पतंगों के पीछे छुपा दर्द: मांझा बनाने वाले ये कारीगर किस हाल में गुज़ार रहे हैं ज़िंदगी

- Author, जिगर भट्ट
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- Author, शहबाज़ अनवर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"हमारी हथेलियां कटती हैं, ख़ून बहता है लेकिन हमने अपने ज़िले को एक पहचान दी है."
ये शब्द नसीम अहमद के हैं, जिनकी उंगलियों पर कई जगह कटने के निशान लगे थे लेकिन वह बेफ़िक्र होकर धागे को रंगने का काम कर रहे थे.
शाम के चार बज रहे थे और उनका मक़सद दिन का आख़िरी काम ख़ुद पूरा करके आज की मज़दूरी लेना था.
वहीं दूसरी ओर, उनका दूसरा साथी धागे को लपेटने के काम में लगा हुआ था.
उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में ऐसे दृश्य बहुत आम हैं.
अकेले बकरगंज के हुसैनबाद इलाक़े में ही लगभग एक हज़ार से अधिक कारीगर पतंगबाज़ी के लिए मांझा बनाने के काम में लगे हैं.
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बरेली से सिर्फ़ प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और विदेशों में बड़े स्तर पर मांझा सप्लाई किया जाता है.
मकर संक्रांति के समय में इनकी मांग बढ़ जाती है. इसके अलावा ये मांग 15 अगस्त और पतंगबाज़ी के अन्य मौक़ों में भी होती है.
बरेली के व्यापारियों के अनुसार, मकर संक्रांति के दौरान गुजरात में बरेली का सबसे अधिक मांझा बिकता है.
वहीं, अगर आप गुजरात के पतंग बाज़ारों में जाएंगे, तो आपको पता चलेगा कि बरेली के मांझे के बिना गुजरात की मकर संक्राति अधूरी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बरेली में प्रचार कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था , "गुजरात में अंतरराष्ट्रीय स्तर का पतंग महोत्सव होता है. लेकिन अगर बरेली का मांझा नहीं हुआ, तो हमारी पतंगों का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा. बरेली के मांझा के बिना गुजरात की पतंगें कहां जाएंगी?"
वैसे बरेली का मांझा न केवल गुजरात में बल्कि पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में प्रसिद्ध है. यह मांझा भारत के बाहर फ्रांस और सऊदी अरब जैसे देशों में भी बिकता है.
बरेली के मांझे की देश-दुनिया में क्यों है अलग पहचान?

