ढाका की मलमल, जो दो सौ साल तक धरती का सबसे क़ीमती कपड़ा रहा

ढाका का मलमल

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    • Author, ज़रिया गोरवेट
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

ढाका की मलमल 200 साल तक इस धरती का सबसे कीमती कपड़ा बना रहा और फिर सिरे से गायब हो गया. आखिर ऐसा कैसे हुआ?

ढाका की मलमल का सफर लंबा रहा है. एक दौर में यह दुनिया का सबसे बेहतरीन कपड़ा माना जाता था और सबसे कीमती भी. लेकिन वक्त के साथ यह सिमटता चला गया. आजकल इस कपड़े की शान फिर से लौटाने की कवायद चल रही है.

ढाका की मलमल सोलह चरणों से गुजरने के बाद तैयार होती थी. वह उस नायाब कपास से बनाया जाता था, जो बांग्लादेश (तत्कालीन भारतीय बंगाल) की मेघना नदी के किनारे पैदा किया जाता था.

हजारों साल से यह कपड़ा पूरी दुनिया में पसंद किया जाता रहा था. प्राचीन ग्रीस में देवियों की मूर्तियों को मलमल के कपड़े पहनाए जाते थे. कई देशों की साम्राज्ञियों के कपड़े मलमल से तैयार होते थे.

भारतीय उप महाद्वीप में राज करने वाले मुगल बादशाहों और अमीर-उमरावों के वस्त्र भी इसी कपड़े से तैयार होते थे.

19वीं सदी की एक तस्वीर जिसमें मलमल के कपड़े पर व्यंग्य किया गया था, यह इतना पारदर्शी हुआ करता था कि कई बार इसे पहनने वाले उपहास के भी पात्र बने

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इमेज कैप्शन, 19वीं सदी की एक तस्वीर जिसमें मलमल के कपड़े पर व्यंग्य किया गया था, यह इतना पारदर्शी हुआ करता था कि कई बार इसे पहनने वाले उपहास के भी पात्र बने

ढाका की मलमल की मुरीद थी दुनिया

मलमल का ये कपड़ा कई किस्मों का होता था. राजदरबार के कवियों ने इससे प्रभावित होकर इसका नाम 'बफ्त हवा' यानी बुनी हुई हवा रखा. कहा जाता है कि आला दर्जे का यह कपड़ा हवा जितना हल्का होता था .

यह इतना महीन होता था कि आप 300 फीट लंबे कपड़े के टुकड़े को अंगूठी से निकाल ले सकते थे. एक यात्री ने लिखा था कि आप 60 फीट लंबे कपड़े को तह करके सूंघनी की छोटी डिबिया में रख सकते थे.

आमतौर पर मलमल उन दिनों साड़ी या जामा (कुरता) बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था लेकिन ब्रिटेन में यह संभ्रांत लोगों का कपड़ा बन गया. यह इतना पारदर्शी हुआ करता था कि कई बार इसे पहनने वाले उपहास के भी पात्र बने.

हालांकि ढाका की मलमल की लोकप्रियता कम नहीं हुई. जो लोग इसे खरीदने की क्षमता रखते थे, इसे पहनते थे. यह उस दौर का सबसे महंगा कपड़ा था. साल 1851 के आसपास एक गज मलमल की कीमत 50 से 400 पाउंड के बीच होती थी.

आज के हिसाब से यह 7 हजार से लेकर 56 हजार पाउंड का बैठता है. इसके संभ्रांत कद्रदानों की कमी नहीं थी. इनमें फ्रांस की क्वीन मैरी एंटोनेट से लेकर साम्राज्ञी बोनापार्ट और जेन ऑस्टिन तक शामिल थीं.

लेकिन जब तक यह कपड़ा नव जाग्रत यूरोप पहुंचा तब तक यह गायब होना शुरू हो गया.

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इमेज कैप्शन, नेपोलियन की पहली पत्नी जोसेफीन बोनापार्ट को मलमल का कपड़ा बेहद पसंद था

16 चरणों से होकर गुजरती थी मलमल तैयार होने की प्रक्रिया

20वीं सदी की शुरुआत तक ढाका की मलमल दुनिया के हर कोने से गायब हो चुकी थी. जो कुछ थोड़ा बहुत कपड़ा बच गया वह लोगों के प्राइवेट कलेक्शन और संग्रहालयों में रह गया था.

इसकी महीन कारगरी भुला दी गई और गोसिपियम आर्बरियम (वानस्पितक नाम) या 'फुटी करपास' के स्थानीय नाम के कपास से बना सूत भी अचानक विलुप्त हो गया. यही एक मात्र कपास था, जिससे मलमल का यह कपड़ा तैयार होता था. आखिर यह कैसे हुआ?

