जर्मन चांसलर ने पीएम मोदी और पोलैंड के विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने जो कहा, उसके क्या संकेत हैं?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अप्रैल 2022 में 2+2 बैठक में शामिल होने वॉशिंगटन गए थे.
अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रक्षा मंत्री ऑस्टिन लॉयड के साथ बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस हो रही थी.
इसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक पत्रकार ने जयशंकर से रूस से तेल ख़रीदने पर सवाल पूछा. जयशंकर का जवाब बिल्कुल सीधा था.
जयशंकर ने अपने जवाब में कहा था, "अगर आप रूस से ऊर्जा आयात की बात कर रही हैं तो मेरा सुझाव होगा कि आपका ध्यान यूरोप पर केंद्रित होना चाहिए. हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए कुछ ऊर्जा ज़रूर ख़रीद रहे हैं. लेकिन मुझे लगता है कि आँकड़ों को देखें तो शायद पूरे महीने में हमारी कुल ख़रीद उतनी भी नहीं होगी जितनी यूरोप एक ही दोपहर में कर लेता है. इसलिए आपको इस पर ज़रा सोचने की ज़रूरत है."
जयशंकर का यह वीडियो क्लिप इंडिया में काफ़ी वायरल हुआ और लोग उनके जवाब की तारीफ़ कर रहे थे. लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि भारत पहली बार पश्चिम को उसी की भाषा में जवाब दे रहा है.
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जयशंकर की अब संतुलित भाषा
लेकिन 2026 आते-आते बहुत कुछ बदल चुका है. डोनाल्ड ट्रंप फिर से अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके हैं और जयशंकर अमेरिका पर बहुत ही सतर्क भाषा में जवाब देते हैं.
मिसाल के तौर पर इसी महीने का वाक़या ले सकते हैं. सात जनवरी को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर पेरिस में फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड के पॉलिटिकल ग्रुप वेइमार ट्राएंगल में शामिल होने गए थे.
इसी बैठक में पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने कहा, "मैंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि भारत ने रूसी तेल के आयात में कमी की है क्योंकि इससे पुतिन की युद्ध मशीन को ईंधन मिल रहा था.''
जब पोलैंड के विदेश मंत्री ऐसा कह रहे थे, तब जयशंकर भी वहीं थे. यूरोप का एक मंत्री कह रहा है कि वह भारत से संतुष्ट है क्योंकि रूस से तेल आयात में कटौती कर रहा है.
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या भारत यूरोप को संतुष्ट करने के लिए रूस से तेल ख़रीद कम कर रहा है? यह अहम है कि पोलैंड के विदेश मंत्री सिकोरस्की के तुरंत बाद बोलते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने इस दावे का खंडन नहीं किया कि भारत ने रूसी तेल की ख़रीद कम की है.
दूसरी बात यह कि जयशंकर का वह पुराना रुख़ बिल्कुल ग़ायब रहा, जो अप्रैल 2022 में बाइडन प्रशासन के दौरान वॉशिंगटन डीसी में दिखा था.
भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने यह सवाल उठाया कि क्या यही मोदी सरकार की रणनीतिक स्वायत्तता है?
कांग्रेस ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से पोलैंड के विदेश मंत्री का वीडियो क्लिप पोस्ट करते हुए लिखा है, ''इस बयान से साफ़ है- मोदी ने ट्रंप को ख़ुश करने के लिए रूस से तेल लेना बंद किया. अब भारत की विदेश नीति व्हाइट हाउस से तय हो रही है.''

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जर्मन चांसलर ने पीएम मोदी के सामने क्या कहा?
बात केवल पोलैंड के विदेश मंत्री की नहीं है. इसी हफ़्ते जर्मन चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ गुजरात आए थे.
12 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जर्मन चांसलर मर्त्ज़ ने कहा, ''जर्मनी भारत के साथ रक्षा उद्योग में सहयोग को और गहरा करना चाहता है. इससे हम दोनों मज़बूत होंगे. साथ ही इससे भारत की रूस पर निर्भरता भी कम होगी.''
