| पुराण पुरुष कह रहे, मैं हूँ ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) बीबीसी के प्यारे पाठकों, ये रामभरोसे सुबह-सुबह हमारा भेजा खाए जा रहा है, बार-बार पूछ रहा है, ‘अच्छा बताइए, वाजपेयी जी के बाद कौन?’ हम बार-बार कह रहे हैं, ‘ये बड़ा मनहुस सवाल है रामभरोसे. ऐसे जोखिम भरे सवाल जब-जब पूछे गए हैं, देश पर संकट आया है. कभी नेहरू के बाद कौन पूछा गया था उसके बाद आज तक सारे लोग रो रहे हैं. सो ऐसे मर्मभेदी सवाल न पूछो भइया.’ ‘कैसे न पूछें, देश का ही तो सवाल है. उस दिन तो अपने विकास पुरुष ने ‘क्लियर’ कर किया था कि वे बीच में छोड़कर नहीं जाने वाले. पार्टी के भीतर तय हो चुका है. लौह पुरुष ने भी कह दिया था कि हम वाजपेयी के, वाजपेयी जी हमारे.’ ‘लेकिन ये मुरली बाबू की तान देखो, मुरली ने खटराग छेड़ दिया है कि उत्तराधिकारी का मामला ऐसे कैसे तय होगा. वो तो गा रहे हैं, मैं हूँ न, मैं हूँ न.’
‘देखिए रामभरोसे लाल जी, समकालीन भारतीय संस्कृति में तीन कोटि के पुरुष कहे गए हैं. उत्तम, मध्यम और उधम पुरुष या कह लीजिए विकासपुरुष, लौहपुरुष और पुराणपुरुष. ‘पुराणपुरुष? ये कौन सा पुरुष हुआ?’ रामभरोसे एकदम से चौंक गए. ‘पुराणपुरुष वह होता है जो हमेशा पुराणों में रहता है. वेदों में रहता है. श्रुतियों और स्मृतियों में रहता है. असली पुरुष तो यही होता है.’ ‘विकास पुरुष तो ‘फ़िफ्टी-फ़िफ्टी’ लगता है. कभी विकास में रहता है, कभी ह्रास में गिर जाता है. लौह पुरुष की धातु अमंगलकारी कही गई है. एक लौह पुरुष पहले भी हो गए हैं. वे पीएम बनते-बनते रह गए, पीएम ने उन्हें पीएम ही नहीं बनने दिया. पुराने विकास पुरुष ने पुराने लौहपुरुष को लोहे की तरह ही घर के बाहर ही रख छोड़ा था. लोहे को तो ऐसे भी सनीचरी धातु माना जाता है. लोहे का कोई ‘फ्यूचर’ नहीं है इस प्लास्टिक के युग में.’ ‘सो बचे अपने पुराणपुरुष. नित्य-प्रति चंदन-रोली-तिलक लगाए , अंग वस्त्र धारण करके जो पवित्र यज्ञ और ज्योंतिष आदि पाठ्यक्रमों को अखिल भारतीय बनाए हैं, वही और सिर्फ वही हो सकते हैं पुराणपुरुष. वही कह सकते हैं, अरे ‘मैं हूं ना’, मेरे बिना उत्तराधिकारी कैसे तय कर लोगे?’ ‘सर्वधर्म परित्यज्यमामेकं शरणम व्रज, अहम त्वाम सर्वे पापेभ्यो मोक्षेष्यामि माशचः’ ‘ये कृष्ण ने गीता में ऐसे थोड़े ही कह दिया था.’ ‘लेकिन यह तो परंपरा के विपरीत होगा बिंदास जी. राम को दशरथ ने अपना उत्तराधिकारी कहा भर था कि छोटे भइया भरत ने 14 बरस तक उनके सैंडिल को ही उत्तराधिकारी समझा. ये तो नहीं कहा, 'मैं हूँ न, मैं हूँ न.’ ‘अरे तब शाहरुख़ खान की ये फ़िल्म कहाँ रिलीज़ हुई थी यार. तब कौन गाने वाला था, मैं हूँ न, नो इंस्पिरेशन. यू नो.’ ‘लेकिन मैं फिर भी कहूँगा, ये सवाल ख़तरनाक है कि कोई पूछे कि इनके या बिनके बिना कौन. देखिए भविष्य सोच कर ही वर्तमान बनाया जाता है.’ रामभरोसे फिर बोले. ‘जी हाँ, बनाइए वर्तमान, अब तक तो आप ग़ैर-भाजपाई इलाके के पाँच-पाँच अत्तराधिकारियों से ही निपट रहे थे, अब भाजपा में भी एक, दो, तीन, चार, पाँच वाला गीत गा रहे हैं.’ ‘भले पुराण पुरुष हैं आप, यहाँ भी अस्थिरता का तड़का लगा दिया.’ ‘देखिए रामभरोसे जी, आप अपने पुराणपुरुष के बारे में ज़्यादा न बोलिए. पाँच साल से नंबर तीन पर डाला हुआ है उनको. तब आप चुप रहे, इतिहास उन्होंने बदला. भूगोल वे बदलते चलते हैं, विज्ञान-प्रबंधन सब वे बदलते हैं. बदल चुके हैं, बदल देंगे, बताइए, जिसने इतिहास बदल दिया हो, वो इतिहास के बाहर कैसे रह सकता है.’ ‘लौह पुरुष ने क्या किया, अरे मजे-मजे में टोयटा में बैठे-बैठे रथयात्रा करते रहे और मंदिर-मंदिर जपते रहे. अरे बनाया कुछ. इधर अयोध्या के चक्कर में पुराणपुरुष इस्तीफा दे दिए लेकिन लौह पुरुष चिपके रहे कुरसी से.’ ‘कितना नैतिक साहस रहा हमारे पुराणपुरुष में. और ज़रा उनका रूप-सुरूप भी तो देखिए. लौह पुरुष में कृष्ण भी लाल रंग का है. लाल कम्यूनिस्टों का रंग होता है, ध्यान रखना. पुराणपुरुष का तो नाम ही मुरली मनोहर है. वे कृष्ण के लाल रंग को एडिट करके ही दम लेंगे. कम्यूनिस्टों का रंग है न.’ ‘जानते नहीं, कविवर बिहारी लाल ने उन्हें ही देख कर ये दोहा लिखा है- ‘तो क्या बिंदास जी, अपने बिहारी लाल भी क्या अपने पुराणपुरुष के ‘फ़ेवर’ में हैं.’ ‘अरे क्या पता रामभरोसे.’ |
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