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बरेली में मांझा बनाने की शुरुआत कैसे हुई, इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है.
पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़े स्थानीय कारीगरों का कहना है कि बरेली में मांझा बनाने की शुरुआत लगभग 300 साल पहले हुई थी.
बरेली के रागतीस महिला महाविद्यालय के सहायक प्रोफे़सर डॉ. दिनेश सिंह कहते हैं, "मांझा बनाने की शुरुआत उत्तर भारत में मुग़ल काल में हुई थी. पतंग उड़ाने की कला आम लोगों तक पहुंची और लोग इसमें प्रतिस्पर्धा करने लगे. इस प्रतिस्पर्धा में मांझा की गुणवत्ता सर्वोपरि हो गई. बरेली के कारीगरों ने एक अलग तकनीक अपनाई, जिसके कारण यह मांझा मशहूर हो गया."
बरेली में मांझा आमतौर पर गहरे काले, नीले या हरे रंग में बनाया जाता है. धागे को 60 मीटर की दूरी पर रखे लकड़ी के खंभों पर लपेटा जाता है. इसके बाद, धागे को लचीला बनाने के लिए उबले हुए चावल में पत्थर का चूर्ण, गोंद की चटनी, रूमी मस्तगी, दालचीनी, मेड्लर पाउडर और इसबगोल मिलाकर बनाया गया पेस्ट मांझा पर लगाया जाता है.
इस तरह तीन बार मांझे को घीसा जाता है, जिसके सूखने के बाद, कारीगर इसे अपने हाथों से तकली पर लपेटते हैं.
बरेली में, आमतौर पर दो कारीगर मिलकर एक दिन में 10,800 मीटर मांझा बनाते हैं.
एक कारीगर लकड़ी की छड़ी पर धागा लपेटता है और तैयार मांझा को तकली पर घुमाता है जबकि दूसरा कारीगर धागे पर लुगदी लगाता है.
लुगदी लगाने वाले कारीगर को प्रतिदिन 400 से 500 रुपये की मज़दूरी मिलती है, जबकि रस्सी लपेटने वाले को आमतौर पर 300 से 350 रुपये मिलते हैं.
बरेली में मांझा मज़दूर कल्याण समिति के अध्यक्ष अरशद हुसैन कहते हैं, "बरेली में 45 से 50 हज़ार लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मांझा बनाने के काम में शामिल हैं."
बरेली में मांझा बनाने की प्रक्रिया श्रमसाध्य है और मांझा बनाने वाले कारीगरों की स्थिति बहुत ही दयनीय है.
कारीगर हसीन कहते हैं, "एक दिन में कम से कम 900 मीटर की 12 रीलें तैयार की जाती हैं. इसमें बहुत मेहनत लगती है. कभी-कभी धागे से हाथ कट जाते हैं और कभी-कभी हमें रोजी-रोटी कमाने के लिए कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ता है. यह पैसा परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन हम अपने पिता और दादा-दादी के समय से यह काम करते आ रहे हैं और हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है."
एक अन्य कारीगर, सलीम कहते हैं, "मेरी तीन बेटियां हैं. मांझा बनाने के अलावा हमारे पास कोई और हुनर नहीं है. हमारे पास दूसरे काम सीखने का समय नहीं है. हम मजबूरी में यह काम कर रहे हैं."
मांझा बनाते समय हथेलियों और उंगलियों पर कट लगना स्वाभाविक है. लेकिन ये घाव इतने गहरे होते हैं कि कई दिनों तक जख़्म बना रहता है.
जब हम कारीगर कासिम से बात कर रहे थे तो उनकी छह साल की बेटी पास ही खड़ी थी.
कासिम कहते हैं, "दाल या कढ़ी को चावल में मिलाकर हाथों से खाना मुश्किल हो जाता है. अगर मिर्च घाव में चली जाए तो आंखों में आंसू आ जाते हैं. मेरी यह बेटी मेरे हाथों पर मरहम लगाती है."
पास खड़ी बेटी लड़खड़ाती भाषा में मरहम लगाने का तरीक़ा समझाने लगती है. पिता का सपना है कि वह अपनी बेटी को शिक्षित करेंगे और उसे डॉक्टर बनाएंगे
'कमरतोड़ मेहनत पर रोटी के लाले, कुछ ने बदला रोज़गार'

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हुसैन बाग़ में ही एक स्थान पर लगभग 60 साल की मुमतियाज़ के पास शरीर पर सर्द हवा से बचने तक के कपड़े नहीं हैं.
वह कहते हैं, 'साहब मैं भी मांझा सुताई का काम करता था, दाईं आंख में थोड़ी परेशानी हुई पर पैसों के अभाव में डॉक्टरों को नहीं दिखा पाया, अब इस आंख से दिखाई ही नहीं देता है. इस बीच एक्सीडेंट भी हो गया, पैरों में रॉड पड़ी, अब ज़िन्दगी कैसी कट रही है, हमें ही मालूम है.'
मुमतियाज़ जब ये सब हमें सुना रहे थे, तभी पास में खड़ी उनकी पत्नी रोने लगीं.
उनकी पत्नी गुलज़ार ने कहा, 'आप देख रहे हैं, मैं इस किराए के मकान में सर्दी में खुले आसमान के नीचे पतंग बना रही हूं. एक पतंग बनाने में 75 पैसे मिलते हैं, दिनभर में 50 पतंग बना पाती हूँ. मेरे भी पैरों में तकलीफ़ रहती है. कई बार ऐसा हुआ कि फ़ाके की नौबत आ गई. मेरा बेटा भी मांझी का काम करता है. हालात ऐसे हैं कि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते. हमारे पास उसकी आँखों के इलाज के लिए भी पैसे नहीं हैं."
यह स्थिति बरेली के मुमतियाज़ तक ही सीमित नहीं है. मांझा बनाने वाले अधिकांश कारीगरों ने हमें बताया कि जब घर में कोई बीमार पड़ जाता है, तो उन्हें पैसे उधार लेने पड़ते हैं.
30 साल के मोहम्मद कलीम पिछले 15 वर्षों से धागा लपेटने का काम कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "जब घर के मुखिया का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, तो हमें क़र्ज़ लेना पड़ता है. घर के खर्चों के लिए अकेले 200 से 300 रुपये ही काफ़ी होते हैं. जब हम बीमार पड़ते हैं, तो हमें उधार लेना पड़ता है. "
राशिद पिछले 12 सालों से मांझा बना रहे थे, लेकिन कमज़ोर दृष्टि के कारण उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा. वह घर पर बैठकर अपने भाइयों की देखभाल करते हैं. पैसों की कमी के कारण वह इलाज नहीं करवा पाए हैं.
राशिद का कहना है, 'मेरे पास डॉक्टर को दिखाने के लिए पैसे नहीं हैं.'
राशिद के तीन और भाई भी रतौंधी से पीड़ित हैं. राशिद के पिता भी मांझा बनाने का काम करते थे. राशिद की 60 वर्षीय मां नत्थू बेगम को इस बात का अफ़सोस है कि वह अपने बच्चों का इलाज नहीं करवा पाईं.
नत्थू बेगम कहती हैं, "मुझे इस बात का अफ़सोस है कि मेरे बच्चे रात में देख नहीं पाते हैं. अगर मेरे पास पैसे होते तो मैं उन्हें किसी अच्छे अस्पताल में ले जाती.'
बरेली के कई कारीगरों का कहना है कि वो मजबूरीवश मांझा बनाते हैं. ख़ुशरुर बी के सातों बच्चे मांझा बनाने के काम में लगे हुए हैं.
खुशरूर बी कहती हैं, 'बच्चे हमारे पास आकर रोते हैं और कहते हैं कि माँ, आपने हमें यह काम सिखाया. तब मैं उनसे कहती हूं कि बेटा, यह काम ग़रीबी की वजह से सिखाया."
मॉनसून का मौसम मांझा कारीगरों के लिए सबसे बुरा समय होता है. बारिश के कारण काम रुक जाता है और रोजगार का भारी संकट पैदा हो जाता है.
खुशरुर बी कहती हैं, "जब बारिश होती है, तो हम अपने घर में रोटी भी नहीं बना पाते. जब पानी घुटनों तक आ जाता है, तो बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता है."

