क़ंधार विमान अपहरण: भारतीय हवाई जहाज़ के चक्कर काटता साइकिल वाला कौन था?

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- Author, मोहम्मद काज़िम
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, क्वेटा
किसी विमान का अपहरण होने के बाद आमतौर पर टीवी स्क्रीन पर दिखाई देता है कि उस विमान के इर्द-गिर्द सुरक्षाकर्मियों की भीड़ है और गाड़ियां तेज़ी से आ जा रही हैं.
लेकिन दो दशक पहले अफ़ग़ानिस्तान के क़ंधार एयरपोर्ट पर एक अलग ही हैरतअंगेज़ नज़ारा देखने को मिला. एयरपोर्ट पर अपहरण किए गए जहाज़ के आस-पास बख़्तरबंद गाड़ियों की जगह एक शख़्स को साइकिल पर चक्कर काटते देखा गया.
यह कहानी इंडियन एयरलाइंस के उस विमान की है जिसका उड़ान भरने के बाद अपहरण कर लिया गया और फिर उसे तीन एयरपोर्ट पर उतारने के बाद क़ंधार ले जाया गया.
अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास में क़ंधार की अहमियत काबुल से कम नहीं है लेकिन 90 के दशक से पहले अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने क़ंधार को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी थी.
90 के दशक में यह शहर दो बड़ी घटनाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया. पहला तालिबान के उदय के बाद इस पर उसका क़ब्ज़ा और दूसरा इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण के बाद उसे यहां पर लाया जाना.
कई पहलुओं के अलावा यह विमान अपहरण इसलिए भी ज़्यादा जाना जाता है क्योंकि यह सबसे लंबे समय तक चलने वाली घटना थी. चरमपंथियों ने सात दिनों तक विमान को क़ब्ज़े में ले रखा था.
कैसे हुआ था अपहरण
24 दिसंबर 1999 को इंडियन एयरलाइंस की उड़ान संख्या आईसी 814 ने नेपाल की राजधानी काठमांडू से लखनऊ के लिए उड़ान भरी. इस विमान में 176 यात्रियों के अलावा पायलट समेत क्रू के 15 लोग सवार थे.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जब यह विमान भारत के हवाई क्षेत्र में दाख़िल हुआ तो एक नक़ाबपोश शख़्स उठा और कॉकपिट की ओर चल पड़ा.
उन शख़्स ने पायलट को धमकी दी कि अगर उसने हवाई जहाज़ का रुख़ लखनऊ की जगह लाहौर की ओर नहीं मोड़ा तो वो इस विमान को बम से उड़ा देगा.
उसके साथ ही उसके चार और नक़ाबपोश लोग खड़े हुए और उन्होंने जहाज़ के अलग-अलग हिस्सों में पोज़िशन ले लीं.

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क़ंधार से पहले कहां-कहां गया विमान
जहाज़ के पायलट कैप्टन देवी शरन ने लखनऊ की जगह लाहौर का रुख़ किया लेकिन इसके लिए उनके विमान में ईंधन कम था. इसके कारण विमान को अमृतसर में उतारा गया.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, विमान की लैंडिंग पर सुरक्षाबलों ने अपहरणकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की तैयारी की थी जिसका अंदेशा उन्हें हो गया था. इस वजह से उन्होंने बिना ईंधन लिए वापस लाहौर की उड़ान भरने के लिए पायलट को मजबूर किया.
शुरुआत में पाकिस्तान ने विमान को लाहौर एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति नहीं दी थी और एयरपोर्ट की लाइटें बंद कर दी थीं. लेकिन ईंधन भरने के लिए लाहौर एयरपोर्ट पर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं था जिसके बाद विमान को लाहौर एयरपोरट पर उतरने की अनुमति दी गई.
ईंधन भरने के बाद पाकिस्तान ने विमान के पायलट को तुरंत लाहौर एयरपोर्ट छोड़ने को कहा.
लाहौर के बाद यह विमान दुबई एयरपोर्ट पहुँचा जहां पर अपहरणकर्ताओं ने 27 यात्रियों को विमान से उतरने की अनुमति दे दी.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, भारत ने दुबई एयरपोर्ट पर विमान को अपहरणकर्ताओं से छुड़ाने के लिए यूएई से कार्रवाई की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.
इसके बाद यह विमान अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे बड़े शहर क़ंधार के एयरपोर्ट पहुँचा और अपहरण की समाप्ति तक वहां पर खड़ा रहा.

