चीन-नेपाल में उलझा भारत, उधर पाकिस्तान-बांग्लादेश में बढ़ी दोस्ती

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
चंद हफ़्तों पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन और पाकिस्तानी राजनयिक इमरान अहमद सिद्दीक़ी की हुई भेंट के अर्थ ढूंढे ही जा रहे थे कि बुधवार दोपहर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को फ़ोन कर लंबी बातचीत की.
शेख़ हसीना के प्रेस सचिव एहसानुल करीम ने कहा है कि दोनों नेताओं के बीच तक़रीबन पंद्रह मिनट लंबी बातचीत हुई.
दो देशों के नेताओं के बीच फ़ोन पर वार्तालाप कोई अनसुनी बात नहीं, और इमरान ख़ान और शेख़ हसीना के बीच भी पहले फ़ोन पर बातें हुई हैं, लेकिन हाल के दिनों में पाकिस्तानी प्रेस में ये ख़बरें आ रही हैं कि तक़रीबन 50 साल पहले तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बनने वाले बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों ही अपने सर्द रिश्ते में गरमाहट लाने की कोशिश कर रहे हैं.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि बातचीत में इमरान ख़ान ने कोविड-19 और बाढ़ से बांग्लादेश में उपजे हालात के साथ-साथ 'भारत के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में मौजूद बुरे हालात पर अपने विचार रखे' और शेख़ हसीना को पाकिस्तान आने का न्योता दिया.
राजधानी ढाका में हाल के दिनों में हुई मुलाक़ात और इन फ़ोन कॉल्स को भारत के सामरिक और कुटनीतिक हल्क़ों में कुछ लोग भारत के पूर्वी सीमा पर भी संभावित बदलाव के दस्तक के तौर पर देख रहे हैं.

धार्मिक रंग देने की कोशिश
पाकिस्तान यह कहकर कि 'दोनों का धर्म और संस्कृति एक हैं,' बांग्लादेश से नज़दीकी बढ़ाने की इस कोशिश को मज़हबी रंग देने की भी कोशिश कर रहा है.
पाकिस्तान की इस कोशिश को बांग्लादेश की राजनीति के जानकार ख़तरनाक मान रहे हैं क्योंकि इससे वहां मौजूद कट्टरपंथी इस्लामी समूहों को मज़बूती मिलेगी, जो हमेशा से भारत-विरोधी रहे हैं.
पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने हाल में एक बयान में कहा है कि 'हम हमारे भाई बांग्लादेश के साथ सभी क्षेत्रों में नज़दीकी रिश्ता चाहते हैं. हमारा इतिहास, मज़हब और संस्कृति एक है'.
1971 में पूर्वी पाकिस्तान - अब बांग्लादेश, हालांकि तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान से जिन वजहों से अलग हुआ था उसमें सांस्कृतिक विभिन्नता एक बहुत बड़ी वजह थी और इन तक़रीबन 50 सालों में दोनों मुल्कों के बीच संबंध सर्द ही रहे हैं.

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ढाका में पाकिस्तान के उच्चायुक्त इमरान अहमद सिद्दीक़ी ने पाकिस्तान-बांग्लादेश के संबंधों पर ये बयान एक जुलाई को बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन के साथ हुई मुलाक़ात के बाद दिया था.
इमरान अहमद सिद्दीक़ी और बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन के बीच ये मुलाक़ात वैसे समय में हुई है जब भारत अपने उत्तरी और पूर्वी मोर्चे पर चीन और नेपाल से निपटने में मशग़ूल रहा है.
एक जुलाई को हुई इस मुलाक़ात पर हालांकि बांग्लादेश विदेश मंत्रालय की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, और मंत्रालय से बीबीसी के इस बाबत पूछने पर इसे महज़ 'अनौपचारिक भेंट' बताया. लेकिन पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने तुर्की समाचार एजेंसी अनादोलु को कहा कि 'आगे की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने पर सहमति जताई.'
भारत की तरफ़ से इस पूरे मामले पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है. बीबीसी के इस संबंध में विदेश मंत्रालय को भेजे गए संदेशों का भी कोई जवाब अबतक हासिल नहीं हुआ.
इस बीच सुत्रों के हवाले से कुछ जगहों पर इस तरह की ख़बरें आ रही हैं कि भारत ढाका के अपने दूतावास में ऊंचे ओहदों पर कुछ बदलाव करने जा रहा है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव और ढाका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "बांग्लादेश में हमेशा एक धड़ा रहा है जो पाकिस्तान से नज़दीक रिश्ते चाहता रहा है और वो पाकिस्तान-बांग्लादेश के बंटवारे के पक्ष में भी नहीं था."
रोहिंग्या मामले में मदद कर सकता है पाकिस्तान?

