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बाल-बाल ही क्यों बचते हो जी... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिदास बाबू की डायरी) बीबीसी के श्रोताओं, आप सब को हमारा नमस्कार. इस बार हमारा रामभरोसे थोड़ा पगलाय गया है. उल्टा हम पर सवारी गाँठ रहा है, ज़रा आप भी देखिए. पूछता है, “ऐ बिंदास बाबू,ये बतलाइए, ये सारे के सारे नेता बाल-बाल ही क्यों बचते हैं” हमने कहा, “ये तो वो ही बता सकते हैं या फिर उनके बाल बता सकते हैं. हम तो कभी बाल-बाल भी नहीं बचे.जब भी बचे हैं,पूरे बचे हैं.भइया उन्हीं से जाकर पूछो.” रामभरोसे भी ज़िद का पक्का ठहरा,अभी-अभी एक बाल-बाल बचे नेता जी से पूछ बैठा. “हे नेताजी, तुम किस तरह बाल-बाल बचे और क्यों हमेशा ही बाल-बाल बच जाते हो. तुम्हारे सिर पर तो बाल भी नहीं हैं.”
अपने चमचमाते हुए खलुहाट सिर पर हाथ फेरते हुए वो बोले, “देखो रामभरोसे, तुम मुहावरा नहीं समझते. हम मुहावरे में बचते हैं.” “बाल-बाल बचना और बार-बार बचना ज़रूरी होता है. चुनाव के दिनों में हर कैंडीडेट को ऐसे ही बचना होता है. बचने का यही बढ़िया स्टाइल है.” “तो आप दूर से क्यों नहीं बचते जी, हमेशा बाल-बाल ही क्यों बचते हो जी. मान लो तुम बाल-बाल नहीं बचते तो क्या खाल-खाल बचते.” “यार बात यह है कि खाल-खाल तो हम हमेशा ही बचते रहते हैं, बाल-बाल चुनाव में बचते हैं. बाल-बाल बचने की राजनीति है.” “सिंपैथी वेव लानी होती है, ख़बर बनानी होती है, बचना भी होता है सो बाल-बाल बचना ठीक रहता है. हम सब जब भी बचते हैं, बाल-बाल बचते हैं.” “बचेंगे तो बनेंगे न, और हम क्या,ये मुल्क पूरा बचा हुआ है. बाल-बाल ही बचा हुआ है, जनतंत्र तक हमसे बाल-बाल ही बचा हुआ है.” “जब कोई बाल-बाल बचता है तो समझो बच ज़रूर गया है और अगली बार फिर मज़े से बाल-बाल ही बचेगा.” नेताजी बोले. रामभरोसे ने सिर के बाल खुजाए और हमारी तरफ देखने लगा. बोले, “बिंदास बाबू, डायरी तो लिख रहे हो, ज़रा बाल-बाल बच-बचा के लिखना.” हमने कहा, “भइया- तुम डाल-डाल, और हम पात-पात.” |
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