हिमालय में सर्दियों के मौसम में क्यों कम होती जा रही है बर्फ़बारी

लेह का इलाक़ा

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इमेज कैप्शन, लेह के सुदूर क्षेत्र की यह तस्वीर अप्रैल 2025 की है.
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता

पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय पर सर्दियों में बहुत कम बर्फ़बारी हो रही है और ऐसे मौसम में जब पहाड़ बर्फ़ से ढंके होने चाहिए, इसके कई हिस्से में पहाड़ नंगे और पथरीले दिखाई देने लगे हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि 1980 से 2020 के बीच औसत बर्फ़बारी के मुक़ाबले, पिछले पाँच सालों में सर्दियों में बर्फ़बारी में कमी देखी गई है.

तापमान में वृद्धि का एक मतलब ये भी है कि जो भी थोड़ी बहुत बर्फ़ गिरती है वो तेज़ी से पिघल जाती है और कुछ निचले इलाक़ों में तो बर्फ़ कम गिरने लगी है और बारिश अधिक होने लगी है.

इंटरगवर्नमेंटरल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज और अन्य वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, इसका एक कारण जलवायु परिवर्तन है.

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कम बर्फ़बारी चिंता की बात क्यों?

अध्ययनों से ये भी पता चलता है कि हिमालय के अधिकांश हिस्से में सर्दियों के दौरान स्नो ड्रॉट या 'बर्फ का सूखा' जैसी स्थितियां हैं.

वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना, भारत के हिमालयी राज्यों और इस क्षेत्र के अन्य देशों के सामने लंबे समय से एक बड़ी समस्या बना हुआ है. विशेषज्ञों ने बीबीसी से कहा कि सर्दियों में घटती बर्फ़बारी इस संकट को और गंभीर बना रही है.

उनका कहना है कि बर्फ़ और हिम में कमी से न केवल हिमालय का स्वरूप बदलेगा बल्कि इसका असर क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों के जीवन और कई इकोसिस्टम पर भी पड़ेगा.

वसंत में तापमान बढ़ने पर सर्दियों के दौरान जमा हुई बर्फ़ पिघलती है और उसका पानी नदियों में जाता है. यह स्नोमेल्ट क्षेत्र की नदियों और नालों के लिए एक अहम स्रोत है, जिससे पीने के पानी, सिंचाई और हाइड्रोपावर की आपूर्ति होती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि पानी की उपलब्धता पर असर के अलावा, सर्दियों में कम बारिश (मैदानी इलाक़ों में बारिश और पहाड़ों में बर्फ़बारी) का ये भी अर्थ है कि सूखी परिस्थितियों के कारण हिमालयी क्षेत्र में जंगल की आग का ख़तरा बढ़ रहा है.

उन्होंने यह भी कहा कि ग्लेशियरों के ख़त्म होने और बर्फ़बारी घटने से पहाड़ अस्थिर हो रहे हैं, क्योंकि बर्फ़ और हिम उनके लिए सीमेंट जैसे हैं. चट्टानें गिरने, भूस्खलन, ग्लेशियर झीलों के फटने और भारी मलबा बहने जैसी आपदाएं अब पहले की तुलना में ज़्यादा आम होती जा रही हैं.

तो, बर्फ़बारी में कमी कितनी गंभीर समस्या है?

पश्चिमी नेपाल में स्थित माछापुच्छरे (फ़िशटेल) पर्वत की.

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इमेज कैप्शन, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में सर्दियों के दौरान होने वाली बर्फ़बारी में भारी कमी आई है और इससे पहाड़ नंगे और पथरीले दिखने लगे हैं. ये तस्वीर है पश्चिमी नेपाल में स्थित माछापुच्छरे (फ़िशटेल) पर्वत की.

भारत का हिमालयी इलाक़ा भी प्रभावित

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भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, दिसंबर महीने में लगभग पूरे उत्तर भारत में बारिश और बर्फ़बारी पूरी तरह नदारद रही.

