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मंगलवार, 27 अप्रैल, 2004 को 11:57 GMT तक के समाचार
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धो-धो वोट लेने वाले योगी जी....
बिंदास बाबू
योगी जी वोट तो लेंगे लेकिन धोकर
बिंदास बाबू की डायरी

बीबीसी के प्यारे, दुलारे, न्यारे, उजियारे पाठकों,

इस महाचुनाव को कवर करने के चक्कर में एक रोज़ बिंदास बाबू की खड़खड़िया मारुति आठ सौ, सीधे गोरखपुर के घाट जा लगी.

वहाँ योगी महाराज के शुद्धीकरण का प्रोग्राम देख कर बिंदास बाबू गदगदायमान हो गए.

लेकिन हमेशा ही ऐसे कामों में फंसट डालने वाले रामभरोसे ने रात की प्रेसक्लबीय दारू पार्टी में पूछ ही डाला, "व्हाट इज़ डिस बिंदास बाबू, स्वामी जी के इस प्यूरीफ़िकेशन पर आप इतने इमोशनल क्यों हो रहे हैं. आप तो पत्रकार हैं न, तटस्थता आवश्यक है. माइंड इट."

"कैसे न हों इमोशनल रामभरोसे, देखते नही, स्वामी जी महाराज कैसे-कैसे दिग्वचन बोल रहे थे."

"मुसलमानों से वोट लूँगा लेकिन गंगाजल से धो-धो कर लूँगा. हिंदू तन होगा, हिंदू जन होगा. घर-घर भगवा लहरा दो, पूर्वांचल में रहना है तो योगी-योगी कहना है."

डायरी के पन्ने

"क्या फर्स्टक्लास पोएट्री है. जोगी जी भाजपा के हीरो हैं. गुजराती नीरो से ज़रा आगे का माल लगते हैं."

"लेकिन बिंदास भाई, इतने पर भी हमारे बुखारी भाई कहते हैं कि चुनाव में मुसलमान भाई भाजपा के हाथ मजबूत कर दें. पिछली बार तो बोले थे कि भाजपा को सबक सिखा देंगे. इस बार क्या हुआ." रामभरोसे ने टीप लगाई.

"इसमें कौन सी बड़ी बात है, बुख़ारी साहब ने सबक की बात की थी, गुजरात में सबक सिखा दिया. वही सीख लिया लगता है."

"न्यू डील है, बुख़ारी साहब ने गुड फ़ील किया है. गुड फ़ील की कील लगते ही आदमी इमोशनल हो जाता है, ये इमोशन से ज़रा प्रमोशन का ज़माना है, यही नया डिवोशन है, लेकिन इसमें 'कॉशन' भी रखना चाहिए."

"कॉशन, वो क्या?" रामभरोसे ने जिज्ञासा दिखाई.

"यही कि न्यू डील में स्वामी जी के धोने-सुखाने वाली लाइन नहीं है. लगता है, जो नहीं लिखा है, योगी महाराज उसी को बाँच रहे हैं. यहीं ग़लती कर रहे हैं." हमने कहा.

"ग़लती, वो कैसे, बिंदास बाबू, ज़रा धो-पोछ कर समझाइए."

"देखो रामभरोसे, धोने-सुखाने वाली लाइन तो पहले भी डील में नहीं थी. लेकिन गुजरात के नीरो नामक हीरो ने मुसलमानों को अच्छी तरह धोया-सुखाया."

"यह गुजरात फैक्टर है. अरे नहीं लिखा जाता है, नहीं कहा जाता है. सिर्फ़ किया जाता है, 'जस्ट डू इट' वाली बात होती है."

"तो अपने मियां बुखारी को ये मर्म क्यों नहीं समझ में आ रहा है."

"यार रामभरोसे, अकबर इलाहाबादी ने ऐसे लोगों के लिए बहुत पहले एक शेर कह रखा है." शेर है-

"जैसा मौसम हो, मुताबिक उसके मैं दीवाना हूँ.
मार्च में बुलबुल हूँ, जुलाई में परवाना हूँ."

और भइया, ये तो अभी अप्रैल-मई के दिन हैं,
"इब्तदा-ए-इश्क है, होता है क्या,
आगे-आगे देखिए, होता है क्या."

अच्छा भइया, ख़ुदा हाफ़िज़

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