जर्मन चांसलर के इस वीडियो क्लिप को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए द हिन्दू की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा है, ''पोलैंड के विदेश मंत्री ने भारत के विदेश मंत्री जयशंकर के साथ खड़े होकर कहा कि भारत रूस से तेल आयात कम कर रहा है. इसके बाद जर्मन चांसलर ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े होकर कहा कि भारत रूस पर अपनी रक्षा-निर्भरता कम करेगा. क्या ऐसे बयानों पर सरकार की मौन सहमति किसी संकेत की ओर इशारा करती है?

सुहासिनी हैदर की इस टिप्पणी का जवाब देते हुए रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा है, ''पोलैंड के विदेश मंत्री रूस को उकसाते रहते हैं. तथ्य यह है कि रूस से तेल आयात घटा है. रिलायंस ने स्वीकार किया है कि वह रूसी तेल नहीं ख़रीद रही है. इसके पीछे अमेरिकी प्रतिबंधों का ख़तरा एक बड़ा कारण है. ट्रंप बेकाबू हैं लेकिन जब तेल की क़ीमतें गिर रही हों, तब छूट से जुड़े कारक भी भूमिका निभा सकते हैं.''
कंवल सिब्बल ने लिखा है, ''विदेश मंत्रालय ने अपनी स्थिति दोहराई है. हमारे फ़ैसले बाज़ार की गतिशीलता और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर होंगे. मर्त्ज़ अपनी सीमा से बाहर चले गए. वह भी रूस को उकसाने वाले बन गए हैं. वह अपने घरेलू दर्शकों को यह संदेश दे रहे थे कि भारत के साथ जर्मनी का रक्षा सहयोग, रूस पर भारत की निर्भरता कम करने में मदद करेगा. उनके मन में रूस के साथ भारत के क़रीबी रिश्ते और जिस गर्मजोशी से पुतिन का स्वागत किया गया था, वही बातें थीं. विदेश सचिव मिसरी ने मर्त्ज़ द्वारा लाए गए रूस वाले एंगल को ख़ारिज कर दिया है.''

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क्या चुप्पी मौन सहमति है?
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र की प्रोफ़ेसर अर्चना उपाध्याय कहती हैं, ''यह सही है कि जयशंकर ने पोलैंड के विदेश मंत्री को कुछ नहीं कहा लेकिन अभी भारत के हित में यही है. अगर पलटकर जवाब देना भारत के हित में नहीं है, तो भारत फ़िलहाल उसी नीति पर चलेगा, जो उसके हित में हो. ट्रंप ऐसे भी कह चुके हैं कि उन्हें केवल उनकी नैतिकता और दिमाग़ ही रोक सकते हैं. ऐसे में भारत का चुप रहना ज़्यादा समझदारी भरा है. हम बाइडन के दौर में हुई चीज़ों की तुलना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से करेंगे तो कई चीज़ों में विसंगति दिखेगी.''
जर्मन चांसलर की रूस से रक्षा निर्भरता कम करने वाली टिप्पणी को लेकर भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब में कहा, ''रक्षा आपूर्ति को लेकर हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों से प्रेरित है. इसमें कई कारक शामिल होते हैं और यह किसी भी तरह से वैचारिक नहीं है. यह पूरी तरह हमारे हितों से संचालित है.''
विक्रम मिसरी ने कहा, ''इसलिए मैं यह नहीं कहूँगा कि एक देश से आपूर्ति का संबंध किसी दूसरे देश से आपूर्ति से है. हमारे पास एक प्रक्रिया है, जिसके तहत किसी भी समय हमारी ज़रूरतों को तय किया जाता है और अगर हम घरेलू स्तर पर निर्माण नहीं कर रहे होते हैं और बाहर से ख़रीद करनी होती है तो हम दुनिया में जहाँ से भी सबसे सुविधाजनक ढंग से आपूर्ति मिल सके, वहाँ से उसे हासिल करते हैं. मुझे नहीं लगता कि एक का दूसरे पर कोई प्रभाव पड़ता है.''
