ईरान और अमरीका में दुश्मनी की पूरी कहानी

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
ईरान और अमरीका की दुश्मनी एक बार फिर से सतह पर आ गई है. अमरीका ने ईरान पर चौतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं जिनसे ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चौपट हो गई है.
अमरीका ने ईरान के रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) को विदेशी आतंकी संगठन घोषित कर दिया है. दुनिया के किसी भी देश को अमरीका ईरान से व्यापार नहीं करने दे रहा है. यहां तक कि भारत को भी ईरान से तेल आयात बंद करना पड़ा. ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से दोनों देशों के बीच दुश्मनी बढ़ गई है.
बुधवार को तनाव उस वक़्त और बढ़ गया जब ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा कि अगर दुनिया के ताक़तवर देश अपने वादे निभाने में नाकाम रहे तो वो अपने परमाणु कार्यक्रम पर लौट आएगा.
दूसरी तरफ़ अमरीका ने कहा है कि वो मध्य-पूर्व में लड़ाकू विमान और बमवर्षक भेजने जा रहा है ताकि ईरान के ख़तरों से निपटा जा सके. इसकी घोषणा पहले अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने रविवार को की थी और बाद में इसकी पुष्टि कार्यकारी रक्षा मंत्री पैट्रिक शानाहान ने की.
आख़िर अमरीका को ईरान फूटी आँखों क्यों नहीं सुहाता है? इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
कहा जा रहा है कि ईरानी क्रांति की 40वीं वर्षगांठ पश्चिम की ताक़तों के लिए आत्ममंथन का एक सुनहरा अवसर है.
इस्लामिक रिपब्लिक ईरान से चार दशकों की असहमति का नतीजा यह मिला कि इससे न तो ईरान ने घुटने टेके और न इलाक़े में शांति स्थापित हुई. यहां तक कि अमरीका में ट्रंप के आने के बाद से दुश्मनी और बढ़ गई है.
1971 में यूगोस्लाविया के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टीटो, मोनाको के प्रिंस रेनीअर और राजकुमारी ग्रेस, अमरीका के उपराष्ट्रपति सिप्रो अग्नेयू और सोवियत संघ के स्टेट्समैन निकोलई पोगर्नी ईरानी शहर पर्सेपोलिस में जुटे थे.
ये सभी एक शानदार पार्टी में शामिल हुए थे. इस पार्टी का आयोजन ईरानी शाह रज़ा पहलवी ने किया था. लेकिन आठ सालों से कम वक़्त में भी ईरान में नए नेता अयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी का आगमन हुआ और उन्होंने इस पार्टी को शैतानों का जश्न क़रार दिया था.
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले ख़ुमैनी तुर्की, इराक़ और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे. ख़ुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमरीका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे.

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1953 में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई.
ईरान में क्रांति के बाद आई रूढ़िवादिता को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संस्था प्रोजेक्ट सिंडिकेट ने अपनी एक रिपोर्ट में जर्मन दार्शनिक हना एरेंट की एक टिप्पणी का उल्लेख किया है. एरेंट ने कहा था, ''ज़्यादातर उग्र क्रांतिकारी क्रांति के बाद रूढ़िवादी बन जाते हैं.''
कहा जाता है कि ख़ुमैनी के साथ भी ऐसा ही हुआ. सत्ता में आने के बाद ख़ुमैनी की उदारता में अचानक से परिवर्तन आया. उन्होंने ख़ुद को वामपंथी आंदोलनों से अलग कर लिया.

