जब इंदिरा गांधी ने बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान को चेताया था

इंदिरा गांधी, शेख मुजीबुर रहमान

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    • Author, डॉक्टर कमाल हुसैन
    • पदनाम, पूर्व विदेश मंत्री, बांग्लादेश

इस महीने इंदिरा गांधी की जन्मशती मनाई जा रही है. इस मौके पर बांग्लादेश की आज़ादी के संघर्ष में उनके महान योगदान को याद किया जाना ज़रूरी है.

जब वे बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम को महत्वपूर्ण समर्थन दे रही थीं तो उस वक्त पीएन हक्सर उनके प्रमुख सहयोगियों में से एक हुआ करते थे.

इंदिरा गांधी ने साल 1973 में पीएन हक्सर को विशेष दूत बनाकर बांग्लादेश भेजा था.

हक्सर के एजेंडे में भारत की आज़ादी के बाद लंबित पड़े मुद्दों जैसे पाकिस्तान से बांग्लादेश आने वाले बंगालियों और बांग्लादेश से पाकिस्तान जाने की ख़्वाहिश रखने वाले लोगों की समस्याएं शामिल थीं.

इंदिरा गांधी

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1973 का संयुक्त घोषणापत्र

साथ ही हक्सर संपत्ति के बंटवारे के सवाल को भी सुलझाने के लिए भी बांग्लादेश भेजे गए थे.

बांग्लादेश के विदेश मंत्री की हैसियत से पीएन हक्सर से मुझे मिलने का मौका मिला. कुछ लंबित मुद्दों को सुलझाने और उनका हल खोजने की दिशा में उन दिनों सकारात्मक प्रगति हुई.

हक्सर और मेरी बातचीत के बाद लंबित मुद्दों के लिए जो समाधान निकाले गए, इंदिरा गांधी ने उन पर महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए.

भारत और बांग्लादेश के बीच गतिरोध के मुद्दों को सुलझाने की दिशा में एक अहम प्रगति हुई, 1973 के संयुक्त घोषणापत्र के शक्ल में. ये हक्सर और हमारी बातचीत का नतीज़े के तौर पर सामने आया था.

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इंदिरा की मंजूरी

लेकिन इस संयुक्त घोषणापत्र को इंदिरा गांधी मंजूरी की ज़रूरत थी. ये ज़रूरी भी था क्योंकि हमारा स्टैंड यही था कि बांग्लादेश और पाकिस्तान को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर तब तक कोई बातचीत नहीं होगी जब तक कि बांग्लादेश पाकिस्तान को औपचारिक रूप से कोई मान्यता न दे दे.

इसका मतलब ये था कि मान्यता न मिलने तक ये मुद्दे किसी बातचीत में नहीं रखे जा सकते थे.

हक्सर और हमारी बातचीत में इस बात पर सहमति बनी कि मानवीय पहलू वाले मुद्दों को पाकिस्तान से मान्यता मिलने की औपचारिकता पूरी किए जाने तक लंबित नहीं रखा जा सकता है.

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बांग्लादेश और पाकिस्तान

इनमें उन लोगों का सवाल भी शामिल था जो बांग्लादेश और पाकिस्तान से एक दूसरे के यहां आना-जाना चाहते थे.

इस बात का ख्याल रखा गया था कि पाकिस्तान से बातचीत पर बांग्लादेश के स्टैंड में कोई नरमी नहीं बरती जाएगी.

इसलिए पाकिस्तान से द्विपक्षीय बातचीत को लेकर बांग्लादेश के रुख़ में बिना कोई ढील दिए भारत-बांग्लादेश संयुक्त घोषणापत्र में ये प्रस्ताव रखा गया कि इसमें मानवीय मुद्दों को भी शामिल किया जा सकता है.

इंदिरा गांधी, शेख मुजीबुर रहमान

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इंदिरा और मुजीब

चूंकि ये ढाका के सैद्धांतिक रुख़ में एक अपवाद था, इसलिए भारत में इंदिरा गांधी और बांग्लादेश में शेख़ मुजीबुर रहमान से उच्चस्तरीय मंजूरी की ज़रूरत थी.

