दुनिया भर में धंस रहे हैं कई शहर, भारत के भी ये शहर हैं शामिल

जकार्ता का उत्तरी हिस्सा
इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया के जकार्ता का उत्तरी हिस्सा सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से एक है

"यह घर बहुत समय से धंस रहा है. 22 साल पहले जब मैं खिड़कियों के बाहर खड़ी होती थी तो ये मेरी छाती तक होती थी, लेकिन अब ये घुटनों तक आ गई है."

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में रहने वाली अर्ना ने यह बात कही है. जकार्ता दुनिया के सबसे तेज़ी से धंसते शहरों में से एक है.

अर्ना का घर जकार्ता शहर के उस उत्तरी हिस्से में स्थित है, जो कि शहर के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है. यहां जब भी तेज़ बारिश होती है तो बाढ़ जैसी स्थिति हो जाती है.

37 वर्षीय अर्ना जकार्ता में पली-बढ़ी हैं. वो बताती हैं कि उन्हें वो व्यस्त बंदरगाह और मस्जिद अब भी याद हैं, जो अब ग़ायब हो चुके हैं और हमेशा के लिए पानी के नीचे चले गए हैं.

उनका घर 1970 के दशक में बना था. इस घर की दीवारें फट गई हैं और फ़र्श को फिर से ज़मीन के स्तर तक लाने की कोशिश में उस पर मोटी-मोटी कंक्रीट की परतें डाली गई हैं. ऐसा अब तक लगभग दस बार किया जा चुका है.

सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एनटीयू) की स्टडी के अनुसार, धंसते शहरों की सूची में जकार्ता के अलावा भारत के चेन्नई, अहमदाबाद और कोलकाता समेत 48 शहर हैं.

दरअसल, नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एनटीयू) की टीम ने एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका के 48 तटीय शहरों का अध्ययन किया. ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां कि विशेष रूप से समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण सबसे अधिक ख़तरा होने की आशंका है. इसका कारण मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन है.

बीबीसी ने स्टडी और संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के आधार पर पाया है कि इन क्षेत्रों में लगभग 16 करोड़ लोग रहते हैं.

भारतीय शहरों को लेकर स्टडी में क्या सामने आया?

कोलकाता

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इमेज कैप्शन, नासा के अनुसार, कोलकाता में 2024 में समुद्र के स्तर में 0.59 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है (सांकेतिक तस्वीर)

कोलकाता

एनटीयू की स्टडी के अनुसार, 2014 से 2020 के बीच कोलकाता के कुछ हिस्सों में औसतन प्रति वर्ष 0.01 सेंटीमीटर से 2.8 सेंटीमीटर तक जमीन धंसी है.

बीबीसी का अनुमान है कि इन धंसते हुए क्षेत्रों में 90 लाख लोग रहते हैं.

एनटीए की स्टडी के मुताबिक सबसे तेजी से धंसने वाले क्षेत्रों में से एक भाटपारा था, जहां हर साल 2.6 सेंटीमीटर जमीन धंस रही थी. वहीं नासा के अनुसार, 2024 में समुद्र के स्तर में 0.59 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि कोलकाता में भूमि धंसने का कारण भूजल का अत्यधिक दोहन करना है.

एक्सपर्ट चेतावनी देते हुए कहते हैं कि कोलकाता में जिन क्षेत्रों में जमीन धंस रही है, वहां भूकंप और बाढ़ का ख़तरा अधिक है.

चेन्नई

चेन्नई का मरीना बीच

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इमेज कैप्शन, नासा के अनुसार 2024 में समुद्र के स्तर में चेन्नई में 0.59 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है (सांकेतिक तस्वीर)

एनटीयू के अनुसार, 2014 से 2020 के बीच चेन्नई के कुछ हिस्सों में जमीन हर साल 0.01 सेंटीमीटर से 3.7 सेंटीमीटर तक धंसी है.

बीबीसी ने पाया कि इन धंसते हुए क्षेत्रों में 14 लाख (1.4 मिलियन) लोग रहते हैं.

