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कौन होगा भविष्य का पीएम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) बीबीसी के प्यारे श्रोताओं, आप सब को नमस्कार आज अपने रामभरोसे बड़े ऐग्रेसिव हो रहे हैं. बार-बार पूछ रहे हैं, ‘ऐ बिंदास जी, ज़रा बताइए तो, भविष्य का पीएम कौन होगा. ज़रा बताइए.’ ‘कोई भी बन सकता है यार, तुम भी बन सकते हो,’ हमने कहा. ‘देखिए मज़ाक नहीं करिए, देश के भविष्य का सवाल है, आप को जवाब देना ही होगा.’ ‘देखिए लालू ने दावा किया है कि हम भी पीएम बन सकता हूँ, शरद पवार ने भी ख़ाम ठोंक दिए हैं कि मैं भी पीएम कैंडीडेट हूँ, उधर मुलायम भइया भी कह रहे हैं कि वो तय करेंगे, मायावती बहन भी कह रही हैं कि वे तय करेंगी यानी वे ही होंगी, सोनिया जी ने कहा तो नहीं है लेकिन कांग्रेस का क्या भरोसा. उधर नेता जी ने कहा है कि तीसरे मोर्चे का पीएम तो तीसरा आदमी ही होना चाहिए.’ ‘जिस चौके में इतने रसोइए हों, वहाँ तो खिचड़ी भी न पके भइया.’ रामभरोसे के स्वर में उलाहना था.
‘देखो भाई, ये जनतंत्र है, एक अरब, पाँच-दस करोड़ की आबादी वाला, 50-60 करोड़ मतदाता हैं, अरे उनमें से कोई भी बन सकता है. ये भाजपा वाले एक पीएम को लिए फिरते हैं, अरे यहाँ दर्जनों हैं. कहो तो सैकड़ों में गिना दें, कमी है क्या.’ ‘थोक में पीएम हैं अपने पास, एक से एक योग्य, एक ईंट उठाओ तो पचास निकलते हैं. अरे कोई मामूली देश है, जो होता है अपने यहाँ, थोक में होता है.’ हमने प्रत्याक्रमण किया. ‘लेकिन आप के पाँच पीएम तो रिटायर्ड हैं, वे क्यों बोल रहे हैं.’ रामभरोसे ने उलटवार किया. ‘यार वो अपने अटल जी को अपने जैसा बनाने के चक्कर में हैं, अटल जी भी कभी कहते हैं न कि रिटायरमेंट का वक्त आ गया है, कभी कहते हैं, नहीं आया है. ऐसा कह-कह कर उनकी आशाओं को बढ़ाते रहते हैं.’ ‘उधर डीपीएम भी अपने नाम के आगे के डी को ड्रॉप करने को तुले हैं.’ ‘लेकिन यार रामभरोसे, भाजपा के पास तो एक ही डेढ़ पीएम है. एक अटल जी, आधे आडवाणी जी, तुम्हें क्या कहना है.’ ‘तो क्या, यहाँ एक तो है, दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद की हिफ़ाजत सिर्फ़ एक ही व्यक्ति कर सकता है. अनेक होंगे तो जूतों में दाल बँटेगी.’ ‘अब देखिए तो, चार दिन में चार पीएम निकल आए. ऐसे में बन गई नॉन एनडीए सरकार, अरे वही होगा जो पहले हुआ है, यानी जूतों में दाल बँटेगी.’ ‘क्या वीकली पीएम हुआ करेंगे?’ रामभरोसे ने पूछा. ‘इसमें हरज ही क्या है, सबको मौका मिलना चाहिए थोड़ा-थोड़ा.’ ‘लेकिन कौन कितने दिन में, इसका आधार भी तो कुछ होगा.’ रामभरोसे ने फिर पूछा. ‘अरे जिसके जितने एमपी हों, वह उतने ही दिन का पीएम हो सकता है. सीधा सा फार्मूला है.’ ‘लेकिन ये पीएम करेंगे क्या?’ उन्होंने पूछा. ‘देखिए नेताजी बने तो सारे देश को बलियाटिक बना डालेंगे. अपने इटावे वाले बने तो सारे देश को मैनपुरी बना डालेंगे. गौतमबुद्ध नगरिया वाली बहन जी बनीं तो देश का नाम गौतमबुद्ध प्रदेश कर देंगी. अपने विंध्याचल पार वाले बने तो सारे देश को चीनी फ्री में सप्लाई होगी और लालू जी बने तो तय मानो, देश का तुरंत ही बिहारीकरण हो जाएगा. ऐसी विविधता और कहाँ.’ ‘तब देश चलेगा कैसे भइया?’ ‘देश क्या पीएम चलाते हैं, अरे पीएम अपने आप को चला लें, सो ही बहुत है. पाँच हजार साल पुराना देश विदाउट पीएम ही चला आ रहा है. चलता रहेगा. देश को जनता चलाती रहती है, जैसा चाहे, वैसे चलाती है.’ ‘जिस तरह कंपनी में ऐक्ज़िक्यूटिव होते हैंगे, वैसे ही यहाँ भी पीएम की जगह भी ऐक्ज़िक्यूटिव होता है. कोई तीन महीने, कोई तीन दिन, कोई तीन साल. ज़्यादा टाइम टिकेगा, तो गड़बड़ करेगा.’ ‘लेकिन भइया बिंदास जी, अभी तो ऐक्ज़िट पोल ही आए हैं, रिज़ल्ट तो नहीं आ गए.’ ‘यार, सूत न कपास, जुलाहे में लट्ठमलट्ठा वाला मुहावरा अपना कल्चरल प्रतीक है. हमेशा होता है, पैठ लगती नहीं है कि जेबकट पहले से पहुँच जाते हैं. कोई 60 का, कोई 70 का, कोई 80 का और कोई 90 का.’ ‘बस पीएम बनने के लिए प्राण अटके हुए हैं इस शरीर में, सपने देखने की फ़ीस थोड़े ही लगती है.’ ‘लेकिन लटकन्त संसद तो ठीक नहीं, अस्थिरता होती है.’ रामभरोसे बोले. ‘देखो रामभरोसे, तत्व की बात समझ लो, ज़्यादा स्थिरता भी ठीक नहीं होती. ज़्यादा गारंटी ठीक नहीं होती, आदमी सुस्त और मस्त हो जाता है.’ ‘यह जगत चंचल है, संसार चंचल है, संसद भी चंचल रहे तो बुरा क्या है.’ |
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