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बुधवार, 05 मई, 2004 को 12:58 GMT तक के समाचार
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वोट को भी चराना पड़ता है भाई
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

बीबीसी के प्यारे पाठकों, बिंदास बाबू का नमस्कार.

सुनते हैं छपरा में बड़ी गड़बड़ हुई है. हमारे रामभरोसे इसी थीम पर बोले चले जा रहे हैं. कह रहे है, "छपरा में बड़ी गड़बड़ हुई है बिंदास बाबू. एकदम जाली वोट पड़ा है. 'प्योर कैप्चरिंग' हुई है. कुछ करिए न बिंदास बाबू. ऐसी रपट बनाइए कि लालू का कचालू बन जाए." रामभरोसे हमसे बोल रहे थे.

"शांत होइए रामभरोसे जी, इतना गुस्सा हेल्थ के लिए ठीक नहीं होता. छपरा में कुछ ख़ास नहीं हुआ. थोड़ा-बहुत जो हुआ, वह ‘वोटचारण’ मात्र हुआ. ‘वोटचारण’ समझते हैं न? हमने खुद जाकर देखा है, 'आन द स्पॉट'." कहते हुए बिंदास बाबू अपने महान लैपटॉप पर लपलपाने लगे.

"वोटचारण? ये क्या बला है बिंदास जी? आप सीरियस नहीं लगते. मजाक करते हैं. अरे जनतंत्र के भविष्य का सवाल है और आप मज़ा ले रहे हैं. छपरा में जनतंत्र खतरे में हैं. हम कहे देते है, लोग प्रोटेस्ट कर रहे हैं, सीडी भेजी है, आयोग ने नोटिस लिया है, दो ठो अपना आदमी भेजा है मौका-मुआयना के लिए. सपा-बसपा, सबने कहा है. चुनाव कैंसिल करो. ये जनतंत्र का मखौल है." रामभरोसे गुस्से में लाल-पीले हुए चले जा रहे थे.

डायरी के पन्ने

"रामभरोसे, तुम तो गाँव के हो. अरे ‘गोचारण’ शब्द तो सुना है न. उसी तर्ज पर है ‘वोटचारण’. जिस तरह गाय-भैंस चराने ले जाए जाते हैं, वोट को भी चराने-पानी पिलाने ले जाना पड़ता है. यही है वोट चारण." हमने समझाया.

"देखिए बिंदास जी, मेहरबानी करके इस ‘चारणकाल’ से बाहर आइए. क्या जनतंत्र लालू जी की पान की पीक है? मोटरसाइकिल पर बंदूक लेकर कौन आए थे? कितनों को मारा पीटा."

"देखिए रामभरोसे जी, आप कैसे कल्चरड आदमी है? बिहार में रहकर भी ‘कैप्चर’ का 'मीनिंग' नहीं जाने हैं. देखिए, जिसकी लाठी होती है उसी की भैंस बताई जाती है न. मरखनी भैंस कभी कैप्चर किए बिना दूध देती है? जो कैप्चर करेगा, वही दूध दुहेगा न. लाठी की जगह बँदूक देख ली तो बिदक क्यों रहे हो रामभरोसे."

"पचास साल से भैंस लाठी वाले की ही रही है. इसमें आयोग क्या करेगा. कैंसिल कर देगा तो कल फिर वोटचारण होगा. दस फीसदी तो वोटचारण हमेशा ही होता रहा है. एकदम 'लीगल' सा होता है." हमने कहा.

"ये आप क्या अनडेमोक्रेटिक बात कह रहे हैं बिंदास जी?" रामभरोसे रोष से बोले.

"अच्छा आप इस तरह जानिए रामभरोसे कि वोट की भैंस और लाठी का अपने यहाँ अत्यंतिक संबंध रहा है. एकदम 'अब्सेल्यूट' और सदियों से. वही भैंस चरने जाती है जिसके पीछे कोई ग्वाला लाठी ले कर चलता है. नए ग्वाले को तो भैंस लिफ्ट ही नहीं देगी. सो हर भैंस को एक पर्सनल ग्वाला चाहिए होता है."

"छपरा वाली भैंस अपने ग्वाले को पहचानती है. उसने लाठी फटकारी, वह चल दी पूँछ हिलाते, कैप्चर कहाँ हुई. प्यार से गई है न. बँदूक-अँदूक तो दूसरों को बरजने के लिए ही थीं न.

"लेकिन बिंदास जी, यह 'इल्लीगल' है सब. आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन" रामभरोसे बोले.

"जी हां, कश्मीर में तो अक्सर सरकारी मशीनरी ही करती रही है वोटचारण. कहाँ नहीं होता वोटचारण. अब लालू के लोग कुछ कर-वरा गए तो आप परेशान हो रहे हैं. गुजरात में भी वोटचारण हुआ था लेकिन थोड़ा 'स्लो मोशन' में, जहाँ वोट हजारों महीनों पहले ही साफ हो गए हों, वहाँ धीरे-धीरे वोटचारण होता है."

"देखिए राम भरोसे जी, सब्र से काम लीजिए. जब तक अपने यहाँ जनतंत्र एक भैंस की तरह रहेगा, उसको कैप्चर करने वाले आते रहेंगे."

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