एनटीए की स्टडी के मुताबिक, चेन्नई शहर में सबसे तेज़ी से धंसते हुए क्षेत्रों में से एक थरमणि है. यहां जमीन औसतन प्रति वर्ष 3.7 सेंटीमीटर धंसी. वहीं, नासा के अनुसार 2024 में समुद्र के स्तर में 0.59 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि चेन्नई के उन क्षेत्रों में तेजी से भूमि धंस रही है, जहां कि कृषि, औद्योगिक और घरेलू गतिविधियों के लिए भारी मात्रा में भूजल का दोहन किया गया है.

इस ख़तरे को कम करने के लिए भारत सरकार ने भूजल प्रबंधन में सुधार करने के लिए कार्यक्रम शुरू किए हैं. ऐसा इसलिए किया गया ताकि पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन किया जा सके.

अहमदाबाद

अहमदाबाद में समुद्र का बढ़ता स्तर

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एनटीयू की स्टडी के अनुसार, 2014 से से 2020 के बीच अहमदाबाद के कुछ हिस्सों में जमीन औसतन प्रति वर्ष 0.01 सेंटीमीटर से 5.1 सेंटीमीटर तक धंसी है.

बीबीसी का अनुमान है कि इन धंसते हुए क्षेत्रों में 51 लाख लोग (5.1 मिलियन) लोग रहते हैं.

एनटीयू की स्टडी में सामने आया है कि अहमदाबाद में सबसे तेज़ी से धंसते हुए क्षेत्रों में से एक पिपलाज है और यहां जमीन हर साल औसतन 4.2 सेंटीमीटर धंस रही थी.

वहीं, नासा के मुताबिक 2024 में समुद्र के स्तर में 0.59 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि जमीन के धंसने का कारण पंपिंग के ज़रिए भूजल से अत्यधिक पानी निकालना, समुद्र का बढ़ता स्तर और अधिक बारिश होना है. ऐसा ही रहा तो भविष्य में शहर में बाढ़ का ख़तरा बढ़ जाएगा.

इसको कम करने के लिए अहमदाबाद नगर निगम ने क्लाइमेट रेसिलिएंट सिटी एक्शन प्लान तैयार किया है, जिसमें बारिश के पानी का संचयन (स्टोरेज) और भूजल पुनर्भरण सहित कई अन्य उपाय शामिल हैं.

भूजल पुनर्भरण यानी भूजल स्टोरेज में कृत्रिम तरीक़े से पानी भरना.

एनटीयू की स्टडी में दुनियाभर में धंसते शहरों की सूची में कोलकाता, अहमदाबाद और चेन्नई के अलावा भारत के मुंबई और सूरत भी है.

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नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी की स्टडी में क्या सामने आया?

नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी का कहना है कि सबसे गंभीर जमीन धंसने का मामला चीन के तियानजिन का है. यहां तेजी से औद्योगिक और बुनियादी विकास हुआ है. साल 2014 से 2020 के बीच शहर के सबसे अधिक प्रभावित हिस्से में औसतन हर साल 18.7 सेंटीमीटर जमीन धंसी है.

नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी की चेरेल टे का कहना है कि कई धंसते हुए शहर एशिया या दक्षिण-पूर्व एशिया में है. इसका कारण यह है कि यहां की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और विकास भी बहुत हो रहा है. पानी की मांग कहीं ज़्यादा है.

उन्होंने कहा कि इससे भूमिगत जल के अधिक दोहन की संभावना बढ़ जाती है. इससे समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाती है.

उनका मानना है कि कुछ जमीनें अन्य की तुलना में अधिक प्रभावित होती है. जोखिम विशेष रूप से उन तटीय क्षेत्रों में अधिक रहता है जो निम्न भूमि वाले डेल्टा में बसे हुए हैं. यहां नदियां समुद्र में मिलने से पहले कई धाराओं में बंट जाती हैं. ऐसे शहरों में जकार्ता, बैंकॉक, हो ची मिन्ह सिटी और शंघाई है.