भारत का रूस से तेल आयात कम हो रहा है. भारत की रूस पर रक्षा निर्भरता भी पहले की तरह नहीं है. ऐसे में भारत और रूस के संबंधों में फिर क्या बचेगा?

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रूस का कोई विकल्प नहीं
इस सवाल के जवाब में रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं, ''भारत भले तेल आयात रूस से ज़ीरो कर ले. ये आने वाले वक़्त में होगा भी. लेकिन भारत रक्षा के मामले में अगले 30 सालों तक रूस पर ही निर्भर रहेगा. ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए कई विकल्प हैं लेकिन रक्षा ज़रूरतों के मामले में फ़िलहाल भारत के पास रूस के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भारत के 60 प्रतिशत रक्षा उपकरण रूसी हैं. यहाँ तक कि भारत असॉल्ट रायफल भी रूस के मदद से ही बना रहा है.''
राहुल बेदी कहते हैं, ''भारत को न्यूक्लियर सबमरीन कौन देगा? तीन न्यूक्लियर सबमरीन कमिशन किए हैं, इन तीनों को कमिशन करने में रूस का हाथ है. न्यूक्लियर सबमरीन न्यूक्लियर डिटरेंस के लिए बहुत ज़रूरी है. रूस के अलावा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने के लिए कोई तैयार नहीं है. कम से कम जर्मनी तो रूस को रिप्लेस नहीं कर सकता है. सुखोई एयरक्राफ़्ट इंडियन एयरफोर्स का बैकबोन है. भारत के पास लगभग 260 सुखोई हैं. इसे अपग्रेड रूस ही कर सकता है. इंडियन आर्मी के टैंक भी रूसी ही हैं, इन्हें रिप्लेस करने में 25 साल लगेंगे.''
रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है. हालाँकि उसकी हिस्सेदारी में काफ़ी गिरावट आई है.
स्वीडिश थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आँकड़ों के अनुसार, 2020–24 के दौरान भारत के रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत रही, जो 2015–19 में 55 प्रतिशत और 2010–14 में 72 प्रतिशत थी.
इस रुझान के बावजूद राहुल बेदी कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ पाँच दिन चले संघर्ष में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और एस-400 की अहम भूमिका रही. राहुल बेदी कहते हैं कि यह बताने के लिए काफ़ी है कि रूस भारत की रक्षा रणनीति में कितना अहम है.
प्रोफ़ेसर अर्चना उपाध्याय मानती हैं कि भारत अगर रूस से तेल निर्यात ज़ीरो भी कर देगा तो दोनों देशों के आपसी संबंधों की प्रासंगिकता बनी रहेगी.
प्रोफ़ेसर उपाध्याय कहती हैं, ''भारत और रूस के बीच संबंध कोई क्रेता और विक्रेता तक सीमित नहीं है. दोनों देशों का जॉइंट प्रोडक्शन भी है. रूस एकमात्र ऐसा देश है जो भारत को सिर्फ़ बेचता नहीं है बल्कि अपनी टेक्नोलॉजी भी ट्रांसफर करता है. दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों की विरासत कोई बोझ नहीं है. रूस भारत के ऊपर दबाव को समझता है.''
प्रोफ़ेसर अर्चना उपाध्याय को भले लगता है कि दोनों देशों के संबंधों को क्रेता-विक्रेता के आईने में नहीं देखना चाहिए लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में द्विपक्षीय व्यापार की भी अहम भूमिका होती है.

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अड़चन कहाँ है?
रूस भी कह चुका है कि भारत को किस हद तक उससे संबंधों में आगे बढ़ना है, उसे ख़ुद तय करना है.
पिछले महीने दो दिसंबर को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे से ठीक पहले रूस ने कहा था, ''भारत जिस हद तक आगे जाएगा, हम भी उस हद तक जाने के लिए तैयार हैं. भारत जिस हद तक सहयोग बढ़ाएगा, उसके लिए हम भी पूरी तरह से तैयार हैं.''
रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था, ''रूस और भारत का द्विपक्षीय व्यापार अभी 68 अरब डॉलर का है और उम्मीद करते हैं कि 2030 तक यह 100 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा.''
