ट्रंप की नई विश्व व्यवस्था से कैसे मुश्किल में आ गया है यूरोप?

ट्रंप और यूरोप के नेता

इमेज स्रोत, AFP/Getty

    • Author, एलन लिटिल
    • पदनाम, वरिष्ठ संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

पिछले 80 सालों तक अमेरिका और यूरोप को रक्षा प्रतिबद्धता की साझेदारी और लोकतंत्र, मानवाधिकार और क़ानून के शासन की रक्षा के संकल्प ने एकसाथ बांधे रखा.

मार्च 1947 में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के 18 मिनट के भाषण के साथ यह दौर शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने वादा किया कि सोवियत संघ का और अधिक विस्तार न हो, इस पर अमेरिका यूरोप का साथ देगा.

अमेरिका के नेतृत्व में नेटो, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई. इसने खुद को उस व्यवस्था में बांध लिया जिसे बाद में 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' कहा गया. इसमें देशों ने आपसी ज़िम्मेदारियों और साझा बोझ उठाने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि लोकतांत्रिक दुनिया को शत्रुतापूर्ण अधिनायकवादी ताक़तों से बचाया जा सके.

अब, दिसंबर में प्रकाशित नई अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) यह संकेत देती है कि व्हाइट हाउस के लिए वह साझा प्रयास समाप्त हो चुका है; दुनिया ने अमेरिका की भूमिका को लेकर जो बातें मान ली थीं, उसमें से ज़्यादातर अब नहीं रहेंगी.

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

'वैचारिक युद्ध की घोषणा'

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने फरवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में एक भाषण के दौरान अपने यूरोपीय सहयोगियों को पहले ही चेतावनी दी थी कि यह बदलाव आने वाला है.

उन्होंने साफ़ कहा कि यूरोप के लिए असली ख़तरा रूस से नहीं, बल्कि भीतर से है- उनसे जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाते हैं, राजनीतिक विपक्ष को दबाते हैं और इस तरह यूरोपीय लोकतंत्र को कमज़ोर करते हैं. उन्होंने 'वामपंथी उदारवादी नेटवर्क' को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया.

फ़्रांस के अख़बार ले मोन्ड ने इस भाषण को यूरोप के ख़िलाफ़ 'वैचारिक युद्ध की घोषणा' बताया.

जेडी वेंस

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

पिछले महीने की एनएसएस ने वेंस की बातों को औपचारिक रूप दिया और सीधे शब्दों में कहें तो उन्हें सिद्धांत का दर्जा दे दिया.

करिन वॉन हिप्पेल पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय में वरिष्ठ पदों पर रह चुकी हैं और लंदन स्थित एक व्हाइटहॉल थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की पूर्व निदेशक हैं. वह कहती हैं, "निश्चित रूप से अमेरिका अब वह देश नहीं रहा जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक मूल्यों को आगे बढ़ाता रहा है."

"यह एक बिल्कुल अलग दिशा में जा रहा है."

तो अगर दुनिया उस व्यवस्था से दूर जा रही है, तो किस ओर बढ़ रही है? और इसका बाकी दुनिया के लिए, ख़ासकर यूरोप के लिए क्या मतलब है?

'आज की दुनिया अलग है'

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

विक्टोरिया कोट्स, वॉशिंगटन स्थित प्रमुख दक्षिणपंथी थिंक टैंक हेरिटेज फ़ाउंडेशन की उपाध्यक्ष हैं. वह कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, ख़ास तौर पर संयुक्त राष्ट्र, गहरे तौर पर अमेरिका-विरोधी भावना से प्रभावित रही हैं और उन्होंने न तो हमारे हित में कोई काम किया है, न ही किसी और के."

पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुकी हैं कोट्स के हिसाब से, बदलती दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बदलना बेहद ज़रूरी है, "दूसरी समस्या यह है कि जब दूसरे विश्व युद्ध के बाद तथाकथित नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई थी, तब चीन कोई बड़ी चिंता नहीं था."

