कंधार में अगवा किए गए भारतीय विमान यात्रियों को छुड़ाए जाने की कहानी- विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
26 दिसंबर, 1999 को इस्लामाबाद में एआर घनश्याम अपनी पत्नी रुचि घनश्याम के साथ अपने घर पर टीवी समाचार देख रहे थे. रात 10 बजे उनके टेलीफ़ोन की घंटी बजी. पाकिस्तान में भारतीय हाई कमिश्नर जी पार्थसारथी ने उन दोनों को उसी समय अपने घर बुलाया.
पार्थसारथी का घर बिल्कुल बगल में था. वे दोनों पैदल चलते हुए वहां पहुंच गए. पति-पत्नी दोनों भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी थे और तब इस्लामाबाद में उनकी तैनाती थी.
भारतीय हाई कमिश्नर ने बिना किसी भूमिका के उन्हें सूचित किया कि सरकार ने एआर घनश्याम को कंधार भेजने का फ़ैसला किया है. उस समय उप-उच्चायुक्त दिल्ली गए हुए थे. कई दूसरे राजनयिक भी क्रिसमस की छुट्टियों पर भारत गए हुए थे.
मामला तालिबान से जुड़ा था इसलिए पार्थसारथी ने रुचि घनश्याम को नहीं भेजने का फ़ैसला किया. कंधार भेजने के लिए व्यापार और आर्थिक मामले देख रहे उनके पति एआर घनश्याम को चुना गया. उनको बताया गया कि 27 दिसंबर की सुबह संयुक्त राष्ट्र का एक विमान उन्हें इस्लामाबाद हवाई-अड्डे से लेकर कंधार के लिए उड़ान भरेगा.
कंधार पहुंचे घनश्याम

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करीब तीन घंटे की उड़ान के बाद विमान ने कंधार हवाई-अड्डे पर लैंड किया, जब घनश्याम विमान के दरवाज़े पर पहुंचे तो उनकी नज़र इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी-184 पर पड़ी.
घनश्याम याद करते हैं, "आईसी-184 हमारे विमान से 150 मीटर की दूरी पर खड़ा था. उसकी सभी खिड़कियां बंद थीं. मैंने देखा कि नीचे सीढ़ियों के पास दो लोग मुझे रिसीव करने के लिए खड़े हैं. उनमें से एक कंधार में संयुक्त राष्ट्र के दफ़्तर का प्रमुख था. दूसरे शख़्स ने सफ़ेद अफ़गान पोशाक पहनी थी. उसके ऊपर उन्होंने बिना आस्तीनों की काले रंग की जैकेट पहन रखी थी. वह तालिबान के विदेश मंत्री थे, वकील अहमद मुतवक्किल. मैंने उन दोनों से हाथ मिलाकर उनका अभिवादन किया."
घनश्याम बताते हैं कि मुतवक्किल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कैसे बात करें. "वह पश्तो बोल रहे थे जो मुझे आती नहीं थी. मैं अंग्रेज़ी बोल रहा था जिसकी उन्हें बहुत कम समझ थी. उन दोनों ने मुझसे कहा कि हमें तुरंत हाईजैक किए गए विमान में बैठे हाइजैकर्स से संपर्क करना चाहिए क्योंकि वह इस बात से बहुत नाराज़ हैं कि अब तक भारत सरकार का कोई प्रतिनिधि उनसे बातचीत करने के लिए नहीं पहुंचा है."
हाइजैकर्स का रवैया

