पाकिस्तान ने 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश की मुहिम को कैसे रिपोर्ट किया था?

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- Author, फ़ारूक़ आदिल
- पदनाम, लेखक, स्तंभकार
साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में जो कुछ हुआ, उसे बताने के लिए दो तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. पाकिस्तान में इसे 'गृहयुद्ध' या अलगाववादी आंदोलन कहा गया, जबकि बांग्लादेश में इसे 'स्वतंत्रता संग्राम' बताया गया.
ऐसे में सवाल उठता है कि तब के पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बार इस हालात को कैसे कवर कर रहे थे? यह सवाल वैसे तो कोई बड़ा पिटारा तो नहीं खोलता, लेकिन तब के अख़बारों को देखने पर एक दिलचस्प स्थिति ज़रूर सामने आती है.
बांग्लादेश के नज़रिए से 7 मार्च, 1971 का दिन बड़ा अहम है. 1970 के चुनावों में सबसे बड़ी बनकर उभरने वाली पार्टी के नेता के रूप में शेख़ मुजीब-उर-रहमान ने इसी दिन सरकार को एक अल्टीमेटम दिया था कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो 'अलगाव' तय है.

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शेख़ मुजीब का 7 मार्च का भाषण
ढाका के पलटन मैदान में हुए इस भाषण के बारे में कहा जाता है कि उस दिन वहां 10 लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे. सभा में शामिल होने वालों की वास्तविक संख्या जो भी हो, यह एक संगठित सभा थी, जिसमें मंच तक पहुंचने के लिए एक विशेष रास्ता बनाया गया था.
शेख़ मुजीब-उर-रहमान की गाड़ी पूरे प्रोटोकॉल के साथ मंच तक पहुंची. वहां मौजूद नेताओं ने उनका स्वागत किया और वे रस्सियों का सहारा लेकर सीढ़ियां चढ़ने लगे. जैसे ही मंच पर उनका पहला क़दम पड़ा, पूरा माहौल एक नारे के साथ गूंज उठा: 'आमार देश तोमार देश, बांग्लादेश, बांग्लादेश.'
इस बीच शेख़ मुजीब अपने साथियों की भीड़ में धीरे-धीरे मंच पर आगे बढ़ते रहे और किनारे पर पहुंचकर हाथ हिलाकर लोगों के नारों का जवाब दिया.
ठीक उसी समय, एक असामान्य नज़ारा दिखा. उनके सिर के ठीक ऊपर बांग्लादेश का झंडा लहराता दिखाई दिया. ध्यान रहे कि यह बांग्लादेश के गठन से ठीक 8 महीने पहले की बात है.

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क्या कहा शेख़ मुजीब ने?
इस बीच शेख़ मुजीब ने अपना बायां गाल खुजाया और लोगों को शांत होने का इशारा करते हुए बोलने लगे. चश्मा उतार कर उसे सामने रखा और बहुत ही शांति से अपना भाषण शुरू किया. उन्होंने दर्शकों को धीमे अंदाज़ में संबोधित किया:
"भाई आमार (मेरे भाइयो)!"
लोगों को संबोधित करने के बाद उन्होंने संयुक्त पाकिस्तान के 26 साल के इतिहास और उस अवधि के दौरान लगे मार्शल लॉ के बारे में संक्षेप में बताया. इसके तुरंत बाद उन्होंने उस समय के हालात की समीक्षा पेश की.
उन्होंने कहा: ''मैंने मांग की थी कि 15 फ़रवरी, 1971 को नेशनल असेंबली का सत्र बुलाया जाए. बहुमत दल के नेता की हैसियत से उन्हें (जनरल याह्या को) मेरी बात माननी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने देरी करने की रणनीति अपनाई. कम सीटों वाले दल के नेता मिस्टर भुट्टो से सलाह मशविरा किया और 3 मार्च को सत्र बुलाया. हम इस पर भी सहमत हो गए, लेकिन हमने स्पष्ट कर दिया कि 6 बिंदुओं पर कोई समझौता नहीं हो सकता.''
''दूसरी ओर, भुट्टो ने डेडलॉक पैदा कर दिया और कहा कि यदि यह सेशन हुआ, तो पश्चिमी पाकिस्तान को जाम कर दिया जाएगा. इन धमकियों के बावजूद सेशन की तैयारी जारी रही. लेकिन फिर सेशन स्थगित हो गया और एक गोलमेज़ सम्मेलन बुलाया गया. किस तरह का गोलमेज सम्मेलन? क्या मैं ऐसे सम्मलेन में उन लोगों के साथ बैठूं, जिन्होंने मेरी माताओं और बहनों की गोद उजाड़ी है?