जकार्ता

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इमेज कैप्शन, जकार्ता का लगभग आधा हिस्सा अब समुद्र तल से नीचे है (सांकेतिक तस्वीर)

जकार्ता का लगभग आधा हिस्सा अब समुद्र स्तर से नीचे स्थित है. यह शहर दलदली भूमि पर बसा है, जहाँ 13 नदियां समुद्र में मिलती हैं, जिससे यह क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है.

इंडोनेशिया के मेट्रोलॉजिकल एजेंसी का कहना है कि जकार्ता में जो 'बाढ़ साइकिल पहले हर पांच साल'में होती वह अब और ज़्यादा बार होने की संभावना है. ऐसा इसलिए क्योंकि इंडोनेशिया में अधिक बारिश आने का ट्रेंड बढ़ रहा है.

पिछले दशक में शहर में आई बाढ़ के कारण कई लोगों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा 2,80,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा था.

जकार्ता के कुछ हिस्से 1970 की तुलना में 4 मीटर नीचे आ चुके हैं. इस कारण इंडोनेशिया ने नूसंतारा को नई राजधानी के रूप में विकसित करने का फ़ैसला लिया है.

एनटीयू की स्टडी और बीबीसी के विश्लेषण में सामने आया है कि भूमिगत जल को पंपिंग के जरिए निकालना जमीन धंसने का मुख्य कारण है. निर्माण और खनन जैसी अन्य गतिविधियों का भी प्रभाव पड़ता है.

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क्या उपाय हो रहे हैं?

जब कोई तटीय शहर जमीन धंसने और समुद्र के बढ़ते स्तर का सामना करता है तो वह इससे निपटने के लिए कई उपाय खोजने की कोशिश करते हैं, लेकिन ये समाधान कभी-कभी अन्य समस्याओं को भी जन्म दे सकते हैं.

जकार्ता, मिस्र का अलेक्ज़ेंड्रिया और वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी ने समुद्र से आने वाली बाढ़ को रोकने के लिए अपनी समुद्री तटरेखाओं के साथ बांध, दीवारें और रेत की बाधाएँ बनाई हैं.

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ पादोवा के प्रोफ़ेसर पिएत्रो टेअतिनी कहते हैं कि जैसे-जैसे दीवारें ऊंची और बड़ी होती जाती हैं, एक 'बाउल इफेक्ट' शुरू हो सकता है. इससे बारिश और नदी का पानी कुछ क्षेत्रों में फंस सकता और समुद्र में वापस बहने से रुक सकता है. यह बाढ़ की स्थिति को और भी बढ़ा सकता है.

इस कारण अतिरिक्त पानी निकालने के लिए जकार्ता और हो ची मिन्ह सिटी जैसे शहरों ने पंपिंग स्टेशन बनाए हैं. हालांकि, जमीन धंसने या बाढ़ के मूल कारण इससे दूर नहीं होते हैं.

जापान के टोक्यो ने कैसे समाधान निकाला?

जापान का टोक्यो

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इमेज कैप्शन, 1970 के दशक में टोक्यो ने भूमिगत जल पंपिंग को लेकर कड़े नियम लागू कर दिए थे

जब टोक्यो को पता लगा कि शहर के कुछ हिस्सों में जमीन धंस रही है तो उसने एक अलग रास्ता अपनाया और समस्या की जड़ पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया.

1970 के दशक में टोक्यो ने भूमिगत जल पंपिंग को लेकर कड़े नियम लागू कर दिए. इस कारण जमीन के धंसने के मामले में कमी आई.

टोक्यो ने एक वाटर सप्लाई मैनेजमेंट बनाया. इसको लेकर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये जमीन धंसने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है.

एनटीयू की स्टडी में सामने आया है कि वर्तमान में टोक्यो शहर पहले से काफी अधिक स्थिर है. हालांकि, कुछ छोटे क्षेत्रों में 2014 से 2020 के बीच हर साल 0.01 से 2.4 सेंटीमीटर तक भूमि धंसी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित