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गुरुवार, 13 मई, 2004 को 18:08 GMT तक के समाचार
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तेरह मई की तेरहवीं
बिंदास बाबू
(13 के अंक पर बिंदास बाबू की टिप्पणी)

तेरह मई के अंक का डंक लगा है. भाजपा तड़प रही है. हाय ऐसा तो किसी ज्योतिषी ने भी नहीं कहा था.

अब तक भाजपा के लोग, 13 के अंक को शुभ लाभ देने वाला मानते थे. ज्योतिषी और अटलजी के हिमायती मानकर चलते थे कि 13 ही उनकी तक़दीर है.

13 दिन सरकार चली फिर 13 महीने सरकार चली, 13 के दिन ही सारे बड़े एक्शन किए. तेरहवीं लोकसभा में अटलजी की सरकार बनी, चुनाव आयोग ने भी जाने अनजाने 13 मई की तिथि का छेता रच दिया कि यही शुभ दिन है, इसी दिन रिज़ल्ट आएँगे.

आयोग ने भाजपा के 13 को शायद यही स्पेशल डेट डिस्काउंट दिया होगा.

लेकिन हाय 13 के अंक ने राजा को रंक बना डाला. हार नहीं मानूंगा, राड़ नई ठानूँगा वाले कविराज 13 के अंक से हार गए. अपनी तक़दीर से हार गए.

काल के कपाल पर लिखने मिटाने वाले के कपाल पर 13 मई के काल ने कितनी निर्ममता से 'तीन-तेरह' लिख डाला.

तीन बार से ज़्यादा पीएम बनने का सपना, 13 ने ही ध्वस्त कर डाला. हाय 13 के अंक तेरा बुरा हो.

13 मई पहली बार अशुभ हुआ. इसके कारणों की खोज संघ वालों को करनी चाहिए.

पश्चिमी परंपरा में 13 का अंक डंक से कम नहीं माना जाता. 13 नंबर का वहाँ मकान नहीं होता, 13 नंबर की मंज़िल नहीं होती. वे मानते हैं कि 13 शैतानी अंक है. शायद शैतान का बर्थडे हो. इस दिन जो पैदा होता है उसकी डेट इधर उधर कर दी जाती है.

डायरी के पन्ने

लेकिन पश्चिमी परंपरा वाले भी क्या करें, हर महीने 13 तारीख़ आती ही है. काल चक्र की बात है. गिनती से 13 को निकाल नहीं सकते सो वो इसे भूले रहते हैं.

पता नहीं किस मुए ने किस मुहूरत में अटलजी के लिए 13 के अंक को शुभ बता डाला, सरल मना अटलजी भी खुश हुए, काल के कपाल पर 13, 13, 13 लिखते रहे, भाजपा एनडीए की यूनाइटेड कलर ऑफ़ तेरहवीं करा बैठे.

भारतीय परंपरा की पाँच हज़ार साल पुरानी संघीय हिंदुत्ववादी परंपरा में 13 के अंक को लेकर कुछ अवसरवादी रवैया अपनाया गया. थोड़ा ठीक से सोचते तो समझ जाते कि 13 के अंक को शुभ समझना, पश्चिमी संस्कृति की लाइन है. भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ षडयंत्र है. इससे बचना चाहिए.

अगर बचे होते, 14 या 12 मई को रिज़ल्ट आते तो गद्दी सुरक्षित रहती. लेकिन कहा ही है, जो विधना ने लिख दियो छठी रात को अंक राई घटै ना तिल बढ़ै, रह रे जीव निशंक भाग्य में तीन तेरह होना लिखा था, हो गया.

13 के अंक को तेरहवीं से जोड़कर देखें तो हिंदू परंपरा में इसे भटकती आत्मा की मुक्ति का दिन माना जाता है. सच्चाई क्या है पता नहीं लेकिन ऐसा माना जाता है कि मरने वालों की आत्मा नक़द 13 दिन तक यत्र-तत्र सर्वत्र भटकती रहती है.

तेरहवीं को 13 ब्राह्मण जिमाने के बाद ही अटकती भटकती आत्मा किसी दूसरी योनि में जाने को अलाउड होती है.

इस तर्क से तो हम यही कह सकते हैं कि भाजपा एनडीए की स्वर्गीय सत्ता की आत्मा 13 मई की आकस्मिक तेरहवीं के दिन मुक्ति पाकर किसी नई योनि में जन्म लेने के लिए प्रवेश कर रही होगी.

वह हिंदुत्ववाद, संघवाद, नीरोवाद, महाजनी सभ्यता इत्यादि अनेक फ़ैडली योनियों में भटकते हुए क्या रुप धरेगी यह तो अब नौ महीने बाद ही ज्ञात होगा.

तब तक के लिए इंतज़ार कीजिए.

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