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घनश्याम ने 'अस्सलाम वलैकुम' कहकर हाइजैकर्स से अपनी बातचीत शुरू की, लेकिन विमान अगवा करने वालों ने उनके अभिवादन का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि कश्मीर में हो रही कथित ज़्यादतियों के बारे में लगातार बोलते रहे.
घनश्याम बताते हैं, "चूंकि वह रमज़ान का महीना था, हाइजैकर्स के लीडर ने सुबह सूरज उगने से पहले ही कुछ खाया होगा लेकिन इसके बावजूद वह मुझसे बुलंद आवाज़ में गाढ़ी उर्दू में बात कर रहा था. वह जितना बोलता जाता था मुझे उतना अधिक समय मिल रहा था जो मेरे लिए अच्छा था. मैंने उसे रोका नहीं. जब वह बोलते-बोलते थक गया तो मैंने उससे उर्दू में पूछा, 'जनाब, क्या आपके पास मेरे लिए कोई संदेश है जिसे मैं अपनी सरकार तक पहुंचा सकूं?''
यह सुनते ही वह और भड़क गया और फिर से चिल्लाने लगा, "किस तरह का देश है आपका? किस तरह की सरकार है आपकी ? आपको जहाज़ के अंदर बैठे अपने लोगों की ज़रा भी चिंता नहीं है. अगर अब थोड़ी भी देर होती है तो मैं एक-एक करके उनको मारना शुरू कर दूंगा. क्या तुम इसके लिए तैयार हो?" घनश्याम ने उन्हें शांत करने की कोशिश करते हुए कहा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल कुछ ही क्षणों में दिल्ली से कंधार के लिए रवाना होने वाला है.
जब घनश्याम विमान पर कब्ज़ा करने वालों से बातचीत करके लाउंज में लौटे तो संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने उन्हें एक भूरा लिफ़ाफ़ा थमा दिया. जब घनश्याम ने वह लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमें कुछ चॉकलेटें निकलीं.
27 दिसंबर को इंडियन एयरलाइंस का एक विशेष विमान कंधार हवाई-अड्डे पर उतरा. उसमें भारत सरकार के पांच प्रतिनिधि और इंडियन एयरलाइंस के 10 तकनीशियन शामिल थे.
इन पांच प्रतिनिधियों में सीडी सहाय और आनंद आर्नी रॉ से, अजीत डोभाल और संधू इंटेलिजेंस ब्यूरो से और विदेश मंत्राललय के संयुक्त सचिव विवेक काटजू थे.
इन लोगों को अफ़गान एयरलाइंस के गेस्ट हाउस में रहने के लिए दो कमरे दिए गए थे. सहाय, डोभाल और काटजू को एक कमरे में ठहराया गया जबकि दूसरे कमरे में घनश्याम, आर्नी और संधू ठहरे. सबसे बड़ी समस्या थी टॉयलेट की. इतने सारे लोगों के लिए सिर्फ़ एक टॉयलेट था.
घनश्याम याद करते हैं, "भीड़ से बचने के लिए मैं सुबह 3 बजे उठ जाता था. मैंने वहां मौजूद एक केयरटेकर से पूछा कि क्या यहां आसपास कोई दूसरा वॉशरूम है क्योंकि मुझे देर हो रही थी. उसने मुझे कुछ दूर एक इमारत दिखलाई. मैं वहां अपना तौलिया और टॉयलेट बैग ले कर गया और वहां का वॉशरूम इस्तेमाल किया. मैंने वहां नोट किया कि उस इमारत में रहने वाले लोग अफ़गानी लोगों से बिल्कुल भिन्न थे. मैंने काटजू को ये बात बताई. काटजू ने भी वहां जाकर उस जगह का जायज़ा लिया. हम दोनों का मानना था कि उस इमारत में सीमा पार से आए लोग रह रहे थे ताकि वह तालिबान को अपहरण से जुड़े मामले में सलाह दे सकें."
पर्ची विमान से नीचे गिराई गई

