ये भारतीय युवा जान ख़तरे में डालकर भी क्यों जाना चाहते हैं इसराइल

मज़दूरी करते धनराज

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    • Author, प्रवीण कुमार
    • पदनाम, बाराबंकी से बीबीसी हिंदी के लिए

ईरान और इसराइल में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत सरकार ने शुक्रवार की शाम को ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है, जिसमें भारतीय नागरिकों से अगली सूचना तक ईरान और इसराइल की यात्रा नहीं करने की सलाह दी गई है.

भारत सरकार ने इसराइल की यात्रा करने को लेकर कोई पाबंदी नहीं लगाई है लेकिन एहितायतन नागरिकों से यात्रा करने से बचने को कहा है.

सरकार की इस एडवाइजरी के बाद उन युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है, जिन्हें नौकरी के सिलसिले में इसराइल जाना था, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में उन लोगों को यात्रा की अनुमति नहीं दी जा रही है.

उत्तर प्रदेश के जिन युवाओं को 15 अप्रैल को इसराइल जाने की फ्लाइट लेनी थी, उन लोगों को शनिवार को व्हाट्सऐप के ज़रिए एक संदेश मिला जिसमें कहा गया है कि 'विदेश मंत्रालय के निर्देशानुसार इसराइल की किसी भी तरह की यात्रा पर फ़िलहाल रोक लगा दी गई है. आप लोग अगली जानकारी मिलने तक का इंतज़ार करें.'

इससे उन युवाओं को अपना भविष्य अधर में फंसता दिख रहा है. एक तरफ़ युद्ध की आशंका से, वे राहत भी महसूस कर रहे हैं कि उन्हें समय रहते यात्रा करने से रोक दिया गया है, लेकिन दूसरी तरफ़ बेहतर आमदनी के मौक़े के टलने का मलाल भी उन्हें है.

'आगे कुंआ, पीछे खाई' वाली स्थीति

वीडियो कैप्शन, वो इसराइली जो बरसती मिसाइलों के बीच रह रहे हैं

इन युवाओं को ये जानकारी भी दी गई है कि टिकट और वीज़ा के लिए लिए गए उनके पैसे सुरक्षित हैं.

लेकिन इन युवाओं और उनके परिवार वालों के सामने अनिश्चितता की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसकी तुलना 'आगे कुंआ, पीछे खाई' से ही हो सकती है.

बीबीसी हिंदी ने शुक्रवार की एडवाइज़री आने से पहले उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के कुछ युवाओं से बात की थी, जो इसराइल जाने की तैयारी कर रहे थे. इन युवाओं को अब सरकार की नई घोषणा तक इंतज़ार करना होगा.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िला मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जगदीशपुर गांव. इस गांव के 20 से अधिक युवकों का चयन इसराइल जाने के लिए हुआ है.

उन युवाओं में से एक हैं अजीत सिंह, जब हम उनसे मिलने जगदीशपुर पहुंचे तो वो एक निर्माणाधीन मकान के लिए मज़दूरी करते मिले.

वीडियो कैप्शन, हमास के हमले और गज़ा में इसराइली कार्रवाई को लेकर क्या सोचते हैं दोनों तरफ़ के लोग?

अजीत अपने गांव और आसपास के इलाकों में पिछले 15 साल से राजमिस्त्री का काम कर रहे हैं. इसी काम से उनके घर का ख़र्च चलता है.

10वीं पास अजीत कहते हैं, "इस तरह का काम रोज़ नहीं मिलता है. जितना काम मिलता है उसके हिसाब से महीने में दस हज़ार रुपये तक कमा लेते हैं, इतने से घर का ख़र्चा पूरा नहीं होता है."

इसराइल जा रहे अजीत ने पिछले साल तक इसराइल का नाम तक कभी नहीं सुना था.

अक्टूबर में इसराइल और हमास के बीच शुरू हुई लड़ाई के बाद उन्होंने पहली बार न्यूज़ में इसराइल का नाम सुना.

वो कहते हैं, "पारिवारिक मजबूरी के कारण जान जोख़िम में डालकर इसराइल जा रहे हैं. मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि किस देश में जाना पड़ रहा है और वहां ख़तरा हो सकता है."