"उसके बाद, मैंने मजबूर हो कर एक असहयोग (सविनय अवज्ञा) आंदोलन शुरू कर दिया. फिर मुझ पर और बंगालियों पर आरोप लगाए गए. अब 25 मार्च, 1971 को एक बार फिर नेशनल असेंबली का सत्र बुलाया गया है. सत्र में शामिल होना है या नहीं, यह फ़ैसला हम बाद में तय करेंगे, पहले हमारी 4 मांगें मानी जाएं."
इस अवसर पर उन्होंने जो मांगें रखी वह इस प्रकार थीं: पहला, मार्शल लॉ को तत्काल समाप्त किया जाए, दूसरा, सेना को बैरक में तुरंत वापस भेजा जाए, तीसरा, लोगों के हत्यारों को उनके अंज़ाम तक पहुंचाया जाए और चौथा, जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को फ़ौरन सत्ता दी जाए.

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सरकार से असहयोग करने का एलान
अपनी मांगों को पेश करते हुए उन्होंने कहा: "मैं अदालतों, सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की घोषणा करता हूं. मैं (लोगों को) निर्देश देता हूं कि मेरी अनुमति के बिना सरकारी कार्यालयों में कोई न जाए.
इस मौक़े पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट (क्वेटा रजिस्ट्री), हाईकोर्ट, सचिवालय, सभी सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों को भी अनिश्चित समय के लिए बंद करने की घोषणा की.
उन्होंने कहा: "पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिमी पाकिस्तान में कोई पैसा नहीं जाएगा. हर चीज़ को जाम कर दिया जाएगा. टेलीफ़ोन और टेलीग्राफ़ सेवा केवल पूर्वी पाकिस्तान तक ही सीमित रहेगी. अगर ख़ून ख़राबा होता है, तो अपने घरों को क़िले बना लेना और दुश्मन से निपटने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, किया जाए. सड़कें बंद कर दी जाए. उन्होंने शासकों या सेना का नाम लिए बिना कहा कि उनका भोजन और पानी तक बंद कर दिया जाए. जब तक हमारी ज़मीन आज़ाद नहीं हो जाती, तब तक कोई टैक्स न दिया जाए.''
इन घोषणाओं के बाद उन्होंने कहा, "अगर हम अपने मतभेद सुलझाने में सफल हो जाते हैं, तो उम्मीद के दरवाज़े खुले रहेंगे. नहीं तो हम कभी एक दूसरे का चेहरा नहीं देखेंगे."
उन्होंने कहा, "अगर हमारे आंदोलन को कवरेज नहीं दी जाती, तो लोग रेडियो सुनना और टेलीविज़न देखना बंद कर दें. शासक भूल जाएं कि भविष्य में अब कभी जनता को सैन्य शासन के लिए ग़ुलाम बनाया जा सकेगा. यह संघर्ष का समय है, स्वतंत्रता के संघर्ष का और यक़ीन रखें कि हम अपनी जनता को आज़ादी दिलाकर रहेंगे."
उन्होंने 'जॉय बांग्ला' शब्द के साथ अपना भाषण समाप्त किया.

पश्चिमी पाकिस्तान में शेख़ मुजीब के भाषण का कवरेज
इसकी सामग्री, लहजे के उतार चढ़ाव और शब्दों के चयन के लिहाज़ से यह भाषण संयुक्त पाकिस्तान के भविष्य के लिए बहुत अहम था, तो इस भाषण को पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में भी सामान्य से हटकर छापा गया.
सरकारी अख़बार दैनिक 'मशरिक़' ने अपने मास्टहेड (अख़बार के नाम से) भी ऊपर सामान्य से अधिक बोल्ड अक्षरों में इस ख़बर को प्रकाशित किया. अख़बार ने कंटेंट के लिहाज़ से इस भाषण को तीन हिस्सों में बांटा और तीन अलग-अलग ख़बरें छापीं. आठ कॉलम के शीर्षक के साथ प्रकाशित पहली ख़बर शेख़ मुजीब-उर-रहमान के 4 बिंदुओं पर आधारित थी.
