फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के टिकट महंगे करके क्या फ़ीफ़ा ने सेल्फ़ गोल कर लिया है

मैक्सिको के ज़ैपोपान में एकरॉन स्टेडियम में प्रदर्शन के लिए रखी गई वर्ल्ड कप ट्रॉफ़ी

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2026 में आयोजित होने वाला 23वां फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप पिछली प्रतियोगिताओं से अधिक बड़े स्तर पर होगा क्योंकि पहली बार इसमें 48 टीमें भाग लेंगी जब कि क़तर में आयोजित पिछले वर्ल्ड कप में केवल 32 टीमों ने भाग लिया था.

हर चार साल बाद होने वाले वर्ल्ड कप के सौ से अधिक मैच अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको में खेले जाएंगे.

न सिर्फ़ 2026 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में मैचों की संख्या बढ़ गई है बल्कि उनके टिकट की क़ीमत भी बढ़ा दी गई है.

फ़ुटबॉल फ़ैन्स के गुट 'फ़ुटबॉल स्पोर्टर्स- यूरोप' ने इसे लूट क़रार दिया है.

दुनिया भर में वर्ल्ड कप का आयोजन करने वाले वर्ल्ड फ़ुटबॉल संगठन यानि फ़ीफ़ा की भारी आलोचना हो रही है.

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इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या 2026 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप ने ओन गोल यानी ख़ुद पर ही गोल कर दिया है?

खेल

फ़ीफ़ा चाहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा देशों में लोग स्कूल से लेकर क्लब के स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर फ़ुटबाल खेलें. उसकी ओर आकर्षित हों.

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विश्व में फ़ुटबॉल को नियंत्रित करने वाले संगठन का नाम है 'फेडरासियो इंटरनैशनाल डी फ़ुटबॉल एसोसियासियों' यानि फ़ीफ़ा. सौ से अधिक साल पहले पेरिस में इसकी स्थापना हुई थी इसलिए इसका नाम फ़्रेंच है.

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1932 में इसे स्विट्ज़रलैंड के शहर ज़्यूरिख़ में स्थानांतरित कर दिया गया था. अब 200 से अधिक राष्ट्रीय फ़ुटबॉल संघ इसके सदस्य हैं. फ़ीफ़ा ही फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप का आयोजन करता है.

यूके की पोर्ट्समथ यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स फ़ाइनेंस की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर क्रिस्टीना फ़िलीपो से हमने फ़ीफ़ा की भूमिका के बारे में बात की.

उन्होंने कहा कि फ़ीफ़ा का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देना है, उसका विकास करना है. ख़ास तौर पर उन देशों में जहां फ़ुटबॉल सबसे प्रमुख खेल नहीं है.

फ़ीफ़ा चाहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा देशों में लोग स्कूल से लेकर क्लब के स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर फ़ुटबॉल खेलें, उसकी ओर आकर्षित हों.

डॉक्टर क्रिस्टीना फ़िलीपो का मानना है कि इसी रणनीति को ध्यान में रखकर फ़ीफ़ा ने वर्ल्ड कप में टीमों की संख्या बढ़ाई है. अधिक देशों की टीमें फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में खेलेंगी तो अधिक देशों में फ़ुटबॉल तेज़ी से लोकप्रिय होगा.

फ़ुटबॉल फ़ैन्स को उम्मीद थी कि जब मैचों की संख्या बढ़ गई है तो मैचों के टिकट पिछले वर्ल्ड कप की तुलना में सस्ते हो जाएंगे क्योंकि ज़्यादा मैच होंगे तो टिकट भी ज़्यादा बिकेंगे. लेकिन जब दिसंबर में टिकटों की बिक्री शुरू हुई तो फ़ैन्स निराश हो गए क्योंकि इस बार टिकटों की क़ीमत क़तर में हुए पिछले वर्ल्ड कप की टिकटों से अधिक थी.

