बांग्लादेश में डॉलर की वजह से बढ़ा आर्थिक संकट, बदहाली के रास्ते पर कई उद्योग

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    • Author, सईदुल इस्लाम
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़,बांग्ला

बांग्लादेश में बीते कुछ महीनों से डॉलर संकट, ईंधन और गैस की क़ीमतों में वृद्धि का देश के कुछ प्रमुख उद्योगों और उत्पादन पर असर नज़र आने लगा है.

डॉलर संकट के कारण बांग्लादेश बैंक ने बीते साल आयात पर कई पाबंदियाँ लगा दी थीं.

पर्याप्त डॉलर नहीं होने के कारण कई व्यावसायिक बैंक भी आयात के लिए लेटर ऑफ़ क्रेडिट जारी नहीं कर पा रहे हैं.

इसकी वजह से आयात करने वाले सबसे ज़्यादा मुसीबत में हैं.

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में खाद्यान्नों से लेकर कल-पुर्ज़ों तक ज़्यादातर वस्तुओं का आयात किया जाता है.

इन उद्योगों के लिए कच्चे माल की ख़रीदारी में कारखाना मालिकों को जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है.

इसके साथ ही ईंधन यानी पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें बढ़ने के कारण परिवहन और दूसरे ख़र्च बढ़ गए हैं.

हाल में व्यावसायिक गैस की क़ीमतें बढ़ने के कारण कारखानों की उत्पादन लागत भी बढ़ी है.

इस वजह से देश के कई उत्पादक संस्थान मुसीबत में पड़ गए हैं. एक ओर तो देश में इन वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ रही हैं और दूसरी ओर कच्चे माल के आयात में दिक़्क़त के कारण उत्पादन जारी रखना भी उनके लिए मुश्किल हो गया है.

बढ़ सकते हैं दाम

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इस समय बांग्लादेश में ज़रूरी दवाओं में से 98 फ़ीसदी देश में ही बन रही हैं.

बांग्लादेश सरकार रेडिमेड कपड़ा उद्योग के बाद दवा उद्योग को ही मुख्य निर्यात उत्पाद मानती है.

लेकिन इस उद्योग के लिए ज़रूरी कच्चे माल का 80 से 85 फ़ीसदी हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है.

हर साल इस उद्योग के लिए 1.3 बिलियन डॉलर के कच्चे माल का आयात किया जाता है.

दवा बनाने वाली एक कंपनी कास्मो फ़ार्मास्यूटिकल्स के निदेशक मोहम्मद अली ने बीबीसी बांग्ला को बताया, ''कई कंपनियाँ समय से कच्चे माल का आयात नहीं कर पा रही हैं. ''

उन्होंने कहा, "100 फ़ीसदी तक मार्जिन देने के बावजूद लेटर ऑफ़ क्रेडिट (एलओसी) मिलना मुश्किल हो गया है. कई आयातकों ने कच्चा माल तो मंगा लिया है, लेकिन बंदरगाह से समय पर माल नहीं ले पा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि बैंक एलओसी का निपटारा करने में सक्षम नहीं हैं. नतीजतन कई कंपनियों में दवाओं का उत्पादन प्रभावित हो रहा है."

अली ने कहा कि इन वजहों से दवा कंपनियों में उत्पादन लागत बढ़ रही है. पहले विभिन्न देशों से जिस क़ीमत पर कच्चे माल का आयात किया जाता था, अब बांग्लादेशी मुद्रा के मुक़ाबले डॉलर की विनिमय दर बढ़ने से इस मद में भी ख़र्च बढ़ रहा है.

दवा बनाने वाली एक कंपनी के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि फ़िलहाल उनके पास उत्पादन जारी रखने लायक कच्चे माल का भंडार है.

लेकिन नए सिरे से कच्चा माल ख़रीदने की स्थिति में उनको मुश्किलों का सामना करना होगा, क्योंकि इस बीच दो बैंकों के साथ बातचीत के बावजूद वह एलओसी नहीं हासिल कर सके हैं.