क्या अब इस कपास को दोबारा पैदा किया जा सकता है? ढाका के मलमल के लिए इस्तेमाल होने वाले कपास के पौधों की खेती मेघना नदी (बांग्लादेश) के किनारे होती थी. तैयार पौधे साल में दो बार डेफोडिल जैसे पीले फूल देते थे.

इससे फिर बिल्कुल सफेद हल्का कपास निकलता था. यह कोई साधारण धागा नहीं था.

दक्षिण अमेरिका में लगभग इसी से मिलती हुई प्रजाति गोसेपियम हिरसटम (इसी से आज दुनिया का 90 फीसदी सूती कपड़ा तैयार होता है) के लंबे महीने रेशे की तुलना में फुटी कपास से तैयार धागा थोड़ा गांठदार और कमजोर होता था.

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यह इस धागे की खामी लग सकती है लेकिन सवाल यह है कि आप इससे क्या बनाने जा रहे हैं? लंबाई में छोटा यह धागा औद्योगिक मशीनों से तैयार होने वाले सस्ते कपड़े के लायक नहीं था. मशीन में ये धागे टूट जाते थे.

दरअसल, स्थानीय लोगों ने हज़ारों सालों से विकसित सरल तकनीकों के जरिये इसे मुश्किल धागे को साध लिया था. ढाका की मलमल 16 चरणों से गुजर कर तैयार होती थी. यह प्रक्रिया इतनी खास होती थी हर चरण ढाका के चारों ओर बसा कोई गांव ही पूरा करता था.

यह पूरी तरह सामुदायिक काम था, जिसमें युवा और बुजुर्ग, महिलाएं, पुरुष सब शामिल होते थे. पहले कपास के छोटे गोले बोआल मछली के दांत के कंघों से साफ किए जाते थे. इसके बाद सूत की कताई होती थी.

धागे तैयार करने के लिए काफी नमी की जरूरत पड़ती था ताकि ये खिंच सके. इसलिए यह काम नावों पर किया जाता था. यह काम बिल्कुल सुबह या ढलती दोपहरी में होती थी, जिस वक्त सबसे ज्यादा नमी होती है.

बुजुर्ग सूत नहीं कातते थे क्योंकि अपनी कमजोर आंखों की वजह से वे महीन धागे को ठीक से देख नहीं पाते थे.

साल 2012 में मलमल पर किताब लिखने वाली लेखिका और डिजाइन इतिहासकार सोनिया आशमोर कहती हैं कि सूती धागे में बीच-बीच में महीन गांठ होती थी , जो पूरे धागे को जोड़े रखती थी . इससे धागे की सतह पर एक रुखापन होता था, जो काफी अच्छा अहसास देता है.

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इमेज कैप्शन, ढाका के मलमल का थ्रेड काउंट 800 से 1200 के बीच होता है

एशिया का चमत्कार था यह मलमल

ढाका की मलमल इतनी शानदार थी कि इस इलाके में आने वाले लोगों को इस बात पर विश्वास ही नहीं होता था कि यह इंसानी हाथों से बना हुआ है. कुछ लोग तो यह मानते थे कि इसे जलपरियां, परियां या भूत बनाते हैं.

बांग्लादेश नेशनलिस्ट क्राफ्ट काउंसिल की प्रेसिडेंट रूबी गजनवी का कहना है कि मलमल इतना हल्की और मुलायम होती है कि इसका जवाब ही नहीं. आज यह कपड़ा कहीं नहीं दिखता.

साल 2013 में यूनेस्को ने जामदानी बुनाई को एक सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर संरक्षित किया था.

एक फोटो एजेंसी चलाने वाले 'रीसरेक्ट द फैब्रिक' प्रोजेक्ट के लीडर सैफुल इस्लाम कहते हैं, "आजकल जो मलमल आ रही है उसका थ्रेड काउंट 40 से 80 होता है. जबकि ढाका की मलमल का थ्रेड काउंट 800 से 1200 के बीच होता है. यह इसकी गुणवत्ता बताने लिए काफी है."

यह नायाब मलमल अब से एक सदी पहले गायब हो चुका है.

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मलमल उद्योग कैसे हुआ बर्बाद?

आशमोर कहती हैं मुगलकाल मलमल के लिए सबसे अच्छा समय था. मुगल बादशाहों और उनकी रानियों ने मलमल को खूब संरक्षण दिया. उन दिनों फारस (अब ईरान) इराक, तुर्की और मध्य पूर्व के देशों तक मलमल का व्यापार होता था.

ढाका की मलमल इतना बारीक होती थी कि इसकी कई तहों के बावजूद शरीर के अंग इससे दिखते थे. कहा जाता है एक बार औरंगजेब ने मलमल पहन कर दरबार में आने पर अपनी बेटी को डांटा था. जबकि उसने सात तह किए हुए मलमल के कपड़े पहने थे.

