पाकिस्तानी जेल में मौत के साए में रहे थे बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2015 में पाकिस्तान के एक टीवी कार्यक्रम 'नुक़्ता-ए-नज़र' में एक पूर्व पुलिस अधिकारी राजा अनार ख़ाँ का एक इंटरव्यू सुनवाया गया था जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि उनको शेख़ मुजीबुर रहमान पर निगरानी रखने के लिए एक क़ैदी के रूप में फ़ैसलाबाद जेल में रखा गया था.
उस समय अनार खाँ स्पेशल ब्राँच में एक युवा पुलिस इंस्पेक्टर थे. अनार ख़ाँ ने बताया, "शेख़ ने मुझसे पूछा कि आपको किस अपराध मे सज़ा सुनाई गई है? मैंने उनसे झूठ बोला कि मुझे एक लड़की को भगाने के आरोप में पकड़ा गया है. एक और क़ैदी ख़्वाजा अयूब को मुजीब का खाना पकाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. मुजीब को उनके पाइप के लिए हमेशा तम्बाकू उपलब्ध कराई जाती थी."
रात को राजा अनार ख़ाँ शेख़ की कोठरी के बाहर सोते थे. सुबह वो ही शेख़ की कोठरी का ताला खोलते थे. वो शेख़ मुजीब को 'बाबा' कह कर पुकारते थे.
राजा अनार ख़ाँ ने बताया, "जब भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू हुई तो सैनिक शासन ने हम दोनों को 150 मील उत्तर पूर्व में मियाँवाली जेल भेजने का फ़ैसला किया. उन्हें डर था कि जेल पर हमला हो सकता है और शेख़ को छुड़ाने की कोशिश भी की जा सकती है."
वे कहते हैं, "शेख़ को एक ऐसी गाड़ी में बैठाया गया जो गद्दों और कंबलों से इतनी भरी हुई थी कि शेख़ के बैठने के लिए बमुश्किल जगह बची थी. गाड़ी के साइड के शीशों पर जानबूझ कर कीचड़ पोत दिया गया था ताकि किसी को पता नहीं चल सके कि अंदर कौन बैठा है? रास्ते में शेख़ ने पूछा कि सड़कों पर इतनी सैनिक गतिविधि क्यों दिखाई दे रही है तो ख़ाँ ने जवाब दिया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि सैनिक अभ्यास चल रहा है."

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मुजीब की रिहाई के लिए इंदिरा का पत्र
13 मई, 1971 को इंदिरा गांधी ने अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को अमरीका में भारत के राजदूत लक्ष्मीकाँत झा के ज़रिए एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने मुजीब को जेल में रखे जाने पर अपनी चिंता व्यक्त की.
11 अगस्त को उन्होंने निक्सन को फिर पत्र लिख कर याह्या ख़ाँ के उस वक्तव्य पर चिंता प्रकट की कि वो मुजीब पर सैनिक अदालत में मुक़दमा चलाने जा रहे हैं जिसमें उन्हें विदेश से कोई क़ानूनी सहायता नहीं मिल सकेगी.
साथ ही उन्होंने दुनिया के 23 राष्ट्राध्यक्षों से अपील की कि वो मुजीब के जीवन को बचाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें.

मशहूर पुस्तक 'मिथ्स एंड फ़ैक्ट्स- बाँग्लादेश लिबरेशन वॉर' के लेखक बी ज़ेड ख़सरो लिखते हैं, "अमरीकी ख़ुफ़िया सूत्रों का मानना था कि याह्या निजी तौर पर मुजीब को मृत्यु दंड देने के ख़िलाफ़ थे. उनके वरिष्ठ सैन्य सलाहकारों ने उन्हें आगाह किया था कि मुजीब को मौत की सज़ा देने से दुनिया में पाकिस्तान की छवि ख़राब होगी."
"निक्सन ऐसी कोई चीज़ नहीं करना चाहते थे जिससे याह्या को कोई शर्मिंदगी महसूस हो. इसलिए उन्होंने पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत जोसेफ़ फ़ॉरलैंड से कहा कि वो जनरल से इस बारे में निजी तौर पर बात करें."
"याह्या ने फ़ारलैंड को बताया कि अगर मुजीब की दया याचिका उनके पास आती है तो वो उस पर उस समय के लिए बैठ जाएंगे जब तक असैनिक सरकार सत्ता नहीं सँभालती. आप इस बारे में निश्चिंत रहें कि मैं इस शख़्स को नहीं मारूँगा, हाँलाकि मेरा मानना है कि वो देशद्रोही है."

