भारत-पाकिस्तान का बंटवाराः कैसे विमानों ने निभाई थी अहम भूमिका

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और पाकिस्तान के रक्तरंजित बंटवारे पर 1974 में लिखे गए उपन्यास तमस (अंधेरा) में लेखक भीष्म साहनी ने एक हिंसाग्रस्त गांव का विस्तृत ब्यौरा दिया है. एक विमान इस गांव के ऊपर से तीन चक्कर लगाता है.
“लोग बाहर निकले हैं. ऐसा लग रहा है लड़ाई रुक गई है और शवों को ठिकाने लगाया जा रहा है. लोग वापस अपने घरों को चले गए हैं और कपड़ों और हथियारों को हुए नुक़सान का अंदाज़ा लगा रहे हैं.”
भीष्म साहनी ने उपमहाद्वीप को दो स्वतंत्र राष्ट्रों भारत और पाकिस्तान में बांट देने वाले विभाजन के साथ हुए नरसंहार का एक काल्पनिक विवरण लिखा है. इस दौरान धार्मिक हिंसा भड़क उठी थी. लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोग विस्थापित हुए थे और क़रीब दस लाख लोग मारे गए थे.
भारत के इतिहासकार आशिक़ अहमद इक़बाल कहते हैं कि जहां विमानों का विवरण है वहां कल्पना वास्तविकता का प्रतिबिंब रही होगी.
इक़बाल कहते हैं, "विमान की मौजूदगी मात्र से ही एक तरह से रक्षात्मक प्रभाव रहा होगा, इससे भीड़ तितर बितर हुई और इससे गांव वालों को अपना बचाव करने का समय मिल गया."
अपनी किताब द एयरोप्लेन एंड द मेकिंग ऑफ़ इंडिया में इक़बाल लिखते हैं, “ब्रितानी साम्राज्य के भारत और पाकिस्तान में बंटवारे के दौरान विमानों ने छोटा लेकिन अहम किरदार अदा किया.”
भारत और पाकिस्तान के बीच विस्थापित होने वाले लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोगों में से अधिकतर ट्रेनों, वाहनों, बैलगाड़ियों या फिर पैदल ही गए थे. इक़बाल कहते हैं कि इनमें से लगभग पचास हज़ार यानी एक प्रतिशत से भी कम लोगों को भारत और पाकिस्तान से विमानों के ज़रिये निकाला गया था.
सितंबर से नवंबर 1947 के बीच, यानी लगभग तीन महीनों में आबादी की अदला-बदली पूरी हो गई थी.

