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मंगलवार, 20 अप्रैल, 2004 को 16:59 GMT तक के समाचार
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उत्तराधिकारी की खोज में निकला रामभरोसे
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

बीबीसी के श्रोताओं, सुबह से रामभरोसे एकदम शरलक होम्स बना हुआ है, आँख के आगे मैगनीफ़ाइंग ग्लास लगाकर कुछ खोजता फिर रहा है.

कभी सिर खुजाता, कभी बड़बड़ाता, अपने-आप से बोलता जाता था, ‘‘अबे मिल जा, अबे मिल जा, मिल जा, मिल गया तो लड्डू खिलाऊँगा, सवा रूपये का प्रसाद चढ़ाऊँगा.’’

हमें लगा कि कुछ ऊपर की हवा का चक्कर है. कोई बुरी आत्मा रामभरोसे पर चढ़ गई है. पागल सा हो गया है, जल्दी ही आगरा या राँची ले जाना पड़ेगा.

हमने टोका, ‘‘भइया रामभरोसे, ये साढ़े चार घंटे से इस कूड़ेदान में क्या ढूँढ रहे हो.’’

डायरी के पन्ने

‘‘उत्तराधिकारी ढूँढ रहा हूँ, और क्या.’’ रामभरोसे बोले.

‘‘किसका उत्तराधिकारी ढूँढ रहे हो रामभरोसे और क्या वो इस कूड़ेदान में मिलेगा.’’ हमने पूछा.

‘‘अटल जी का उत्तराधिकारी ढूँढ रहा हूँ और क्या .’’ रामभरोसे झल्लाया.

‘‘इसमें झल्लाने की क्या बात है, यार वो अपने महारथी ही तो उत्तराधिकारी हैं.’’

‘‘लेकिन वो तो लक्ष्मण भइया हैं, भगवान राम के वनगमन के बाद वो तो संघ चले गए थे, तब भी उत्तराधिकारी का प्रश्न आया था, भरत ने सँभाला था सारा मामला.’’ रामभरोसे रामायण में चला गया.

‘‘लेकिन भरत जी कहाँ उत्तराधिकारी बने थे,’’ हमने रामभरोसे को उलझाने की कोशिश की.

‘‘भइया बिंदास, ये क्या उलटी बात कह रहे हो, भरत ने राजगद्दी नहीं संभाली थी तो क्या आपने संभाली थी.’’ रामभरोसे गुस्सा खा गया.

‘‘रामभरोसे याद करो, भरत ने राम के खड़ाऊँ की पूजा की थी. तो खंड़ाऊँ ही उत्तराधिकारी हुए न.’’

‘‘पाँच हजार साल पुरानी परंपरा यही कहती है कि जब उत्तराधिकारी डिक्लेयर न किया जाए तो खड़ाऊँ ही उत्तराधिकारी होते हैं.’’

‘‘तो भइया अटल जी के उत्तराधिकारी अटल जी के खंड़ाऊँ ही हुए न.’’

‘‘पाँच हजार साल पुरानी परंपरा यही कहती है कि जब उत्तराधिकारी डिक्लेयर न किया जाए तो खड़ाऊँ ही उत्तराधिकारी होते हैं.’’

‘‘तो भइया अटल जी के उत्तराधिकारी अटल जी के खंड़ाऊँ ही हुए न.’’

‘‘लेकिन बिंदास ब्रदर, क्या कहते हो, अगर ऐसा है, तो मामला सीरियस है.’’ रामभरोसे हमारे कान में फुसफुसाकर बोला.

‘‘क्यों?’’ हमने पूछा.

‘‘यार अपने अटल जी लकड़ी के खड़ाऊँ-वड़ाऊँ तो पहनते नहीं. ये डिजाइनर-फ़िजाइनर का ज़माना है. मान लो उनके नए खड़ाऊँ गुक्की-फुक्की के हुए तो.’’

‘‘तो,’’ हमने पूछा.

‘‘यार फिर वही इटली का चक्कर हुआ न. अपने अटल जी भी ख़ूब पहेली बुझाते हैं. एकदम रहस्यवादी भाषा में बात करते हैं. देखो तो, मामला फिर इटली तक पहुँचा दिया.’’
‘‘अरे भइया, जानते नहीं हो, अटल जी कवि हैं. छायावादी-रहस्यवादी किस्म के कवि हैं.’’ हमने टीप लगाई.

इस तरह रामभरोसे को भरोसा हुआ कि उत्तराधिकारी का मामला अभी तक उन्हीं के हाथ में हैं.

तो हे श्रोताओं,

आप भी उत्तराधिकारी का अर्थ ढूँढते फिरो और हमें नमस्कार करने की इजाज़त दो.

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