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जब क़ंधार एयरपोर्ट पर जमी रहीं दुनिया की निगाहें
क़ंधार में विमान के उतरने के बाद वहां पर पत्रकारों के इकट्ठा होने का सिलसिला शुरू हो गया.
क़ंधार एयरपोर्ट बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा के नज़दीक़ है तो सबसे पहले क्वेटा में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के पत्रकार इकट्ठा होने शुरू हो गए.
क्वेटा से जो पत्रकार सबसे पहले क़ंधार पहुंचे थे उनमें क्वेटा में बीबीसी पश्तो सेवा के संवाददाता अय्यूब तरीन शामिल थे. उनके बाद पहुँचने वालों में वरिष्ठ पत्रकार शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार और एएफ़पी से जुड़े प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़र बनारस ख़ान भी शामिल थे.
दो दशक गुज़रने के बावजूद अपहरण की शुरुआत से उसके ख़त्म होने तक सारी घटनाएं इन लोगों को आज भी याद हैं.
अय्यूब तरीन ने बताया कि पहले दिन वो क़ंधार के एक होटल में ठहरे. उन्होंने बताया कि उस समय रमज़ान का महीना चल रहा था.
उन्होंने कहा, "जब हम सहरी के लिए उठे तो होटल में लोग हमें घूरने लगे कि बिना दाढ़ी के ये जीव कहां से आए हैं. होटल में मौजूद लोग इस बात से बेख़बर थे कि किसी भारतीय जहाज़ को अग़वा करके उनके एयरपोर्ट पर लाया गया है."

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साइकिल और मोटर साइकिल पर गश्त
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार ने बताया कि उन्होंने एयरपोर्ट पर जो सबसे अजीबो-ग़रीब चीज़ देखी वह थी एक शख़्स का साइकिल पर एयरपोर्ट पर आना और उसी से विमान के इर्द-गिर्द चक्कर लगाना.
बनारस ख़ान के मुताबिक़ वहां सुरक्षा इंतज़ाम देखने वाले लोग साइकिल या मोटर साइकिल पर ही गश्त करते थे.
उनका कहना था कि वो इस पर हैरान थे कि ऐसे मौक़ों पर तो बख़्तरबंद गाड़ियां और सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम होने चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं था.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार के मुताबिक़ उनके सवाल करने के बाद बताया गया कि जो शख़्स ज़्यादातर साइकिल पर चक्कर लगाते थे वो एयरपोर्ट के इलाक़े के एसएचओ स्तर के अधिकारी हैं.
कड़ाके की ठंड और सुविधाओं की कमी
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार ने बताया कि वो एक अहम घटना की कवरेज के लिए गए थे इसलिए वो रात को एयरपोर्ट नहीं छोड़ना चाहते थे क्योंकि रात को कोई भी बड़ी घटना हो सकती थी.
उनका कहना था कि उन दिनों ग़ज़ब की सर्दी पड़ रही थी और वहां रहने के कोई इंतज़ाम नहीं थे.

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उन्होंने बताया कि कड़ाके की ठंड पड़ने के बावजूद बचाव के लिए उनके पास सिर्फ़ गाड़ियां थीं. "जितने दिन पत्रकार वहां रहे उनके पास जो गाड़ियां थीं उन्होंने सर्दी से बचने के लिए उनको लगातार चालू रखा और वे गाड़ियों के अंदर बैठकर सर्दियों से बचने की कोशिश करते रहे."
"मैंने क्वेटा से जो जूते पहने थे वो कड़ाके की सर्दी और वहां पर सोने का इंतज़ाम न होने की वजह से दो-तीन रोज़ तक उनके फ़ीते तक नहीं खोले थे."
उन्होंने बताया कि सर्दी और इंतज़ाम न होने की वजह से वो नहीं सो सकते थे तो नींद पूरी करने के लिए वहां मौजूद पत्रकारों ने बारी-बारी चार-चार घंटे सोने का फ़ैसला किया.
जहाज़ के क़रीब जलाई जाती थी आग
हवाई अड्डे के पास सर्दी से बचने के लिए कोई ख़ास इंतज़ाम नहीं था जिसका हाल सुरक्षा पर मौजूद तालिबान के कर्मचारियों ने ऐसे निकाला कि वो खुले मैदान में आग जलाने लगे.
अय्यूब तरीन का कहना था कि यह आग ज़्यादा दूर नहीं बल्कि विमान के बिलकुल क़रीब जलाई जाती थी.
उन्होंने बताया कि किसी भी विमान के नीचे आग जलाना किसी भी तरह से सही नहीं होता लेकिन तालिबान को इस बात की बिलकुल भी परवाह नहीं थी और इस बात का ख़याल रखे बिना वे ऐसा करते थे.
फ़ाइव स्टार होटल से आया खाना