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वैसे मांझा के बाज़ार में चीनी मांझा के आने से कारोबार पर बड़ा झटका लगा है.
बरेली में पिछले 45 वर्षों से मांझा बेचने वाले इनाम अली कहते हैं, "मांझे का व्यापार 80 प्रतिशत तक गिर गया है. यहां के कई कारीगरों ने यह काम छोड़ दिया है और रिक्शा चलाने या फल बेचने लगे हैं."
मोहम्मद शाहिद (45) जो कभी मांझा बनाने का काम करते थे, अब ई-रिक्शा चलाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं.
उन्होंने बताया, "मैं मांझा बनाने का काम करता था, लेकिन इस धंधे से घर चलाना मुश्किल था."
बरेली के मोहम्मद शोएब का परिवार पांच पीढ़ी से मांझा बनाता आ रहा है.
मोहम्मद शोएब कहते हैं, "चीनी मांझे के कारण काम कम हो गया है., पहले नए बच्चे यह काम सीखते थे और उनके माता-पिता भी उन्हें सिखाते थे. लेकिन अब माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बच्चे यह काम करें. मुझे भी लगता है कि मेरे बच्चों को भी कोई और काम करना चाहिए."
श्रम विभाग के पास नहीं कोई आंकड़े

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बरेली के मांझा मज़दूरों की मांग है कि इस कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिशें सरकार के स्तर पर होनी चाहिए.
मांझा कारोबारी यूनुस कहते हैं, "इस काम में अधिकांश मुस्लिम वर्ग से जुड़े लोग ही शामिल हैं. मांझा बनाने में बरेली का पूरे देश में नाम है, सरकार को काम को बढ़ावा देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है."
बरेली के श्रम प्रवर्तन अधिकारी पवन कुमार चौधरी ने बताया कि विभाग के पास बरेली के मांझा कारोबारियों से संबंधित कोई आंकड़ा मौजूद नहीं हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "बरेली का मांझा देश-दुनिया में जाना जाता है, ये बात तो सही है, लेकिन ये मज़दूर श्रम विभाग में कोई रजिस्ट्रेशन आदि नहीं कराते हैं. सरकार हमें इस तरफ सर्वे आदि करने का आदेश दे तो हम ज़रूर इस तरफ देखेंगे."
इस बारे में बरेली के सांसद छत्रपाल सिंह गंगवार ने कहा, "अगर मांझा उद्योग विकसित हो तो यह बहुत अच्छी बात होगी. फिलहाल हमें यह नहीं पता कि इस मांझा उद्योग में कितने लोग शामिल हैं. देखते हैं क्या होता है."
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