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बोफ़ोर्स तोप से एक इंटरव्यू... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) बीबीसी के प्यारे दुलारे न्यारे श्रोताओं, इस इलैक्शन में भी देखिए, बोफ़ोर्स तोप चल ही गई. इसी अवसर पर पेश है - एक्सक्लूसिव इंटरव्यू विद बोफ़ोर्स तोप. हमने पूछा, ‘हे बोफ़ोर्स तोप, तू क्या है? तू कौन है, तू कब से मौन है’ ‘मैं एक तोप हूँ, चुनाव की रोप हूँ, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, जब चाहे घुमा लो.’ 'स्कूट एंड शूट, नो छूट, यों सर्वदा मौन, मगर सवाल पूछने वाले, तुम कौन?’ ‘ तू हर पाँच साल में चल जाती है, चुनाव के दिनों में चल जाती है, लेकिन इन्हीं दिनों में क्यों चलती है.’ हमने पूछा. ‘ ये तो चलाने वाले जानें भइया, हम तो बस चल जाते हैं. चलाने वालों से पूछो बिंदास बाबू.’ प्यारी दुल्हनियाँ तोप ने कहा. ‘ तू अपनों पे ही क्यों चलती है ?’ ‘ अरे, इस जगत में कौन अपना, कौन पराया?’ तोप ने दार्शनिक अंदाज़ में हमसे प्रति-प्रश्न कर डाला.
‘ राजीव भइया ने ख़रीदा, उन्हीं पर चल गई, तुझे शरम नहीं आई?’ हमने खीझ कर कहा. ‘ राजीव भइया की याद मत दिलाओ भइया, हमने लाख कहा, अपने दुश्मनों पर चला दो जी, अभी इसी वक्त चला दो. लेकिन वो झिझक गए, गांधीवादी थे न. नहीं चलाई. हम क्या करते. बाद में राजाजी ने उन्हीं पर चला दी. हम भी चल गए. हम क्या करते, नो ऑप्शन.’ ‘मगर तुझे खरीदा तो उन्होंने ही था, कुछ तो अहसान मानती. ’ ‘अब क्या बताएं तुम्हें मिस्टर बिंदास! राजीव भैया को बचपन से नई-नई चीज़ों का शौक था. कांग्रेस की तरह खरीदते रहते थे. इस्तेमाल नहीं करते थे. कांग्रेस की तरह, हमारा क्या क़सूर.’ 'अच्छा बता, तू कारगिल में किसके कहने पर चल गई?’ 'फ़र्नांडिस भइया के कहने पर चल गई, और क्या.' तो कारगिल में ही रहती, दिल्ली से अमेठी तक क्यों गोला दागती है, राहुल बेटवा को तो बख्श. उसका क्या कसूर है? ‘अरे हमारा भी क्या कसूर है भइया ? वो इधर नली मोड़ दिए, हम उधर मुड़ गए. हमें तो चलना होता है, ड्यूटी इज़ ड्यूटी. ‘ तो क्या राहुल के बाल बच्चों तक पर चलेगी ? हमने पूछा. 'अरे राम-राम, कैसी बातें करते हो बिंदास बाबू!' ये जो नए बच्चे हैं जेनरेशन नेक्स्ट मार्का. ये तो खुद अपने-आप में तोप हैं, हमी पर चल जाएंगे. इतना कहते ही बोफोर्स तोप ग़ायब हो गई. देर रात तक की ख़बर थी कि वह भाजपा कार्यालय के पास खड़ी थी. |
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