ललित नारायण मिश्रा हत्याकांड, पांच दशक बाद भी जिस पर उठते रहते हैं सवाल

ललित नारायण मिश्रा

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इमेज कैप्शन, ललित नारायण मिश्रा पहले विदेश व्यापार मंत्री के पद पर भी रहे थे
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी

इंदिरा गांधी की कैबिनेट में रेल मंत्री रहे ललित नारायण मिश्रा की हत्या दो जनवरी, 1975 को हुई थी लेकिन यह हत्याकांड अब भी चर्चा में आता रहता है.

2025 में संसद के मॉनसून सत्र में बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने इस मामले को एक बार फिर उठाया और इस हत्या में कांग्रेस की कथित भूमिका को लेकर सवाल उठाए.

इससे पहले भी कई दूसरे सांसद इस हत्याकांड को एक कथित 'गहरी साज़िश' बताकर नए सिरे से जाँच की माँग करते रहे हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के नेता अश्विनी कुमार चौबे ने पिछले साल नवंबर महीने में एक याचिका दायर करके दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि हत्याकांड की जाँच नए सिरे से कराई जाए, ऐसी ही माँग मिश्रा के पोते वैभव मिश्रा भी कर चुके हैं.

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ललित नारायण मिश्रा कांग्रेस में थे ख़ासे चर्चित

1970 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े फ़ंड कलेक्टर ललित नारायण मिश्रा हुआ करते थे जिन्हें इंदिरा गांधी ने पहले विदेश व्यापार मंत्री और फिर रेलवे मंत्री बनाया था.

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक इंदर मल्होत्रा इंदिरा गाँधी की जीवनी 'इंदिरा गांधी अ पर्सनल एंड पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, "मिश्रा का नाम हर तरह की वित्तीय हेराफेरी और राजनीतिक छल-कपट के साथ जोड़ा जाने लगा था."

"उनका नाम तुलमोहन राम केस में आया था जहाँ अररिया से कांग्रेस के सांसद तुलमोहन राम ने कांग्रेस के 21 सांसदों के फ़र्ज़ी हस्ताक्षर करके कुछ व्यापारियों के लिए विदेश व्यापार मंत्रालय से व्यापार लाइसेंस जारी करवाए थे."

सन 1973 में इंदिरा गांधी ने मिश्रा को रेल मंत्रालय सौंप दिया था. दो मई, 1973 की सुबह लखनऊ सेंट्रल स्टेशन के रिटायरिंग रूम में गहरी नींद में सोए जॉर्ज फ़र्नांडिस को जगाकर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था. उन्हें एक सरकारी विमान से दिल्ली ले जाया गया था.

उसी समय केंद्रीय रेलवे मंत्री मिश्रा के ड्राइवर ने फ़र्नांडिस के दिल्ली निवास की घंटी बजाकर उनकी पत्नी लैला फ़र्नांडिस को एक पत्र दिया था, उस पत्र में मिश्रा ने लिखा था कि "रेलवे कर्मचारियों से बातचीत फ़ेल होने के लिए जॉर्ज ज़िम्मेदार थे और इसी वजह से उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है."

लोकसभा में इस मुद्दे पर ज़बरदस्त हंगामा हुआ था और विपक्ष ने मिश्रा पर भ्रष्ट और अयोग्य होने के आरोप लगाए थे.

ललित नारायण मिश्रा

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इमेज कैप्शन, ललित नारायण मिश्रा के छोटे भाई जगन्नाथ मिश्रा भी इस हमले में घायल हुए थे

समस्तीपुर में रेलवे लाइन का उद्घाटन

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ऐतिहासिक रेल हड़ताल ख़त्म होने के सात महीने बाद मिश्रा एक रेलवे लाइन का उद्घाटन करने बिहार में समस्तीपुर गए थे.

मिश्रा का ज्योतिष में गहरा विश्वास था. उनका एक निजी ज्योतिषी था जो आने वाले दिनों के लिए पंचांग बनाता था, वह अपने दोनों हाथों की सभी उंगलियों में अंगूठी पहनते थे.

मिश्रा जल्द से जल्द समस्तीपुर-दरभंगा ब्रॉडगेज लाइन का उद्घाटन करवाना चाहते थे.

मिश्रा हत्याकांड की जांच के लिए बनाए गए मैथ्यू आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़, "उनके ज्योतिषी ने जो पंचांग बनाया उसमें आने वाली दो जनवरी, 1975 को उनके लिए अशुभ घोषित कर दिया और कैलेंडर पर उस दिन के आगे लाल कलम से 'महाकाल' लिख दिया."

"ललित नारायण मिश्रा ने जब इससे बचने का उपाय पूछा तो ज्योतिषी ने कहा कि अगर उस दिन घर से बाहर नहीं निकलेंगे तो विपत्ति अपने-आप टल जाएगी."

मैथ्यू आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, जब ललित नारायण मिश्रा अपने दफ़्तर पहुंचे तो उनके अधिकारियों ने उन्हें बहुत उत्साह से बताया कि रेल लाइन के उद्घाटन के लिए 2 जनवरी का दिन निर्धारित किया गया है.

जब जाँच ने आयोग ने तफ़्तीश की तो पता चला कि मिश्रा इस उद्घाटन के लिए जल्दी में थे इसलिए उन्होंने ज्योतिषी की सलाह के बावजूद इस कार्यक्रम को स्थगित नहीं करने का फ़ैसला किया.

जॉर्ज फ़र्नांडिस
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ललित नारायण मिश्रा पर हथगोला फेंका गया

मशहूर पत्रकार कूमी कपूर अपनी किताब 'इमरजेंसी अ पर्सनल हिस्ट्री' में लिखती हैं, "जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर ललित नारायण मिश्रा के मित्र हुआ करते थे. उन्होंने (नैयर ने) मुझे एक इंटरव्यू में बताया था कि ललित बाबू ने उन्हें फ़ोन पर बताया था कि समस्तीपुर जाने से पहले उन्होंने मंत्री पद से अपना त्यागपत्र इंदिरा गाँधी को सौंप दिया था. उन्होंने नैयर से कहा था उन्हें बहुत शक है कि वो समस्तीपुर से जीवित वापस लौट पाएं, उन्हें डर था कि उनकी हत्या कर दी जाएगी."

दो जनवरी की सुबह ललित नारायण ने एक सरकारी विमान से दिल्ली से पटना के लिए उड़ान भरी. पटना में मौसम बहुत ख़राब था. चारों ओर गहरा कोहरा छाया हुआ था. पायलट ने विमान उतारने में असमर्थता प्रकट की.

मिश्रा ने नाराज़ होकर कहा, "हमें समस्तीपुर समय पर पहुंचना है. किसी भी तरह से विमान उतारिए." पायलट ने बहुत मुश्किल से विमान नीचे उतारा. पटना हवाई-अड्डे के रनवे पर एक कार उनका इंतज़ार कर रही थी.

मिश्रा शाम पाँच बजे समस्तीपुर पहुंचे. वहाँ उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ और उन्हें स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर-3 पर ले जाया गया. उन्होंने लाल फ़ीता काटकर समस्तीपुर से दरभंगा की ब्रॉडगेज लाइन का उद्घाटन किया.

ठीक 5 बजकर 30 मिनट पर जब वे अपना भाषण समाप्त करके मंच से नीचे उतर रहे थे किसी ने उनके ऊपर हथगोला फेंका. चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री और गहरा धुआँ फैल गया.

जब धुआँ छँटा तो तक़रीबन 20 लोग वहाँ घायल पड़े थे. ललित नारायण मिश्रा, उनके छोटे भाई जगन्नाथ मिश्रा और दरभंगा के डीआईजी बीएन मिश्रा बुरी तरह से घायल हो चुके थे.