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मियाँवाली जेल में एयर रेड शेल्टर
मियाँवाली जेल में ही शेख़ मुजीब की रिहाइश के दौरान अंग्रेज़ी के 'एल' की शक्ल का एक एयर रेड शेल्टर बनाया गया जिसमें गद्दों और कंबलों की व्यवस्था भी की गई थी. बाद में बाँग्लादेश पहुंच कर शेख़ मुजीबुर रहमान ने लोगों को बताया कि जेल में उनकी कब्र खोदी गई थी जहाँ उन्हें मारने के बाद दफ़न किया जा सके.
अनार ख़ाँ का कहना था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. शेख़ मुजीब शायद ये कह कर लोगों की सहानुभूति अर्जित करना चाह रहे थे.
ये सही था कि जेल में रहने के दौरान शेख़ को कोई अख़बार, रेडियो या टेलीविजन मुहैया नहीं कराया गया था लेकिन उनको पढ़ने के लिए किताबें दी जाती थीं. बाद में एक इटालियन पत्रकार ओरियाना फ़लाची से मुजीब ने स्वीकार भी किया था कि जेल में उन्हें पढ़ने की सामग्री मिलती थी.
सैयद बदरुल अहसन मुजीब की जीवनी में लिखते हैं, "6 दिसंबर से लड़ाई के अंत के बीच मुजीब को सैनिक अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई. लेकिन लड़ाई के बाद याह्या ख़ाँ ने भुट्टो के हाथ में सत्ता सौंप दी. उसी शाम भुट्टो ने पाकिस्तान वासियों को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्वी पाकिस्तान पर इस समय दुश्मन का कब्ज़ा है लेकिन जल्द ही हम उसे अपने भाइयों के हित में वापस छुड़ा लेंगे. भाइयों से उनका मतलब पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले बंगालियों से था."
शेख मुजीबु-उर-रहमान और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो

मुजीब को सिहाला गेस्ट हाउस ले जाया गया
पाकिस्तान की हार के बाद शेख़ मुजीब को एक हेलिकॉप्टर में इस्लामाबाद के पास सिहाला गेस्ट हाउस में ले जाया गया. राजा अनार ख़ाँ और जेल सुपरिंटेंडेंट शेख़ अब्दुर्रहमान भी उनके साथ गए. बाद में पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब ख़ाँ के सूचना सचिव रहे अल्ताफ़ गौहर को भी उसी गेस्ट हाउस के कमरे में नज़रबंद किया गया जहाँ कभी मुजीब रहे थे.
बाद में उन्होंने लिखा, "मैं उसी पलंग पर सो रहा था और वही कंबल इस्तेमाल कर रहा था जिसे कभी मुजीब ने इस्तेमाल किया था. जेलर ने मुझे बाहर जा कर मूँगफली के छिलके दिखाए जिन्हें मुजीब वहाँ रहने के दौरान खाया करते थे.
एक दिन जेलर ने मुझे बताया कि मियाँवाली जेल में मुजीब करीब करीब पागल हो कर अपना सिर दीवार से मारने लगे थे. वो ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर कह रहे थे कि मुझे याह्या ख़ाँ से मिलवाओ. मैं ढाका में हो रहे क़त्लेआम को रुकवा सकता हूँ. जेलर अब्दुर्रहमान ने ये बात जनरल पीरज़ादा को बताई थी लेकिन मुजीब को याह्या से नहीं मिलने दिया गया."