"आज की दुनिया अलग है."

यह नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों में बनी थी. यह उस पीढ़ी की देन थी जो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धी राजनीति के दौरान बड़ी हुई थी और देखा था कि वह व्यवस्था दो बार विनाशकारी वैश्विक संघर्ष में बदल गई थी.

भले ही वह अपूर्ण और दोषयुक्त रही हो लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उस अनुभव की विरासत थी.

लेकिन एनएसएस सीधे तौर पर कहती है कि बीते वर्षों में अमेरिकी रणनीति भटक गई, और इसका दोष वह 'अमेरिकी विदेश नीति के अभिजात वर्ग' पर डालती है.

यह कहती है, "उन्होंने अमेरिकी नीति को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ऐसे नेटवर्क से बांध दिया, जिनमें से कुछ खुले तौर पर अमेरिका-विरोधी हैं और कई ऐसे अंतरराष्ट्रीयवाद से प्रेरित हैं जो स्पष्ट रूप से अलग-अलग राष्ट्रों की संप्रभुता को ख़त्म करना चाहते हैं."

यह संकेत देती है कि भविष्य में अमेरिका सुपरनेशनल संस्थाओं के प्रभाव को कम करने की कोशिश करेगा.

"दुनिया की बुनियादी राजनीतिक इकाई राष्ट्र है और रहेगी… हम राष्ट्रों के संप्रभु अधिकारों के पक्ष में खड़े हैं और सबसे ज़्यादा दखलअंदाज़ी करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों के ख़िलाफ़ हैं जो संप्रभुता को कमजोर करते हैं…"

दस्तावेज़ के एक हिस्से में 'ताक़त का संतुलन' पर विचार करते हुए लिखा है: "बड़े, अमीर और मज़बूत देशों का असामान्य प्रभाव अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक शाश्वत सत्य है."

क्रेमलिन ने इस समीक्षा का स्वागत किया और कहा कि इसमें कही गई कई बातें मॉस्को की सोच से मेल खाती हैं.

फ़ील्ड मार्शल लॉर्ड रिचर्ड्स, 2010 से 2013 तक, जनरल सर डेविड रिचर्ड्स के नाम से ब्रिटेन की सेना के प्रमुख रहे थे. वह कहते हैं, "मेरा मानना है कि ट्रंप, शी, पुतिन और उनके अधिनायकवादी समर्थक हमें फिर से महाशक्तियों की राजनीति के दौर में ले जाना चाहते हैं."

हालांकि, किंग्स कॉलेज लंदन में युद्ध अध्ययन के सेवामुक्त प्रोफ़ेसर सर लॉरेंस फ़्रीडमैन मानते हैं कि अमेरिका की नई सुरक्षा रणनीति अतीत से उतना दूर नहीं जा रही जितनी पहली नज़र में लगती है.

"हमें नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के बारे में थोड़ा सावधान रहना चाहिए, यह शब्द आम इस्तेमाल में सिर्फ़ पिछले दशक में आया है,"

वह कहते हैं, "पीछे मुड़कर देखें तो नियमों के उल्लंघन की कई मिसालें मिलती हैं, वियतनाम का ही उदाहरण ले लें. तो, अतीत को कभी-कभी बहुत चमकदार बना कर देखा जाता है लेकिन एक जटिल अतीत की यादों को लेकर सबको सावधान रहना चाहिए."

मोनरो सिद्धांत की ताक़तवर वापसी

1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर करते अमेरिकी प्रतिनिधि और देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर करते अमेरिकी प्रतिनिधि और देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन

वेनेज़ुएला की राजधानी काराकस में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में देश के नेता निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ़्लोरेस को 'पकड़ लिया' गया. यह घटना स्वतंत्र एकतरफ़ा कार्रवाई के ताक़तवर दावे का शुरुआती उदाहरण है.

