उनके मित्र हैं और वह लोग उनको ही यहां ले आएं. इस प्रकार वे कुछ हद तक धोखा खा गए. वह लोग निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं कर सके."

दूसरी ओर, सात नवंबर को सुबह ही कर्नल केएन हुदा के साथ ढाका में रंगपुर से आए 10 ईस्ट बंगाल रेजिमेंट में खालिद मुशर्रफ, कर्नल केएन हुदा और लेफ्टिनेंट कर्नल एटीएम हैदर की हत्या कर दी गई. इस बात की कहीं कोई ठोस जांच नहीं हुई कि खालिद मोहम्मद की हत्या किसके निर्देश पर और क्यों की गई थी. उस हत्या की अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई है.

सत्ता के केंद्र में जियाउर रहमान

जियाउर रहमान साल 1981 तक सत्ता में रहे

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अनवर हुसैन बताते हैं, "जियाउर रहमान के रेडियो पर भाषण के बाद तख्तापलट में जन वाहिनी की भूमिका दब गई और आम लोगों में यह धारणा बन गई कि यह पूरी तरह जियाउर रहमान का तख्तापलट है."

सात नवंबर के बाद जियाउर रहमान सत्ता के केंद्र में आ गए. इसके कुछ दिनों बाद 24 नवंबर को कर्नल ताहिर को गिरफ्तार कर लिया गया और वर्ष 1976 की 21 जुलाई को राष्ट्रद्रोह के आरोप में उनको फांसी पर चढ़ा दिया गया.

इसके वर्षों बाद वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कर्नल ताहिर के खिलाफ उस मुकदमे को अवैध घोषित किया था.

जियाउर रहमान ने वर्ष 1981 तक उप-प्रमुख सैन्य कानून प्रशासक और उसके बाद प्रेसीडेंट के तौर पर जिम्मेदारी संभाली. मई, 1981 में एक नाकाम तख्तापलट के दौरान उनकी हत्या कर दी गई.

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