पीएन हक्सर ने ये प्रस्ताव रखा कि मुझे दिल्ली जाकर इंदिरा गांधी से इस मंजूरी के लिए कहना चाहिए. मैं दिल्ली गया और इंदिरा गांधी से मिला.

मैंने उन्हें बताया कि हक्सर और मेरी बातचीत के बाद हम इस नतीज़े पर पहुंचे हैं कि हमारा इरादा मानवीय संकट को सुलझाने की दिशा में आगे कदम बढ़ाने का है. वो हमारी बात से सहमत थीं.

उन्होंने कहा कि वो इसके लिए ज़रूरी निर्देश देंगी. मानवीय संकट हल करने के लिए किए गए 1973 के घोषणापत्र की दुनिया भर में तारीफ़ हुई.

इंदिरा गांधी

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सुरक्षा की चिंता

मुझे आज भी याद है जब 1975 में इंदिरा गांधी की बंगबंधु के साथ जमैका में मुलाकात हुई थी. उन्होंने शेख़ मुजीब की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की.

उन्हें खुफिया एजेंसियों से इसकी जानकारी मिली थी कि बंगबंधु की जान को ख़तरा है. लेकिन शेख़ मुजीब को ये भरोसा था कि कोई बंगाली उन्हें नुक़सान नहीं पहुंचाएगा.

लेकिन इंदिरा गांधी ने जो आशंका जाहिर की थी, वो सच साबित हुई. कुछ ही महीनों के भीतर 15 अगस्त, 1975 को शेख़ मुजीबुर रहमान हत्या की साजिश का शिकार हो गए.

इसके कुछ महीनों के बाद नई दिल्ली में मेरी इंदिरा गांधी से मुलाक़ात हुई थी.

शेख मुजीबुर रहमान

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बंगबंधु के ख़िलाफ़ साजिश

इंदिरा गांधी मुझे याद दिलाया कि बंगबंधु के जीवन पर मंडरा रहे ख़तरे को लेकर उन्होंने आगाह किया था.

उन्होंने कहा कि ये कितने दुख की बात है कि जिस साजिश को लेकर उन्होंने बंगबंधु को सावधान किया था, वो हकीक़त में बदल गया.

इसके बाद मैंने उन्हें कहा कि हमारे क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए ये ज़रूरी है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए.

जैसा कि बंगबंधु के साथ हुआ था, उन्होंने भी अपने पर आने वाले ऐसी किसी ख़तरे को कभी ज़्यादा तवज्जो नहीं दी थी.

पीएन हक्सर के साथ इंदिरा गांधी
इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी के तमाम अहम फ़ैसलों में पीएन हक्सर की भूमिका बेहद अहम थी

राष्ट्रहित में मुश्किल फ़ैसले

इंदिरा गांधी ने मुझे कहा भी कि उन्हें इस तरह का कोई डर नहीं है. इस मुलाक़ात के कुछ अर्से बाद वो भी ऐसी ही हत्या की साजिश का शिकार हो गईं.

एक बार किसी मुलाक़ात में उन्होंने मुझसे कहा था कि पीएन हक्सर ने उनके सलाहकार की भूमिका छोड़ दी है, वे उनकी समझदार सलाह को मिस करती हैं.

मैंने उनसे कहा कि हक्सर से मेरी मुलाक़ात होने वाली है और मैं उनसे इस बात का जिक्र करूंगा.

इंदिरा गांधी से कई मुलाकातें हुईं और मैं उन्हें एक ऐसे राजनेता के तौर पर देखता हूं जो राष्ट्रहित में मुश्किल फ़ैसले स्वतंत्र रूप से ले सकती थीं. भले ही नौकरशाही उन्हें कोई अलग सलाह देती.

मुझे मालूम है और ये सच भी था कि बांग्लादेश की आज़ादी के संघर्ष को समर्थन देने का फ़ैसला लेकर उन्होंने कितना बड़ा जोखिम लिया था.

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