कच्चे माल की क़ीमतें बढ़ने के कारण बीते साल बांग्लादेश में दवाओं की क़ीमतें बढ़ी थी.

अब व्यापारियों ने संकेत दिया है कि कच्चे माल की क़ीमतों में वृद्धि, गैस और संचालन ख़र्च में वृद्धि और डॉलर की विनिमय दर के कारण फिर एक बार दवाओं की क़ीमतें बढ़ सकती हैं.

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बढ़ गया है क़र्ज़ का ख़र्च

दवा उद्योग की तरह ही देश के एक अन्य बड़े उद्योग सीमेंट पर भी असर पड़ा है.

व्यापारियों का कहना है कि लोड शेडिंग के कारण कुछ दिनों से उनके उत्पादन पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

गैस के संकट के कारण वे लोग ख़ुद भी बिजली का उत्पादन करने में समर्थ नहीं हैं.

इसके अलावा गैस और ईंधन की क़ीमतें बढ़ने के कारण उनकी उत्पादन लागत बढ़ गई है.

बांग्लादेश सीमेंट निर्माता समिति (बीसीएमए) के पदाधिकारियों ने बीते दिसंबर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि डॉलर की क़ीमत बढ़ने के कारण उनके क़र्ज़ का ख़र्च 20 फ़ीसदी बढ़ गया है. इससे इस सीमेंट उद्योग के सामने वर्किंग कैपिटल का संकट पैदा हो गया है.

बीसीएमए के अध्यक्ष मोहम्मद आलमगीर कबीर ने तब कहा था, "साल की शुरुआत में उन लोगों ने कच्चा माल ख़रीदने के लिए 86-87 रुपए प्रति डालर की दर से एलओसी लिया था. उसी दर से चीज़ों की बिक्री हुई थी. लेकिन अब एलओसी के निपटारे के लिए उनको प्रति डॉलर 106 से 112 रुपए तक भुगतान करना पड़ रहा है. इससे कई फ़ैक्टरी मालिक पूँजी की भारी कमी से जूझ रहे हैं."

आलमगीर कबीर का कहना है, "कच्चे माल के आयात के लिए एलओसी हासिल करने में भी हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. कई छोटे-छोटे उत्पादक लंबे इंतज़ार के बावजूद बैंक से एलओसी नहीं ले पा रहे हैं. नतीजतन उनके सामने उत्पादन ठप होने का संकट पैदा हो गया है."

सीमेंट

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क़ीमतें बढ़ी हैं, बिक्री घटी है

बांग्लादेश में वाहनों के इंजन से लेकर कृषि और निर्माण के क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले उपकरण, प्लास्टिक उत्पादों के सांचे, नट-बोल्ट और बेयरिंग जैसी ज़्यादातर चीज़ें स्थानीय तौर पर ही बनाई जाती हैं. लेकिन बीते एक साल से दूसरे उद्योगों की तरह यह उद्योग भी संकट के दौर से गुज़र रहा है.

ढाका के केरानीगंज स्थित कल-पुर्जे बनाने वाली एक फ़ैक्टरी के अधिकारी शोभन साहा ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से भी कच्चे माल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ने लगी थी. अब यह 50 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ गई हैं. इसके अलावा डॉलर की क़ीमत बढ़ने के कारण हमारा ख़र्च और बढ़ा है. हमें भी मजबूरन कल-पुर्ज़ों की क़ीमत बढ़ानी पड़ी है. लेकिन इसकी वजह से अब बिक्री में गिरावट आ गई है."

व्यापारियों का कहना है कि इन उद्योगों के लिए मुख्य तौर पर चीन से कच्चे माल का आयात किया जाता है.

कई मामलों में विभिन्न कच्चे माल का आयात कर बांग्लादेश में वाहनों के कल-पुर्ज़े, धान कूटने की मशीन, इंजीनियरिंग मशीनरी और तरह-तरह के खिलौने तैयार किए जाते हैं.

