ईरान में ख़ामेनेई शासन का हश्र क्या सीरिया की तानाशाह सत्ता जैसा होगा?

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई की सत्ता के सामने इस समय बड़ी चुनौती है

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    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक, बीबीसी न्यूज़

एक तानाशाही शासन कैसे ख़त्म होता है.

पहले धीरे-धीरे, फिर अचानक. अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने किसी शख़्स के कंगाल होने की प्रक्रिया बताने के लिए 'धीरे-धीरे' और 'अचानक' का इस्तेमाल किया था.

लेकिन यहां बात ईरान की हो रही है.

ईरान में प्रदर्शन करने वाले लोग और विदेशों में उनके समर्थक उम्मीद कर रहे थे कि तेहरान की इस्लामी सत्ता अब 'अचानक' वाले चरण में पहुंच गई है. लेकिन संकेत बताते हैं कि अगर इस शासन का पतन भी हो रहा है तो अभी वह धीरे-धीरे वाले चरण में ही है.

पिछले दो हफ़्तों की अशांति ईरान के शासन के लिए एक बड़ी चुनौती है.

इससे पहले भी ईरान में गुस्सा और हताशा सड़कों पर फूटती रही है, लेकिन इस बार की स्थिति अलग है.

यह विरोध अमेरिका और इसराइल की ओर से पिछले दो वर्षों में ईरान को दिए गए सैन्य झटकों के बाद हुआ है.

लेकिन अपने परिवार का पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहे आम ईरानियों पर सबसे बड़ा असर प्रतिबंधों का है.

ब्रिटेन, जर्मनी और फ़्रांस ने 2015 के परमाणु समझौते के तहत हटाए गए संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रतिबंधों को सितंबर 2025 में फिर लागू कर दिया था.

ईरान में 2025 में खाद्य महंगाई 70 फ़ीसदी से ज़्यादा रही.

दिसंबर में ईरानी मुद्रा रियाल ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई.

हालांकि ईरानी शासन पर भारी दबाव है, लेकिन संकेत यही बताते हैं कि वह अभी गिरने वाला नहीं है.

सबसे अहम बात यह है कि सुरक्षा बल अब भी शासन के प्रति वफ़ादार हैं.

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरानी सत्ता ने दमन और नियंत्रण का एक सख़्त और व्यापक तंत्र बनाने में समय और पैसा लगाया है.

पिछले दो हफ़्तों में सुरक्षा बलों ने अपने ही नागरिकों पर गोली चलाने के आदेशों का पालन किया.

इसका नतीज़ा यह हुआ कि हाल के हफ़्तों के प्रदर्शन समाप्त हो गए, हालांकि इस बारे में हम उतना ही जानते हैं जितना सरकार इजाज़त दे रही है. क्योंकि सरकार ने संचार पर पाबंदी लगा रखी है.

ईरान में सत्ता की हिफ़ाजत कैसे की जा रही है

ईरान

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इमेज कैप्शन, साल 2025 में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसीज की ओर से तेहरान में अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ आयोजित प्रदर्शन
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ईरान में प्रदर्शनों को कुचलने में सबसे आगे है इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर यानी आईआरजीसी. ये देश का सबसे ताक़तवर संगठन है.

इसका काम 1979 की इस्लामी क्रांति की विचारधारा और शासन व्यवस्था की रक्षा करना है. ये सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के प्रति जवाबदेह है.

अनुमान है कि आईआरजीसी के पास करीब डेढ़ लाख सशस्त्र जवान हैं.

यह ईरान की पारंपरिक सेना के समानांतर काम करता है.

यह ईरानी अर्थव्यवस्था में भी एक बड़ा खिलाड़ी है.

सत्ता, पैसा, भ्रष्टाचार और विचारधारा का यह मिश्रण इसे मौजूदा व्यवस्था की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रेरित करता है.

आईआरजीसी की एक सहायक ताक़त है बसीज मिलिशिया.

ये एक स्वयंसेवी अर्द्धसैनिक संगठन है. इसका दावा है कि इसके लाखों सदस्य हैं.

पश्चिमी अनुमान बताते हैं कि इसके सक्रिय सदस्य लाखों में हो सकते हैं. बसीज मिलिशिया प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई में सबसे आगे रहती है.

मैंने 2009 में तेहरान में आईआरजीसी और बसीज को काम करते देखा था, जब विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे.

बसीज के स्वयंसेवक सड़कों पर रबड़ और लकड़ी के डंडों के साथ खड़े थे.

उनके पीछे ऑटोमैटिक हथियारों से लैस वर्दीधारी जवान थे.