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शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार बताते हैं कि जिस तरह से वहां रहने की मुश्किलें थीं उसी तरह से वहां पर खाने-पीने की भी बहुत दिक़्क़तें थीं.
उन्होंने बताया कि शुरुआत में एक-दो दिन काफ़ी परेशानियां हुईं लेकिन फिर बाद में रेड क्रॉस के विमान से खाना आने लगा हालांकि कुछ पत्रकार खाना खाने के लिए शहर भी जाते थे.
अय्यूब तरीन ने बताया कि जहाज़ में तालिबान की ओर से यात्रियों और अन्य लोगों को खाने-पीने का सामान भी भेजा जाता था.
उनका कहना था कि तालिबान का फ़ूड पैकेज एक प्लास्टिक का थैला होता था जिसमें एक रोटी, एक चिकन लेग पीस और एक माल्टा होता था.
उन्होंने बताया कि विमान के यात्रियों ने खाने पर आपत्ति जताई कि वे हर समय यह खाना नहीं खा सकते हैं.
इसके बाद यह हल निकला कि इस्लामाबाद से संयुक्त राष्ट्र का एक विमान आता था जिसमें फ़ाइव स्टार होटल का खाना होता था.
कमांडो एक्शन की तैयारी
बनारस ख़ान बताते हैं कि शुरुआत के एक-दो दिन जब मसला हल होता नज़र नहीं आया तो तालिबान की ओर से किसी कार्रवाई के आसार नज़र आए.
उनका कहना था, "उसके लिए कोई ख़ास सुरक्षाबल नहीं थे बल्कि एयरपोर्ट पर जो तालिबान के कर्मचारी होते थे उन्हें ही एयरफ़ोर्स के कर्मचारियों वाली वर्दी पहना दी गई थी लेकिन तालिबान की ओर से किसी नुक़सान से बचने के कारण कोई कार्रवाई नहीं की गई थी."
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार ने बताया कि एयरपोर्ट पर तैनात जो कर्मचारी थे या जो आते-जाते थे उनको ऐसी किसी स्थिति से निपटने का अनुभव नहीं था.
उन्होंने बताया कि इस दौरान तालिबान की ओर से बताया गया कि भारत ने कमांडो एक्शन की माँग की थी लेकिन इसकी उन्हें इजाज़त नहीं दी गई.
उनका कहना था कि तालिबान ने ये बताया था कि वह किसी भी विदेशी फ़ौज को अपनी ज़मीन पर कार्रवाई की अनुमति नहीं दे सकता है.