लेकिन भारत अगर तेल आयात ज़ीरो करता है तो रूस की यह उम्मीद अधूरी रह जाएगी.
दिसंबर 2021 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने से पहले थिंक टैंक कार्नेगी मॉस्को सेंटर के निदेशक दिमित्री त्रेनिन ने मॉस्को टाइम्स में लिखा था, ''जियोइकनॉमिक दृष्टि से देखें तो परमाणु ऊर्जा से लेकर आउटर स्पेस और आर्कटिक क्षेत्र तक और हथियारों के विकास के साथ उत्पादन को अलग से गिनाने की भी ज़रूरत नहीं है. इसके बावजूद, भारत–रूस संबंधों की सबसे स्पष्ट कमज़ोरी उनका सीमित और ठहरा हुआ व्यापार है. अमेरिका और चीन के साथ (हालाँकि चीन के साथ भारत के संबंध अच्छे नहीं हैं) तब भी भारत का व्यापार 100 अरब डॉलर पार कर चुका है. दूसरी तरफ़ रूस के साथ व्यापार अब भी 10 अरब डॉलर के आसपास ही सिमटा हुआ है.''

दिमित्री त्रेनिन ने लिखा है, ''इसका कारण भी साफ़ है. जहाँ भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा अब निजी क्षेत्र के हाथों में है, वहीं भारत–रूस आर्थिक संबंध अब भी मुख्यतः दोनों देशों की सरकारों के समझौतों पर आधारित हैं. सोवियत–भारतीय आर्थिक संबंधों का पुराना मॉडल 1991 में ढह जाने के बाद व्यापार में तेज़ गिरावट आई. कभी सोवियत संघ भारत के शीर्ष तीन आर्थिक साझेदारों में शामिल था; आज रूसी फ़ेडरेशन की स्थिति बीसवें से पच्चीसवें स्थान के बीच सिमटी हुई है.''
यूक्रेन में युद्ध शुरू होने से पहले यानी 2021 में रूस और भारत का द्विपक्षीय व्यापार महज 13 अरब डॉलर का था, जो 2024-25 में 68 अरब डॉलर हो गया है.
हालाँकि इस बढ़ोतरी में भारत के तेल आयात का सबसे बड़ा योगदान है.
अगर भारत तेल आयात ज़ीरो करता है तो फिर से दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार यूक्रेन में युद्ध शुरू होने से पहले वाले दौर के बराबर हो सकता है. भारत और रूस के बीच व्यापार एकतरफ़ा है. 2024-25 में भारत का रूस को निर्यात महज 4.88 अरब डॉलर रहा जबकि आयात 63.84 अरब डॉलर रहा.
भारत और रूस के संबंधों में मुश्किलें केवल अमेरिकी दबाव ही नहीं है बल्कि चीन भी है. चीन और रूस में गहरा विश्वास है जबकि भारत और चीन में गहरा अविश्वास है.
अगर चीन की ओर से भारत को दिक्कतों का सामना करना पड़ा तो रूस के लिए भारत को मदद करना मुश्किल होगा.
रूस और भारत दोनों के लिए मुख्य चुनौती यह है कि रणनीतिक साझेदारी को व्यापक और लगातार प्रतिकूल होते वैश्विक माहौल में आपसी विश्वास को बनाए रखे.
इस साल भारत के पास ब्रिक्स की अध्यक्षता है. ईरान ब्रिक्स का सदस्य है और अमेरिका सैन्य कार्रवाई की बात कर रहा है.
ब्रिक्स में ये मुद्दा उठेगा और भारत के लिए मुश्किलें होंगी कि कैसे ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी गुट ना बनने दे. रूस चाहेगा कि ब्रिक्स अमेरिका के ख़िलाफ़ कड़ा प्रस्ताव पास करे पर शायद भारत ऐसा नहीं चाहेगा.
ट्रंप ब्रिक्स को लेकर कई बार धमकी दे चुके हैं. ऐसे में भारत के लिए संतुलन साधना आसान नहीं होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












