ईरान का वो प्राचीन कारनामा जिसकी दुनिया कर्ज़दार है

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- Author, जुबिन बेख़राद
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
ईरान के बारे में आपने बहुत से क़िस्से कहानियां सुने होंगे. इन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो इसकी चर्चा काफ़ी गर्म है. एटमी प्रोग्राम को लेकर ये अमरीका समेत तमाम पश्चिमी देशों के निशाने पर है.
लेकिन, ईरान सभ्यता का बहुत पुराना केंद्र रहा है. किसी ज़माने में यहां पर तमाम आर्य जनजातियों ने पनाह ली थी. इस्लाम से पहले ईरान पारसी धर्म का केंद्र था. पैग़म्बर ज़रथुष्ट्र ईरान में ही हुए थे.
पारसी धर्म के दौर और उससे पहले भी ईरान ने इंसानी सभ्यता के विकास में बहुत अहम रोल निभाया है. एक वक़्त ऐसा था कि ईरान के राजाओं की हुकूमत यूनान से हिंदुस्तान तक फैली हुई थी. बादशाह दारा और साइरस ने बड़े साम्राज्य स्थापित किए थे.
लेकिन, आज आपको ईरान की ऐसी उपलब्धि के बारे में बताते हैं, जिसे सुनकर आप को शायद पहले-पहल यक़ीन ही न हो.
ईरान को क़ुदरत ने तमाम नेमतें बख़्शी हैं. लेकिन, सारी ख़ूबियों के बावजूद यहां एक कमी रह गई. अन्य देशों की तरह यहां कलकल करती नदियां और चश्मे नहीं हैं. लेकिन ज़मीन के नीचे पानी भरपूर है.

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पानी की किल्लत का हल
एक ज़माने से ईरानियों को पीने के पानी की बहुत किल्लत झेलनी पड़ती थी. लेकिन पहले के ज़माने में ईरान में साइंस ने इतनी तरक़्क़ी कर ली थी कि ईरानियों ने इस मुश्किल का तोड़ इंजीनियरिंग के कमाल से ढूंढ निकाला.
ईरान में पहाड़ बहुत हैं. इनकी तलहटियों में अक्सर भूगर्भ जल की बड़ी मात्रा मिल जाती है. आज से क़रीब तीन हज़ार साल पहले ईरानियों ने इसी भूगर्भ जल को गहराई से निकालकर ढलान के ज़रिए दूर-दूर तक पहुंचाने का तरीका सीख लिया था और कामयाबी से इस्तेमाल भी किया.
ज़मींदोज़ पानी निकालने की ईरान की इस तकनीक के नमूने ईरान के शहरों इस्फ़ान से लेकर याज़्द और दूसरे इलाक़ों में मिलते हैं. पानी सप्लाई की इस शानदार इंजीनियरिंग को फ़ारसी ज़बान में 'कारिज़' कहते हैं. लेकिन, इसका अरबी नाम 'क़नात' चलन में ज़्यादा है.
पहाड़ों की तलहटी से पानी निकालकर इसे दूर-दूर तक पहुंचाने वाला सिस्टम आज भी चलन में है. 2016 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कर लिया है.
पहाड़ों में क़नात बनाने के लिए सबसे पहले ऐसी जगह की पहचान की जाती थी जहां ज़मीन के अंदर प्रचुर मात्रा में गाद वाली मिट्टी हो. फिर बड़ा गड्ढा खोद कर जम़ीन के अंदर पानी तक पहुंच बनाई जाती थी. क़नात के ज़रिए ही ऊंचाई से निचले इलाक़ों में सिंचाई के लिए पानी पहुंचाया जाता था.