ख़बर के इस हिस्से को असामान्य तौर पर प्रमुखता के साथ प्रकाशित करने के बावजूद, इसके कुछ बिंदुओं को असल अंदाज़ में प्रकाशित नहीं किया गया या उन्हें छोड़ दिया गया.
शेख़ मुजीब की 4 मांगों में से एक अहम मांग थी कि लोगों के हत्यारों को उनके अंज़ाम तक पहुंचाया जाए. ख़बर की सामग्री में इस बिंदु के बारे में लिखा गया कि फ़ायरिंग की जांच होनी चाहिए.
शीर्षक में इसे इन शब्दों में प्रकाशित किया गया था: ''हाल के दंगों में मारे जाने वालों के बारे में जांच कराई जाए''
संयुक्त पाकिस्तान के भविष्य के बारे में असाधारण अहमियत रखने वाले इस भाषण के कई और अहम बिंदु भी कवरेज में शामिल नहीं थे. इस कवरेज में सभा में बांग्लादेश का झंडा लहराए जाने और बांग्लादेश के नारों का कहीं कोई ज़िक्र नहीं था.
शेख़ मुजीब ने कहा था कि जब तक हमारी ज़मीन आज़ाद नहीं हो जाती, तब तक टैक्स अदा न किया जाए. ख़बर में इन बातों का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं था.
उन्होंने भुट्टो पर डेडलॉक पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने (भुट्टो ने) नेशनल असेंबली का सत्र बुलाये जाने पर विरोध के ज़रिए पश्चिमी पाकिस्तान को ब्लॉक करने और उसे बूचड़खाने में बदलने की धमकी दी. ख़बरों में ये भी शामिल नहीं था.
उन्होंने लोगों को रेडियो और टेलीविज़न का बहिष्कार करने का निर्देश देते हुए, इन संस्थानों के अधिकारियों से कहा था कि इस देश को नर्क बनाकर उन्हें एक दिन अपनी अंतरात्मा के सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा. यह बात भी नदारद थी.
समाचारों में बहिष्कार का ज़िक्र करते हुए बताया गया था कि उन्होंने संस्थानों को उनके आंदोलन की ख़बरें और बयान प्रसारित करने का निर्देश दिया है. शेख़ मुजीब के भाषण में यह बात शामिल नहीं थी.

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शेख़ मुजीबुर रहमान ने अपने भाषण में कहा था कि अगर हम भाइयों की तरह बैठकर समस्याओं का समाधान कर लें, तो उम्मीद बनी रहेगी. अन्यथा हम कभी एक-दूसरे का चेहरा नहीं देखेंगे (यानी हम अलग हो जाएंगे). ख़बरों में सबसे अहम यह बात भी शामिल नहीं थी.
ख़बर में सड़कों को बंद करने और सेना या प्रशासन का नाम लिए बिना उनके भोजन और पानी बंद करने के एलान ज़िक्र किया गया था.
उन्होंने सैन्य शासक याह्या ख़ान द्वारा बुलाए गए गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल न होने का एलान करते हुए कहा था कि क्या मैं अपने लोगों के हत्यारों के साथ बैठूं. यह बात भी रिपोर्ट मैं शामिल नहीं थी.
उनके भाषण का एक मुख्य बिंदु घरों को क़िले बना लेने और लक्ष्य हासिल होने तक आज़ादी के लिए संघर्ष जारी रखने के बारे में था, जो कि सरकार द्वारा संचालित अख़बार 'मशरिक़ में रिपोर्ट नहीं किया गया.
शेख़ मुजीब-उर-रहमान के इस भाषण से एक दिन पहले दैनिक 'नवा-ए-वक़्त' में उनका एक बयान प्रकाशित हो चुका था, जिसमें उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि वे जुल्फ़िकार अली भुट्टो के साथ सत्ता संभालने को तैयार हैं. और वे दो प्रधानमंत्रियों के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए भी तैयार हैं.
ध्यान रहे कि दो प्रधानमंत्रियों के प्रस्ताव को पीपुल्स पार्टी के प्रमुख जुल्फ़िकार अली भुट्टो का प्रस्ताव बताया जाता है.

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8 मार्च, 1971 के दैनिक मशरिक़ को देखने से पता चलता है कि असहयोग आंदोलन के प्रोग्राम के स्पष्टीकरण के लिए, शेख़ मुजीब-उर-रहमान का एक बयान जारी किया गया था. उस दिन के अख़बार में दूसरी सबसे अहम ख़बर यही थी.