डॉक्टर क्रिस्टीना फ़िलीपो ने कहा कि, "जब लोगों ने टिकट ख़रीदने के लिए लॉग इन किया तो पाया कि सबसे सस्ते टिकट भी पिछले कुछ वर्ल्ड कप मैचों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक महंगे थे. लोगों को अपेक्षा नहीं थी कि टिकट इतने महंगे होंगे."

पिच से सबसे दूर लगी सीटों या कैटेगरी 4 के टिकट आम तौर पर सबसे सस्ते होते हैं लेकिन वर्ल्ड कप के अंतिम चरण के मैचों के लिए यह टिकट भी बहुत महंगे हैं और इतने कम हैं कि आम लोगों के लिए बिक्री की शुरुआत से पहले ही सारे टिकट बिक गए. दुनिया भर के फ़ुटबॉल फ़ैन्स के सामने इस वर्ल्ड कप में एक समस्या यह भी है कि इसका आयोजन तीन देशों में हो रहा है. इसलिए फ़ैन्स को एक जगह से दूसरी जगह जाने में भी बहुत पैसे ख़र्च करने पड़ेंगे.

डॉक्टर क्रिस्टीना फ़िलीपो ने आगे कहा कि अगर कोई किसी एक टीम को सपोर्ट करता है तो उसे अपनी टीम के सभी ग्रुप मैच देखने के लिए लंबा सफ़र तय करना होगा. दूसरे उन शहरों में होटल में रहने के लिए अलग ख़र्च होगा.

लेकिन अगर आपने शुरू में ही सामान्य टिकट नहीं ख़रीदे तो क्या होगा? फिर टिकट की क़ीमत वह नहीं होगी जो फ़ीफ़ा ने शुरू में तय की थी बल्कि वह होगी जो बाज़ार में मांग पर निर्भर है.

डायनामिक प्राइसिंग

फ़ीफ़ा ने तय किया है कि टिकटों की रीसेल केवल उसी के आधिकारिक प्लैटफ़ार्म के माध्यम से हो सकती है (फ़ाइल फ़ोटो)

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अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित कॉलेज ऑफ़ दि होली क्रॉस में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर और स्पोर्ट्स इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञ डॉक्टर विक्टर मैथेसन बताते हैं कि डायनामिक प्राइसिंग क्या होती है?

"आम तौर पर कोई उत्पादक या दुकानदार अपने सामान की एक क़ीमत तय कर लेता है. लेकिन डायनामिक प्राइसिंग में ऐसा होता कि दुकानदार अपने सामान की एक क़ीमत तय तो करता है लेकिन बाज़ार में उसकी मांग के उतार-चढ़ाव को देखते हुए उसकी क़ीमत तेज़ी से बढ़ाता या घटाता जाता है."

आपने यह बात फ़्लाइट की टिकट बुक करते समय भी देखी होगी कि उनकी क़ीमत बदलती रहती है. आम तौर पर वह बढ़ती जाती है. ऐसा डायनामिक प्राइसिंग की वजह से होता है. ऐसा कई व्यापारों में होता है.

डॉक्टर विक्टर मैथेसन का अनुमान है कि फ़ीफ़ा देखेगा कि कौन से मैचों की टिकटों की कितनी मांग है और उसी हिसाब से उनकी क़ीमत में बदलाव करेगा. मगर क्या खेलों में भी ऐसा होता है?

डॉक्टर विक्टर मैथेसन ने कहा कि पहले ऐसा नहीं होता था. लेकिन पिछले बीस सालों के दौरान यह होने लगा है. मिसाल के तौर पर 1994 के वर्ल्ड कप के दौरान डायनामिक प्राइसिंग नहीं थी बल्कि वेरिएबल प्राइसिंग थी. यानि अमेरिका के मैचों या सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल की टिकटें दूसरे मैचों से अधिक महंगी थीं.