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ज़मीन के भीतर पानी की नालियों का जाल
ऊपर से देखने पर ये गड्ढे ऐसे ही मालूम देते हैं जैसे कच्ची ज़मीन में चींटियां गड्ढा खोद कर अपने लिए घर तैयार करती हैं. ऊपर से देखने में ये अंदाज़ा नहीं लगता है कि अंदर नालियों का जाल बना हुआ है. ज़मीन के ऊपर ये गड्ढे हवा पास करने के लिए बनाए जाते थे ताकि अंदर खुदाई कर रहे मज़दूरों की सांस न घुटे.
क़नात असल में ज़मीन के भीतर पानी की नालियों का जाल होता है. इसके अंदर कई कक्ष बने होते हैं. ठीक इसी तरह क़नात में भी ज़मीन के अंदर अलग-अलग कक्ष बनाए जाते थे. कई जगह पर पानी थोड़ी-सी मिट्टी हटाने पर ही निकल आता है. तो कई जगह तीन सौ मीटर की गहराई तक खुदाई करनी पड़ती थी.
ज़मीन के अंदर दलदली मिट्टी में छेद करके मिट्टी बाहर निकाली जाती थी. फिर गड़्ढे बनाकर वहां पानी निकाला जाता था. क़नात के अंदर ढलान इस तरह से बनाए जाते थे कि पानी तेज़ बहाव के साथ चलता रहे.
क़नात बनाने का तरीक़ा काफ़ी पेचीदा था. लेकिन इसकी बदौलत ही ईरान सदियों तक अपने सूखे इलाक़ों तक पानी पहुंचाता रहा.
इसकी बेहतरीन मिसाल तो दक्षिण-पूर्वी ईरान के प्रांत फ़ार्स में देखने को मिलती है. 550 से 330 ईसा पूर्व में यहां एकेमेनिड वंश के राजाओं ने 'पर्सिपोलिस' नाम का शहर बसाया था. ये शहर 'ज़ागरोस' पहाड़ों से घिरा था. यहां के मैदानों में सूखा था और हवा काफ़ी गर्म थी. रेगिस्तानी इलाक़ों की तरह यहां के लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता था. लेकिन क़नात जैसी तकनीत की बदौलत पर्सिपोलिस एकेमेनिड वंश के राजाओं के लिए सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र बन गया.
यहीं से उन्होंने अपनी हुकूमत यूनान से लेकर हिंदुस्तान तक क़ायम कर ली. इस शहर को उन्होंने दुनिया का सबसे आलीशान शहर बना दिया. बड़े-बड़े पार्क और बाग़ इस शहर की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाते थे.

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एयरकंडीशनिंग के इसी तरीक़े का चलन
वक़्त के साथ पानी सप्लाई का ईरान का क़नात सिस्टम दुनिया भर में फैल गया. कुछ तो ईरान के बादशाहों की बदौलत और कुछ यहां पर आने वालों की वजह से. जो भी ईरान आया वो यहां से क़नात सिस्टम की जानकारी लेकर लौटा और अपने यहां उसे आज़माया.
एक इतिहासकार ने तो यहां तक दावा किया है कि मिस्र के राजा क़नात सिस्टम से इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने फ़ारस के राजा दारा महान को फ़राओ की उपाधि से नवाज़ा.
क़नात से ना सिर्फ़ पीने का पानी मिलता था बल्कि ये एयर कंडिशनिंग का भी काम करते थे. मिसाल के लिए मध्य ईरान का इलाक़ा याज़्द काफ़ी गर्म है. यहां क़नात के पास ठंडी हवा गुज़ारने के लिए 'बगदीर' बनाए गए हैं. क़नात में शाफ़्ट के ज़रिए जो गड़्ढे बनाए गए हैं, वहां से गर्म हवा ज़मीन के अंदर जाती है और पानी के संपर्क में आकर ठंडी हो जाती है. याज़्द के पुराने घरों में आज भी एयरकंडीशनिंग का यही तरीक़ा चलन में है.

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बर्फ़ जमाने के तहख़ाने यख़चाल
क़नात का एक और इस्तेमाल होता था. जाड़े के दिनों में ठंडा पानी पहाड़ों से क़नात के ज़रिए यहां पहुंचाया जाता था. यहां आकर ठंडी दीवारों के बीच ये पानी जम कर बर्फ़ बन जाता था. इन बर्फ़ जमाने वाले तहख़ानों को 'यख़चाल' कहते थे.
यख़चाल फ़ारसी शब्द है जिसका मतलब है 'बर्फ़ के गड्ढे'. यहां सर्दी के मौसम में बर्फ़ जमाने का काम किया जाता था, ताकि गर्मी के दिनों में इसका इस्तेमाल हो सके. बर्फ़ जमाने का ये तरीक़ा यहां क़रीब 400 ईसा पूर्व यानी आज से क़रीब ढाई हज़ार साल पहले विकसित किया गया था. यख़चाल में बर्फ़ जमा रहने से ज़मीन के ऊपर का तापमान भी संतुलित रहता है.
क़नात सिस्टम न सिर्फ़ ईरानियों की पानी की ज़रूरत पूरा करता है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से रूहानी मक़सद भी पूरा करता है. क़नात की बदौलत ही यहां के राजा इतने ख़ूबसूरत बाग़ बना सके कि इन्हें आज यूनेस्को की लिस्ट में शामिल कर लिया गया है.
इन बाग़ों में हरी घास की परतें क़ालीन जैसी मालूम होती हैं. इन बाग़ों को चहार बाग़ कहते थे. फूलों से लदे लहलहाते पेड़ और कल-कल करते पानी के चश्मों से लबरेज ये बाग़ रूह को सुकून देते हैं.

