भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद का बांग्लादेश कनेक्शन

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फणींद्र दाहाल
बीबीसी नेपाली सेवा
पिछले दिनों भारत के दौरे पर गए नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने कहा कि उनका देश शुरू से ही बांग्लादेश तक जाने का सीधा रास्ता चाहता रहा है.
नेपाल लौट कर आने के बाद प्रचंड ने कहा कि उन्होंने नेपाली सीमा के विशेषज्ञों से कई विकल्पों पर चर्चा की है लेकिन अपनी तरफ़ से कोई ठोस प्रस्ताव नहीं रखा है.
नेपाली सीमा के विशेषज्ञ बुद्धिनारायण श्रेष्ठ ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच कालापानी क्षेत्र को लेकर पिछले छह दशक से विवाद चल रहा है.
उन्होंने बीबीसी से कहा कि इस इलाक़े को अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से लैंड स्वैप के जरिए विवाद सुलझाया जा सकता है.
उनका कहना है कि भारत और नेपाल के बीच नक्शे को लेकर जो विवाद है, उसे अगर इस आधार पर सुलझाया जा सकता है तो लिपु नदी को सीमा की नदी माना जा सकता है.
और उत्तर और पश्चिम में 310 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन भारत के लिए छोड़ी जा सकती है.
उनके मुताबिक़ नेपाल को भारत के पास मौजूद 310 वर्ग किलोमीटर ज़मीन लेनी चाहिए ताकि ये काकड़ाविट्टा के पूरब में पानीटंकी (जगह का नाम) के ज़रिये बांग्लादेश में बांग्लाबांध पर ज़ीरो पॉइंट तक छू सके.
सीमा विवाद पर भारतीय विशेषज्ञों का नज़रिया

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भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक गंभीर मुद्दा है और भारत मानता है कि वह ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लेगा जिससे चीन के साथ उसके मौजूदा तनाव को देखते हुए कोई हित प्रभावित हो.
भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल एसबी अस्थाना कहते हैं, ’’ये इस मुद्दे को सुलझाने का सही वक़्त नहीं है क्योंकि हम कई और दूसरे मुद्दों से जूझ रहे हैं.''
पिछले कुछ समय से एलएसी पर भारत और चीन की सेना आमने-सामने हैं.
नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड का मानना है कि भारत के साथ नेपाल का सीमा विवाद ज़मीन की अदला-बदली के ज़रिये सुलझाया जा सकता है.
लेकिन भारतीय सेना से जुड़े अफसरों का कहना है कि वे ये नहीं समझते कि इस तरह के किसी विकल्प पर इस समय बात हो रही है.
फिर भी उनके मुताबिक़ प्रचंड और नरेंद्र मोदी के बीच बातचीत में जताई गई प्रतिबद्धताओं के आधार पर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने का कोई मैकेनिज्म काम करना शुरू कर देता है तो ये एक बड़ी उपलब्धि होगी.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रचंड से मुलाक़ात के बाद कहा था कि ये मुलाक़ात भारत और नेपाल के बीच रिश्ते हिमालय की ऊंचाई तक ले जाएगी और दोनों देशों के बीच सीमा विवाद उनके लोगों की भावनाओं के आधार पर सुलझाया जाएगा.

भारत, नेपाल और कालापानी विवाद
प्रचंड ने नेपाल के पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
नेपाल और भारत के बीच कालापानी क्षेत्र के मालिकाना हक़ को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है.
नेपाल और भारत ( तब भारत पर ब्रिटेन का शासन था) के बीच 1816 को सुगौली समझौता हुआ था. इसके तहत महाकाली नदी को भारत और नेपाल के बीच की सीमा माना गया. दोनों के बीच इसके स्रोत को लेकर भी लंबे समय से विवाद रहा है.
नेपाली अधिकारियों का कहना है कि कालापानी क्षेत्र भारत की आज़ादी के बाद कई साल तक नेपाल के शासन में रहा. नक्शे की बात छोड़ दीजिये तो स्थानीय लोगों ने नेपाल सरकार को राजस्व दिया था. इसका सुबूत भी उनके पास है.
वे ये दावा करते रहे हैं कि भारत ने इलाक़ा कभी नहीं छोड़ा. जबकि भारतीय फौजों को यहां अस्थायी तौर पर ही रहने की इजाज़त थी.
2019 में भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने के दौरान जो नया नक्शा जारी किया था, उसमें कालापानी को भारतीय क्षेत्र में दिखाया गया था.
इसके जवाब में नेपाल ने अपने राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शे में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना क्षेत्र दिखाया था.

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भारत के लिए सामरिक महत्व का इलाक़ा
अस्थाना के मुताबिक़ यह इलाक़ा भारत के लिए सामरिक महत्व का है क्योंकि ये चीन से लगी सीमा पर मौजूद लिपुलेख पास और कैलाश मानसरोवर को जोड़ने वाली सड़क से जुड़ता है
उन्होंने कहा, ’’भारत और नेपाल दोनों के अपने-अपने तर्क हैं. मेरा मानना है कि नेपाल की कुछ गंभीर चिंताएं हैं. और उसे इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए . भारत को भी काफ़ी कुछ सोचने की ज़रूरत है. क्योंकि एलएसी की दूसरी ओर चीन की सेना मौजूद हैं.’’
नेपाल-भारत रिश्तों पर नज़र रखने वाले भारतीय सेना के एक और रिटायर्ड जनरल अशोक मेहता का मानना है कि इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों ने बातचीत की जो प्रतिबद्धता जताई है वो काफ़ी सकारात्मक है. लेकिन संभावित सौदेबाजी आसान नहीं है. इसमें जटिलताएं हैं.''
उन्होंने कहा,’’ नेपाली पक्ष ने विवादित ज़मीन को नक्शे में शामिल कर अपने संविधान को एकतरफ़ा बदल दिया. लेकिन ये ज़मीन भारत के पास है.’’
‘’अब ये एक ‘न्यूट्रल’ लैंड से ज्यादा कश्मीर जैसी स्थिति वाली जगह हो गई है. इसलिए बात कहां से शुरू की जाए ये एक बड़ा सवाल है.’’
मेहता ने कहा कि भारत ने कभी ये नहीं कहा है कि जो क्षेत्र उसके अधीन है, उस पर नेपाल का हक़ है. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत का ये रुख़ आगे बदलने वाला है.

