भारत प्रेम को भुला क्या चीन और पाकिस्तान के पाले में जा रही हैं शेख़ हसीना

शेख़ हसीना और नरेंद्र मोदी

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    • Author, शुभम किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

15 अगस्त, 1975 के दिन शेख़ हसीना अपने पति और बहन के साथ ब्रसेल्स में बांग्लादेश के राजदूत सनाउल हक़ के यहाँ ठहरी हुई थीं, जब ये पता चला कि उसी सुबह ही बांग्लादेश में सैनिक विद्रोह हो गया था.

राजदूत सनाउल हक़ को जब यह पता चला कि सैनिक विद्रोह में शेख़ मुजीब मारे गए हैं, तो उन्होंने उनकी दोनों बेटियों और दामाद को कोई भी मदद देने से इनकार कर दिया और अपना घर भी छोड़ देने के लिए कहा. इसके बाद उन्हें जर्मनी में बांग्लादेश के राजदूत हुमायूँ रशीद चौधरी की मदद से जर्मनी पहुँचाया गया.

लेकिन बड़ा सवाल ये था कि शेख़ हसीना और उनकी बहनों को राजनीतिक शरण कौन देगा?

हुमायूँ रशीद चौधरी ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पूरी बात बताई और दोनों बहनों को शरण देने की गुज़ारिश की. इंदिरा गांधी शरण देने को तैयार हो गईं.

24 अगस्त, 1975 को एयर इंडिया के विमान से शेख़ हसीना और उनका परिवार दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुँचा, उन्हें यहाँ एक फ़्लैट आबंटित किया गया, हसीना के पति डॉक्टर वाज़ेद को भी परमाणु ऊर्जा विभाग में फ़ेलोशिप प्रदान कर दी गई.

हसीना के साथ ही नहीं इंदिरा उनके पिता शेख़ मुजीब के साथ भी खड़ी दिखीं थीं.

13 मई, 1971 को इंदिरा गांधी ने अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को अमरीका में भारत के राजदूत लक्ष्मीकाँत झा के ज़रिए एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने पाकिस्तानी जेल में बंद मुजीब को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी.

क्या शेख़ हसीना रुख़ बदल रहा है?

शेख़ हसीना

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मुश्किल समय में भारत के साथ ने शेख़ हसीना और बांग्लादेश के साथ बेहतर रिश्तों की नींव तो रखी थी, लेकिन क्या हालात अब बदल गए हैं? क्या शेख़ हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश पाकिस्तान और चीन के क़रीब जा रहा है?

22 जुलाई को ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को फ़ोन कर बात की थी. हाल के दिनों में बांग्लादेश के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स चीन को भी मिले हैं और चीन ने बांग्लादेश के माल को कई तरह के करों से छूट देकर दोनों देशों के साझा व्यापार को भी बढ़ाया है.

बीबीसी बांग्ला सर्विस के संवाददाता शुभज्योति घोष बताते हैं, “शेख़ हसीना के कार्यकाल में भारत से रिश्ते अच्छे रहे हैं. 1996 में गंगा जल संधि, लैंड बाउड्री एग्रीमेंट जैसे बड़े फ़ैसले हुए. इसके अलावा, गांधी परिवार और कांग्रेस से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं.”

जब साल 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार आई, तो दोनों के रिश्तों को लेकर कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन शुरुआत बेहतरीन रही, घोष के मुताबिक, “मोदी का बांग्लादेश दौरा सफल रहा था, लोग इसे एक बेहतरीन शुरुआत की तरह देख रहे थे.”

जेएनयू प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज बताते हैं, “पिछले 10-12 सालों में भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं, दोनों देश एक दूसरे के लिए जो भी कर सकते थे, उन्होंने किया ज़मीन विवाद, व्यापार को लेकर फ़ैसले, सुरक्षा से जुड़े फ़ैसले, उन्होंने सब किया.”

लेकिन जानकार ये भी मानते हैं कि हाल के समय में रिश्तों में थोड़ी कड़वाहट दिखी है. मोदी सरकार के हिंदुत्व की राजनीति और हाल में पास हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम ने बांग्लादेश के लोगों के मन में भारत की छवि को नुक़सान पहुँचाया है. भारत की नीतियों को कई लोग मुस्लिम विरोधी की तरह देखने लगे.