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ढाका में भी दबे सुरों में कुछ व्यवसायिक हितों के ज़रिये पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिश को आगे बढ़ाने की बात हो रही है. हालांकि इस संबंध में कोई खुलकर बात करने को तैयार नहीं है.
कहा जा रहा है कि पाकिस्तान से बेहतर संबंध का पक्षधर तबक़ा किसी तरह बांग्लादेश की हुकूमत के ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को इस बात के लिए राज़ी करने में सफल हो गया है कि देश की रोहिंग्या समस्या का हल और म्यंमार में उनकी वापसी में पाकिस्तान अहम भूमिका निभा सकता है.
बांग्लादेश में पिछले कई सालों से लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं जो इस छोटे से क्षेत्रफल के मुल्क पर जनसंख्या के घनत्व का दबाव बनाने के अलावा कई दूसरी तरह की मुश्किलें पैदा कर रहे हैं.
साथ ही बार-बार वहां ये चिंता भी जताई जा रही है कि इनमें से कुछ अगर किसी तरह की उग्रवादी गतिविधियों में शामिल हो गए तो उसका अंजाम बांग्लादेश के लिए क्या होगा?
बांग्लादेश का एक तबक़ा इन्हें वापस म्यंमार भेजने के पक्ष में है लेकिन इस मामले में बांग्लादेश को अबतक सफलता नहीं मिल पाई है.
बांग्लादेश राजनीति को क़रीब से समझनेवाले बीबीसी के पूर्व संवाददाता सुबीर भौमिक कहते हैं कि अराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी के कुछ मुस्लिम मुल्कों से नज़दीकी रिश्ते और पाकिस्तान से उन देशों के बेहतर संबंध की बात भी बांग्लादेश की नज़र में हो सकती है.
ढाका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं कि बांग्लादेश पाकिस्तान के म्यंमार से संबंध को लेकर किसी तरह की ग़लतफ़हमी में नहीं है, हां 'भारत पूरे रोहिंग्या मामले में बांग्लादेश का साथ देने की बजाय जिस तरह क़त्लेआम करने वाले म्यंमार के पक्ष में दिखा. उसको लेकर यहां मायूसी है'.
प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "बांग्लादेश जो ख़ुद 1970 के दशक में नरसंहार का शिकार हो चुका है वो पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर सावधान रेहगा क्योंकि फ़िलहाल ये मालूम नहीं कि बंगालियों के उस दौर में हुए क़त्ले-आम पर पाकिस्तान का नज़रिया क्या है. हां ये ज़रूर है कि बांग्लादेश अब अपनी सारी मुर्ग़ियां एक बास्केट में नहीं रखना चाहता."
भारत से नाराज़गी
हाल के दिनों में बांग्लादेश के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स चीन को भी मिले हैं और चीन ने बांग्लादेश के माल को कई तरह के करों से छुटकारा देकर दोनों देशों के साझा व्यापार को भी बढ़ाया है. बांग्लादेश पाकिस्तान की तरह चीन के बेल्ट और रोड प्रोग्राम का भी हिस्सा है.

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बांग्लादेश में एक भावना ये भी है कि उसने पूर्वोत्तर भारत के कई उग्रवादी गुटों को अपने यहां पनाह न देने और उन्हें भारत के हवाले करने में जिस तरह पड़ोसी मुल्क (भारत) की मदद की भारत उसके बदले तीसता और दूसरी साझा नदियों के पानी के बंटवारे तक को लेकर समझौता नहीं कर पाया है.
सुबीर भौमिक कहते हैं कि भारत में मुसलमानों के अलावा कुछ पड़ोसी मुल्कों के दूसरे समुदायों को नागरिकता देनेवाला नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं के बोल जिसमें उन्होंने भारत में रह रहे ग़ैर-क़ानूनी लोगों और बांग्लादेशी को पर्यायवाची बना दिया है, उससे बांग्लादेश में बहुत नाराज़गी है.
प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद मानते हैं इसने बांग्लादेश में बहुत सारे लोगों को भारत से दूर किया है.
वो आगे कहते हैं, "यह भारत के सोचने की बात है कि आख़िर एक के बाद दूसरे क़रीबी पड़ोसी देश भी जैसे बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका सब उससे दूर क्यों जा रहे हैं और उसे इस संबंध में क्या करना चाहिए?"
पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं कि पाकिस्तान के बांग्लादेश के क़रीब आने की कोशिश उसे 'भारत को तंग करने और घेरने की नीति का हिस्सा है' और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
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