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भुट्टो की शेख़ मुजीब से मुलाक़ात
राष्ट्रपति बनने के बाद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो 27 दिसंबर, 1971 को शेख़ मुजीब से मिलने सिहाला गेस्ट हाउस आए थे. इस मुलाक़ात के दौरान अनार ख़ाँ पर्दे के पीछे खड़े हो कर भुट्टो और मुजीब के बीच होने वाली बात सुन रहे थे. वैसे इस बातचीत को बाक़ायदा टेप किया गया था.
भुट्टो की जीवनी 'ज़ुल्फ़ी भुट्टो ऑफ़ पाकिस्तान' में स्टेनली वॉलपर्ट इन टेपों के बारे में बताते हैं, "मुजीब ने बातचीत की शुरुआत करते हुए कहा था आप यहाँ कैसे तशरीफ़ लाए? भुट्टो ने जवाब दिया था, मैं अब पाकिस्तान का राष्ट्पति और चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर हूँ. मुजीब ने कहा, मैं ये जान कर ख़ुश हूँ. लेकिन मुझे ये बताइए बंगाल की हालत क्या है? मैं वहाँ के बारे में बहुत चिंतित हूँ."
जब भुट्टो ने मुजीब को बताया कि ढाका पर भारतीय सेनाओं का कब्ज़ा हो गया है तो ये सुन कर मुजीब बोले, "उन्होंने हमें मार डाला है. आप मुझे ढाका जाने दीजिए. आपको मुझसे एक वादा करना होगा कि अगर भारतीय मुझे जेल में डालते हैं तो आपको मेरी लड़ाई लड़नी होगी."
भुट्टो ने वादा किया, "हम दोनों साथ लड़ेंगे मुजीब."
भुट्टो ने बताई पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ बने रहने की ख़्वाहिश
वालपर्ट इसके बाद लिखते हैं, "मुजीब जानते थे कि उनका वास्ता भुट्टो जैसे शातिर शख़्स से पड़ा है. वो ये भी जानते थे कि उनकी हर बात को टेप किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मुझे ढाका जा कर चीज़ों को संभालने दीजिए. मेरा विश्वास कीजिए मैंने ये कभी नहीं चाहा था कि भारतीय फ़ौज वहाँ पहुंचे."
"भुट्टो ने कहा, मुझे आप पर पूरा विश्वास है. यही वजह की मैंने आपको रिहा करने का फ़ैसला किया है. फिर भुट्टों ने अपनी दिली इच्छा मुजीब को बताई, मुजीब भाई, क्या कोई संभावना है कि हम अभी भी साथ रह सकें? मुजीब ने कहा, मैं ढाका में एक सभा करूँगा. अपने लोगों से बात करूँगा और फिर आपको इस बारे में सूचित करूँगा."

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मुजीब को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश
इसके बाद 11 दिनों तक शेख़ मुजीब लगातार अनिश्चितता के दौर में रहे. इस बीच भुट्टो उनसे कई बार मिले.
स्टेनली वॉलपर्ट लिखते हैं, "भुट्टो ने मुजीब को याद दिलाया 27 तारीख़ की हमारी मुलाक़ात में आपने दो या तीन चीज़ें साथ करने की बात मानी थीं- रक्षा, विदेशी मामले और करेंसी पर हमारा हक़ रहने दीजिए. नर्वस मुजीब ने तुरंत जवाब दिया, लेकिन इसके लिए पहले आपको मुझे ढाका जाने की इजाज़त देनी होगी. भुट्टो ने एक और पैंतरा फेंका, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री... आप जो चाहें पद ले लें, मैं राजनीति से संन्यास ले लूँगा. मुजीब ने इसको सिरे से ख़ारिज नहीं किया और कहा कि आपको इसका रास्ता पता है. मुझे बस ढाका जाने दीजिए."

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भुट्टो मुजीब को ईरान के शाह से मिलवाना चाहते थे
शेख़ मुजीब और भुट्टो के बीच चल रही इस मंत्रणा का एक दूसरा ब्योरा बाांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री कमाल हुसैन ने मुझसे बात करते हुए दिया था.
कमाल का कहना था, "भुट्टो आख़िरी समय तक पाकिस्तान के साथ कुछ न कुछ संबंध बनाए रखने के लिए दबाव डालते रहे. जिस दिन शेख़ को छोड़ा जाना था और वो लंदन के लिए उड़ान भरने वाले थे, भुट्टो ने कहा कि वो एक दिन और रुक जाएं क्योंकि अगले दिन ईरान के शाह आ रहे थे और वो उनसे मिलना चाहते थे."
कमाल कहते हैं, "शेख़ समझ गए कि वो ईरान के शाह से उन पर दबाव डलवाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि भुट्टो का प्रस्ताव उन्हें मंज़ूर नहीं है. अगर वो चाहें तो उन्हें दोबारा जेल भिजवा सकते हैं."

