पतंग का इतिहास: युद्ध में इस्तेमाल करने से लेकर हवाई जहाज़ बनाने तक

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- Author, रौनक भैड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
14 जनवरी को मकर संक्रांति या उत्तरायण का पर्व होता है. देश के ज़्यादातर हिस्सों में इस अवसर पर पतंगबाज़ी होती है. इस मौक़े पर आसमान भी रंगीन हो जाता है.
पतंग के आज़ादी से उड़ने से लेकर डोर से बंधे होने पर कवियों ने तमाम कविताएं रची हैं. एक नज़रिया यह भी है कि मकर संक्रांति भले किसी धर्म विशेष का त्योहार हो, लेकिन इस त्योहार पर पतंगबाज़ी तो सब करते हैं.
पतंग का दायरा सिर्फ़ भारत तक ही सीमित नहीं है. दुनिया के कई देशों में पतंगबाज़ी होती है.
10 से 14 जनवरी तक अहमदाबाद में इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल-2026 हो रहा है. इसमें रूस, यूक्रेन, इसराइल, जॉर्डन, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया समेत 50 देशों के 135 पतंगबाज़ शामिल हुए हैं.
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सबसे अधिक प्रतिभागी चिली, कोलंबिया और दक्षिण कोरिया से हैं, हर देश से छह पतंगबाज़ आए हैं. इसका मतलब पतंगबाज़ी का जितना उत्साह भारत में देखने को मिलता है, उतना दुनिया के कई और देशों में भी है.
पतंग का इस्तेमाल विश्व युद्ध से लेकर हवाई जहाज़ बनाने तक के लिए हुआ है. फ़िलहाल पतंग को मनोरंजन के ज़रिये के तौर पर देखा जाता है.
लेकिन इसका इतिहास बताता है कि पतंग ज़रूरी हुआ करती थी और इसके कारण कितना बड़ा आविष्कार हुआ था.

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कहाँ बनी थी पतंग?
अब भले पतंगबाज़ी दुनियाभर में मशहूर हो गई हो, लेकिन इसकी शुरुआत भारत के पड़ोसी देश चीन से हुई थी.
अमेरिकन काइटफ्लायर्स एसोसिएशन के मुताबिक़, बहुत से विद्वान मानते हैं कि पतंग चीन में बनी थी. हालांकि, कुछ साक्ष्य बताते हैं कि मलेशिया, इंडोनेशिया और दक्षिण प्रशांत के इलाक़ों में भी लोगों ने पत्तों और सरकंडे जैसी प्राकृतिक चीज़ों से पतंग बनाकर मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल की.
450 ईसा पूर्व में चीन के मशहूर विचारक मोज़ी ने तीन साल तक मेहनत करके लकड़ी से एक पक्षी जैसी दिखने वाली चीज़ बनाई, जिसे डोर से बांधकर उड़ाया जा सके. कुछ लोग कहते हैं कि यह पतंग ही थी, लेकिन इस पर विवाद है.
रिपोर्ट बताती है कि पतंग का सबसे पुराना लिखित प्रमाण 200 ईसा पूर्व का है, जो चीन से ही मिलता है.
इसमें कहा गया है कि हान राजवंश के सेनापति हान शिन ने एक शहर पर हमला करते समय उसकी दीवारों के ऊपर पतंग उड़ाई. इससे उन्होंने यह नापा कि उनकी फ़ौज को दीवार के नीचे से सुरंग कितनी लंबी खोदनी होगी.
13वीं सदी तक चीन के व्यापारियों ने पतंग को कोरिया, भारत और बाकी एशिया व मध्य पूर्व के देशों तक पहुँचा दिया. हालांकि, हर जगह के लोगों ने अपनी अलग-अलग तरह की पतंग बनाई और उन्हें अलग-अलग मौक़ों पर उड़ाने लगे.

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भारत में पतंग कैसे आई?
नेशनल काइट मंथ के मुताबिक़ , भारत में पतंगबाज़ी का इतिहास मुग़ल काल से शुरू हुआ. इसका सबूत 1500 ईस्वी के आसपास की छोटी-छोटी चित्रकारी से मिलता है.
इन चित्रों में दिखाया जाता था कि एक युवा पतंग की मदद से अपनी प्रेमिका तक संदेश भेजता है. प्रेमिका पर कई पाबंदियां थीं, जिस कारण वह पतंग के ज़रिये प्रेम संदेश पाती था.
गुजरात टूरिज़्म की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, पतंग को भारत में सबसे पहले या तो मुस्लिम व्यापारियों के ज़रिये लाया गया था या फिर चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों के ज़रिये.
चीनी तीर्थयात्री बौद्ध धर्म से जुड़ी किताबें ढूंढने भारत आते थे.
एक हज़ार साल से भी ज़्यादा पहले संतनाम्बे नाम के संगीतकार ने अपनी रचनाओं में पतंगों का ज़िक्र किया था. साथ ही, उस समय की कई पुरानी छोटी-छोटी पेंटिंग्स में भी लोगों को पतंग उड़ाते हुए दिखाया गया है.
गुजरात भारत के सबसे पश्चिमी छोर पर है. यहां मुस्लिम और हिंदू संस्कृति मिली-जुली हुई है. इसी वजह से मुमकिन है कि मुस्लिमों की लाई गई पतंगों का इस्तेमाल उत्तरायण जैसे हिंदू त्योहार मनाने के लिए होने लगा.
मिरेकल काइट्स के अनुसार, शुरुआत में भारत में पतंग धार्मिक प्रतीक के तौर पर बनाई जाती थी. लोग इन्हें पूजा-पाठ या अनुष्ठान के दौरान हवा में उड़ाते थे, ताकि उनकी मनोकामनाएं और प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच जाएं. समय के साथ पतंगबाज़ी लोकप्रिय होने लगी. धीरे-धीरे काइट फेस्टिवल और प्रतियोगिताएं भी होने लगीं.
युद्ध के दौरान कैसे होता था पतंग का इस्तेमाल?