उस समय के राजनैतिक परिदृश्य में धमाका कर देने वाले शेख़ मुजीब के इस भाषण से पहले, याह्या ख़ान ने 1 मार्च को नेशनल असेंबली का सत्र स्थगित करने का जब एलान किया था, तो उस समय अवामी लीग ने इसके विरोध में पूर्वी पाकिस्तान में हड़ताल करने की अपील की थी.
पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में उनकी ये अपील भी प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी.
दक्षिणपंथी विचारधारा की तरफ़ झुकाव रखने वाले अख़बार नवा-ए-वक़्त में उस दिन पहली बड़ी ख़बर नेशनल असेंबली सत्र के स्थगन की थी और दूसरी बड़ी ख़बर इस अपील के बारे में थी.
1 मार्च, 1971 को नेशनल असेंबली के स्थगन के बाद, पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर अशांति फ़ैल गई थी. इस अशांति के कारण कई शहरों में कर्फ्यू लगाने के हालात बन गए थे. यह ख़बर भी पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में प्रमुखता से छपी थी.

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बांग्लादेश सरकार के पोर्टल ने क्या बताया
शेख़ मुजीब-उर-रहमान की जन्म शताब्दी के मौक़े पर बांग्लादेश की सरकार ने उनके 100 अहम भाषणों वाला एक पोर्टल जारी किया था.
पोर्टल पर 23 मार्च, 1971 को बांग्ला भाषा में दिए गए उनके भाषण के वीडियो के परिचय में लिखा है कि पूर्वी पाकिस्तान में यह पहला दिन था, जब पाकिस्तान दिवस नहीं मनाया गया और न ही पाकिस्तानी झंडा फहराया गया.
इसके बजाय, पूरे प्रांत में बांग्लादेश का झंडा फहराया गया.
वीडियो के साथ लिखे गए लेख के अनुसार, शेख़ मुजीब-उर-रहमान ने उस दिन असहयोग आंदोलन को जारी रखने के अपने इरादे को दोहराया. अपने भाषण में उन्होंने यह भी घोषणा की कि जब तक 7 करोड़ लोग आज़ादी हासिल नहीं कर लेते, तब तक संघर्ष जारी रहेगा.
यह भाषण पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में भी प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था. शेख़ मुजीब-उर-रहमान ने उस दिन पूर्वी पाकिस्तान के अख़बारों के नाम एक विशेष संदेश भी जारी किया था, जो 22 मार्च, 1971 को ढाका से निकलने वाले दैनिक 'आज़ाद' में प्रकाशित हुआ था.
यह बयान 23 मार्च 1971 को पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में भी छपा था. शेख़ मुजीब का यह संदेश भी 7 मार्च, 1971 के उनके भाषण के मुख्य बिंदुओं पर ही आधारित था.
पूर्वी पाकिस्तान के अख़बारों ने 'बांग्लादेश साल्वेशन डे' शीर्षक से विशेष संस्करण प्रकाशित किये थे. शेख़ मुजीब-उर-रहमान ने इन संस्करणों के प्रकाशन पर अख़बारों को बधाई दी और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आंदोलन जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
अपने इस संदेश में उन्होंने अपना वो वाक्य भी दोहराया कि लोगों को अपने घरों को क़िलों में बदल लेना चाहिए.
पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों ने 7 मार्च के भाषण की रिपोर्टिंग करते हुए इस बिंदु को प्रकाशित नहीं किया था, लेकिन इस बार ये वाक्य प्रकाशित हुआ. उस दिन, उनका एक और वाक्य प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के लोग अब तोपों, गोलियों और संगीनों से नहीं डरेंगे क्योंकि वे एकजुट हैं.
साल 1971 में मार्च का महीना जैसे जैसे अपने समापन की तरफ़ बढ़ रहा था, पूर्वी पाकिस्तान का राजनीतिक मंच डेडलॉक, तनाव और संघर्ष की ओर बढ़ रहा था.

बातचीत को लेकर शेख़ मुजीब का रुख़
अवामी लीग के एक प्रमुख नेता ताजुद्दीन अहमद का एक बयान 22 मार्च, 1971 को स्थानीय दैनिक आज़ाद में प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया था कि उनकी पार्टी अब बातचीत को लंबा नहीं खींचना चाहती.