जिन दिनों लंदन में लोग मलमल के कपड़े पहन कर गर्व महसूस कर रहे थे ठीक उसी वक्त इसके कारीगर कर्ज में डूब कर आर्थिक तौर पर बरबाद हो रहे थे.

'गुड्स फ्रॉम द ईस्ट 1600-1800' नाम की एक किताब में कहा गया है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने 18वीं सदी के आखिर में मलमल बनाने की नाजुक प्रक्रिया में टांग अड़ाना शुरू किया.

सबसे पहले कंपनी ने मलमल के स्थानीय खरीदारों को हटा कर इसे खुद खरीदना शुरू कर दिया. आशमोर कहती हैं कि उन्हें इसके प्रोडक्शन पर शिकंजा कस लिया और फिर पूरे कारोबार पर कब्जा कर लिया. इसके बाद वे बुनकरों से कम कीमत पर ज्यादा कपड़ा तैयार करने को कहने लगे.

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इस्लाम कहते हैं, "लेकिन यह मुश्किल था क्योंकि फुटी करपास से कपड़ा तैयार करने के लिए एक खास तरह की स्किल की जरूरत होती है. यह काफी श्रम साध्य और खर्चीली प्रक्रिया है और कई बार तो पूरे दिन के काम के बाद आठ ग्राम कपड़ा तैयार होता है."

"कई बार कारीगरों को एक खास स्टैंडर्ड का कपड़ा बुनने के लिए पैसा एडवांस दिया जाता था लेकिन कपड़ा उस स्टैंडर्ड पर खरा न उतरने पर पैसा वापस करना पडता था. जल्दबाजी में काम उस स्टैंडर्ड का काम नही हो पाता था क्योंकि ज्यादा से ज्यादा कपड़ा तैयार करने का भी दबाव था."

बाद में ब्रिटिश कारोबारियों ने इसका बड़े पैमाने पर मशीनों से उत्पादन का फैसला किया ताकि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके. लेकिन साधारण कपास से तैयार मलमल, हाथ से बुने ढाका की मलमल का मुकाबला नहीं कर पा रही थी.

इस तरह दशकों तक इस उद्योग के साथ हुए दुर्व्यवहार और आयातित कपड़े की मांग घटने से ढाका का मलमल उद्योग खत्म हो गया. बाद में इस इलाके में युद्ध, गरीबी और भूकंप की वजह से बचे-खुचे बुनकरों ने भी कम गुणवत्ता के कपड़े बनाने शुरू कर दिए और कुछ पूरी तरह खेती-बाड़ी करने लगे. आखिरकार मलमल का पूरा कारोबार की चौपट हो गया.

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ढाका के मलमल को पुनर्जीवित करने की कोशिश

बांग्लादेश में पैदा हुए इस्लाम 20 साल पहले लंदन चले गए थे. 2013 में उन्हें ढाका के मलमल के बारे में पता चला. लेकिन ढाका के मलमल को पुनर्जीवित करने के इरादे का सबसे बड़ा रोड़ा फुटी करपास के पौधे का खत्म हो जाना था.

इस्लाम ने कीव के रॉयल बोटेनिकल गार्डन में एक बुकलेट खोज निकाली, जिसमें फुटी करपास के पत्ते सुखा कर रखे गए थे. यहां से उन्होंने इसकी डीएनए सिक्वेसिंग करवाई. इस्लाम बांग्लादेश लौटे और मेघना नदी के पुराने मानचित्रों का अध्ययन किया.

यह पता किया कि पिछले दो सौ साल में इसकी धारा कैसे बदली. फिर एक नाव लेकर कम से कम नदी की बारह किलोमीटर की चौड़ाई में सारे जंगली पौधों की तलाश की. खास कर उन पौधों की जो बुकलेट की तस्वीर से मिलते थे.

आखिर में उन्हें फुटी करपास से 70 फीसदी मिलता-जुलता पौधा मिला. यह फुटी करपास का पूर्वज हो सकता था. इस्लाम और उनकी टीम ने फुटी करपास की खेती कोशिश की लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली.

आखिरकार उन्होंने भारतीय बुनकरों से मिलकर साधारण कपास और फुटी करपास को मिलाकर हाइब्रिड धागा तैयार करने में सफलता हासिल की. अब तक इस हाइब्रिड मलमल से उनकी टीम ने कई साड़ियां बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है.

इन साड़ियों को दुनिया भर प्रदर्शित किया गया है. कुछ तो हजारों पाउंड में बिकी हैं. इस्लाम को जिस तरह से इस नए मलमल का स्वागत होते हुए दिखा, उससे अब उन्हें इस कपड़े का भविष्य नजर आने लगा है.

कौन जानता है कि जल्द ही कोई नई पीढ़ी इस कपड़े को बुनना पसंद करने लगी. और यह नायाब कपड़ा फिर अपने अतीत से उबर कर पुराना गौरव हासिल कर सकेगा.

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