ठीक-ठाक पैसा कमाने को परिवार के लिए ज़्यादा ज़रूरी बताते हुए अजीत कहते हैं, "जब यहां उतना रोज़गार नहीं है तो सरकार तो बाहर जाने की व्यवस्था करेगी ही."

सरकार की तैयारियों से संतुष्ट है परिवार

अपने परिवार के साथ अजीत सिंह

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पास ही बैठी अजीत सिंह जी पत्नी फूला देवी की आंखें बातचीत के दौरान बार-बार नम हो जाती हैं. उनका गला भी रुंध जाता है.

वो कहती हैं, "मेरा तो मन नहीं है कि ये जाएं. मैंने कई बार इनको ना जाने के लिए कहा लेकिन ये माने नहीं. अब मैंने संतोष कर लिया कि परिवार के हित में इनका जाना ठीक ही होगा."

अजीत अकेले नहीं हैं. उनके छोटे भाई धनराज भी प्लास्टरिंग वर्क के लिए इसराइल जा रहे हैं.

धनराज उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से की जा रही व्यवस्थाओं से थोड़े असंतुष्ट दिखे.

उन्होंने बताया, "आवेदन करने बाद बताया गया कि जाने के लिए कोई पैसा नहीं लगेगा, लेकिन बाद में टिकट और वीज़ा के लिए 66,800 रुपये जमा करने पड़े."

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आवेदन करने बाद बताया गया कि जाने के लिए कोई पैसा नहीं लगेगा, लेकिन बाद में टिकट और वीज़ा के लिए 66800 रुपये जमा करने पड़े.
धनराज सिंह
इसराइल जाने के लिए चयनित

दोनों के पिता शारदा सिंह युद्ध के बीच बेटों के इसराइल जाने को ठीक नहीं मानते हैं, लेकिन सरकार द्वारा की जी रही व्यवस्था पर संतुष्ट हैं.

वे कहते हैं, "यहां तो रोज़-रोज़ काम भी नहीं मिलता है. दो दिन काम मिलता है तो दस दिन बैठना भी पड़ता है. वहां कम से कम हर दिन काम तो मिल रहा है और पैसा भी ठीक-ठाक मिल रहा है."

अजीत और धनराज, दोनों पहले तो ये बताने से बचते रहे कि वे आपस में भाई हैं, क्योंकि उन्हें डर था कि एक घर से दो लोगों के चयन होने की बात सार्वजनिक होने पर क्या पता दोनों में से किसी एक का चयन कैंसिल न हो जाए.

इसराइल को क्यों है इतने कामगारों की ज़रूरत?

मजदूरी करते अजित और धनराज

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इसराइली अधिकारियों के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया कि इसराइल को भारत और चीन से क़रीब 70 हज़ार कामगारों की ज़रूरत है, क्योंकि ग़ज़ा युद्ध शुरू होने के बाद वहां निर्माण क्षेत्र में काम करने वालों की सख़्त कमी हो गई है.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसराइल ने वहां काम कर रहे 80 हज़ार फ़लस्तीनी लोगों के वहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया. अब इस सेक्टर में जान फूंकने के लिए इन इसराइल को कामगारों की ज़रूरत पड़ रही है.

भारत सरकार और इसराइल सरकार के बीच हुए समझौते के अंतर्गत प्लास्टरिंग वर्क, सिरेमिक टाइलिंग, बिल्डिंग फ्रेमवर्क (सेटरिंग कारपेंटर), आयरन वेल्डिंग के कुशल श्रमिक स्क्रीनिंग के बाद इसराइल भेजे जाने थे.

इसराइल से आई टीम ने इन युवाओं की टेस्टिंग की है. उत्तर प्रदेश और हरियाणा में इसी साल जनवरी-फ़रवरी में ये टेस्ट हुए थे.

दस हज़ार कामगार जा रहे हैं इसराइल

विजय कुमार का कागज

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लखनऊ के अलीगंज आईटीआई के प्रिंसिपल राजकुमार यादव के मुताबिक़, क़रीब 14 हज़ार युवक स्क्रीनिंग में शामिल हुए थे, इनमें से 9145 युवक चयनित हुए थे.

इन चयनित श्रमिकों को नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र दिया जा रहा है. पहले चरण में प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों से कुल 2176 श्रमिक इसराइल जाने के लिए चुने गए थे.