टिकटों की क़ीमत में वृद्धि की एक वजह महंगाई में आई वृद्धि हो सकती. लेकिन डॉक्टर विक्टर मैथेसन कहते हैं कि टिकटों की क़ीमत में की गई वृद्धि महंगाई दर से कहीं ज़्यादा है.

इसके अलावा कुछ ख़ास देशों के मैचों की टिकटें अन्य मैचों से महंगी हैं. मिसाल के तौर पर इंग्लैंड, अमेरिका और कनाडा के मैच की क़ीमत अन्य मैचों से अधिक है. इसके अलावा ओपनर मैच, इलीमिनेशन राउंड और फ़ाइनल की टिकटें भी कहीं अधिक महंगी हैं.

फ़ीफ़ा ने टिकटों की क़ीमत तय करते समय अन्य बातों को भी ध्यान में रखा. यानि न्यूयॉर्क, सैन फ़्रांसिस्को और लॉस एंजेलिस जैसे प्रमुख शहरों के इलाकों में होने वाले मैचों की टिकट अधिक महंगी हैं क्योंकि दूसरे देशों से आने वाले फ़ैन्स इन शहरों में भी घूमना चाहेंगे.

लेकिन अगर कोई टिकटधारक अपनी टिकट बेचना चाहे यानि रीसेल करना चाहे तो क्या होगा? अन्य कार्यक्रमों में ऐसे रीसेल, टाउट या दलालों के मार्फ़त होते हैं. लेकिन फ़ीफ़ा ने तय किया है कि टिकटों की रीसेल केवल उसी के आधिकारिक प्लैटफ़ार्म के माध्यम से हो सकती है. वहीं रीसेल की जा रही टिकटों की उच्चतम सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

डॉक्टर विक्टर मैथेसन ने आगे कहा कि "टिकट बिक्री और उनकी रीसेल के सभी अधिकार फ़ीफ़ा ने अपने पास रखे हैं ताकि इसके मुनाफ़े का बड़ा हिस्सा उसकी जेब में आए. फ़ीफ़ा का कहना है कि यह हमारा आयोजन है और इससे मिलने वाले लाभ पर किसी और का नहीं बल्कि उसी का अधिकार होना चाहिए."

फ़ायदा

मैक्सिको में बीबीवीए स्टेडियम को फ़ुटबॉल विश्व कप के शुरू होने का इंतज़ार है

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डॉक्टर योहान रेविलाक यूके की लाफ़्ब्रा यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स मैनेजमेंट के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. वह बताते हैं कि फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के मैच के टिकट और टेलीविज़न राइट्स से कमाए गए पैसे प्रतियोगिता का आयोजन करने वाले संगठन यानि फ़ीफ़ा को मिलते हैं और वह जैसा चाहे उसका इस्तेमाल कर सकता है.

फ़ीफ़ा का काम दुनिया भर में फ़ुटबॉल के खेल को बढ़ाना और विकसित करना है. वह इन पैसों का इस्तेमाल इस काम के लिए कर सकता है.

डॉक्टर योहान रेविलाक कहते हैं, "फ़ीफ़ा कम विकसित देशों में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाता है और उन पर पैसे ख़र्च करता है. अगर महंगे टिकटों से कमाए गए पैसों का इस्तेमाल फ़ुटबॉल के विकास के लिए होता है तो बुरी बात नहीं है."

फ़ीफ़ा का कहना है कि वह फ़ुटबॉल से जुड़ी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए एक अरब डॉलर से अधिक निवेश कर चुका है. इसके तहत घाना में टेक्निकल सेंटर बनाया गया और नाइजीरिया में फ़ुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर को सुधारने के लिए सहायता दी गई है.

फ़ीफ़ा का यह भी कहना है कि 2026 के वर्ल्ड कप से कमाए गए डेढ़ अरब डॉलर का अधिकांश हिस्सा दुनिया भर में फ़ुटबॉल के लिए सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए ख़र्च किया जाएगा.