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'नहरों में बह रही लाशें देख सकते थे'
इक़बाल लिखते हैं कि ब्रितानी भारत और फिर आगे चलकर भारत अधिराज्य की वायु सेना- द रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स (आरआईएएफ़) ने बंटवारे के दौरान अव्यवस्था को शांत करने और विभाजन की वजह से शरणार्थी बने लोगों को निकालने में अहम भूमिका निभाई थी.
हर सुबह, वायुसेना के विमान महत्वपूर्ण टोही अभियानों पर निकलते थे और रेलवे ट्रैक के ऊपर उड़ान भरते थे ताकि शरणार्थियों से भरी ट्रेनों की भीड़ के हमलों से सुरक्षा की जा सके और ट्रैक से हुई संभावित छेड़छाड़ का पता लगाया जा सके. ये विमान हथियारबंद भीड़ की निगरानी भी करते और वायरलैस रेडियो के ज़रिये ट्रेन से संवाद बनाये रखते.
सितंबर 1947 में पंजाब के ऊपर उड़ान भर रहे एक विमान ने एक हैरान कर देने वाले दृश्य का विवरण दिया. इक़बाल याद करते हैं- क़रीब तीस हज़ार शरणार्थी 40 किलोमीटर लंबे काफ़िले में पैदल ही सरहद की तरफ़ बढ़ रहे थे. इन विमानों ने थके हुए शरणार्थियों पर हमला करने के लिए घात लगाकर बैठी भीड़ को देख लिया और इसकी जानकारी सेना के गश्ती दलों को दी. विमानों ने जला दिए गए गांवों से धुआं उठने का ब्यौरा भी दर्ज किया.
इक़बाल लिखते हैं, “आप नीची उड़ान भरते हुए पंजाब की नहरों में बह रही लाशों को देख सकते थे.”
लेकिन विमानों की भूमिका यहीं तक सीमित नहीं थी. आरआईएएफ़ के भरोसेमंद विमान डैकोटा ने दिल्ली से कराची तक कोलेरा की दवा की 15 लाख डोज़ पहुंचाई. कराची के गंदगी भरे शरणार्थी शिविरों में महामारी फैलने का ख़तरा पैदा हो गया था. विमानों से शरणार्थियों के लिए पका हुआ खाना, चीनी और तेल भी गिराया जाता था.
इक़बाल लिखते हैं- भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में विमानों के ज़रिये पर्चे गिराकर दंगाइयों को हिंसा रोकने की चेतावनियां दी जा रहीं थीं.
आरआईएएफ़ ने पाकिस्तान के दूरस्थ इलाक़ों जैसे मुल्तान, बन्नू और पेशावर में फंसे गैर-मुसलमानों को निकालकर सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाया.
अगस्त 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान ने क़ब्ज़ा कर लिया तो लाखों लोगों ने देश छोड़कर भागने की कोशिश की और एयरपोर्ट पर लोग विमानों के टायरों तक से लटकते हुए नज़र आए. 1947 में दिल्ली और पंजाब की हवाई पट्टियों पर भी ‘हताशा और किसी भी क़ीमत पर जान बचाने की जद्दोजहद’ के ऐसे ही दृश्य थे.

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विमान में बैठने के लिए रिश्वत
इक़बाल लिखते हैं, “हवाई पट्टियों के नज़दीक कैंपों में रह रहे शरणार्थियों को जैसे ही इजाज़त मिलती वो विमानों की तरफ़ दौड़ लगा देते. खतरे से निकलकर बाहर भागने के लिए बेचैन यात्री विमान पर सवार होने के लिए चालक दल को सोना और पैसा देकर रिश्वत देते थे.”
टिकट महंगे थे. यात्रियों को बहुत कम सामान ले जाने की अनुमति थी. हैदराबाद से पाकिस्तान गई एक महिला यात्री का विवरण है कि वो सिर्फ़ अपना क़ुरान ही साथ ले जा पायीं. अन्य यात्री ‘बच्चे की बेंत की कुर्सी’ और ‘बीमार सा दिखने वाला तोता’ लेकर जा रहे थे.
इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि विमान ठूंस-ठूंस कर भरे गए थे. सीटों और कालीनों को हटा दिया गया था ताक़ि अधिक से अधिक लोगों को भरा जा सके. डैकोटा डीसी-3 विमानों की क्षमता 21 यात्रियों की थी लेकिन ये अकसर पांच गुणा तक अधिक लोगों के साथ उड़ान भरते थे.
एक निजी एयरलाइन के टेक्नीशियन को पायलट ने मुक्के में पहनने के लिए पंच दिए थे ताकि वो भीड़ को नियंत्रित कर सके.
इक़बाल लिखते हैं, “वो अंडरकैरिज (विमान का निचला हिस्सा) की पिन लेकर दरवाज़े तक मुक्के मारते हुए आगे बढ़ता और फिर विमान के दरवाज़ें को मज़बूती से बंद करने से पहले वो विमान में भी मुक्के मारता हुआ दाख़िल होता. फिर इंजन की गड़गड़ाहट के साथ विमान से चिपकी भीड़ अपने आप ही अलग हो जाती.”
विमान में भारी भीड़, क्षमता से अधिक इस्तेमाल और एयरपोर्ट पर कमज़ोर सुरक्षा के बावजूद कोई हादसा नहीं हुआ था, ये अपने आप में उल्लेखनीय बात है.