उत्तर प्रदेश से पहले हरियाणा राज्य से भी पिछले सप्ताह 530 श्रमिक इसराइल जा चुके थे. शनिवार की सुबह बीबीसी के सहयोगी पत्रकार सत सिंह ने इसराइल पहुंच चुके दो युवाओं से बातचीत की है, जिन्होंने बताया है कि 'वे लोग सुरक्षित हैं, और काम शुरू कर चुके हैं और किसी तरह की चिंता की बात नहीं है.'

सत सिंह ने हरियाणा के सोनीपत ज़िले के युवा सरवीण मोर से ज़ूम पर बात की.

उन्होंने बताया, "यहाँ सब अच्छा अच्छा है, काम मिल गया है, खाने पीने के लिए कंपनी ने पैसे भी दिए हैं, होटल जैसा कमरा हैं. एक सेफ्टी ट्रेनिंग भी दी है. कोई दिक़्क़त होने पर बंकर के अंदर जाने की सलाह दी है."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: ग़ज़ा: इसराइली सैनिकों के लौटने के बाद ख़ान यूनिस का हाल

वहीं, यमुनानगर से इसराइल गए युवा महेश ने बताया कि, "हम सब बिलकुल सेफ़ हैं."

हालांकि हरियाणा के जो युवा इसराइल गए हैं, उनके परिवार वाले ज़रूरत चिंतित हैं.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले से 238 श्रमिकों का चयन हुआ था. इनमें से 187 युवाओं को पहले चरण में जाना था. लेकिन अब इन सबको अगली सूचना तक इंतज़ार करने को कहा गया है.

इन सबको अलीगंज आईटीआई में प्लास्टरिंग, सेरेमिक टाइलिंग, आयरन बेंडिग और बिल्डिंग फ्रेम वर्क (सेटरिंग कारपेंटर) के लिए स्क्रीनिंग के बाद चयनित श्रमिक स्वास्थ्य परीक्षण और पुलिस वेरिफिकेशन के बाद इसराइल जाने के लिए चयनित हुए थे.

जगदीशपुर के एक अन्य युवक रंजीत से हमारी मुलाकात हुई. रंजीत का चयन आयरन वेल्डिंग काम के लिए हुआ है.

अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद

जगदीशपुर के रंजीत

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समाप्त

23 साल के रंजीत इसराइल जाने को लेकर बहुत उत्साहित थे. रंजीत की 15 अप्रैल को इसराइल के लिए फ्लाइट है, उनके सभी ज़रूरी दस्तावेज़ पूरे हो चुके हैं.

वहां हर महीने मिलने वाली 1,37,250 रुपये की सैलरी के बारे में बताते हुए रंजीत की आंखों में एक चमक थी. वे कहते हैं, "मेरे मन में वहां जाने को लेकर किसी प्रकार का डर नहीं है. एक डर भाषा को लेकर ज़रूर था, लेकिन चयन के दौरान बताया गया कि वहां हिंदी बोलने वाले लोग रहेंगे. सबसे बड़ी बात यही है कि जो पैसे मिलेंगे उससे घर वालों का जीवन बेहतर होगा."

जगदीशपुर गांव के विजय कुमार का चयन भी रंजीत की तरह आयरन वेल्डिंग के काम के लिए हुआ है. विजय कुमार ज़रूरी दस्तावेजों के साथ टिकट के लिए 66,800 रुपये जमा कर चुके हैं. अब उन्हें जाने के दिन का इंतज़ार है.

वे कहते हैं कि जाने की तारीख़ कभी भी तय हो सकती है. राज्य में बेरोज़गारी की बात बताते हुए विजय कुमार कहते हैं, "यहां काम करने वाले लोग ज़्यादा हैं, काम कम है. इसलिए यहां कंप्टीशन बहुत है, इसलिए ठीक से मज़दूरी नहीं मिल पाती है. कम से कम वहां पैसे तो ठीक मिल रहे हैं."

'टिकट के पैसे ख़ुद देने पड़े'

अजित सिंह की ओर से टिकट के लिए जमा कराए गए पैसे

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टिकट के लिए पैसों के इंतज़ाम पर विजय कहते हैं, "पहले पैसों के बारे में जानकारी नहीं थी. जब पता चला कि टिकट के लिए पैसे लगेंगे तो परेशानी हुई. जैसे-तैसे ज़मीन गिरवी रख कर पैसे का इंतज़ाम किया. वहां अच्छा पैसा मिलेगा तो घर की स्थिति सुधरेगी और ज़मीन गिरवी रखने वाले का पैसा भी चुका देंगे."

