गुपचुप किया गया एक नेक काम जो पहले ग़ैर-क़ानूनी था, कहानी चंडीगढ़ के रॉक गार्डन की

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
अगर आप चंडीगढ़ जाएं तो आपको 25 एकड़ में फैले रॉक गार्डन घूमने की सलाह देने वाले ज़रूर मिलेंगे.
यह उद्यान औद्योगिक और घरेलू कचरे, जैसे टूटी हुई चूड़ियों, टाइलों और चीनी मिट्टी के बर्तनों से बनी कलाकृतियों के लिए मशहूर है.
इस उद्यान का उद्घाटन आधिकारिक रूप से 1976 में किया गया था लेकिन वहां ये बात कहीं अंकित नहीं है कि इसकी शुरुआत कब की गई थी.
देखकर यक़ीन करना मुश्किल है कि एक अकेले इंसान ने बरसों की अथक मेहनत से, बिना किसी लालसा के इसे सबकी नज़रों से छुपाकर बनाया है.
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चंडीगढ़ आधुनिक भारत का पहला सुनियोजित शहर था जिसे बनाने का विचार पहली बार सन 1948 में आया था.
आज़ादी के बाद जब लाहौर पाकिस्तान के हिस्से में चला गया तो तय किया गया कि चंडीगढ़ में पंजाब की एक नई राजधानी बनाई जाएगी.
निर्माण कचरे के ढेर लगे

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1950 और 60 के दशक में चंडीगढ़ को व्यापक निर्माण प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा जिसकी वजह से वहां भारी मात्रा में निर्माण कचरा इकट्ठा हो गया. इस निर्माण प्रक्रिया से न सिर्फ़ इलाके का भूगोल बदला बल्कि उसने विस्थापन, शहरी विकास, विनाश, पूंजी, बाज़ार और जनसंख्या जैसे मुद्दों को जन्म दिया.
मीता राजीव लोचन, कविता शर्मा और चितलीन सेठी अपनी किताब 'चंडीगढ़ लाइफ़इस्केप, ब्रीफ़ सोशल हिस्ट्री ऑफ़ अ प्लान्ड सिटी' में लिखते हैं, "चंडीगढ़ को बनाने के लिए 28 हज़ार एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया, 58 गांवों के करीब 21 हज़ार लोगों का विस्थापन हुआ, भारत सरकार ने सन 1952 में 'पंजाब राजधानी अधिनियम' पारित कर इसका पूरा निर्माण अपने हाथों में ले लिया."
सरकार के इस फ़ैसले का स्थानीय स्तर पर व्यापक विरोध भी हुआ और एक राजधानी विरोधी समिति भी बनाई गई. इस समिति में गांधीवादी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, अकाली और यहां तक कि कांग्रेसी भी शामिल थे.
सरकार ने कई बार पुलिस बल, गिऱफ़्तारी और अदालती मुक़दमों का सहारा लिया. यह विरोध तब शांत हुआ जब विस्थापित लोगों को रहने के लिए वैकल्पिक जगह दे दी गई.
नेक चंद सैनी की कहानी

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नेक चंद सैनी 1924 में लाहौर से 90 किलोमीटर दूर एक गांव बेरियां कलां में पैदा हुए थे. विभाजन के बाद वह अपने परिवार के साथ भारत आ गए. पहले वह जम्मू में रहे और फिर कई शहरों जैसे गुरदासपुर, करनाल, पानीपत और फ़रीदाबाद को उन्होंने अपना घर बनाया.
आखिर में वह चंडीगढ़ में बसे. माली जाति से आने वाले सैनी का परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी बागवानी, फूलों, फलों और सब्ज़ियों के खेती और बिक्री करके अपना जीवनयापन कर रहा था.
जाति प्रथा के ख़िलाफ़ काम करने वाले ज्योतिबा फुले भी माली जाति से आते थे. विलियम क्रुक अपनी किताब 'द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ नॉर्थ-वेस्टर्न प्रॉविंसेज़ एंड अवध' में लिखते हैं, "उत्तर क्षेत्र की लोककथाओं में मालियों का अक्सर ज़िक्र आता है. उनमें से अधिकतर लोगों ने 'सैनी' उपनाम को अपनाया है."
"सैनी शब्द की उत्पत्ति 'रासैनी' शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है चतुराई और कौशल. जैसे-जैसे समय बीता पहला अक्षर 'रा' खोता चला गया और सिर्फ़ 'सैनी' बचा. बाद में मंडल आयोग ने सैनी जाति को अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में शामिल कर लिया."
निर्माण कार्य से उपजे कचरे का इस्तेमाल