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दूसरे विश्व युद्ध में छूट गए विमानों का इस्तेमाल
इक़बाल लिखते हैं, “कमज़ोर सुरक्षा की वजह से अकसर विमान के पट्टी पर उतरने से पहले ही शरणार्थियों की भीड़ लग जाती. लेकिन प्रशासन दूसरे देश के विमानों के चालक दल के साथ बहुत दोस्ताना नहीं था और इसी वजह से कोई मदद नहीं मिल पाती थी.”
1947 में भारत में 115 नागरिक विमान थे जिनका संचालन 11 निजी कंपनियां कर रहीं थीं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद नागरिक विमानन में बेहद तेज़ी से वृद्धि हुई थी क्योंकि भारतीय कंपनियां सस्ते विमान ख़रीद रहीं थीं- इनमें से अधिकतर डगलस डीसी-3 डैकोटा थे, जिन्हें अमेरिका वायुसेना पीछे छोड़ गई थी. लेकिन आपूर्ति की भरमार थी और मांग इतनी ज़्यादा नहीं थी, ऐसे में मुनाफ़ा कम हो गया था. बंटवारे के दौरान, तय उड़ाने नहीं भर रहे नागरिक विमानों को पाकिस्तान से शरणार्थियों को भारत लाने-ले जाने में लगा दिया गया था. इनमें से दस विमानों को सरकार के लिए उपलब्ध करवा दिया गया था.
लेकिन नागरिक विमानों का संचालन कर रहे ऑपरेटर बड़े पैमाने पर चल रहे निकासी अभियान का सामना करने में सक्षम नहीं थे.
इस असंभव काम के लिए वो अपने विमानों और चालक दल की जान ख़तरे में डालने से भी इनकार कर रहे थे. आख़िरकार विदेश से मदद मांगी गई.
ब्रिटिश ओवरसीज़ एयरवेज़ कॉर्पोरेशन के 21 विमानों ने दिल्ली से कराची तक 6300 लोगों को पहुंचाने के लिए 15 दिनों तक दिन रात उड़ानें भरीं. दिल्ली के हवाई अड्डों पर फंसे मुसलमान शरणार्थियों की मदद के लिए ये विमान खाद्य सामग्री, टेंट और दवाइयां लेकर भी पहुंचे.

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ब्रिटेन से भारत आये कर्मचारी
रॉयल एयरफ़ोर्स के दो विमान जिन्हें ब्रितानी नागरिकों को बाहर निकालने के लिए तैनात किया गया था का इस्तेमाल भारत और पाकिस्तान के बीच 12 हज़ार लोगों को लाने-ले जाने के लिए किया गया था.
इक़बाल लिखते हैं, इनमें से सिर्फ़ 2790 ब्रितानी कर्मचारी थे, बाक़ी रेलवे, डाक और टेलीग्राफ़ विभाग के कर्मचारी थे जिन्हें आबादी की अदला बदली में अहम भूमिका निभानी थी.
अक्तूबर 1947 में भारत को अहसास हुआ कि ये प्रयास भी काफ़ी नहीं है. फिर ऑपरेशन इंडिया लांच हुआ. अक्तूबर और नवंबर के बीच 21 विमानों ने- जिनमें अधिकतर डैकोटा थे, जिन्हें 8 ब्रितानी कंपनियों से ठेके पर लिया गया था, भारत और पाकिस्तान के बीच क़रीब 35 हज़ार लोगों की अदला-बदली की और भारी मात्रा में सामान इधर-उधर पहुंचाया. इस अभियान के लिए 170 कर्मचारियों को ब्रिटेन से भारत लाया गया था.
बचाव अभियान इतना बड़ा था कि भारत की विमानन कंपनियां नाकाफ़ी साबित हो रहीं थीं, ऐसे में दोनों ही सरकारों को ब्रितानी कंपनियों से चार्टर किए गए विमानों पर निर्भर होना पड़ा.
इक़बाल कहते हैं, “विमानों के इस्तेमाल ने आज़ादी के बाद के पहले महत्वपूर्ण महीनों में स्वतंत्र भारत के तेज़ी से निर्माण में मदद की.”
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