इन दिनों विजय यूट्यूब और इंटरनेट के माध्यम से इसराइल के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं. लेकिन जब से सरकार की एडवाइज़री का उन्हें पता चला है तबसे उनकी चिंता बढ़ गई है.

उन्होंने बताया, "जब तक वहाँ चले न जाएं, तनख़्वाह में मिलने वाले पैसे हाथ में न आ जाएं तब तक तो चिंता लगी रहेगी. जनवरी 2024 से जब से इस प्रक्रिया की शुरूआत हुई थी, तीन महीने बीत हो गए. कमाई नहीं है. पहले स्क्रीनिंग के लिये दौड़-भाग करते रहे फिर उसके बाद पेपर आदि जमा करने के लिये लखनऊ आना-जाना लगा रहा. अब पता नहीं और कितने दिन इंतज़ार करना पड़ेगा."

विजय कुमार के पिता के बड़े भाई रामपाल सिंह बताते हैं कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की वजह से यह भरोसा है कि जो बच्चे इसराइल जा रहे हैं, उन्हें वहां कोई दिक़्क़त नहीं होगी कोई ख़तरा नहीं होगा.

देश में बेरोज़गारी की हालत

पीएम नरेंद्र मोदी

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नरेंद्र मोदी पिछले दस सालों से भारत के प्रधानमंत्री हैं और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के इरादे से चुनाव मैदान में हैं. 2014 की अपनी चुनाव कैंपेन के दौरान उन्होंने हर साल दो करोड़ लोगों को नौकरी देने का वादा किया था..

लेकिन जॉब सेक्टर की हालत भारत में बहुत अच्छी नहीं है.

भारत में बेरोज़गारी कम तो हो रही है लेकिन इसकी दर अब भी बहुत ऊंची है. अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2019 के बाद से नियमित सैलरी वाली नौकरियों की रफ़्तार में कमी आ रही है. इसकी वजह आर्थिक मंदी और कोरोना को बताया जा रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ महामारी के बाद 15 प्रतिशत से ज़्यादा ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं. इतना ही नहीं ऐसे ग्रैजुएट जिनकी उम्र 25 साल से कम हैं उनमें कुल 42 फ़ीसदी लोग बेरोज़गार हैं.

पैसों के लिए ख़तरा मोल लेने को तैयार

अपने घर के सामने बैठे मोहित सिंह

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बाराबंकी के ही बिनोवाग्राम के मोहित सिंह ग्रैजुएशन कर चुके हैं और अब इसराइल जाने की तैयारी में जुटे हैं. मोहित सिंह पहले अमेठी में कॉन्ट्रेक्ट पर काम करते थे जहां से महीने का 15-20 हज़ार रुपये कमा लेते थे.

वे बताते हैं, "मंहगाई की वजह से इतने पैसों में काम चलाना मुश्किल है, इसलिए जैसे ही इसराइल में नौकरी का पता चला तो आवेदन कर दिया."

मोहित सिंह अब 15 अप्रैल को दिल्ली से इसराइल के लिए उड़ान भरेंगे. वे कहते हैं, "पहले तो पता ही नहीं था कि इसराइल कोई देश भी है. युद्ध शुरू होने के बाद ही इसराइल के बारे में पहली बार सुना."

हालांकि मोहित अब सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से इसराइल के बारे में बहुत कुछ जान गए हैं. वे कहते हैं कि अच्छा पैसा कमाने की इच्छा है इसलिए वहां जान को लेकर किसी बात का डर नहीं लग रहा है.

मोहित ने बताया, "इसराइल में कुछ दैनिक प्रयोग की चीज़ें भारत की तुलना में महंगी है इसलिए खाने पीने के सामान के अलावा खाने बनाने के लिए बर्तन भी साथ ले जा रहे हैं. हमारी सरकार अगर चाहे तो ऐसी नौकरी की व्यवस्था यहीं कर सकती थी जिससे हम जैसे लोगों को रोज़गार के लिए इतनी दूर जाना नहीं पड़ता."

