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सोमवार, 10 मई, 2004 को 11:03 GMT तक के समाचार
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जित देखूँ तित लाल...
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

बीबीसी के प्यारे पाठकों,

अदभुत दृश्य है, हर तरफ़ माई के लालों की बहार आई हुई है.

कबीर जी ने मानो इसी सीन के लिए ये दोहा लिखा था.

"लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल,
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गई लाल."

"बोल इस चुनाव में लड़ने वाले सब माई के लालों की जय."

बिंदास बाबू के ऐसा बोलते ही रामभरोसे उत्साह में आ गया. बोला, "बिंदास सर, अब तो अपने लाल का 'फ़्यूचर' भी 'ब्राइट' दिखता है. अपुन भी अगले चुनाव में अपने बिटवा को उतार देंगे. अभी तक शर्म लगती थी कि लोग कहीं वंशवाद का ठप्पा लगा कर हमारी इज्जत को बट्टा न लगा दें."

डायरी के पन्ने

पहले तो हमें हँसी आई, बताइए, इस रामभरोसे को क्या पड़ी है. अपनी इज़्ज़त की फ़िकर कर रहा है. वंश की बात तो ऐसे करता है, जैसे सूर्यवंशी ही हो. प्रेस क्लब के सत्संग ने इस पर जनतांत्रिक किस्म का ग़लत असर डाला लगता है.

लेकिन हम हँसी छिपा कर बोले, "एकदम उतार दो रामभरोसे, जब सोनियासुत, माधव राव सिंधियासुत, वसुंधरासुत, बंसीलालसुत, भजनलालसुत, चौटालासुत, मारानसुत, और न जाने कितने-कितने सुत इस बार मैदान में हैं, तो भइया तुम ही पीछे क्यों रहो. एक ठो रामभरोसे-सुत भी होना ज़रूरी है. वंशवाद 'पोज़िटिव' हो गया है. परवाह न करना, अभी से टिकट की लाइन में लग जाओ."

"लेकिन एक प्रॉब्लम है सर, एक सुत से काम नहीं चलने वाला. या तो एक-आध दर्जन सुत हों, या फ़िर उन सुतों के चाचा-ताऊओं के सुत हों. सब मिल कर संभालें तो संभलता है जनतंत्र. वरना कोई भी सुत, 'सूत' कर चला जाता है.

"बिंदास जी, सोनियासुत के साथ सैकड़ों बड़े-बड़े सुत हैं, लालों के संग भी सुत हैं, लाठी के संग भी सुत हैं, बंदूक-सुत हैं और उनके झुंड हैं. हम अकेले क्या करें.

"तो कर लो न रामभरोसे दो-चार-छह. अभी तो तुम्हारी उम्र सुत-सृजन की ही है. सुतों के भविष्य की चिंता करो. दिव्य बेरोज़गारी के इस ज़माने में रोज़गार सिर्फ़ राजनीति में परमानेंन्ट है. वंश की वंशी बजाओ, हरि गुन गाओ."

"लेकिन पहले अपने सुत को थोड़ा 'मॉडर्न' बनाना पड़ेगा. डीपीएस में या मॉडर्न में पढ़ाना पड़ेगा, फ़िर सैंट स्टीफ़ेंस में भेजना पड़ेगा, फ़िर ऑक्सफ़ोर्ड, कैंब्रिज या हारवर्ड में डालना पड़ेगा. वहाँ से आईटी, एमबीए करे, तब अचानक एक दिन चुनाव में कूद पड़े."

"देखना, ये देश नई पौध का एहसान मान कर नाक रगड़ने को तैयार रहेगा."

"तुम्हारा छोरा हर हाल में हाईटेक-विज़टेक होना चाहिए. थोड़ा टॉम क्रूज़, थोड़ा बिल गेट्स, थोड़ा जस्टिन टिंबरलेक, थोड़ी-थोड़ी हिंदी वाला और ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेजीवाला होना चाहिए. एनआरआई जैसा लेकिन देश की सेवा की ख़ातिर ऊँची-ऊँची दुनिया की दीवारें तोड़कर आया हुआ लगे. 'जनरेशन नैक्स्ट' छाप होना चाहिए."

"तब कोई भी अमेठी, कोई भी गुना, कोई भी राजस्थान, शहर या सीट उसे गोद ले लेगी. तेरे सँग अपना भी कल्याण हो जाएगा."

"लेकिन ये तो बहुत बड़ा झमेला हो गया बिंदास बाबू. हमारे जैसा टकियल आदमी ये सब कैसे कर पाएगा."

"देखो रामभरोसे, पहले एक ठोस सपना देखो. इधर कई सपनों के सौदागर मार्केट में हैं. अटल जी का सपना बाज़ार में है, मुलायम जी का सपना बाज़ार में है. सोनिया जी के सपने बाज़ार में हैं, एक आध देख डालो और वहाँ से उड़ा लाओ, फ़्री में. सपना देखोगे, तभी तो आगे बढ़ोगे."

"अभी तो तुमने सपना भी नहीं देखा, तो फिर कैसे होगा तुम्हारा काम. देखो न जाकर."

प्रिय पाठकों, रामभरोसे सपना देखने के लिए चला गया है, और गाता चला गया है- लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल, लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गई लाल.

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