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बाग-ए-ख़ोशनेविसान
ये बाग़ चार हिस्सों में बने हैं इसीलिए इन्हें 'चहार बाग़' यानी 'चार बाग़' कहा जाता है. इन बाग़ों को देखकर एहसास होता है कि पारसी लोग क़ुदरत के प्रेमी थे. कोई शक नहीं कि इब्राहिमी मज़हबों (इस्लाम, ईसाई और यहूदी) में जिस जन्नत की कल्पना की गई है, उसका ख़्याल इन चार बाग़ों से ही प्रेरित है. फ़ारसी लोग इन्हें 'परीदाइदा' का नाम देते हैं. जन्नत के लिए अंग्रेज़ी शब्द 'पैराडाइज़' इसी फ़ारसी शब्द से बना है.
ईरान की राजधानी तेहरान के मशहूर बाग़ हैं 'बाग-ए-ख़ोशनेविसान' यानी 'तस्वीरें उकेरने वालों का बाग'. 'बाग़-ए-मुज़ेह' यानी 'म्यूज़िम गार्डन', 'बाग़-ए-फ़िरदौस' यानी 'पैराडाइज़ गार्डन'. कुछ जानकार दावा करते हैं कि हो सकता है इन बाग़ों की ख़ूबसूरती ने ही ईरान के मशहूर शायर हाफ़िज़ और शेख़ सादी को शायरी की प्रेरणा दी हो.
ईरान के चहार बाग़ की फ़िलॉसफ़ी का असर दुनिया के कई देशों में देखा जा सकता है. मोरक्को के शहर मराकश के महलों, स्पेन के क़िले अलहमरा के सहन में बने बाग़ और फ्रांस के राष्ट्रपति निवास यानी वर्साय पैलेस के आर्किटेक्चर पर फ़ारस की कला और संस्कृति का असर साफ़ देखा जा सकता है. ये अरबों के ज़रिए दूर-दूर तक पहुंचा.

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फ़ारस के चहार बाग़ से प्रेरित है मुग़ल गार्डेन
मुग़ल बादशाह फ़ारसी ज़बान और संस्कृति को दुनिया में अव्वल मानते थे. मुग़लों ने न सिर्फ़ ईरानियों की भाषा फ़ारसी को अपनी ज़बान बनाया बल्कि उनकी वास्तुकला को भी गले से लगाया.
ईरानियों के चहार बाग़ की तर्ज पर मुग़ल बादशाहों ने कश्मीर से लेकर दिल्ली और लाहौर तक बाग़ तामीर कराए. हमारे राष्ट्रपति भवन का मुग़ल गार्डेन भी फारस की चहार बाग़ परंपरा से ही प्रेरित है. हुमायूं के मक़बरे, ताजमहल के आस-पास, लाहौर और कश्मीर के मुग़ल गार्डेन भी फ़ारसी संस्कृति के भारत पर असर की मिसाल हैं. मुग़ल काल में इन्हें भारत में भी चहार बाग़ ही कहा जाता था.
हालांकि नई तकनीक आने के बाद ईरानियों की क़नात पर निर्भरता कम हुई है, लेकिन गांव देहातों में आज भी इसी के ज़रिए पानी पहुंचाया जाता है. क़नात की देखरेख का काम स्थानीय लोगों को सामाजिक तौर पर जोड़ने का काम भी करता है.
साइरस महान ने अपने दम पर ईरान में बैठकर दूर-दूर तक अपना राज्य फैलाया. ज़रा सोचिए अगर ईरान के सूखे वातावरण में क़नात जैसा सिस्टम नहीं बना होता तो क्या इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित हो सकता था.
(नोटःये ज़ुबिन बेख़राद की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)
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