चिकन नेक कॉरिडोर की भूमिका
2014 में सत्ता में आने के बाद जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काठमांडू का पहली बार दौरा किया था तो कहा गया था तो विदेश सचिव स्तर की बातचीत में कालापानी और सुस्ता इलाके से जुड़े विवादों को हल करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी. लेकिन इसके लिए जो मैकेनिज्म तय हुआ, उसकी एक भी बैठक नहीं हुई.
कुछ नेपाली अधिकारियों का कहना है कि नक्शे पर विवाद जारी है लेकिन बॉर्डर मैनेजमेंट की टेक्निकल मैकेनिज्म का काम बहुत धीमा चल रहा है.
एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रचंड और नरेंद्र मोदी ने सीमा विवाद की थोड़ी चर्चा की थी. लेकिन भारत की ओर से जारी 24 बिंदुओं वाली प्रेस रिलीज में इसका कोई जिक्र नहीं था.
लेकिन नेपाल में लैंड ट्रांसफर को लेकर जो बहस चल रही है, उस पर भारत की ओर से कोई औपचारिक राय भी नहीं दी गई.

अस्थाना ने कहा कि बांग्लादेश को जोड़ने वाला रास्ता सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक है और ये भारत के लिए काफ़ी अहम है. इसलिए वो इस मुद्दे पर किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेगा.
इस कॉरिडोर को चिकन नेक भी कहा जाता है. ये इलाका सिर्फ़ 17 किलोमीटर चौड़ा है. यह पश्चिम बंगाल को पूर्वोत्तर के राज्यों से जोड़ता है. ये नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की सीमा के नजदीक है. ये पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ने वाला रास्ता है. इसलिए इसे पूर्वोत्तर की लाइफलाइन भी कहा जाता है
इस इलाक़े का रेलवे नेटवर्क भारतीय सेना को भारत-चीन बॉर्डर के नज़दीक एलएसी तक जाने में मदद करता है.
जनरल अस्थाना कहते हैं, ’’इसमें कोई शक नहीं कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर का भारत के लिए असाधारण महत्व है. लेकिन अगर चीन में बातचीत में शामिल हो तो भी भारत यहां समझौता नहीं करेगा.’’

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भारत, नेपाल और बांग्लादेश का समीकरण
अस्थाना ने कहा ‘’पिछली बार जब चीन ने भारत के नज़दीक भारत, बांग्लादेश और चीन के ट्राइ पॉइंट पर यथास्थिति बदलने की कोशिश की थी तो भारतीय सेना भूटान में घुस आई थी. ‘’
‘’हमने सिर्फ़ भारतीय क्षेत्र में ही चीनी सेना को नहीं रोका है. हम भूटानी इलाक़े में पहुंच गए. आप समझ सकते हैं कि भारत ने इस इलाक़े की भौगोलिक स्थिति को कितनी गंभीरता से लिया है.’’
उन्होंने कहा कि इस कॉरिडोर पर किसी भी तरह का समझौता भारत को दो हिस्सों में बाँटने जैसा होगा. क्योंकि पूर्वोत्तर के साथ संपर्क का यही एक रास्ता भारत के पास है.
उन्होंने कहा कि भारत को नेपाल को बांग्लादेश तक गई अपनी ज़मीन से रास्ता देने में कोई दिक्क़त नहीं है. वो नेपाल को अपनी सड़कों के इस्तेमाल और ऊर्जा संबंधी कारोबार की सुविधाएँ दे सकता है."
"भारत और नेपाल के बीच जो संबंध हैं, उसमें बांग्लादेश तक पहुंच देने में कोई दिक्क़त नहीं रही है.’’
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1997 में नेपाल और बांग्लादेश के बीच काकड़ाविट्टा-फूलबाड़ी-बांग्लादेश ट्रांजिट रूट को लेकर एक समझौता हुआ था.
इसके बाद से बांग्लादेश ने नेपाल को मोंगला और चटगांव बंदरगाह का इस्तेमाल करने देना शुरू कर दिया था.
जनरल मेहता कहते हैं भारत में हर किसी को सिलीगुड़ी कॉरिडोर के सामरिक महत्व के बारे में पता है.
नेपाल में प्रधानमंत्री ने ये संदेश दिया है कि वो बॉर्डर मामले में दबाव में नहीं है. वो इस बात का संकेत दे रहे हैं कि देखिए हमने सीमा विवाद पर भारत से बातचीत शुरू कर दी है.’’
‘’मैं समझता हूं कि बातचीत विदेश सचिव पर बातचीत शुरू हो सकती है. लोग ये सोचेंगे कि कम से कम लोग ये तो सोचेंगे कि विचार-विमर्श शुरू हुआ है. लेकिन जहां तक मुझे लगता है कि कोई भी बातचीत आसान नहीं होगी.
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