भारद्वाज बताते हैं, “बांग्लादेश एक मुस्लिम बहुल देश है. सीएएए और एनआरसी के मुद्दे के बाद बांग्लादेश के लोगों के मन में ये भावना है कि ये क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ है. इसके कारण वहाँ के लोगों का दबाव बढ़ा है, जनता में भारत से जुड़े इन मुद्दों पर ग़ुस्सा है और शेख़ हसीना इसे लेकर सतर्क हैं.”

हालाँकि बांग्लादेश से जुड़े मामलों की जानकार वीणा सीकरी की राय इससे अलग है. वह कहती हैं, “मुझे नहीं लगता है कि सीएएए को लेकर बांग्लादेश में ऐसी कोई भावना है. कुछ राजनीतिक ताक़तों की कोशिश ऐसी भावनाओं को भड़काने की होती है, भारत में भी ऐसा ही है. भारत ने अपनी ओर से ये समझाया है कि इसका संबंध भारत या बांग्लादेश में रहने वाले मुसलमानों से नहीं है और मुझे यक़ीन है कि वह भी ये बात समझते हैं.”

आर्थिक मोर्चे पर चीन का रुख़?

शी जिनपिंग

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भारत बांग्लादेश के लिए राजनीतिक स्थिरता, व्यापार, आर्थिक विकास के नज़रिए से बहुत ज़रूरी है, लेकिन चीन बहुत बड़े निवेश का ऑफ़र दे रहा है.

शेख़ हसीना चीन के निवेश को एक मौक़े की तरह देख रही हैं. भारद्वाज कहते हैं, “हसीना उन मौक़े को भी नहीं खोना चाहती है.

इसके अलावा वहाँ के युवा भी विकास चाहते हैं, उन्हें लगता है कि जो भी देश विकास में मदद करता है उसका साथ देना चाहिए. रोहिंग्या के मसले पर भी चीन ने भारत के मुक़ाबले बढ़त ले ली, तो शेख़ हसीना को एक विकल्प दिख भी रहा है.”

इसके अलावा भारद्वाज ये भी मानते हैं कि राजनीतिक स्थिरता के लिए भी हसीना को भारत की बहुत ज़्यादा ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि वहाँ विपक्षी ताक़तें बहुत कमज़ोर है.

वीणा सीकरी कहती हैं कई प्रोजेक्ट्स पर भारत और बांग्लादेश साथ हैं. उनके मुताबिक़ “हाल ही में भारत ने लोकोमोटिव इंजन की डिलीवरी की, जिसकी बांग्लादेश को ज़रूरत है, इससे पता चलता है कि दोनों देशों के रिश्ते बहुत अच्छे चल रहे हैं. इसके अलावा शेख़ हसीना का 2019 में भारत दौरा भी सफल रहा था.”

तो क्या पाकिस्तान से भी शेख़ हसीना की नज़दीकियाँ बढ़ेंगी?

इमरान ख़ान

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पाकिस्तान- बांग्लादेश की पिछले दिनों हुई बातचीत से ये ज़ाहिर है कि पाकिस्तान बांग्लादेश के साथ नज़दीकियाँ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन जानकारों का मानना है कि इससे बांग्लादेश और भारत के रिश्तों पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.

भारद्वाज कहते हैं, “बांग्लादेश और पाकिस्तान साथ नहीं जा सकते है. हसीना जिनसे लड़ती आई हैं, वो पाकिस्तानी समर्थक फ़ोर्स रहे हैं.”

बांग्लादेश में भी पाकिस्तान समर्थक लोग है, जो मानते हैं कि पाकिस्तान से बांग्लादेश का अलग होना ग़लत था, लेकिन यह शेख़ हसीना का वोट बेस नहीं है. बातचीत की कोशिश लगातार पाकिस्तान की तरफ़ से होती रही है.

जानकार मानते है कि भारत और बांग्लादेश के बीच अभी कई अनसुलझे मुद्दे हैं, जिसके कारण रिश्तों में बहुत ज़्यादा सुधार की संभावना नहीं है लेकिन दोनों देश एक दूसरे पर कई मामलों में निर्भर भी हैं, इसलिए ये कहना कि रिश्ते बिगड़ जाएँगे भी ग़लत है.

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