ग़ौरतलब है कि शेख़ मुजीब-उर-रहमान भविष्य के संविधान के निर्माण और सत्ता के हस्तांतरण के संबंध में याह्या ख़ान के साथ बातचीत में व्यस्त थे.
जिस दिन पूर्वी पाकिस्तान में यह बयान प्रकाशित हुआ, उसी दिन पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में शेख़ मुजीब और याह्या ख़ान के बीच मुलाक़ात की ख़बर छपी. ये मुलाक़ात 70 मिनट तक चली थी. ये मुलाक़ात पहले से निर्धारित नहीं थी. इस बैठक में शेख़ मुजीब के साथ ताजुद्दीन अहमद भी शामिल थे.
मीडिया से बात करते हुए शेख़ मुजीब-उर-रहमान ने कहा था, कि ये मुलाक़ात कुछ बिंदुओं को स्पष्ट करने के लिए थी. ये बिंदु क्या थे, शेख़ मुजीब ने इनके बारे में सवालों के जवाब देने से इनकार कर दिया. जुल्फ़िकार अली भुट्टो ने भी उसी दिन याह्या ख़ान से ढाका में मुलाक़ात की थी. भुट्टो के समर्थन और विरोध में उस दिन ढाका में प्रदर्शन भी हुए थे.
इस मुलाक़ात से चार दिन पहले शेख़ मुजीबु-उर-रहमान ने याह्या ख़ान से भी ढाका में मुलाक़ात की थी. इस मुलाक़ात की ख़ास बात यह थी, कि जिस कार से वह ढाका में प्रेसीडेंसी पहुंचे, उस पर एक काला झंडा फहरा रहा था. शेख़ मुजीबु-उर-रहमान के इस तरह से आने की यह ख़बर भी पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में प्रमुखता से छपी थी.

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25 मार्च की तारीख़ की अहमियत
25 मार्च, 1971 संयुक्त पाकिस्तान के इतिहास में एक अहम दिन है. उस दिन हुई घटनाओं को बांग्लादेश अलग-अलग तरीक़े से बताता है, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में इन घटनाओं का विवरण अलग था.
दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान के अख़बारों में प्रकाशित इन जानकारियों का मुख्य स्रोत शेख़ मुजीब-उर-रहमान हैं या अवामी लीग के अन्य नेता.
यह दिन न केवल बांग्लादेश के नज़रिए से बल्कि संयुक्त पाकिस्तान के समर्थकों की राय में भी महत्वपूर्ण है. इसका कारण यह है कि उस दिन दोनों पक्षों का सब्र टूट गया था. देश के सैन्य शासक याह्या ख़ान ने शांति बहाल करने के लिए शेख़ मुजीब-उर-रहमान, उनके सहयोगियों और अवामी लीग को देशद्रोही घोषित करके उनके ख़िलाफ़ एक अभियान शुरू किया था, जबकि अवामी लीग की तरफ़ से सैन्य गतिविधियों का विरोध करना शुरू कर दिया गया था.
साल 1972 में, बांग्लादेश में 'बांग्लादेश जेनोसाइड एंड वर्ल्ड प्रेस' नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसमें पुस्तक के संकलनकर्ता फज़ल-उल-क़ादिर चौधरी ने इस संबंध में दुनिया के कुछ अख़बारों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों को जमा किया है.
इनमें ब्रिटिश अख़बार द डेली टेलीग्राफ़ के संवाददाता साइमन ड्रिंग की रिपोर्ट भी शामिल है. किताब में दावा किया गया है कि उस दिन ऑपरेशन की ख़बरों को छिपाने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों ने विदेशी संवाददाताओं को एक होटल में बंद कर दिया था या कराची भेज दिया था.
किताब के अनुसार, इस अवसर पर साइमन ड्रिंग होशियार रहे और वे पाकिस्तान की पकड़ से बच गए. इस तरह, उनके द्वारा भेजी गई रिपोर्ट 26 मार्च को डेली टेलीग्राफ़ में प्रकाशित हुई थी.
रिपोर्ट का एक पैराग्राफ़ फज़ल-उल-क़ादिर चौधरी ने अपनी किताब में इस तरह लिखा है: ''ढाका अब तबाही और आतंक का शहर है. पाकिस्तानी सेना की 24 घंटे बर्बर बमबारी में 7,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. छात्र अपने हॉस्टलों के बिस्तरों में मारे गए हैं. कसाई बाज़ारों में अपनी दुकानों के पीछे मारे गए हैं.''