कुछ अंतरराष्ट्रीय क़ानून विशेषज्ञों ने ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि हो सकता है कि अमेरिका ने बल प्रयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन किया.

अमेरिका का कहना है कि उसकी कार्रवाई क़ानूनी रूप से जायज़ थी.

पहले ट्रंप प्रशासन में रक्षा मंत्रालय में अंडरसेक्रेटरी रह चुके रॉबर्ट विल्की ने बीबीसी को बताया था, "अमेरिकी क़ानून के तहत यह निश्चित रूप से वैध थी."

"हमारे अधिकांश यूरोपीय साझेदारों ने मादुरो के शासन को मान्यता नहीं दी है, इसलिए वह एक अवैध शासक हैं. इसी वजह से उन्हें उन सामान्य सुरक्षा अधिकारों से वंचित कर दिया गया है जो आम तौर पर राष्ट्राध्यक्षों को मिलते हैं... ख़ासकर जब हम अमेरिकी संविधान के प्रावधानों को देखते हैं, जो संयुक्त राष्ट्र की किसी भी बात से ऊपर होंगे."

एनएसएस दावा करती है कि संयुक्त राज्य अमेरिका को पश्चिमी गोलार्ध में सर्वोच्च शक्ति बने रहने का अधिकार है, और अपने लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई पड़ोसियों को अमेरिका के हितों के अनुरूप ढालने का भी.

यह 1823 के मोनरो सिद्धांत को ताक़त के साथ फिर से कहा जाना है, जिसमें अमेरिका की पश्चिमी गोलार्ध में सर्वोच्चता का वादा किया गया था. कोलंबिया, पनामा और क्यूबा भी राष्ट्रपति ट्रंप की निगाहों में हैं.

विक्टोरिया कोट्स कहती हैं, "मुख्यतः यह पनामा नहर से शुरू होगा, नहर पर नियंत्रण अमेरिका के लिए कितना ज़रूरी है, इसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जा रहा."

आज चीन लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और वहां बुनियादी ढांचे का प्रमुख निवेशक है. एनएसएस का लक्ष्य है कि अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में चीन का असर कम किया जाए.

कोट्स कहती हैं कि जब 1999 में नहर पनामा को सौंपी गई थी, "हम यह मानकर चल रहे थे कि चीन एक ज़िम्मेदार देश है… लेकिन यह सच नहीं निकला… इसलिए यह सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है कि नहर पर अमेरिका की प्रमुखता रहे, और मुझे लगता है कि पहली बार पनामा को अमेरिका से यह संदेश मिल रहा है."

चीन में शी जिनपिंग और मादुरो

इमेज स्रोत, Getty Images

लेकिन सर लॉरेंस फ़्रीडमैन उन लोगों में हैं जो मानते हैं कि अमेरिका की अपने पड़ोसियों पर नियंत्रण की क्षमता असीमित नहीं है.

"इस रणनीति समीक्षा में कहा जा सकता है कि यह हमारा गोलार्ध है और हम जो चाहें कर सकते हैं, लेकिन चुनौतियां अब भी मौजूद हैं. उन्होंने भले ही मादुरो और उनकी पत्नी को हटा दिया है, लेकिन अब भी वहां पुराना शासन ही चल रहा है. चाहे ट्रंप कुछ भी कहें लेकिन वह देश नहीं चला रहे हैं."

नई रणनीति के तहत, अमेरिका अब अधिनायकवादी शासन पर मानवाधिकार सुधारने का दबाव नहीं डालेगा.

अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणापत्र (1776) से ली गई एक पंक्ति है: "सभी राष्ट्र 'प्रकृति के नियमों और ईश्वर के नियमों' के तहत एक-दूसरे के प्रति 'अलग और समान दर्जे' के हक़दार हैं."

उदाहरण के लिए मध्य पूर्व के लिए अमेरिका कहता है कि वह "इन देशों, ख़ासकर खाड़ी की राजशाहियों, को उनकी परंपराएं और ऐतिहासिक शासन-प्रणालियां छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले ग़लत प्रयोग" को छोड़ देगा.