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मंहगाई की वजह से इतने पैसों में काम चलाना मुश्किल है, इसलिए जैसे ही इसराइल में नौकरी का पता चला तो आवेदन कर दिया.
मोहित सिंह
निवासी विनोवाग्राम, बाराबंकी

इन युवाओं को नौकरी के सिलसिले में इसराइल जैसे देश भेजने के बारे में बाराबंकी के सहायक श्रमायुक्त मयंक सिंह ने कहा, "इन युवाओं के चयन के लिए आईटीआई अलीगंज में स्क्रीनिंग हुई. वहीं लोगों को अंतिम रूप से चयनित किया गया."

इसराइल में युद्ध के हालात बीच जाने वाले श्रमिकों और उनके परिजनों के बीच डर और चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार की तरफ से क्या प्रयास किया गया इसके जवाब में मयंक सिंह ने स्पष्ट तौर पर बताया, "श्रमिकों और परिजनों की चिंताओं के समाधान के लिए किसी प्रकार की काउंसिलिंग की व्यवस्था हमारे ज़िम्मे नहीं थी. इससे संबंधित सरकार की मंशा के अनुरूप श्रम विभाग को जो निर्देश मिले थे हमने उस अनुरूप ही ठीक से अपना काम करने का प्रयास किया है."

इस तरह की नौकरी की व्यवस्था उत्तर प्रदेश और देश के अंदर भी तो हो सकती है, पूछे जाने पर मयंक सिंह इस सवाल के जवाब में कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं और इसराइल भेजे जाने की तैयारियों के बारे में बताने लगते हैं.

इस पूरे मामले के सामाजिक और आर्थिक पहलू की व्याख्या करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी बताते हैं, "खेती आधारित राज्यों में ये विकराल समस्या है. रोज़गार के साधन नहीं हैं. ऐसे में युवा क्या कर रहे हैं, उनके पास महानगरों में गार्ड बनने के अलावा विकल्प क्या है? इसराइल का विकल्प वैसे तो आकर्षक है."

भारत-इसराइल में समझौता

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भारत और इसराइल के बीच हुए समझौते के तहत 15 सदस्यीय इसराइली टीम भारत से प्लास्टरिंग वर्क, सेरेमिक टाइलिंग, बिल्डिंग फ्रेम वर्क और आयरन वेल्डिंग के कुशल श्रमिकों का चयन कर रही है.

दोनों देश के बीच हुए समझौते के माध्यम से भारत से श्रमिकों को इसराइल भेजा जा रहा है जो वहां के निर्माण और उद्यमिता क्षेत्र में योगदान देंगे.

भारत से इसराइल जा रहे श्रमिकों को पांच साल का वीज़ा दिया जा रहा है. चयनित श्रमिकों को इसराइल में कम से कम एक साल और ज़्यादा से ज़्यादा पांच साल तक काम करने का मौका मिलेगा. साल में एक महीने की छुट्टी मिलेगी इस दौरान श्रमिक अपने देश वापस आ सकते हैं, बीच में ज़रूरी होने पर भी श्रमिक अपने देश वापस आ सकते हैं.

क्या शर्तें होंगी

जगदीशपुर के विजय कुमार

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सहायक श्रमायुक्त, बाराबंकी मयंक सिंह ने कहा, "किसी भी श्रमिक को ज़बरदस्ती नहीं भेजा जा रहा है. सारे युवा अपनी मर्जी से नौकरी के लिए जा रहे हैं. इनके जाने में प्रदेश सरकार पूरी तरह से मदद कर रही है."

हालांकि अब इन युवाओं को अगली जानकारी तक जाने से रोक दिया गया है, जिसके बारे में मयंक सिंह को शनिवार तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि 'जिन लड़कों को 15 अप्रैल को जाना था, उनसे उन्हें इसकी जानकारी मिली है.'

वहां श्रमिकों को प्रतिमाह 1,37,250 भारतीय रुपये वेतन में मिलेगा, ओवर टाइम करने पर महीने में मिलने वाला वेतन 1,37,250 रुपये से अधिक भी हो सकता है. इसराइल में नियोक्ता कंपनी की तरफ़ से मुफ़्त रहने के लिए आवास उपलब्ध कराया जाएगा, लेकिन खाने के लिए श्रमिकों को खुद से ख़र्च करना पड़ेगा.

इन श्रमिकों को राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की ओर से बीमा का भी लाभ मिलेगा, जिसमें प्रत्येक श्रमिक के लिए 10 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा शामिल है.

(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)

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