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भुट्टो मुजीब को छोड़ने ख़ुद हवाईअड्डे गए
बाद में जनवरी, 1971 में शेख़ मुजीब ने न्यूज़वीक पत्रिका को इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने बताया कि याह्या उन्हें उसी दिन मरवाना चाहते थे जिस दिन बाांग्लादेश अस्तित्व में आया था, लेकिन भुट्टो ने उन्हें ये कह कर बचा लिया कि अगर ऐसा होता है तो भारत के कब्ज़े में आए 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों की जान ख़तरे में पड़ जाएगी.
सात जनवरी 1972 की रात, भुट्टो स्वयं मुजीब और कमाल हुसैन को छोड़ने रावलपिंडी के चकलाला हवाई अड्डे गए. उन्होंने बिना कोई शब्द कहे मुजीब को विदा किया और मुजीब भी बिना पीछे देखे तेज़ी से हवाई जहाज़ की सीढ़ियाँ चढ़ गए.

मुजीब ने अनार ख़ाँ को दोस्तोएवस्की की लिखी किताब भेंट में दी
जाने से पहले मुजीब ने जेल में उनके साथ रहने वाले राजा अनार ख़ाँ को दोस्तोएवस्की की किताब 'क्राइम एंड पनिशमेंट' भेंट की. जब अनार खाँ ने पाकिस्तानी टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया तो उन्होंने मुजीब से मिली वो किताब दिखाई.
उस पर उन्होंने दस्तख़त करते हुए लिखा था 'झूठ और सच के बीच लंबी लड़ाई में पहले तो झूठ जीतता है, लेकिन बाद में जीत सच की ही होती है.'
1974 में जब मुजीब इस्लामिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने लाहौर आए तो उन्होंने राजा अनार ख़ाँ के बारे में पूछताछ की और उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की. लेकिन अनार ख़ाँ उनसे मिलने नहीं गए. उनको डर था कि उनकी अपनी सरकार इसे पसंद नहीं करेगी और इसके लिए उन्हें परेशान किया जाता रहेगा.
शेख़ मुजीब का लंदन आगमन
8 जनवरी, 1971 की सुबह शेख़ मुजीब का विमान हीथ्रो हवाईअड्डे पहुंचा. पाकिस्तानी विदेश सेवा से इस्तीफ़ा दे चुके और उस समय लंदन में रह रहे बंगाली राजनयिक एम एम रेज़ाउल करीम के लिए ये एक अविश्वसनीय ख़बर थी. उन्होंने अपनी पुरानी छोटी कार निकाली और पूरी स्पीड से हीथ्रो हवाईअड्डे की तरफ़ दौड़ा दी.

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अपनी तेज़ी से चल रही साँसों पर नियंत्रण करते हुए जब वो हीथ्रो हवाईअड्डे के वीआईपी लाउंज में पहुंचे तो उन्होंने शेख़ मुजीब को वहाँ अपना पाइप पीते हुए पाया.
वहाँ पर डाक्टर कमाल हुसैन और शेख़ मुजीब के साथ पाकिस्तान से आए कुछ अधिकारी भी मौजूद थे. जैसे ही उन अधिकारियों ने करीम को देखा, उन्होंने शेख़ को सेल्यूट किया और बिना कोई शब्द कहे बाहर चले गए.
सैयद बदरुल अहसन अपनी किताब 'फ्रॉम रेबेल टू फ़ाउंडिंग फ़ादर - शेख़ मुजीबुर रहमान' में लिखते हैं, "बंगाली राजनयिक रेज़ाउल करीम को वीआईपी लाउंज में देख कर शेख़ मुजीब की जान में जान आई. उन्होंने उनसे ताबड़तोड़ सवाल करने शुरू कर दिए. उनका पहला सवाल था, क्या ये सही है कि बाँगलादेश अब एक आज़ाद देश है?"
अहसन लिखते हैं, "ब्रिटिश सरकार ने शेख़ को लेने के लिए रॉल्स रोइस कार भेजी थी लेकिन मुजीब करीम की छोटी कार में क्लारिजेस होटल आए. दोपहर होते होते मुजीब ब्रिटिश प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ और विपक्ष के नेता हैरोल्ड विल्सन से मुलाकात कर चुके थे. उन्होंने ढाका फ़ोन मिलाया और पाकिस्तानी सेना द्वारा गिरफ़्तार किए जाने के बाद पहली बार अपने परिवार वालों से बात की."
वे लिखते हैं, "शाम को उनके संवाददाता सम्मेलन में सैंकड़ों पत्रकार मौजूद थे. जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि आपने सीधे ढाका न जा कर लंदन आने का फ़ैसला क्यों किया तो शेख़ का जवाब था, ये फ़ैसला भुट्टो साहब ने लिया था. मैं उनका क़ैदी था."