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विमान का एसी हुआ ख़राब
बनारस ख़ान ने बताया कि अपहरण के तीसरे दिन विमान का एयर कंडिशनिंग सिस्टम बंद हो गया. जब एयर कंडिशनर बंद हुआ तो यात्रियों की दिक़्क़तें बढ़ गईं.
उन्होंने बताया था कि भारतीय कर्मचारी क़ंधार एयरपोर्ट आ रहे थे तो उनके साथ भारतीय इंजीनियर्स भी थे, एक इंजीनियर को विमान में जाने को कहा गया और वो काम करके बाहर निकल आया.
उनका कहना था कि जब पत्रकारों ने उस इंजीनियर से अंदर के हालात पूछे तो उसने बस इतना बताया कि उसे वहीं ले जाया गया था जहां पर ख़राबी थी.
भारतीय इंजीनियर ने पत्रकारों को बहुत कुछ नहीं बताया लेकिन उसने कहा कि जो अपहरणकर्ता हैं वे आम अपहरणकर्ता नहीं हैं क्योंकि उन्हें हवाई जहाज़ के बारे में भी बहुत सारी जानकारियां हैं.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार बताते हैं कि अपहरणकर्ता विमान में सफ़ाई के लिए एक कर्मचारी को आने देते थे और वही यात्रियों का हाल जानने का ज़रिया था.
उन्होंने बताया कि वो शख़्स बाहर आकर बताता था कि विमान के यात्री किस परेशानी से गुज़र रहे हैं.
सफ़ाई कर्मचारी को किसी भी यात्री से बात करने की अनुमति नहीं थी, उसको जल्दी काम करके निकलने के लिए कहा जाता था.
बातचीत हुई नाकाम

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शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार ने बताया कि भारतीय अधिकारी आए और तालिबान से लगातार बातचीत करते रहे.
उनका कहना था कि भारतीय अधिकारियों की शायद बहुत कोशिश रही होगी कि अपहरणकर्ताओं की बात को न मानें लेकिन वहां उन्होंने जो आसार देखे तो उन्हें समझ आ गया कि ऐसा मुमकिन नहीं है.
"वे समझ गए थे कि वे फंस गए हैं और इससे निकलना मुमकिन नहीं है जिसके कारण अपहरणकर्ताओं के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े और उन चरमपंथियों को रिहा करना पड़ा जिनके लिए विमान का अपहरण किया गया था."
वो बताते हैं कि अपहरण संकट समाप्त होने तक क़ंधार एयरपोर्ट भारत और तालिबानी अधिकारियों का केंद्र रहा, भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह को दो बार क़ंधार एयरपोर्ट आना पड़ा था.
एक बार वो बातचीत के सिलसिले में आए थे और दूसरी दफ़ा तब जब अपहरणकर्ताओं की माँग के बाद भारत की जेल में बंद चरमपंथियों मौलाना मसूद अज़हर, मुश्ताक़ ज़रगर और अहमद उमर सईद शेख़ को रिहा करने के लिए क़ंधार एयरपोर्ट लाया गया.
उनका कहना था कि जिस दिन बंधक संकट समाप्त हुआ उस दिन भारत से दो हवाई जहाज़ आए जिसमें से एक में जसवंत सिंह थे.
उन्होंने बताया कि दूसरे विमान में शायद मौलाना मसूद अज़हर समेत तीनों चरमपंथी थे.

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अपहरणकर्ता एंबुलेंस में हुए फ़रार
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार बताते हैं कि अपहरण संकट ख़त्म होने से पहले एक एंबुलेंस विमान के पास आकर खड़ी हुई.
उन्होंने बताया कि विमान के आगे की तरफ़ से पाँच नक़ाबपोश अपहरणकर्ता उतरे और एंबुलेंस में दाख़िल हो गए.
उनका कहना था कि मौलाना मसूद अज़हर समेत रिहाई पाने वाले चरमपंथियों को उन्होंने देखा और शायद वे भी उसी एंबुलेंस में निकल गए जिसमें अपहरणकर्ता थे.
उन्होंने बताया कि यह पता नहीं चला कि वे लोग एयरपोर्ट से निकलकर किस ओर चले गए हालांकि अपहरणकर्ताओं और रिहा होने वाले चरमपंथियों के लिए तालिबान अधिकारियों ने आदेश जारी किया हुआ था कि वे दो घंटे में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दें.
शहज़ादा ज़ुल्फ़िक़ार बताते हैं कि अपहरण होने वाला विमान पत्रकारों के बिल्कुल क़रीब था और विमान से उतरकर दूसरे विमान में चढ़ने वाले यात्रियों के क़रीब पत्रकारों को जाने नहीं दिया गया.
उन्होंने बताया कि दूसरे विमान में चढ़ते यात्रियों के चेहरों को साफ़ पढ़ा जा सकता था, वे इतने ख़ुश थे जैसे उन्हें दूसरी ज़िंदगी मिली हो.
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