यहां यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि टिकटों से होने वाली आय टीवी राइट्स की बिक्री के मुक़ाबले बहुत कम है. दूसरी बात यह कि इन मैचों के आयोजन के लिए स्टेडियम बनाने या उन्हें सुधारने का ख़र्च फ़ीफ़ा नहीं बल्कि वे शहर उठाएंगे जहां वर्ल्ड कप के मैच होंगे. मगर क्या आयोजक शहर यह पैसे वापस कमा पाएंगे?

डॉक्टर योहान रेविलाक कहते हैं कि यह तो हमारे देखने के नज़रिए पर निर्भर करता है.

"कई बार इन बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए बनाए गए स्टेडियम सफ़ेद हाथी बनकर रह जाते हैं."

उन्होंने कहा कि मिसाल के तौर पर लिलीहैमर में विंटर ओलंपिक्स के मद्देनज़र खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों और पर्यटकों के लिए बनाए गए कई होटलों को बाद में बंद करना पड़ा.

2010 में दक्षिण अफ़्रीका में आयोजित वर्ल्ड कप के लिए कई स्टेडियम और अन्य खेल सुविधाएं बनाई गई थीं जिनका बाद में पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका. रियो डी जेनेरियो में बने गोल्फ़ कोर्स के रख-रखाव के लिए सरकार को सालाना दस लाख डॉलर ख़र्च करने पड़ते हैं जो अब घाटे में चल रहा है.

एक स्टेडियम

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इमेज कैप्शन, विश्लेषक मानते हैं कि कई बार आयोजन स्थल समारोह के बाद निर्जन हो जाते हैं

हां उन क्षेत्रों की कुछ छोटी दुकानों और व्यापारियों को इन प्रतियोगिताओं के दौरान थोड़ा फ़ायदा ज़रूर होता है.

कुछ देश इस निवेश को दीर्घकालिक स्तर पर देखते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में इस निवेश से फ़ायदा होगा.

डॉक्टर योहान रेविलाक ने कहा कि जब चीन ने 2008 ओलंपिक खेलों का आयोजन किया था तो उसका उद्देश्य दुनिया को यह संदेश देना भी था कि वह दुनिया के साथ व्यापार के लिए और अन्य स्तरों पर जुड़ने के लिए तैयार है.

ऐसा ही संकेत वर्ल्ड कप के आयोजन से क़तर ने देने की कोशिश की कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूमिका निभाने को तैयार है. साथ ही वर्ल्ड कप की वजह से क़तर और उसकी अर्थव्यवस्था का प्रचार भी हुआ.

इसी को सॉफ़्ट पावर भी कहा जाता है. इन आयोजनों के ज़रिए आयोजक देश-दुनिया को अपनी आर्थिक संभावनों से बेहतर तरीके़ से परिचित करा सकता है. भविष्य में इसके चलते वहां निवेश और व्यापारिक अवसर भी बढ़ सकते हैं.

स्टेट्स ऑफ़ प्ले

वर्ल्ड कप के टिकटों की ऊंची क़ीमत के मुद्दे पर हमने बात की मिगुएल डिलेनी से जो यूके के इंडिपेंडेंट अख़बार के मुख्य फ़ुटबॉल राइटर हैं और 'स्टेट्स ऑफ़ प्ले' के लेखक भी हैं. उनकी इस किताब में आधुनिक फ़ुटबाल की दिशा पर विस्तृत चर्चा है.

उन्होंने कहा, "फ़ीफ़ा की टिकट संबंधी नीति एक नैतिक मुद्दा है. फ़ुटबॉल सबके लिए उपलब्ध होना चाहिए. यह विभिन्न समुदायों को जोड़ता है. सब साथ मिलकर उसका आनंद लेते हैं. यह हासिल करने के बजाय फ़ीफ़ा ने टिकटों की क़ीमत बढ़ाकर केवल इसके आर्थिक पहलू को प्राथमिकता दी है. फ़ीफ़ा को ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं थी. उसे सस्ते टिकटों की संख्या बढ़ानी चाहिए थी."