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नेक चंद को सन 1951 में सरकारी नौकरी मिली और वह पीडब्लूडी में रोड इंस्पेक्टर के पद पर काम करने लगे. यह वह समय था जब चंडीगढ़ को पंजाब की नई राजधानी बनाने के बारे में विचार-विमर्श शुरू हो चुका था.
जवाहरलाल नेहरू की पहल पर चंडीगढ़ कैपिटल प्रोजेक्ट की शुरुआत हो चुकी थी और फ़्रेंच वास्तुविद ले कार्बुज़िए अपनी पूरी टीम के साथ वहां पहुंच चुके थे. नेक चंद ने सालों शिवालिक की तलहटी में अपनी साइकिल पर घूम-घूम कर हज़ारों पत्थरों और शिलाओं को इकट्ठा किया जिनकी शक्ल पक्षियों, जानवरों और मानवों से मिलती थी.
मुकुल शर्मा अपनी किताब 'दलित इकॉलॉजीज़ कास्ट एंड इनवारेनमेंट जस्टिस' में लिखते हैं, "नेक चंद ने बरसों चंडीगढ़ के आसपास औद्योगिक, शहरी और घरेलू कचरा एकत्र किया. चंडीगढ़ में उन दिनों व्यापक निर्माण कार्य चल रहा था. नेक चंद ने जंगल में टूटे चीनी के बर्तनों, टाइलों, पत्थरों, शिलाओं, टूटे हुए शीशों और लोहे की छड़ों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे ये मानव इतिहास की कहानी कहने का एक बहुत बड़ा प्रतीक बन गया. आज नेक चंद की इस कृति को देखने रोज़ करीब पांच हज़ार लोग आते हैं. मैं रॉक गार्डन को दलित बहुजन 'एंथ्रोपोसीन' के एक उदाहरण के तौर पर देखता हूं."
गुप्त उद्यान का निर्माण

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सन 1958 के आसपास नेक चंद ने निर्माण स्थल से उठाए गए कूड़े-कचरे को ख़ूबसूरत चीज़ों में बदलना शुरू कर दिया. दिन में वह सड़क निरीक्षक के तौर पर काम करते लेकिन अपने खाली समय में एक गुप्त उद्यान बनाने की अपनी मुहिम में लगे रहते.
टूटी हुई बाथरूम फ़िटिंग, बिजली के प्लग के सांचे, बोतलें, चूड़ियां, खाना पकाने के बर्तन और जो कुछ भी उन्हें मिला उससे उन्होंने अद्भुत मूर्तियां बनाईं और उन्हें उद्यान में लगाया. उन्होंने चंडीगढ़ में एक जंगल का मैदान ढ़ूंढा और वहां निर्माण कचरे से राजा रानियों, भिखारियों, स्कूली बच्चों, बंदरों, हाथियों और ऊंटों की मूर्तियां बनाना शुरू कर दिया.
15 साल से भी ज़्यादा समय में नेक चंद की गुप्त परियोजना असाधारण मूर्तियों, घुमावदार रास्तों और झरनों से भरे एक ख़ूबसूरत बगीचे में बदल गई. नेक चंद ने अपनी दुखदायी यादों को भुलाने के लिए कचरे के इस्तेमाल का मौलिक प्रयोग किया. उन्होंने पत्थरों को जमा कर पृथ्वी का इतिहास कहने और पर्यावरण के जैविक और अजैविक हिस्सों के अभिन्न संबंधों को बताने की कोशिश की.
सौमेन बंदोपाध्याय और इयान जैकसन अपनी किताब 'द कलेक्शन, द रुइन एंड द थिएटर, आर्किटेक्चर, स्कल्पचर एंड लैंडस्केप इन नेक चंद्स रॉक गार्डन' में लिखते हैं, "अपनी पूरी ज़िंदगी नेक चंद विस्थापन के दाग़ और अनुभवों के साथ रहे. रॉक गार्डन का निर्माण अपने चारों तरफ़ के विनाश और विस्थापन से निपटने का एक रचनात्मक तरीका था. उनके बचपन की कहानियां बताती हैं कि किस तरह भूमि, खेती और मवेशियों के साथ संतोषप्रद जीवन बिताने वाले नेक चंद की ज़िंदगी को विभाजन ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था.
मास्टर प्लान का उल्लंघन

