श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण ही क्या पाकिस्तान में शामिल होने से बचा बंगाल?

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में अपने भाषण के दौरान दावा किया था कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते, तो बंगाल भारत का हिस्सा नहीं होता.
उन्होंने कहा था, 'आज बंगाल अगर भारत में है तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण है'.
सात अगस्त को राज्यसभा में दिल्ली सर्विस बिल पर बहस का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ज़िक्र किया था.
उन्होंने कहा था, "कम्युनिस्ट पार्टी के दो सदस्यों ने मेरी पार्टी का उल्लेख करते हुए ये कहा कि मेरी पार्टी का आज़ादी के आंदोलन में कोई इतिहास नहीं है. लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि जिस पार्टी का जन्म ही 1950 में हुआ, वो आज़ादी के आंदोलन में कैसे हिस्सा ले सकती है. हमारी पार्टी का जन्म ही 1950 में हुआ. हम कैसे आज़ादी का आंदोलन लड़ेंगे. अगर आज बंगाल भारत में है, तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण है."
अमित शाह ने ये भी कहा कि अगर कश्मीर भारत में है, तो श्याम प्रसाद मुखर्जी के कारण.
बंगाल पर इस दावे की सच्चाई परखने से पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उस समय की परिस्थितियों के बारे में जानना ज़रूरी है.

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स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में मंत्री
श्यामा प्रसाद मुखर्जी वकील, शिक्षाविद् और नेता थे. वे स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे.
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनकी काबिलयत को देखते हुए अपने मंत्रिमंडल में उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया था.
कलकत्ता में साल 1901 में जन्मे मुखर्जी सबसे कम उम्र में कुलपति बने थे.
जब उन्हें कलकत्ता यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर बनाया गया तो उनकी उम्र केवल 33 साल थी, वे चार साल तक इस पद पर रहे.

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बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मे मुखर्जी का राजनीतिक करियर 1929 में शुरू हुआ. वे उस साल बंगाल कांग्रेस से जुड़े.
लेकिन अगले साल यानी 1930 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी.
1938 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पद से हटने के बाद अगले साल यानी 1939 में वे बंगाल में हिंदू महासभा में शामिल हुए.
1940 में उन्हें हिंदू महासभा का अध्यक्ष बनाया गया.
1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ का गठन किया. ये वही भारतीय जनसंघ है, जिसने आगे चलकर मौजूदा भारतीय जनता पार्टी का रूप लिया.

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बँटवारे से पहले का बंगाल विभाजन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिल्ली स्थित बाबा साहब आप्टे स्मृति भवन केशव कुंज ने अपनी इतिहास संकलन योजना के तहत 'इतिहास दर्पण' के एक अंक में एक शोध पत्र प्रकाशित किया था.
उदयपुर के बीएन कॉलेज में इतिहास विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एके कपिल और डॉ. भानु कपिल ने 'बंगाल का द्वितीय विभाजन' शीर्षक वाले इस शोध पत्र में कहा था कि श्यामा प्रसाद बंगाल के विभाजन के पक्ष में थे.
साल 1947 में उन्होंने बंगाल के कांग्रेसियों से राष्ट्रीय हित में बंगाल विभाजन का समर्थन करने की अपील की थी, बंगाल प्रांत के विभाजन के लिए समर्थन जुटाने के मकसद से मुखर्जी ने उन दिनों कई दौरे किए और राज्य के सभी क्षेत्रों में हिन्दू सम्मेलन आयोजित किए.
मुखर्जी का मानना था कि पूरा बंगाल अगर पाकिस्तान में चला गया, तो मुस्लिम प्रभुत्व वाले इलाकों में हिंदुओं पर हमले बढ़ जाएँगे.
1947 में कलकत्ता के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार अमृत बाज़ार पत्रिका ने एक जनमत संग्रह करवाया.
इससे पता चला कि 98 प्रतिशत हिंदू विभाजन के पक्ष में थे. बंगाल कांग्रेस का बहुमत भी विभाजन के पक्ष में था.

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दक्षिणपंथी नेताओं का दावा
दक्षिणपंथी संगठन बंगाल को पाकिस्तान में शामिल होने से बचाने का पूरा श्रेय डॉ. मुखर्जी को देते हैं.
युवा लेखक दिगंत चक्रवर्ती ने इसी साल 20 जून को ‘हिंदू पोस्ट डॉट इन’ में इस मुद्दे पर अपने लेख में कहा है कि उस समय बंगाल के विभाजन की मांग में तमाम बुद्धिजीवी डॉ. मुखर्जी के समर्थन में आगे आए थे.
बंगाल को अगर दो टुकड़ों में न बाँटा गया होता तो पूरे बंगाल के पाकिस्तान में जाने का अंदेशा था.
हिंदू बहुल पश्चिमी बंगाल को भारत में बनाए रखने के लिए प्रांत का विभाजन ज़रूरी था.
मुस्लिम लीग और सुराहवर्दी को छोड़कर सबने (कांग्रेस, हिंदू महासभा और वामपंथी) इस विभाजन का समर्थन किया था.
दरअसल, जब मुस्लिम लीग के नेता सुराहवर्दी को लगा कि पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल कराना असंभव होगा तो उन्होंने अचानक पैंतरा बदलते हुए एक ऐसे संप्रभु अविभाजित बंगाल का प्रस्ताव सामने रखा, जो न तो भारत में शामिल हो और न ही पाकिस्तान में.
लेकिन उस अविभाजित बंगाल में भी हिंदू अल्पसंख्यक थे. वे कहते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी सुराहवर्दी के इस प्रस्ताव पर सहमति दे दी.
इससे लगने लगा कि देर-सबेर अविभाजित बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा. उससे कुछ पहले ही कोलकाता में दंगे हुए थे और नोआखाली में नरसंहार हुआ था.
इसमें सुहरावर्दी की भूमिका सवालों के घेरे में रही थी. 20 जून, 1947 को बंगाल विधानसभा में हिंदू बहुल इलाक़ों को लेकर पश्चिम बंगाल के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया.
उससे पहले 23 अप्रैल, 1947 को लार्ड माउंटबेटन के साथ बैठक में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विस्तार से इस बात का ज़िक्र किया था कि बंगाल का विभाजन क्यों ज़रूरी है.
उसी साल दो मई को मुखर्जी ने माउंटबेटन को एक लंबा पत्र भी भेजा था. उसी के बाद 20 जून 1947 को बंगाल के विभाजन का फ़ैसला किया गया था.