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उन्होंने विरोधी आवाज़ों को दबाना शुरू कर दिया और इस्लामिक रिपब्लिक और ईरान की लोकतांत्रिक आवाज़ में एक किस्म की दूरी बननी शुरू हो गई.
क्रांति के परिणामों के तत्काल बाद ईरान और अमरीका के राजनयिक संबंध ख़त्म हो गए. तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह ने अमरीकी दूतावास को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और 52 अमरीकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था.
कहा जाता है कि इसमें ख़ुमैनी का भी मौन समर्थन था. अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से इनकी मांग थी कि शाह को वापस भेजें. शाह न्यूयॉर्क में कैंसर का इलाज कराने गए थे.
बंधकों को तब तक रिहा नहीं किया गया जब तक रोनल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति नहीं बन गए. आख़िरकार पहलवी की मिस्र में मौत हो गई और ख़ुमैनी ने अपनी ताक़त को और धर्म केंद्रित किया.
इन सबके बीच सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला बोल दिया. ईरान और इराक़ के बीच आठ सालों तक ख़ूनी युद्ध चला. इस युद्ध में अमरीका सद्दाम हुसैन के साथ था. यहां तक कि सोवियत यूनियन ने भी सद्दाम हुसैन की मदद की थी.
यह युद्ध एक समझौते के साथ ख़त्म हुआ. युद्ध में कम से कम पांच लाख ईरानी और इराक़ी मारे गए थे. कहा जाता है कि इराक़ ने ईरान में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था और ईरान में इसका असर लंबे समय तक दिखा.
यह वही समय था जब ईरान ने परमाणु बम की संभावनाओं को देखना शुरू कर दिया था. शाह के वक़्त में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइज़नहावर के वक़्त में परमाणु-ऊर्जा संयत्र बनाने की कोशिश की थी.
ईरान ने परमाणु कार्यक्रम पर जो काम करना शुरू किया था वो 2002 तक छुपा रहा. अमरीका का इस इलाक़े में समीकरण बदला इसलिए नाटकीय परिवर्तन देखने को मिला.
अमरीका ने न केवल सद्दाम हुसैन को समर्थन करना बंद किया बल्कि इराक़ में हमले की तैयारी शुरू कर दी थी. कहा जाता है कि अमरीका के इस विनाशकारी फ़ैसले का अंत ईरान को मिले अहम रणनीतिक फ़ायदे से हुआ.
हालांकि ईरान अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रसिद्ध टर्म 'एक्सिस ऑफ इवल' में शामिल हो गया था.
आगे चलकर यूरोप ने ईरान से परमाणु कार्यक्रम पर बात करना शुरू किया. जेवियर सालोना उस वक़्त यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधि के तौर पर ईरान से बात कर रहे थे.

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उन्होंने प्रोजेक्ट सिंडिकेट की एक रिपोर्ट में कहा है कि ईरान में 2005 का चुनाव था और इस वजह से बातचीत पर कोई कामयाबी नहीं मिली. 2013 में जब हसन रूहानी फिर से चुने गए तो विश्व समुदाय ने परमाणु कार्यक्रम को लेकर फिर से बात शुरू की.
दशकों की शत्रुता के बीच ओबामा प्रशासन 2015 में जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ ऐक्शन पहुंचा. इसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी के तौर पर देखा गया.
इस बार अमरीका में चुनाव आया और ट्रंप ने एकतरफ़ा फ़ैसला लेते हुए इस समझौते को रद्द कर दिया. ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए.
यहां तक कि ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा कि ईरान से व्यापार जो करेगा वो अमरीका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा.
इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान पर अमरीका और यूरोप में खुलकर मतभेद सामने आए. यूरोपीय यूनियन ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को बचाने की कोशिश की लेकिन ट्रंप नहीं माने.
अब अमरीका वॉर्सोवा में मध्य-पूर्व पर एक सम्मेलन करा रहा है. वो चाहते हैं कि ईरान विरोधी गठजोड़ में इसराइल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ यूरोप भी एकमत से शामिल हो जाए. ईरान एक बार फिर से संकट में घिरा हुआ है.
पिछले 40 सालों में ईरान ने कई संकट देखे लेकिन इस बार का संकट भी कम दुखदायी नहीं है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप शत्रुतापूर्ण नीतियों से इस इलाक़े में शांति स्थापित नहीं कर सकते हैं और उन्हें ईरान को बातचीत का हिस्सा बनाना चाहिए.
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