दिसंबर में फ़ीफ़ा ने घोषणा की कि हर मैच के लिए 400 टिकट 60 डॉलर प्रति टिकट की क़ीमत पर बेचे जाएंगे. यह सस्ते टिकट उन देशों के समर्थकों को बेचे जाएंगे जिन्होंने वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई किया है.

फ़ीफ़ा कम विकसित देशों में फ़ुटबाल को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाता है और उन पर पैसे खर्च करता है

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इस बारे में बीबीसी ने फ़ीफ़ा से संपर्क किया जिसके जवाब में फ़ीफ़ा ने एक वक्तव्य भेजा. इसमें कहा गया है, "विश्व कप के लिए 15 करोड़ टिकटों की मांग है. फ़ीफ़ा इस बात की पुष्टि करता है कि जिन देशों की टीमों ने वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई किया है उनके फ़ैन्स के लिए अलग क़ीमत पर टिकट बेचे जाएंगे ताकि वे स्टेडियम में आकर अपनी टीम का मैच देख सकें. फ़ीफ़ा ने टिकटों की क़ीमत लगभग वैसी ही रखी है जैसी कि आयोजक देशों में मनोरंजन के कार्यक्रमों और फ़ुटबॉल सहित प्रमुख खेल प्रतियोगिताओं के लिए रखी जाती है."

फ़ीफ़ा ने 2026 के वर्ल्ड कप के टिकटों की ऊंची क़ीमत को यह कहकर जायज़ ठहराया है कि इससे होने वाली कमाई को विश्व के कम विकसित क्षेत्रों में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही फ़ीफ़ा की योजनाओं पर खर्च किया जाएगा.

फ़ीफ़ा ने यह भी कहा कि वह एक ग़ैर लाभकारी संगठन है और वर्ल्ड कप से होने वाली आय को उसके 211 सदस्य देशों द्वारा पुरुष, महिला और युवा खिलाड़ियों के लिए चलाई जा रही फ़ुटबॉल संबंधी योजनाओं पर ख़र्च किया जाएगा. फ़ीफ़ा ने यह भी कहा कि टिकटों की रीसेल नीति भी उत्तरी अमेरिकी देशों में ऐसे कार्यक्रमों द्वारा अपनाए गए फ़ार्मूले पर आधारित है.

लेकिन मिगुएल डिलेनी की दलील है कि दर्शक इस खेल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. "जो इंग्लैंड के फ़ैन हैं और अपनी टीम को सपोर्ट करने के लिए मीलों का सफ़र तय करते रहे हैं. लेकिन महंगी टिकटों की वजह से अगर वह वर्ल्ड कप के मैच देखने नहीं पहुंच पाएंगे तो उन्हें लगेगा कि उनकी निष्ठा की कदर नहीं की गई. इससे फ़ुटबॉल और उसके फ़ैन्स के बीच संबंध को चोट पहुंचेगी. भविष्य में युवा पीढ़ी का फ़ुटबॉल से जुड़ाव भी प्रभावित हो सकता है."

तो क्या 2026 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप ने ओन गोल यानी अपना ही गोल कर दिया है?

पिछले वर्ल्ड कप के मुकाबले जून 2026 में शुरू होने वाले वर्ल्ड कप की टिकटें कहीं अधिक महंगी हैं. साथ ही तीन देशों के अलग अलग शहरों में होने वाले मैचों के लिए यातायात का टिकट एक अतिरिक्त ख़र्च है.

इन सभी ख़र्च के चलते स्टेडियम में जाकर मैच देखना अधिकांश फ़ुटबॉल फ़ैन्स के लिए संभव नहीं है.

फ़ीफ़ा की दलील है कि टिकटों की ऊंची क़ीमतों से होने वाली कमाई का इस्तेमाल उसके सदस्य देशों में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा.

इसका मतलब यह है कि या तो फ़ैन्स अपने बजट को बढ़ाएं या फिर टीवी पर मैच देख कर संतोष कर लें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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