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25 मार्च की ख़बरों की कवरेज कैसी
पूर्वी पाकिस्तान की घटनाओं की ख़बरें 26 मार्च, 1971 को दैनिक नवा-ए-वक़्त में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी. 26 मार्च का यह अख़बार तीन सुर्खियों के साथ प्रकाशित हुआ.
अख़बार की दूसरी हेडलाइन में लिखा गया था कि पूर्वी पाकिस्तान के दो बड़े शहरों चटगांव और रंगपुर में फ़ायरिंग हुई है. इन घटनाओं में मरने वालों की संख्या 64 थी. लेकिन इसी ख़बर में आगे कहा गया कि मरने वालों की संख्या 57 थी.
पश्चिम पाकिस्तान में प्रकाशित होने वाली ये ख़बरें अवामी लीग के नेताओं के हवाले से छपी. सैन्य सूत्रों से आने वाली ख़बर यह थी कि सैन्य आवाजाही में आने वाली रुकावटों को दूर करने के लिए फ़ायरिंग ज़रूरी हो गई थी.
अख़बार ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से लिखा कि सेना के जवानों की आवाजाही में रुकावट डालने के लिए भीड़ ने बैरिकेड खड़े कर दिए थे. सेना ने जब इन बैरिकेड्स को हटाना शुरू किया तो उग्र भीड़ ने नसीराबाद नामक स्थान पर हज़रत बयाज़ीद बस्तामी के मक़बरे के पास उन पर हमला कर दिया.
इसके जवाब में सेना ने फ़ायरिंग की जिसमें दो लोगों की मौत हो गई. नसीराबाद से कुछ दूरी पर फ़क़ीर पाड़ा में भी झड़प हुई. यहां हुई फ़ायरिंग में चार लोगों की मौत हो गई.
ख़बर के मुताबिक़ बंदरगाह पर एक जहाज़ से गोला बारूद ले जा रहे ट्रक पर हमला कर गया. भीड़ ने सड़क के साथ-साथ रेलवे ट्रैक को भी नष्ट कर दिया, जिससे सैन्य आवाजाही असंभव हो गई, जबकि एक पुल को भी उड़ा दिया गया था. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक़ यहां फ़ायरिंग की गई थी.
अख़बार ने सरकारी न्यूज़ एजेंसी के हवाले से लिखा कि: भीड़ ने चटगाम छावनी की ओर जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया था. इसी ख़बर में अख़बार ने अवामी लीग चटगाम के महासचिव एम.ए. हन्नान का बयान प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने पानी के जहाज़ 'स्वात' पर भीड़ के हमले की पुष्टि की और कहा, कि वहां गोलीबारी की घटनाओं में दो लोग मारे गए.
उसी ख़बर में शेख़ मुजीब-उर-रहमान का बयान भी प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सैयदपुर, रंगपुर और जयदेव पुर में भी सैन्य कार्रवाई हुई है. उन्होंने कहा कि क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है और सभी ऑपरेशन सेना कर रही है. उन्होंने इन घटनाओं के विरोध में हड़ताल का भी आह्वान किया, जो ख़बर में शामिल थी.
एक दूसरी रिपोर्ट में कहा गया, कि रंगपुर में हिंसा की घटनाएं हुई हैं और जिन पर कंट्रोल करने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया है. ख़बर में अवामी लीग के महासचिव ताजुद्दीन अहमद के हवाले से कहा गया है कि इन घटनाओं में गोलीबारी भी हुई, जिससे मौतें हुईं. ख़बर में मौतों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया था.
सरकार अख़बार दैनिक मशरिक़ ने अपने उसी दिन के अंक में ताजुद्दीन का हवाला देते हुए रंगपुर में गोलीबारी और हत्याओं की ख़बर प्रकाशित की. इस रिपोर्ट में मरने वालों की संख्या नहीं बताई गई थी. ये ख़बर नवा-ए-वक़्त की तरह प्रमुखता से नहीं दी गई थी, लेकिन ये ख़बर भी अख़बार के ऊपरी हिस्से में तीन कॉलम में प्रकाशित हुई थी.