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विधायकों की बैठक में फ़ैसला
20 जून 1947 को, बंगाल विधानसभा के विधायकों के दो अलग-अलग गुटों में बैठक हुई थी. इसमें यह तय किया जाना था कि क्या बंगाल भारत के साथ रहेगा, पाकिस्तान में शामिल होगा या विभाजित होगा.
90 के मुक़ाबले 120 मतों के साथ पहले गुट ने यह तय किया गया था कि बंगाल अखंड रहेगा. साथ ही, इसका पाकिस्तान में विलय हो जाएगा.
वहीं बंगाल के हिंदू बहुल क्षेत्रों के सदस्यों की एक अलग बैठक ने प्रांत के विभाजन के लिए मतदान किया. इसमें हिंदू बहुल हिस्से के भारत के साथ रहने का फ़ैसला हुआ.
इस तरह पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल अलग-अलग हुए और पूर्वी बंगाल विभाजन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया जिसे ईस्टर्न पाकिस्तान कहा गया.
दोनों तरफ़ से क़रीब 25 लाख लोग विस्थापित हुए. विभाजन के बाद दंगे भी भड़के. करोड़ों रुपए की संपत्तियों को नुक़सान हुआ.

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अकेले श्रेय देना कितना सही?
हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी संगठनों का दावा है कि बंगाल को पाकिस्तान में शामिल होने से रोकने में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान को इतिहास की पुस्तकों में समुचित जगह नहीं मिली.
लेकिन दूसरी ओर, ऐसे इतिहासकारों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि संघ परिवार अपने सियासी हितों के लिए मुखर्जी के योगदान को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता रहा है.
कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर सुस्नात दास कहते हैं, “श्यामा प्रसाद अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे, जिन्होंने बंगाल के विभाजन का मुद्दा उठाया हो. उस समय विधानसभा में ज्योति बसु समेत वामपंथियों और कांग्रेस ने भी विभाजन के पक्ष में मतदान किया था. बाक़ी सबकी तरह श्यामा प्रसाद ने भी इसका समर्थन किया था इसलिए इसमें उनका कोई निजी योगदान नहीं था.”
इसी विश्वविद्यालय में इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर हितेन्द्र पटेल मानते हैं कि बंगाल के विभाजन में श्याम प्रसाद मुखर्जी की भूमिका अहम ज़रूर थी, लेकिन वही एकमात्र कारण नहीं थे जिनकी वजह से बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बच गया.
उस समय बंगाल का भद्रलोक तबका भी विभाजन के समर्थन में खड़ा था. ऐसे में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पूरा श्रेय देना कितना सही है?
इस सवाल पर पटेल कहते हैं, “यह आंशिक रूप से सच है, पूरी तरह नहीं. उस समय लगभग वही स्थिति पंजाब में थी और वहाँ तो कोई श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं था. बंगाल में अगर श्यामा प्रसाद नहीं होते, तो कोई और होता. उनका योगदान महत्वपूर्ण ज़रूर था, लेकिन सीधे तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके कारण ही बंगाल भारत का हिस्सा बना.”

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'मुखर्जी के योगदान का अब मूल्यांकन हो रहा है'
साल 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध कवर कर चुके कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, “केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से पश्चिम बंगाल में पैठ जमाने की क़वायद के तहत श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का सिलसिला लगातार तेज़ हो रहा है.”
पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राहुल सिन्हा कहते हैं, "अमित शाह का बयान हक़ीक़त पर आधारित है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने न सिर्फ़ बंगाल बल्कि पंजाब और कश्मीर को भी बचाने में अहम भूमिका निभाई थी. अगर वे नहीं होते तो आज ममता बनर्जी भी बांग्लादेश की नागरिक होती और मैं भी."
वे कहते हैं कि बंगाल को बचाने में मुखर्जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने बंगाल को बचाने के लिए तमाम बुद्धिजीवियों को एकजुट कर आवाज़ उठाई थी. वे देश की आज़ादी के बाद अपने प्राणों की आहुति देने वाले पहले शहीद थे.
उत्तर बंगाल के एक कॉलेज में इतिहास के लेक्चरर (अब सेवानिवृत्त) रहे गौर कांति मंडल कहते हैं, "बंगाल को बचाने में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका अहम थी. लेकिन आज़ादी के बाद राज्य में हुक्मरानों ने उनके योगदान को वैसी मान्यता नहीं दी थी जैसी मिलनी चाहिए थी. अब उनके योगदान का सही मूल्यांकन हो रहा है. बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचाने में डॉ. मुखर्जी का योगदान अमूल्य था."
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