इंदिरा गांधी

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी ने मिश्रा की हत्या के लिए उस समय देश में व्याप्त अराजकता को दोषी ठहराया था

दानापुर ले जाने का फ़ैसला

सारे घायलों को 40 किलोमीटर दूर दरभंगा के सरकारी अस्पताल में ले जाया गया लेकिन रेलवे अधिकारियों ने मंत्री ललित नारायण और उनके छोटे भाई जगन्नाथ मिश्रा को पटना ज़िले के दानापुर रेलवे अस्पताल ले जाने का फ़ैसला किया.

मैथ्यू जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "कुछ रेल अधिकारियों ने ललित बाबू को स्थानीय समस्तीपुर अस्पताल में ले जाने की सलाह दी थी लेकिन उन्होंने वहाँ जाने से मना कर दिया और निर्देश दिया कि उन्हें जल्द से जल्द विशेष ट्रेन से दानापुर के बड़े रेलवे अस्पताल ले जाया जाए."

"मिश्रा को ले जाने वाली ट्रेन रात साढ़े आठ बजे दानापुर के लिए रवाना हुई. आयोग को बताया गया कि बिना किसी विशेष कारण के ट्रेन रास्ते में कई जगह रुकती गई और दानापुर रेलवे स्टेशन में पहुंचने में देरी होती चली गई, जिस कारण ललित बाबू की बेचैनी बढ़ती चली गई."

"समस्तीपुर से दानापुर की दूरी 132 किलोमीटर थी, ट्रेन ने इस सफ़र के लिए 14 घंटे से अधिक का समय लिया. ट्रेन पटना से गुज़री लेकिन उन्हें वहाँ नहीं उतारा गया. घायल ललित बाबू को सुबह तीन बजे अस्पताल में भर्ती करवाया गया."

लेकिन डॉक्टर उनकी जान नहीं बचा सके.

वीडियो कैप्शन, आम आदमी की तड़प को आवाज़ देने वाले दुष्यंत कुमार की कहानी- विवेचना

कैबिनेट मंत्री की हत्या का पहला मामला

उस ज़माने में गंगा नदी पर महात्मा गाँधी सेतु नहीं बना था. कूमी कपूर ने लिखा था, "मिश्रा को मेडिकल सहायता तुरंत मिल गई होती अगर उन्हें एक घंटे की दूरी पर दरभंगा मेडिकल कालेज पहुंचा दिया गया होता. वो साढ़े पाँच बजे घायल हुए थे. उस समय मिश्रा को मिलने वाली डॉक्टरी सहायता में देरी पर कई सवाल उठाए गए थे."

"उनको दानापुर ले जाने वाली ट्रेन साढ़े आठ बजे समस्तीपुर से चली और उन्हें अगले दस घंटों तक मेडिकल सहायता नहीं दी गई. जब उन्हें दानापुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया तब तक बहुत देर हो चुकी थी."

आकाशवाणी के सुबह के समाचार बुलेटिन में ख़बर दी गई कि ललित नारायण मिश्रा इस दुनिया में नहीं रहे. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 52 साल. ये आज़ादी के बाद किसी कैबिनेट मंत्री की हत्या की यह पहली घटना थी जिससे पूरे देश में सनसनी फैल गई.

इस बम विस्फोट में ललित नारायण मिश्रा के अलावा बिहार विधान परिषद के सदस्य सूर्य नारायण झा और एक रेलवे क्लर्क राम किशोर प्रसाद भी मारे गए लेकिन ललित नारायण के छोटे भाई जगन्नाथ मिश्रा बच गए जो आगे चलकर बिहार के मुख्यमंत्री बने.

इंदिरा गांधी ने मिश्रा की हत्या के लिए उस समय देश में व्याप्त अराजकता को दोषी ठहराया था. विपक्ष ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि उस समय की सरकार ने खुद मिश्रा से पिंड छुड़ाया था क्योंकि उनकी वजह से सरकार को काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही थी.