मोटरसाइकिल दस्ते तेहरान की चौड़ी सड़कों पर दौड़ते हुए प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ते थे.

दो हफ्त़ों के भीतर, जो प्रदर्शन पूरे शहर को जाम कर चुके थे, वे सिमटकर छात्रों के छोटे समूहों तक रह गए. वे नारे लगाते और कूड़े के डिब्बों में आग लगा देते थे.

शाम ढलते ही लोग अपनी बालकनियों और छतों पर आकर "अल्लाहू अक़बर" के नारे लगाते थे. ये नारा ठीक वैसा ही था जैसा उनके माता-पिता ने शाह के ख़िलाफ़ लगाया था.

लेकिन वह भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गया.

क्या ट्रंप की धमकी काम करेगी

ट्रंप

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सुरक्षा बलों की यह मजबूती यह नहीं दिखाती कि सर्वोच्च नेता या उनके करीबी निश्चिंत हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब भी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं.

लाखों ईरानी, जो इस शासन का अंत चाहते हैं, भीतर ही भीतर गुस्से और नाराजगी से भरे हुए हैं.

तेहरान में सरकार और सर्वोच्च नेता दबाव कम करने के रास्ते तलाशते दिख रहे हैं.

आक्रामक बयानबाज़ी के साथ-साथ अमेरिका से बातचीत दोबारा शुरू करने का संकेत भी दिया गया है.

ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर कोई समझौता होना मुश्किल दिखता है.

पहले की बातचीत भी नाकाम रही है. लेकिन बातचीत का दिखावा करके भी ईरान समय ले सकता है.

ख़ासकर अगर ट्रंप को यह यकीन दिलाया जा सके कि किसी सौदे की संभावना है.

अपने दबाव अभियान के तहत ट्रंप ने कहा है कि जो भी देश ईरान से कारोबार करेगा, उसके सामान पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया जाएगा.

यह कैसे काम करेगा, यह साफ़ नहीं है.

चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है.

पिछले साल ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रेड वॉर में अस्थायी समझौता किया था.

अप्रैल में बीजिंग में अमेरिका और चीन के बीच शिखर बैठक होनी है. क्या ट्रंप ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए इस अहम बैठक को ख़तरे में डालना चाहेंगे.

तेहरान में उम्रदराज सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई की सबसे बड़ी प्राथमिकता इस्लामी गणराज्य की सत्ता व्यवस्था को बचाए रखना है.

आगे भी विरोध प्रदर्शन हुए तो उन पर सख़्ती से जवाब दिया जाएगा.

प्रदर्शनकारियों की कमजोरी

 ईरान में प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, ईरान की राजधानी तेहरान में 12 जनवरी 2026 को सत्ता के विरोध में प्रदर्शन

शासन के लिए एक राहत यह है कि प्रदर्शनकारियों के पास कोई संगठित नेतृत्व नहीं है.

अपदस्थ शाह के बड़े बेटे रज़ा पहलवी खुद को नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके परिवार के इतिहास और इसराइल से करीबी संबंधों के कारण उनकी अपील सीमित है.

एक सबक जो तेहरान के शासकों को परेशान कर सकता है, वो उनके पुराने सहयोगी सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद का है.

2024 के अंत में, जब वह खुद को मजबूत मान रहे थे और अरब दुनिया में उनकी वापसी हो रही थी. लेकिन एक संगठित विद्रोही हमले ने सब कुछ बदल दिया.

उनके सबसे बड़े समर्थक रूस और ईरान उन्हें बचाने में नाकाम रहे.

कुछ ही दिनों में असद अपने परिवार के साथ रूस भाग गए.

तानाशाही शासन धीरे-धीरे कमजोर होता है, फिर अचानक गिर जाता है.

असद का सीरिया बहुत तेजी से ढह गया.

एक और उदाहरण 2011 में ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली का है, जब सेना ने आंतरिक सुरक्षा बलों के बजाय प्रदर्शनकारियों की रक्षा की.

बेन अली के पतन के बाद मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा. अगर सेना उनका साथ देती रहती, तो शायद वह बच जाते.

क्या ऐसा ईरान में हो सकता है. शायद. लेकिन अभी नहीं.

इस्लामी शासन के विरोधी चाहते हैं कि देश के भीतर और बाहर दबाव बढ़े और एक भरोसेमंद नेतृत्व उभरे, ताकि पतन की यह प्रक्रिया तेज हो सके और ये 'धीरे-धीरे' से 'अचानक' में बदल जाए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.