इसमें आगे कहा गया है, "मध्य पूर्व के साथ सफल संबंधों की कुंजी है कि इस क्षेत्र, उसके नेताओं और उसके देशों को 'जैसे हैं वैसे ही स्वीकार' करना होगा. साथ ही साझा हितों पर मिलकर काम करना है."

लेकिन ऐसा लगता है कि परंपराओं और ऐतिहासिक शासन-प्रणालियों के प्रति वही सम्मान यूरोप के लोकतांत्रिक और सहयोगी देशों को नहीं दिया जा रहा.

हालांकि इसमें यूरोपीय महाद्वीप, और ब्रिटेन व आयरलैंड, के प्रति अमेरिकी भावनात्मक लगाव का ज़िक्र है, लेकिन इस दस्तावेज़ की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पश्चिमी दुनिया में किन चीज़ों की रक्षा की जानी चाहिए, उसे नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है.

यह समीक्षा सभ्यतागत स्तर तक जाती है और ऐसी सभ्यता की वकालत करती है जो अब ट्रूमैन डॉक्ट्रिन के साझा मूल्यों पर नहीं, बल्कि संप्रभु राष्ट्र की प्रधानता पर आधारित है.

तो फिर यूरोप का क्या होगा?

ट्रंप और ज़ेलिंस्की यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ

इमेज स्रोत, Anadolu via Getty Image

यह समीक्षा यूरोप की 'वर्तमान दिशा' पर सख़्त टिप्पणी करती है और सवाल उठाती है कि क्या भविष्य में कुछ यूरोपीय देशों को भरोसेमंद सहयोगी माना जा सकता है.

यह 'आर्थिक गिरावट' की बात करती है, लेकिन जोड़ती है कि यह "सभ्यता के मिट जाने की वास्तविक और अधिक कठोर संभावना" के तले ढंक गई है.

एक जगह दस्तावेज़ में लिखा है: "यह पूरी तरह संभव है कि आने वाले कुछ दशकों में, कुछ नेटो सदस्य देशों की आबादी में गैर-यूरोपीय बहुमत हो जाएगा." जिससे उनकी लंबी अवधि में सुरक्षा साझेदार के रूप में विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं.

करिन वॉन हिप्पेल कहती हैं, "यह बहुत ही स्वदेशी सोच वाला दस्तावेज़ है,".

"यह विचारधारा से प्रेरित है. इसका मूल संदेश यह है कि अब पश्चिम के कई देशों में ईसाई गोरे पुरुष सत्ता में नहीं हैं और हम देख रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप में ईसाई गोरे पुरुषों के प्रभुत्व को चुनौती मिल रही है. वे बहुत सावधानीपूर्वक सीधे तौर पर यह नहीं कहते, लेकिन मेरा मानना है कि संकेत यही दिया गया है."

लेकिन विक्टोरिया कोट्स का तर्क है कि उनकी नज़र में 'जिस बड़े संघर्ष में हम फंसे हुए हैं', वह वास्तव में सभ्यतागत है.

वह कहती हैं, "संप्रभुता भी एक अहम मुद्दा है. यूरोपीय संघ परियोजना को देखें, ख़ासकर ब्रेग्ज़िट के बाद… तो मुझे लगता है कि कई देश सोच रहे हैं कि राष्ट्रीय हितों को ब्रसेल्स के हवाले करना क्या सही रणनीति है. मुझे लगता है कि यह उन संस्थाओं में से एक है जिन पर एनएसएस सवाल उठाती है."

यह अमेरिकी टेक कंपनियों के हितों से भी मेल खाता है, जो यूरोप में अपनी गतिविधियों को नियंत्रित करने के ईयू के प्रयासों का विरोध करती हैं.

पिछले महीने एलन मस्क ने एक्स पर पोस्ट किया कि यूरोपीय संघ को समाप्त कर देना चाहिए और देशों को संप्रभुता लौटा देनी चाहिए.