जिस दिन पूर्वी पाकिस्तान में हिंसा की ये घटनाएं हुईं, उसी दिन देश के सैन्य शासक जनरल याह्या ख़ान ने रेडियो और टेलीविजन पर एक भाषण में अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया था. उन्होंने शेख़ मुजीबु-उर-रहमान और उनके साथियों को देशद्रोही घोषित किया था.
उन्होंने आरोप लगाया कि शेख़ मुजीब पूर्वी पाकिस्तान को अलग करने की साजिश रच रहे थे. इसी संबोधन में याह्या ख़ान ने देश में सेंसरशिप लगाने की भी घोषणा की. उन्होंने (उनके अपने अनुसार) देश को बचाने के लिए एक सैन्य अभियान शुरू करने का भी आदेश दिया.
इस ऑपरेशन के दौरान पूर्वी पाकिस्तान के किन इलाकों में क्या कार्रवाई हुई और शेख़ मुजीब-उर-रहमान को कब गिरफ़्तार किया गया था, इस बारे में पाकिस्तान के अख़बारों में कोई ख़बर प्रकाशित नहीं हुई थी.

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सेंसरशिप के बाद बदल गया ख़बरों का स्वरूप
हालांकि, सेंसरशिप लागू होने के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आने वाली ख़बरों का स्वरूप बदल गया था. अप्रैल में, इस तरह की ख़बरें प्रकाशित हुईं, कि पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित हो कर भारत जाने वाले बंगालियों की वापसी शुरू हो गई है.
कुछ ख़बरों में बताया गया कि स्थिति में सुधार होना शुरू हो गया है. इसका एक उदाहरण 10 अप्रैल, 1971 के अख़बार 'मशरिक़' में दिखाई देता है.
ख़बर में कहा गया है कि चटगांव में असामाजिक और राष्ट्र विरोधी तत्वों का सफाया कर दिया गया है, जबकि ज्यादातर लोगों ने सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. ख़बर में यह भी कहा गया कि देशभक्त जनता के सहयोग से सशस्त्र भारतीयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी है.
यह वही समय था जब पाकिस्तान और भारत के बीच पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के मोर्चों पर तनाव बढ़ रहा था. नतीजतन, अप्रैल से दिसंबर तक दोनों देशों के बीच झड़पों और कूटनीतिक गतिविधियों की ख़बरों में वृद्धि हो गई थी.
हालाँकि 4 अप्रैल, 1971 की एक रिपोर्ट इस संकट में एक नए तत्व के आगमन का संकेत देती है. यह ख़बर भारतीय संसद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संबोधन की है.
अपने भाषण में उन्होंने कहा कि भारत पूर्वी पाकिस्तान की घटनाओं पर चुप नहीं रह सकता. ख़बर में कहा गया था, कि कांग्रेस ने बांग्लादेश में निर्वासित सरकार को मान्यता देने की मांग की है. भारत सरकार ने 6 दिसंबर, 1971 को इस मांग को स्वीकार कर लिया. उसी दिन पाकिस्तान ने भारत से संबंध तोड़ लिए थे.
अप्रैल में इंदिरा गांधी का बयान एक ख़ास घटना की वजह से अहम हो गया था. 24 मार्च, 1971 को, 'नवा-ए-वक़्त' में ये ख़बर प्रकाशित हुई, कि भारत ने कलकत्ता में पाकिस्तान के उप उच्चायुक्त मेहदी मसूद को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है.
ख़बर के मुताबिक, कुछ तत्वों ने उप उच्चायोग की इमारत पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वहां पूर्वी पाकिस्तान की निर्वासित सरकार का कार्यालय स्थापित कर दिया गया था. पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने कलकत्ता के मुख्य सचिव को इमारत खाली कराने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया.
इसी विवाद के दौरान, भारत सरकार ने दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायुक्त को सूचित किया, कि निर्वासन सरकार को मान्यता देने का उनका कोई इरादा नहीं है. पाकिस्तानी सरकार ने भारत के इस स्पष्टीकरण को ख़ारिज कर दिया.
एक रिपोर्ट के अनुसार, 17 मार्च 1971 को भारतीय सीमा के पास मोहिबपुर में बांग्लादेश की निर्वासित सरकार का गठन हुआ. वहीं विकिपीडिया के अनुसार, इसका गठन 10 अप्रैल, 1971 को हुआ था. इसका गठन कभी भी हुआ हो, लेकिन पाकिस्तान के अख़बारों में इसकी कहीं कोई ख़बर प्रकाशित नहीं हुई.
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