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मंगलवार, 04 मई, 2004 को 12:15 GMT तक के समाचार
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बसंत या बस अंत...
बिंदास बाबू
बिंदास बाबू कह रहे हैं कि संसद भी संसार की चंचल हो तो हर्ज ही क्या है
(बिंदास बाबू की डायरी)

बीबीसी के सारे श्रोताओं को हमारा नमस्कार.

ये एक्ज़िट-एक्ज़िट क्या है, रामभरोसे ने पहला सवाल सुबह-सुबह कर दिया है.

ये जनता की लात है प्यारे, जो ज़्यादा बोलत है, वही खात है. हमने रामभरोसे को समझाया.

लेकिन जनता की लात पहले भारतीय जनता पर ही क्यों पड़ी, क्या जनता जानती नहीं कि ये लात उसी की है, उसी पर पड़ रही है. रामभरोसे ने दूसरा सवाल पूछा.

भारत की जनता बड़ी चतुर सुजान है प्यारे, जो ज़्यादा हवाबाजी करता है न, उसी की खटिया खड़ी कर देती है. यही असली भारतीय जनता की लात है, यही तो अपना प्रजातंत्र है.

डायरी के पन्ने

लेकिन अपने अटल जी तो किसी सपने की बात करते थे. जन-जन धड़कन की फड़कन से सड़क की बात करते थे. ‘भगवान के नाम, बस पाँच साल ही दे दो, 272 ही दे दो भइया.’ क्या ये जनता नहीं दे सकती थी उन्हें, भारतीय परंपरा रही है, अतिथि देवो भव.

प्यासे को पानी पिलाना, भूखे को रोटी देना, अरे क्या इतना भी नहीं दिया जाता इस बार.

रामभरोसे भाई, तुम बहुत भोले हो, ज़माना ग्लोबलाय गया है. ग्लोबलायमान जगत में सेंत में कुछ नहीं मिलता. जनता भी कुछ नहीं देती, जनता ‘वैल्यू फ़ॉर मनी’ माँगती है. जो कुछ जनता को दिया होगा, वही तो जनता ने लौटाया है. ज़्यादा इमोशनल होने की ज़रूरत नहीं है रामभरोसे.

लेकिन बिंदास बाबू, ओपीनियन पोल तो सपनन में सड़कन की धड़कन सुना रहे थे. स्वप्नजीवी जी को जिता रहे थे. तब क्या गड़बड़ हुई. इसका एनालिसिस ज़रूरी है.

देखो रामभरोसे, जब जनता आती है तो अच्छी बातें कहती है और जब बूथ से जाती है तो लात लगा के जाती है. ये वही ऐतिहासिक लात है जो जनता ने कभी सिंडीकेट को लगाई थी, कभी इंदिरा गाँधी को लगाई थी, कभी राजीव को लगाई थी, इस बार ज़रा जल्दी लगा दी है. दूसरे चरण में ही मार दी है.

जनता प्रचार के ट्रैफ़िक जाम में फंस गई होगी सो इस बार जल्दी ही मार दी, लेकिन इससे तो सेंसेक्स ही नीचे आ गया. सट्टा बाज़ार के होश गुम हो गए, इससे जनता को क्या मिला. रामभरोसे ने जिज्ञासा की.

देखो प्यारे रामभरोसे, गोस्वामी तुलसीदास बहुत पहले ही कह गए हैं-

करम प्रधान विश्व करि राखा,
जो जस करी, सो तस फल चाखा.

जैसी करनी, वैसी भरनी. जनता को जैसा मिला, वैसा ही तो लौटाएगी.

जनता को पाँच साल लात पे लात मिली होगी, अब बेटा थोक में जाते-जाते लौटा के जा रही होगी. जनता जब एक्ज़िट मारती है तो लात समेत एक्ज़िट मारती है.

लेकिन बिंदास जी, इतनी चमक थी, इतनी खनक थी, इतने वादे थे, इतने इरादे थे, ये लो एक मंदिर, ये लो दो करोड़ उर्दू शिक्षक, ये लो लम्बी और ठंडी सड़कें, इस जनता के लिए क्या नहीं किया, जो पचास साल में नहीं किया गया, वो पाँच साल में कर डाला. रथ पर रथ चला दिए, धरम ध्वजा लहरा दी.

देखो रामभरोसे, यूँ तो अपने प्यारे अटल जी कवि हृदय है लेकिन लगता है, उनका काव्य ज्ञान कुछ कमज़ोर-सा है. वरना वे चमक-दमक के चक्कर में नहीं पड़ते.

देखिए आप हमारे ‘हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा’ वाले कवि को इतना डाउनग्रेड नहीं कर सकते, रामभरोसे ग़ुस्सा खा गया.

भइया ग़ुस्सा मत खाओ, हिंदी के कवि ने बहुत पहले जनता का मूड भाँपते हुए लिखा था, चाँदनी चंदन सदृश हम क्यों लिखें, मुख हमें कमलों सरीखे क्यों दिखें, हम लिखेंगे चाँदनी उस रूपए सी, जनता ने कहा दिया है, चमक हो लेकिन खनक ग़ायब है. यही बात है, यही जनता की एक्ज़िट की प्यारी सी लात है.

लेकिन एक्ज़िट तो झूठ भी बोल सकते हैं. होते ही हैं, पहले भी हुआ है. रामभरोसे ने मोर्चा नहीं छोड़ा.

हाँ भइया, तुम आशावादी हो, तुम्हारे लिए एक कवि ने और भी कुछ लिखा है, ज़रा सुनते जाना. कहा है-

यही आस अटक्यो रहे, अलि गुलाब के मूल
अइहै फिर बसंत रुत, इन डालन में फूल

लेकिन भइया, कलयुग में बसंत का मतलब बस-अंत भी होता है.

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