मौसम विभाग का कहना है कि इसकी सबसे अधिक संभावना है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे राज्यों समेत उत्तर पश्चिमी भारत के अधिकांश हिस्से में जनवरी और मार्च के बीच लंबी अवधि की औसत (एलपीए) बारिश और बर्फ़बारी में 86 प्रतिशत की कमी आएगी.

एलपीए किसी क्षेत्र में 30 से 50 सालों में दर्ज की गई बारिश या बर्फ़बारी है और इसके औसत का उपयोग वर्तमान मौसम को सामान्य, अधिक या कम के रूप में वर्गीकृत करने के लिए किया जाता है.

मौसम विभाग के अनुसार, 1971 से 2020 के बीच उत्तर भारत में एलपीए के हिसाब से औसत बारिश 184.3 मिलीमीटर रही.

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश में आई तेज़ गिरावट कोई एक बार की घटना नहीं है.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग में ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी के प्रमुख शोध फ़ेलो कीरन हंट ने कहा, "अब अलग-अलग डेटा सेट में इसके पुख़्ता सबूत मौजूद हैं कि हिमालय में सर्दियों की बारिश वास्तव में घट रही है."

हंट के सह-लेखन में 2025 में प्रकाशित एक स्टडी में 1980 से 2021 के बीच के चार अलग-अलग डेटा सेट शामिल किए गए हैं. इन सभी में पश्चिमी हिमालय और केंद्रीय हिमालय के कुछ हिस्सों में बारिश में कमी दिखाई गई है.

यूरोपीय सेंटर फ़ॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स के रीएनालिसिस डेटा सेट ईआरए-5 का इस्तेमाल करते हुए, जम्मू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के रिसर्च फ़ेलो हेमंत सिंह का कहना है कि उत्तर-पश्चिमी हिमालय में पिछले पांच सालों में बर्फ़बारी 40 साल के दीर्घकालिक औसत (1980 से 2020) की तुलना में 25 प्रतिशत कम हुई है.

चमोली, उत्तराखंड

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इमेज कैप्शन, उत्तराखंड में भी कुछ सालों में बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई है.

बारिश और बर्फ़बारी दोनों में गिरावट

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, नेपाल में भी सर्दियों की बारिश में बड़ी गिरावट देखी जा रही है जो कि केंद्रीय हिमालय का इलाक़ा है.

काठमांडू की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में मेटियोरोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर बिनोद पोखरेल ने कहा, "नेपाल में अक्तूबर से अब तक बारिश नहीं हुई है और लगता है कि इस सर्दी का बाक़ी समय भी ज़्यादातर सूखे में ही बीतेगा. पिछले पांच सालों में लगभग हर सर्दी में यही हाल रहा है."

हालांकि मौसम वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि हाल के कुछ सालों में कुछ सर्दियों के दौरान भारी बर्फ़बारी हुई है, लेकिन ये घटनाएं सीमित इलाक़ों तक रही हैं और ये पहले की सर्दियों जैसी सामान्य बारिश नहीं बल्कि ख़राब मौसम की वजह से हुई.

बर्फ़बारी में गिरावट का आकलन करने के लिए वैज्ञानिक जो दूसरा तरीक़ा अपनाते हैं, वो इस बात का पता लगाना कि पहाड़ों पर कितनी बर्फ़ इकट्ठा हुई और उसमें कितनी बर्फ़ बिना पिघले बनी रही- इसे स्नो परसिस्टेंस यानी बर्फ़ कितने समय तक टिकी रही, के नाम से जाना जाता है.

इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024-2025 की सर्दी में बर्फ़ के टिके रहने की अवधि सामान्य से क़रीब 24 प्रतिशत कम रही, जो पिछले 23 सालों में रिकॉर्ड कमी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2020 से 2025 के बीच बीते पांच में से चार सर्दियों में हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बर्फ़ का टिकाव सामान्य से कम रहा.