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वहां मौजूद तालिबान के अफ़सरों से भारतीय प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों को विमान के पास जाने की अनुमति मिली.
घनश्याम बताते हैं, "जब हम विमान के पास पहुंचे तो अचानक विमान का दरवाज़ा खुला और वहां से एक कागज़ नीचे गिराया गया. उस समय ठंडी हवा चल रही थी इसलिए कागज़ हवा में उड़ने लगा. यह एक कॉपी से फाड़ा गया एक पन्ना था. मैं उड़ते हुए कागज़ के पीछे दौड़ा और आख़िरकार उसे पकड़ने में कामयाब हो गया. मैंने देखा कि उसपर बहुत सुंदर राइटिंग में उनकी मांगें लिखी हुई थीं. कुल मिलाकर उनकी 38 मांगें थीं. वह चाहते थे कि भारत की जेलों में बंद 36 बंदियों को रिहा किया जाए. भारत में दफ़न हरकत-उल-अंसार के संस्थापक सज्जाद अफ़गानी के अवशेषों को वापस किया जाए. इसके अलावा, भारत सरकार उन्हें 100 डॉलर की गड्डियों में 20 लाख डॉलर दे."
भारतीय प्रतिनिधिमंडल के लिए पहला खाना आया, मुर्गे की एक भुनी हुई टांग, एक बड़ी अफ़गानी नान, कटा हुआ खीरा और प्याज़. ये उस लिहाज़ से बड़ी बात थी क्योंकि उनके आसपास के लोग रमज़ान होने की वजह से कुछ खा-पी नहीं रहे थे. अगले दिन उनके लिए सीमा पार पाकिस्तान से खाना आने लगा. लाउंज में मौजूद लोगों के बीच मज़ाक प्रचलित था कि अचानक इतने सारे लोगों के आ जाने की वजह से छोटे-से शहर कंधार में मुर्गों की कमी पड़ गई थी.
आख़िरकार तीन चरमपंथियों को छोड़ने पर सहमति बनी.

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सज्जाद अफ़गानी की लाश को कब्र से बाहर निकालने की मांग पूरी कर पाना भारतीय प्रशासन के लिए बहुत मुश्किल था.
एआर घनश्याम बताते हैं, "हमारे अनुरोध पर तालिबान ने भी हाइजैकर्स से कहा कि इस तरह की मांग इस्लाम विरोधी है. इसी तरह का तर्क अमेरिकी डॉलर की मांग के लिए भी दिया गया. कई तर्कों और जवाबी तर्कों के बाद वह मांग भी वापस ले ली गई. जहां तक बंधकों की रिहाई की बात थी, हमारा तर्क था कि हमें इस बात की पुख़्ता जानकारी नहीं है कि ये लोग भारत की किस जेल में बंद हैं. उनकी रिहाई के लिए हमें अदालतों से अनुमति लेनी होगी और हमें उन्हें इसका कारण भी बताना होगा. ऐसा करने में हफ़्तों, महीनों या इससे ज़्यादा भी लग सकते हैं. हाइजैकर्स की तरफ़ से बात करने वाले लोग जल्दी थक जा रहे थे, उनकी आवाज़ धीमी पड़ती जा रही थी क्योंकि उन्हें ख़ाली पेट लंबी बात करनी पड़ रही थी. तीसरे दिन तक उनकी मांग घटकर तीन बंदियों की रिहाई तक आ पहुंची थी."
ये तीन चरमपंथी थे मसूद अज़हर, उमर शेख़ और मुश्ताक़ अहमद ज़रगर. सरकार पर बहुत दबाव था कि विमान में फंसे भारतीय यात्रियों को किसी भी कीमत पर छुड़ाया जाए.
चरमपंथियों के रिश्तेदारों ने उनकी पहचान की

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31 दिसंबर को इन तीन चरमपंथियों और विदेश मंत्री जसवंत सिंह को लेकर इंडियन एयरलाइंस का एक विमान शाम पांच बजे कंधार पहुंचा. उस समय सूरज डूबने ही वाला था.
घनश्याम याद करते हैं, "हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि यात्रियों को विमान से कैसे उतारा जाए क्योंकि कंधार हवाई-अड्डे पर सिर्फ़ एक ही सीढ़ी उपलब्ध थी. उससे सबसे पहले चरमपंथियों और विदेश मंत्री को उतारा गया. फिर उसी सीढ़ी से यात्रियों को अगवा किए गए विमान से उतारा गया, फिर उसी सीढ़ी से उन यात्रियों को भारत से आए विमान पर चढ़ाया गया. इस सबमें काफ़ी समय लग गया. जसवंत सिंह विदेश मंत्रालय में निदेशक वीपी हरन के साथ सबसे पहले उतरे. उन्हें तालिबान के विदेश मंत्री से मिलने के लिए ले जाया गया. उन्होंने उनकी मध्यस्थता के लिए उन्हें धन्यवाद दिया."
उसके बाद तीनों चरमपंथी उतरे. उनको तालिबान के प्रतिनिधियों ने एक-एक करके रिसीव किया. इसके बाद वह तीनों ग़ायब हो गए.
जसवंत सिंह ने उस दृश्य का वर्णन करते हुए अपनी आत्मकथा 'अ कॉल टु ऑनर' में लिखा, "जैसे ही वह तीनों नीचे उतरे उनका गले लगाकर और नारे लगा कर स्वागत किया गया. इन सबके रिश्तेदारों को पाकिस्तान से वहां लाया गया था. उन लोगों ने बाक़ायदा उनकी पहचान की. जब हाइजैकर निश्चिंत हो गए कि छोड़े गए चरमपंथी असली हैं तभी उन्होंने विमान से उतरने का फ़ैसला किया. मैं इस बीच इंतज़ार करता रहा. इस बीच अंधेरा घिर आया. ठंड बढ़ गई."
डोभाल को दूरबीन भेंट की