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अमेरिकन काइटफ्लायर्स एसोसिएशन के मुताबिक़, युद्ध के दौरान भी पतंगों का इस्तेमाल होता था. पहले विश्व युद्ध (1914-1918) में ब्रिटिश, फ्रेंच, इटालियन और रूसी सेनाओं ने पतंगों की खास यूनिट्स बनाई थीं.
इनका इस्तेमाल दुश्मन पर नज़र रखने और संदेश भेजने के लिए किया जाता था. दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945) में अमेरिकी नौसेना ने भी पतंगों का कई कामों में इस्तेमाल किया, जैसे हवाई रेस्क्यू से लेकर निशाना लगाने की प्रैक्टिस तक में.
फॉक्स वेदर की एक रिपोर्ट बताती है कि वॉशिंगटन में वर्ल्ड काइट म्यूज़ियम में एक कमरा है, जिसका नाम "वॉर रूम" है. इस कमरे में सिर्फ़ उन पतंगों को रखा गया है, जिनका इस्तेमाल युद्ध में किया जाता था.
म्यूज़ियम के वाइस प्रेसीडेंट जिम सेस कहते हैं कि यहां पर एक "बराज काइट" है, जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के शुरुआती दिनों में होता था. व्यापारी जहाज़ों से इस पतंग को उड़ाया जाता था. पतंग के साथ एक तार जुड़ा होता था, जो जहाज़ से ऊपर आसमान तक जाता था. अगर दुश्मन खेमे का कोई हवाई जहाज़ व्यापारियों के जहाज़ पर हमला करने आता, तो वह इस तार से टकरा जाता था. इससे हवाई जहाज़ के एल्यूमिनियम के पंख कट जाते थे.
जिम सेस ने 1890 के दशक की एक पतंग का भी उदाहरण दिया.
उन्होंने बताया, "एक त्रिकोण आकार की पतंग थी, जिस पर जर्मन फ्राइटर एयरक्राफ्ट का चित्र बना हुआ था. इस पतंग का इस्तेमाल ट्रेनिंग के लिए किया जाता था."
"जहाज़ से इस पतंग को कई सौ ग़ज़ दूर तक उड़ाया जाता था. फिर जहाज़ पर मौजूद मशीनगन चलाने वाले सैनिक उस पतंग को निशाना बनाते थे. वे पतंग पर बने हवाई जहाज़ के चित्र को देखकर ऐसे अभ्यास करते थे जैसे कि दुश्मन का असली प्लेन हो. इससे वे निशाना लगाना सीखते थे."

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हवाई जहाज़ को बनाने का विचार पतंग से ही आया
अमेरिकन काइटफ्लायर्स एसोसिएशन की रिपोर्ट में बताया गया है, "हवाई जहाज़ बनाने वाले राइट ब्रदर्स पतंग उड़ाने में बहुत माहिर थे. कई सालों तक पतंग उड़ाने के कारण ही उन्हें हवाई जहाज़ बनाने का विचार आया. एक दिन किटी हॉक में पतंग उड़ाते समय उन्हें पता चला कि ये पतंग इतनी ताक़त से ऊपर उठती है कि इंसान को भी ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठा सकती है."
अगस्त 1899 में उन्होंने एक बाइप्लेन काइट बनाई. उन्होंने देखा कि पतंग के चारों कोनों से जुड़ी चार डोरियों को अलग-अलग तरीक़े से खींचने पर पतंग के पंख मुड़ सकते हैं. यह वही तरीक़ा था जिसे अपनाकर पक्षी आसमान में उड़ते हैं.
इसके बाद 1901 में अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने अपनी 'टेट्राहेड्रल काइट' का पहला प्रोटोटाइप बनाया. यह एक ख़ास तरह की मज़बूत पतंग थी. इसमें कई छोटी-छोटी पतंगों को जोड़कर बड़ी से बड़ी पतंग बनाई जा सकती थी, इसके लिए मोटी डंडियों की ज़रूरत भी नहीं होती थी.
ग्राहम बेल की इस टेट्राहेड्रल पतंग ने बाद में 288 पाउंड यानी लगभग 130 किलो तक वज़न उठाया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