आईसीआईएमओडी में रिमोट सेंसिंग और जियोइंफ़ॉर्मेशन के सीनियर एसोसिएट श्रवण श्रेष्ठ ने कहा, "आमतौर पर इसे एचकेएच क्षेत्र के बड़े हिस्से में सर्दियों की बारिश और बर्फ़बारी में कमी से जुड़ा हुआ माना जा रहा है."

जम्मू स्थित आईआईटी से जुड़े हेमंत सिंह के सह-लेखन में 2025 में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्र में अब स्नो ड्रॉट की घटनाएं बढ़ रही हैं यानी बर्फ़ की उपलब्धता काफ़ी कम हो रही है, खास तौर पर 3,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में.

आईसीआईएमओडी की स्नो अपडेट रिपोर्ट चेतावनी देती है, "क्षेत्र की 12 प्रमुख नदी घाटियों में कुल वार्षिक रनऑफ़ का औसतन क़रीब एक चौथाई हिस्सा बर्फ़ के पिघलने से आता है. ऐसे में मौसमी तौर पर बर्फ़ के टिकाव में गड़बड़ी इन नदी घाटियों में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा को प्रभावित करती है."

विशेषज्ञों ने चेताया है कि हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना लंबे समय में पानी की कमी का ख़तरा बढ़ाता है, जबकि कम बर्फ़बारी और तेज़ स्नोमेल्ट निकट भविष्य में जल आपूर्ति के लिए ख़तरा बन रहे हैं.

हिमालयी क्षेत्र

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का कहना है कि बर्फ़बारी कम होने से करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होने का ख़तरा है

तेज़ी से पिघलती बर्फ़

ज़्यादातर मौसम वैज्ञानिक सर्दियों में उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में कम बारिश और कभी-कभार बर्फ़बारी की एक बड़ी वजह पश्चिमी विक्षोभों के कमज़ोर पड़ने को मानते हैं.

ये भूमध्यसागर से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम होते हैं, जो ठंडी हवा लेकर आते हैं.

उनका कहना है कि पहले पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों में अच्छी बारिश और बर्फ़बारी लेकर आते थे, जिससे फसलों को मदद मिलती थी और पहाड़ों पर बर्फ़ फिर से जमा हो जाती थी.

हालांकि, स्टडी के नतीजे एक जैसे नहीं हैं. कुछ में पश्चिमी विक्षोभों में बदलाव की बात कही गई है जबकि कुछ शोधों में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया है.

हंट ने कहा, "हालांकि हम जानते हैं कि सर्दियों की बारिश में बदलाव का संबंध पश्चिमी विक्षोभों से ही होना चाहिए क्योंकि हिमालय में सर्दियों की ज़्यादातर बारिश इन्हीं के कारण होती है."

उन्होंने कहा, "हमें लगता है कि यहाँ दो चीज़ें हो रही हैं. पश्चिमी विक्षोभ कमज़ोर हो रहे हैं और कुछ हद तक, कम निश्चित तौर पर, थोड़ा और उत्तर की ओर खिसक रहे हैं. इन दोनों कारणों से अरब सागर से नमी लेने की उनकी क्षमता घट जाती है, जिसके चलते बारिश भी कमज़ोर हो जाती है."

भारतीय मौसम विभाग ने इस सर्दी में अब तक उत्तर भारत में आए पश्चिमी विक्षोभ को 'कमज़ोर' बताया है, क्योंकि इससे बहुत मामूली बारिश और बर्फ़बारी ही हो सकी.

वैज्ञानिक जल्द या देर से यह पता लगा सकते हैं कि सर्दियों की बारिश में कमी के पीछे असल वजह क्या है.

लेकिन जो बात अब साफ़ होती जा रही है, वह यह है कि हिमालयी क्षेत्र एक दोहरे संकट का सामना कर रहा है.

एक तरफ़ जहां ग्लेशियर और बर्फीले क्षेत्र तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अब यहाँ बर्फ़बारी भी कम होने लगी है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस दोहरी परिस्थिति के नतीजे गंभीर होंगे.

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