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जब पहली बार चंडीगढ़ के लोगों को पता चला कि शहर के उत्तरी हिस्से में एक उद्यान बन चुका है तो शुरू में इसको तोड़ने की योजना बनाई गई क्योंकि प्रशासन की नज़र में इसका बनना ग़ैर-कानूनी था, यह चंडीगढ़ के मास्टर-प्लान का उल्ल्घंन था.
जॉन मोएज़ेल्स अपने लेख 'नेक चंद, द क्रिएटर ऑफ़ अ मैजिकल वर्ल्ड' में लिखते हैं, "फ़रवरी, 1973 की एक सुबह एक मलेरियारोधी दल ने अंडरवियर पहने हुए एक अधेड़ व्यक्ति को कूड़े के एक ढ़ेर के पास पत्थरों और शिलाओं को व्यवस्थित करते हुए देखा. तुरंत ही यह ख़बर बिजली की तरह सरकारी दफ़्तरों में फैल गई. नेकचंद को यह डर सता रहा था कि उन्हें कचरे की कथित बर्बादी या सरकारी ज़मीन के ग़ैरकानूनी उपयोग के लिए दंडित तो नहीं किया जाएगा. उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि कहीं सरकारी बुलडोज़र आकर उनकी वर्षों की मेहनत पर पानी तो नहीं फेर देगा."
नेक चंद की यह आशंका कुछ हद तक सही साबित हुई जब 1990 के दशक में सरकार ने उद्यान के बीचोंबीच एक सड़क बनाने का फ़ैसला किया. इसके लिए कुछ पेड़ गिराए गए और कुछ ढ़ांचों को गिराने के लिए बुलडोज़र उद्यान की दीवारों तक पहुंच गए.
'हम किसी से कम नहीं'

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नेक चंद के बेटे अनुज सैनी ने मुकुल शर्मा को दिए इंटरव्यू में बताया, "नेक चंद की जाति को समाज में नीची और पिछड़ी हुई जाति समझा जाता था लेकिन उन्होंने अपनी जाति के पिछड़ेपन को कभी अपने काम में आड़े नहीं आने दिया. बचपन से ही उन्होंने हममें संस्कार डाले थे कि जाति प्रधान समाज में शिक्षा, कौशल और अवसरों में हम किसी से कम नहीं हैं. रोड इंस्पेक्टर के तौर पर उन्हें शहर के भौगोलिक विवरण और अर्थव्यवस्था की ज़रूरी जानकारी थी. उनको पता था कि कहां से इन चीज़ों को उठाना है और कहां इन्हें छिपाना है. वह अपनी पुरानी साइकिल से निर्माण स्थलों और कूड़े-करकट के ढ़ेरों का चक्कर लगाते थे और अपने काम की चीज़ साइकिल के कैरियर में बांध कर ले आते थे."
वह गांव-गांव जाकर लोगों से अपना कचरा देने का अनुरोध करते थे. उन्होंने इस उद्यान में अपने रहने के लिए एक झोंपड़ी बना ली थी जिसे उन्होंने तारकोल के ड्रमों से आम लोगों की नज़र से छिपा लिया था.
अपने काम करने की जगह पर वह रात को टायरों को जलाकर रोशनी की व्यवस्था करते थे. अपने-आप को मच्छरों से बचाने के लिए वह सीमेंट के बोरों का इस्तेमाल करते थे. उन्हें किसी आंधी-तूफ़ान, बारिश या जंगली जानवर का डर नहीं था.
अनुज सैनी बताते हैं, "बाद में उन्होंने औद्योगिक केंद्रों में कचरा जमा करने के केंद्र बना दिए थे जिन्हें वह छोटे ट्रकों में लादकर उद्यान में लाया करते थे, बाद में प्रशासन ने उन्हें 50 मज़दूर भी मुहैया करवाए जो पूरे समय काम करके उद्यान को अगले स्तर तक ले जा सकें."
पद्मश्री से सम्मानित

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चंडीगढ़ के उत्तरी किनारे में सुखना लेक और सेक्टर-1कैपिटल कॉम्पलेक्स के बीच स्थित रॉक गार्डन के बारे में लंबे समय तक लोगों को जानकारी नहीं थी, लोग इसे जंगली और कंटीली झाड़ियों का इलाका समझते थे, उन्हें पता नहीं था कि नेक चंद चुपचाप अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे थे.
नेकचंद ने लूसियां पाइरी को दिए इंटरव्यू में कहा था, "मैं अपने-आपको न तो कलाकार मानता हूं और न ही शिल्पकार. मेरा होना या न होना इतना मायने नहीं रखता सिवाय इसके कि मैं अपना समय एक ऐसे काम को दे रहा था जिसका मुझे जुनून था. यह काम मेरे दिल के बहुत करीब था."
इस रॉक गार्डन का कोई वैज्ञानिक और आधुनिक स्वरूप नहीं था क्योंकि इसको बनाने वाला एक ग़रीब सरकारी कर्मचारी था. आज ये उद्यान 40 एकड़ से भी ज़्यादा इलाके में फैला हुआ है.
सन 2015 में नेकचंद का निधन हो गया. उन्हें सन 1984 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
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