लेकिन बीते कुछ महीनों से एलओसी नहीं मिलने के कारण वह लोग उत्पादन बंद रखने पर मजबूर हैं.

बांग्लादेश इंजीनियरिंग उद्योग मालिक समिति के अध्यक्ष अब्दुल रज़्ज़ाक़ ने कहा है कि गैस की क़ीमत बढ़ने की वजह से उनका उत्पादन ख़र्च बढ़ गया है.

उनका कहना था, "डॉलर की क़ीमत बढ़ने के कारण कच्चे माल की क़ीमतें बढ़ गई हैं. पहले चीन से एक कंटेनर एक हज़ार डॉलर में आता था, लेकिन अब उसके लिए चार हज़ार डॉलर का भुगतान करना पड़ रहा है. इसके बावजूद एलओसी मिलना मुश्किल है. कच्चे माल का आयात नहीं कर पाने के कारण कई फ़ैक्टरियों में ठीक से उत्पादन नहीं हो रहा है."

बांग्लादेश में इस समिति के सदस्यों की संख्या 3,200 है. लेकिन पदाधिकारियों का दावा है कि पूरे देश में ऐसे 50 हज़ार से ज़्यादा संस्थान हैं.

बीते वित्त वर्ष के दौरान इस उद्योग ने 79 करोड़ डॉलर का निर्यात किया था. लेकिन चालू वर्ष के पहले छह महीनों के दौरान महज 26 करोड़ डॉलर का ही निर्यात हो सका है.

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भविष्य को लेकर चिंतित हैं व्यापारी

बांग्लादेश के चमड़ा उद्योग से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि इस उद्योग के लिए चमड़ा देश के भीतर से ही जुटाने के बावजूद उसकी प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी केमिकल विदेशों से आयात किया जाता है. लेकिन इसके लिए दूसरे उद्योगों की तरह बैंकों के चक्कर काटने पड़ते हैं.

विदेशी मुद्रा संकट के कारण बांग्लादेश सरकार ने खाद्यान्न की तरह ज़रूरी मद में प्राथमिकता के आधार पर एलओसी जारी करने का फ़ैसला किया है.

इसके अलावा निर्यात लायक मद में भी एलओसी को प्राथमिकता दी जाएगी.

लेकिन हक़ीक़त में यह बात देखने को मिल रही है कि खाद्यान्न और निर्यात लायक वस्तुओं के निर्माताओं को भी कच्चे माल के आयात में काफ़ी जटिलताओं से जूझना पड़ रहा है.

बैंकरों का कहना है कि एलओसी की मांग बढ़ रही है. लेकिन विदेशी मुद्रा नहीं रहने के कारण चाह कर भी उनको जारी करना मुश्किल हो रहा है.

बांग्लादेश टैनरी एसोसिएशन के महासचिव मोहम्मद सखावत उल्लाह ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "चूना, नमक और सल्फ़्यूरिक एसिड के अलावा बाक़ी तमाम कच्चा माल हमें विदेशों से आयात करना पड़ता है. लेकिन फ़िलहाल एक एलओसी लेने के लिए काफ़ी चक्कर लगाना पड़ता है. कई छोटे व्यापारी तो एलओसी लेने में नाकाम हैं."

उनका कहना था, ''हमारे देश में क़ुर्बानी के समय 60 से 70 फ़ीसदी चमड़ा एकत्र होता है. उसके पहले ही कच्चे माल का आयात करना होगा. लेकिन हम देख रहे हैं कि रोज़ा के लिए ज़रूरी खाद्यान्न का आयात करने वाले व्यापारी ही एलओसी नहीं ले पा रहे हैं. हम चिंतित हैं कि आख़िर ऐसी हालत में क्या करेंगे. चमड़ा कारखाने में बिजली और गैस नहीं होने के कारण इन व्यापारियों की मुसीबत और बढ़ गई हैं.''