इंदिरा गाँधी ने इसका जवाब देते हुए कहा था, "अगर कल मेरी हत्या भी हो जाती है तो मेरे आलोचक कहेंगे कि मैंने ख़ुद अपनी हत्या की योजना बनाई थी."

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लोकसभा में हंगामा

इस पूरे मामले की शुरुआती जांच रेलवे पुलिस ने की थी लेकिन एक सप्ताह बाद पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के जज केके मैथ्यू के नेतृत्व में इस हत्या की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई गई.

18 फ़रवरी को लोकसभा में हुई बहस में अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदुस्तान स्टैंडर्ड अख़बार की एक कटिंग रखी जिसमें लिखा था कि जिस बोगी में ललित नारायम मिश्रा को दानापुर ले जाया गया उसमें बैठे लोग शराब पी रहे थे.

वाजपेयी ने पूछा, "सीआरपीएफ़, सीमा सुरक्षा बल, रेलवे पुलिस सभी के जवान और ख़ुफ़िया विभाग के लोग वहाँ मौजूद थे लेकिन इसके बावजूद हत्यारे मंच के नज़दीक कैसे पहुंच गए? अगर मिश्रा जी को सही समय पर मेडिकल सहायता मिल गई होती तो वो आज हमारे बीच होते. लेकिन उनका ख़ून निकलता रहा. उनके साथियों, पुलिस और सुरक्षा अधिकारियों को ये नहीं सूझा कि उन्हें तुरंत मेडिकल सहायता की ज़रूरत है."

"हथगोला फेंके जाने के तुरंत बाद डॉक्टर यूएन साही वहाँ पहुंच गए थे लेकिन उन्हें ललित नारायण मिश्रा को देखने की अनुमति नहीं दी गई. किसकी सलाह पर उन्हें दानापुर ले जाने का फ़ैसला किया गया सिर्फ़ ईश्वर जानता है? पटना से दानापुर जाने में मात्र 10-15 मिनट लगते हैं लेकिन उस दिन एक घंटे से अधिक समय लगा. उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कहाँ थे? मुख्य सचिव क्यों नहीं समस्तीपुर पहुंचे?"

40 साल बाद फ़ैसला और राजनीति

न्याय की देवी
इमेज कैप्शन, यह मामला अभी भी दिल्ली हाई कोर्ट में है

पाँच महीने बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया जिसने भारत के राजनीतिक क्षितिज को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. जुलाई, 1975 में सीबीआई ने 'आनंदमार्ग' के रंजन द्विवेदी और 12 अन्य लोगों को इस हत्या के आरोप मे गिरफ़्तार कर लिया.

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर पूरे केस को बिहार से दिल्ली लाने का अनुरोध किया. आख़िरकार, 17 जून, 1980 को केस को दिल्ली ट्रांसफ़र किया गया. कुल 213 लोगों ने केस में गवाही दी.

घटना के 40 साल बाद 8 दिसंबर, 2014 को अदालत ने 'आनंदमार्ग' से संबंधित चार लोगों सच्चिदानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत, गोपालजी और रंजन द्विवेदी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई.

ये चारों 20 मार्च, 1975 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एएन राय के ऊपर हुए हमले के मामले में भी अभियुक्त थे. इन लोगों ने फ़ैसले के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में अपील की.

ललित नारायण मिश्रा के पोते वैभव मिश्रा ने एक बार फिर से सीबीआई जाँच कराने की माँग की लेकिन इस पर सरकार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

यह मामला हत्याकांड के पाँच दशक गुज़र जाने के बाद भी तूल पकड़ता रहता है और बीजेपी के कई नेता इस मामले में कांग्रेस की भूमिका को लेकर सवाल उठाते रहते हैं.

चारों अभियुक्त इस समय ज़मानत पर रिहा हैं. इस समय मामला दिल्ली हाइकोर्ट में है जहाँ अभियुक्तों की अपील पर अदालत विचार कर रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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