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उसी दौरान एक हाइजैकर ने अजीत डोभाल को एक दूरबीन भेंट की. बाद में इसका विवरण देते हुए डोभाल ने लिखा, "तीन चरमपंथियों को हाइजैकर्स के हवाले करने से पहले मैं सुनिश्चित करना चाहता था कि हाइजैकर्स किसी और शरारत की फ़िराक में तो नहीं हैं. मैंने विमान में जाकर यात्रियों का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें संबोधित किया. जब मैं विमान से उतर रहा था तो दो हाइजैकर बर्गर और सैंडी मेरे पास आए और उन्होंने मुझे यादगार के तौर एक छोटी-सी दूरबीन दी. उनका कहना था कि इस दूरबीन से वह बाहर की गतिविधियों पर नज़र रख रहे थे. जब हम दिल्ली वापस लौट रहे थे तो मैंने वह दूरबीन विदेश मंत्री को दिखाई. उन्होंने ये कहते हुए वह दूरबीन अपने पास रख ली कि वह उन्हें कंधार के कटु अनुभव के बारे में याद दिलाती रहेगी."
उस रात विदेश मंत्री जसवंत सिंह सभी यात्रियों के साथ दिल्ली वापस लौट आए लेकिन उन्होंने घनश्याम को निर्देश दिया कि वह तब तक कंधार में ही रहें जब तक अगवा किया गया भारतीय विमान दिल्ली वापस नहीं चला जाता.
घनश्याम याद करते हैं, "जब मैं करीब सात बजे विमान के अंदर घुसा तो उसमें असहनीय दुर्गंध आ रही थी. कॉकपिट के अंदर चिकन की हड्डियां और संतरों के छिलके पड़े हुए थे. टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं थे. उस रात मैं हवाई अड्डे के लाउंज मे ही रुका. 11 बजे तक कैप्टन राव विमान से लौटे नहीं थे. मैं उनके बारे में पूछने विमान तक गया. मैं कैप्टन राव को अपने साथ लाउंज ले आया था और हम सब उस रात लाउंज मे ही सोए थे."
तालिबान की तरफ़ से घनश्याम को तोहफ़ा

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अगले दिन एक जनवरी को इस्लामाबाद लौटने से पहले घनश्याम तालिबान के अधिकारियों से मिलकर उनका धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन उनसे मिलने कोई नहीं आया.
करीब 11 बजे कंट्रोल रूम के अंग्रेज़ी बोलने वाले एक अधिकारी ने घनश्याम को एक पैकेट दिया.
घनश्याम याद करते हैं, "उस पैकेट में कुछ बादाम और किशमिश थी. इसके अलावा उसमें एक छोटा कंघा, एक नेलकटर, नाइलॉन की एक जोड़ी जुराबें और अफ़गानी पोशाक बनाने के लिए कुछ मीटर सूती कपड़ा था. उस व्यक्ति ने मुझसे कहा कि ये तालिबान के नागरिक उड्डयन मंत्री की तरफ़ से मुझे भेजा गया तोहफ़ा है. बारह बजे मैं संयुक्त राष्ट्र के विमान पर सवार होकर इस्लामाबाद के लिए रवाना हो गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