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मुजीब ने दिल्ली में बाँगला में भाषण दिया
लंदन में दो दिन रुकने के बाद मुजीब नौ जनवरी की शाम ढाका के लिए रवाना हुए. इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अपना विमान उपलब्ध कराया.
रास्ते में वो इंदिरा गाँधी को धन्यवाद देने के लिए कुछ घंटों के लिए नई दिल्ली में रुके.
डॉक्टर कमाल हुसैन याद करते हैं, "भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति गिरि, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, उनका पूरा मंत्रिमंडल, सेना के तीनों अंगों के प्रमुख और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय, शेख़ के स्वागत में दिल्ली के हवाई अड्डे पर मौजूद थे. सब की आँखे नम थीं. ऐसा लग रहा था कि किसी परिवार का पुनर्मिलन हो रहा हो."

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सेना के कैंटोनमेंट के मैदान पर मुजीब ने एक जनसभा में बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में मदद करने के लिए भारत की जनता को धन्यवाद दिया.
शेख़ ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में शुरू किया. लेकिन तभी मंच पर मौजूद इंदिरा गांधी ने उनसे अनुरोध किया कि वो बाँग्ला में भाषण दें.
ढाका में अभूतपूर्व स्वागत
दिल्ली में दो घंटे रुकने के बाद जब शेख़ ढाका पहुंचे तो क़रीब दस लाख लोग उनके स्वागत में ढाका हवाई अड्डे पर मौजूद थे.
नौ महीने तक पाकिस्तानी जेल में रहने के बाद काफ़ी वज़न खो चुके शेख़ मुजीब ने अपने दाहिने हाथ से अपने बढ़े हुए बालों को पीछे किया और प्रधानमंत्री ताजउद्दीन अहमद आगे बढ़ कर अपने नेता को अपनी बाहों में भर लिया.
दोनों की आँखों से आँसू बह निकले. मुजीब एक खुले ट्रक में सवार हो कर रेसकोर्स मैदान की तरफ़ बढ़े. चारों तरफ़ इतनी भीड़ थी कि दो किलोमीटर लंबे रास्ते को तय करने में ट्रक को तीन घंटे लगे.

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मुजीब ने टैगोर को किया याद
रेसकोर्स मैदान पर लाखों की भीड़ के सामने शेख़ मुजीब पाकिस्तानी सेना के खिलाफ़ देशवासियों के बलिदान को याद कर रो पड़े. उन्होंने रबीन्द्रनाथ टैगोर को याद किया. इस महान कवि को उद्धत करते हुए शेख़ ने कहा कि आपने एक बार शिकायत की थी कि बंगाल के लोग सिर्फ़ बंगाली ही बने रहे, अभी तक सच्चे इंसान नहीं बन पाए.
नाटकीय अंदाज़ में मुजीब ने कहा, "हे महान कवि वापस आओ और देखो किस तरह तुम्हारे बंगाली लोग उन विलक्षण इंसानों में तब्दील हो गए हैं जिसकी तुमने कभी कल्पना की थी."
इस भाषण के दौरान उन्हें भुट्टो को दिया गया वादा भी याद था जिसमें उन्होंने कहा था कि वो अपने लोगों से पूछ कर बताएंगे कि बाँग्लादेश और पाकिस्तान के बीच भविष्य में क्या संबंध रहेंगे.
उन्होंने भुट्टो को संबोधित करते हुए कहा कि बाँग्लादेश और पाकिस्तान के बीच अब से वहीं संबंध रहेंगे जो दो संप्रभुतासंपन्न देशों के बीच होते हैं.
(नोट - ये लेख मूल रूप से मार्च 2020 में पहली बार प्रकाशित हुआ था )
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