'यूरोप की दिशा के ख़िलाफ़ प्रतिरोध को बढ़ावा देना'

जर्मनी के चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ ने कहा कि यूरोप को अमेरिका से 'स्वतंत्रता हासिल' करनी होगी

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, जर्मनी के चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ ने कहा कि यूरोप को अमेरिका से 'स्वतंत्रता हासिल' करनी होगी

समीक्षा इस बारे में साफ़ है कि यूरोप अपना 'आत्मविश्वास' कैसे वापस पा सकता है.

यह कहती है: "देशभक्त यूरोपीय पार्टियों का बढ़ता प्रभाव वास्तव में बड़े आशावाद का कारण है. हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि यूरोप अपनी वर्तमान दिशा को सुधार सके. हमें सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करने के लिए एक मज़बूत यूरोप की ज़रूरत होगी."

और इसे हासिल करने की एक नीति है, "यूरोपीय देशों के भीतर यूरोप की वर्तमान दिशा के ख़िलाफ़ प्रतिरोध को बढ़ावा देना."

लेकिन "प्रतिरोध को बढ़ावा देने" का सही मतलब क्या है, इस पर कई सवाल उठते हैं.

ऐसे समय में जब रूस का ख़तरा बढ़ रहा है, यूरोप में कुछ लोग पहले ही यह निष्कर्ष निकाल चुके हैं कि अमेरिका अब शायद भरोसेमंद सहयोगी नहीं रहा.

म्यूनिख में उपराष्ट्रपति वेंस के भाषण के बाद, जर्मनी के चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ ने कहा कि यूरोप को अमेरिका से 'स्वतंत्रता हासिल' करनी होगी, नाटो को एक नए रूप में गठित करना होगा.

लेकिन इसमें समय लगेगा.

सर लॉरेंस कहते हैं, "कम समय में यह संभव नहीं है, यूरोपीय देश अमेरिका पर बहुत निर्भर हो गए हैं, और यह उनका अपना चुनाव था: यह सस्ता और आसान था."

"हालांकि व्यवहारिक रूप से अच्छा तो यही होगा कि हम अमेरिकियों के बिना काम कर सकें… लेकिन वास्तव में हमें खुद को अलग करने में सालों लगेंगे. और यह बेहद महंगा पड़ेगा."

"तो यूरोप की मुश्किल यह है: वह अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकता, लेकिन उसके बिना आसानी से काम भी नहीं कर सकता."

तो बड़ा सवाल यह है कि यूरोप और यूरोपीय संघ के लिए निकट भविष्य में इसका क्या मतलब है?

इस अहम सवाल पर लॉर्ड रिचर्ड्स सख़्त चेतावनी देते हैं: "(यह) दरारों के बीच में फंसने का ख़तरा है."

वह कहते हैं, "ईयू एक महाशक्ति नहीं बन सकता, न ही इसके किसी सदस्य देश बन सकते हैं."

"(तो) ब्रिटेन/ईयू को तय करना होगा कि उन्हें किसके प्रभाव क्षेत्र में रहना चाहिए? जवाब यह है कि वे शायद अमेरिका के साथ रहेंगे - और एक नए रूप में गठित नाटो के भीतर."

'स्थापित व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनविद्रोह'

डोनाल्ड ट्रंप

इमेज स्रोत, Getty Images

लेकिन लॉर्ड रिचर्ड्स को यह भी लगता है कि रक्षा खर्च बढ़ाने की प्रतिबद्धता की ज़रूरत बहुत पहले से है.

"यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा पर कहीं ज़्यादा खर्च करना होगा. लंबे समय से यह किया जाना ज़रूरी था लेकिन ब्रिटेन में यह अब तक इसके लिए और पैसे खर्च नहीं किए जा रहे हैं. बल्कि इस साल तो सशस्त्र बलों को पैसे बचाने पड़ रहे हैं, ज़्यादा खर्च करने के बजाय."