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डॉलर के साथ होड़ लगा रही हैं पुस्तकों की क़ीमतें

बांग्लादेश में फरवरी से अमर एकुश पुस्तक मेला शुरू होना है. लेकिन काग़ज़ के संकट और क़ीमतें बढ़ने के कारण व्यापारी इस साल पुस्तकों की बिक्री को लेकर चिंतित हैं.

प्रकाशन और मुद्रण उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बीते एक महीने में बाज़ार में काग़ज़ की क़ीमत लगभग दोगुनी हो गई है. ज़्यादा पैसे देने पर भी बेहतर क्वालिटी का काग़ज़ नहीं मिल रहा है.

बांग्लादेश पुस्तक प्रकाशक और विक्रेता समिति के उपाध्यक्ष श्यामल पाल ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "कुछ दिन पहले ही पाठ्य-पुस्तकों के प्रकाशन की बड़ी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई है. अब भी वह काम जारी है. इसलिए बाज़ार में मांग की तुलना में बेहतर क्वालिटी के काग़ज़ की कमी है. कई प्रकाशक ज़्यादा क़ीमत देने को तैयार हैं. बावजूद इसके उनको काग़ज़ नहीं मिल रहा है."

आगामी प्रकाशन के उस्मान ग़नी ने बीबीसी बांग्ला को बताया है, ''बहुत ज़्यादा क़ीमत देकर काग़ज़ ख़रीदना पड़ रहा है.''

उनका कहना था, "तीन महीने पहले के मुक़ाबले प्रति रिम काग़ज़ की क़ीमत दोगुनी हो गई है. अब कहा जा सकता है कि काग़ज़ की क़ीमत हर सप्ताह बढ़ रही है. मैंने जुलाई तक छपी पुस्तकों की जो क़ीमत रखी थी, उसके बाद छपी पुस्तकों की क़ीमत कम से कम 25 फ़ीसदी बढ़ानी पड़ी है."

ग़नी को अंदेशा है कि क़ीमतें बढ़ने के कारण इस बार पुस्तक मेले में नई किताबों के प्रकाशन की संख्या भी घट सकती है.

प्रकाशकों का कहना है कि बीती जुलाई से डॉलर की क़ीमत बढ़ने के साथ ही काग़ज़ की क़ीमत भी बढ़ने लगी थी.

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बांग्लादेश में मूल रूप से दो तरह के काग़ज़ का इस्तेमाल किया जाता है. पुस्तकों की छपाई या लिखने-पढ़ने के लिए हल्के काग़ज़ का इस्तेमाल होता है.

काग़ज़ की यह किस्म पूरी तरह देसी कारखानों में तैयार की जाती है. फ़िलहाल इस मद में सबसे ज़्यादा संकट है.

दूसरी ओर कैलेंडर, पैकेजिंग या कपड़ा उद्योग में भारी काग़ज़ की ज़रूरत होती है. इसे विदेशों से आयात किया जाता है.

फ़िलहाल बाज़ार में इन दोनों किस्मों के काग़ज़ का संकट है. बांग्लादेश के कारखानों में विदेशों से कच्चे माल का आयात किया जाता है.

लेकिन डॉलर की क़ीमत डेढ़ गुना बढ़ने के कारण व्यापारियों को पहले आयातित पल्प या लुगदी के लिए ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ रही है.

इस वजह से कई व्यापारियों के सामने वर्किंग कैपिटल का संकट पैदा हो गया है.

इसके अलावा डॉलर की कमी के कारण बैंक काग़ज़ के आयात के लिए एलओसी जारी करने के लिए तैयार नहीं हो पा रहे हैं.

बांग्लादेश पेपर इंपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और एफ़बीसीसीआई के निदेशक शफीकुल इस्लाम भुइयां ने मई, 2022 में बीबीसी बांग्ला को बताया था कि वे दो महीने से एलओसी नहीं हासिल कर पा रहे हैं.

बैंक जाने पर वे लोग ऐसा करने से मना कर देते हैं. मूल रूप से डॉलर संकट के कारण बाज़ार प्रभावित हो गया है.

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