सर लॉरेंस याद दिलाते हैं कि अमेरिका वर्षों से यूरोप पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डालता रहा है.

"लंबे समय से यह संदेश दिया जा रहा है कि यूरोप को अपनी रक्षा के लिए और खर्च करना होगा. ओबामा और बाइडेन दोनों ने इस बात को आगे बढ़ाया था."

पिछले साल ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों से रक्षा खर्च को जीडीपी के 5% तक बढ़ाने का वादा लिया. और ऐसा करके उन्होंने शायद यूरोप की सुरक्षा का हित ही किया है, क्योंकि इससे लंबे समय में यूरोप को वॉशिंगटन से अलग होकर काम करने की ज़्यादा क्षमता हासिल होगी.

सर लॉरेंस कहते हैं, "खर्च उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है. जर्मनी ने काफ़ी प्रभावशाली प्रगति की है. हलचल तो है, बेशक यह उतनी तेज़ नहीं है जितनी कई लोग चाहते हैं, लेकिन यह हो रहा है."

समीक्षा में इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि अमेरिका यूरोप की 'मदद' कैसे करना चाहता है. यह कहती है, "हम उन देशों के साथ काम करना चाहते हैं जो अपनी पुरानी महानता को वापस पाना चाहते हैं."

अंततः यह रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका और यूरोप को अलग करने वाला कोई वैचारिक विभाजन नहीं, बल्कि वही दरार है जो दोनों महाद्वीपों को भीतर से चीर रही है.

पेरिस-स्थित पत्रकार विक्टर मललेट की जल्द ही एक किताब 'फ़ार राइट फ़्रांसः ले पेन, बारडेला एंड फ़्यूचर ऑफ़ यूरोप' आने वाली है. उनके अनुसार अटलांटिक के दोनों ओर कुछ साझा चिंताएं हैं.

वह कहते हैं, "आव्रजन को लेकर चिंताएं, अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं… और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, फ्रांस में नेशनल रैली, जर्मनी में एएफ़डी के समर्थकों और बौद्धिक, महानगरीय, शिक्षित उदारवादी अभिजात वर्ग के बीच एक असाधारण सांस्कृतिक खाई है."

"यह निश्चित रूप से स्थापित व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक जनविद्रोह है."

उनका मानना है कि समस्याओं में से एक असमानता है. "अमेरिका के पास औसतन दुनिया के सबसे अमीर उपभोक्ताओं का समूह है, और फिर भी कई आम अमेरिकियों को गुज़ारा करने तक में कठिनाई होती है, और यही बात पश्चिमी यूरोप पर भी लागू होती है."

पुतिन

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

एनएसएस में अमेरिका ने कुछ प्रथाओं को ख़त्म करने का वादा किया है, जैसे कि विविधता, समानता और समावेशन- बहुत से ट्रंप समर्थक अक्सर इनका मज़ाक बनाते हैं.

इस दस्तावेज़ में साफ़ दिखता है कि अमेरिका की घरेलू राजनीति में चल रहा सांस्कृतिक संघर्ष अब कुछ हद तक विदेश नीति को भी प्रभावित कर रहा है - और उसके ज़रिए पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा पर असर डाल रहा है.

रूस को इसमें शत्रु शक्ति के तौर पर नहीं दर्ज किया गया है जबकि उसने पश्चिम के सहयोगी यूक्रेन पर हमला किया है.

दरअसल, सांस्कृतिक संघर्षों के तहत श्वेत, ईसाई राष्ट्रवादी सभ्यता के बचाव में ट्रंप के मागा समर्थकों का एक हिस्सा व्लादिमीर पुतिन को दुश्मन नहीं, बल्कि स्वाभाविक सहयोगी मानता हैः एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो गर्व से अपने देश, उसकी परंपराओं और पहचान की रक्षा करता है.

और यही गुण वे डोनाल्ड ट्रंप में भी देखते और सराहते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)