अमेरिका की 'जेएलओटीएस' योजना क्या है जिसके ज़रिए ग़ज़ा तक राहत सामग्री पहुंचाई जाएगी

इमेज स्रोत, US ARMY
- Author, बर्न्ड डेबुस्समान जूनियर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वॉशिंगटन से
अमेरिका पिछले कई महीनों से युद्ध की मार झेल रही ग़ज़ा पट्टी में समंदर के रास्ते राहत सामग्री पहुंचाने की योजना बना रहा है.
इस योजना के तहत पानी पर अस्थाई प्लेटफॉर्म बनाए जाएंगे जिन्हें डॉक या पियर कहा जाता है. इन्हीं के ज़रिए ग़ज़ा तक सामान पहुंचाया जाएगा.
लेकिन अमेरिका की योजना भी कई जोख़िमों से भरी हुई है. इसमें एक तरफ़ शत्रु पक्ष की ओर से गोलीबारी का ख़तरा है तो दूसरी ओर तट पर मौजूद बेबस नागरिक हैं.
इस अभियान में एक हज़ार से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक हिस्सा ले सकते हैं. हालांकि, अमेरिकी सैन्य मुख्यालय पेंटागन ने कहा है कि अमेरिका का एक भी सैनिक ग़ज़ा की ज़मीन पर पैर नहीं रखेगा.
अमेरिका ने इस अभियान को अंजाम देने के लिए एक अनजान-सी निजी कंपनी फॉगबो के साथ अनुबंध किया है. इसका संचालन अमेरिकी सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी में काम कर चुके आला अधिकारी कर रहे हैं.
इस अभियान का लक्ष्य ग़ज़ा में हर रोज़ बीस लाख खाद्य पैकेट पहुंचाना है. संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में ग़ज़ा को लेकर जारी चेतावनी में कहा था कि वहां भुखमरी के हालात होना लगभग तय हैं.
लेकिन सवाल ये है कि अमेरिका इस चुनौतीपूर्ण अभियान को अंजाम कैसे देगा?
पानी पर कैसे बनेगा अस्थाई प्लेटफॉर्म?

इमेज स्रोत, EPA-EFE/REX/Shutterstock
पेंटागन के मुताबिक़, इस पियर के तहत दो अस्थाई प्लेटफॉर्म बनाए जाएंगे.
पहला प्लेटफॉर्म पानी पर बनाया गया अस्थाई बंदरगाह होगा. वहीं, दूसरा प्लेटफॉर्म 1800 फीट (548 मीटर) लंबा डबल लेन मार्ग होगा जिसे 40 फीट लंबे स्टील पाइपों को जोड़कर बनाया जाएगा.
इनके बन जाने के बाद राहत सामग्री लेकर आ रहे जहाज़ पहले प्लेटफॉर्म पर राहत सामग्री उतारेंगे. इसके बाद इस राहत सामग्री को छोटे जहाज़ों में चढ़ाया जाएगा जो उसे दूसरे प्लेटफॉर्म तक लेकर जाएंगे.
इन छोटे जहाज़ों को लॉजिस्टिक सपोर्ट व्हीकल या एलएसवी कहा जाता है.
राहत सामग्री के समुद्र तट तक पहुंचने के बाद उसे ट्रकों के ज़रिए ग़ज़ा के अंदर तक ले जाया जाएगा.
इस तरह समुद्र पर डबल लेन मार्ग बनाकर समुद्र तट तक सामान ले जाया जाएगा ताकि अमेरिकी सैनिक ग़ज़ा की ज़मीन पर पैर रखने से बच सकें.

अमेरिका इस युद्ध में इसराइल का समर्थन कर रहा है जो उसका सहयोगी रहा है. उसने हमास को एक आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है और कहा है कि इसराइल को अपनी सुरक्षा का पूरा हक़ है.
समुद्र से लेकर ज़मीन तक फैली इस विशाल परियोजना को 'जेएलओटीएस' (ज्वाइंट लॉजिस्टिक्स ओवर-द-शोर) कहा जा रहा है.
अमेरिकी सेना ने इससे पहले कुवैत, सोमालिया, हैती और सेंट्रल अमेरिका में राहत एवं बचाव अभियानों के दौरान इस तरह की योजना का इस्तेमाल किया है.
इसके पिछले संस्करणों का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों में नॉरमेंडी आक्रमण के दौरान किया गया था.
इसके साथ ही रक्षा विभाग ने ऐसे ही उपकरणों का इस्तेमाल ऑस्ट्रेलिया में विशाल युद्धाभ्यास के दौरान किया था.
इन प्रोजेक्ट को बनाने की योजनाएं बनाने का अनुभव रखने वाले अमेरिकी कर्नल मार्क केंसियन ने बीबीसी से इस बारे में बात की है.
वह कहते हैं, "सेना एक ऐसा बंदरगाह चाहती है जो सभी समस्याएं हल कर सके. लेकिन हमेशा ऐसा करना संभव नहीं होता है. कभी इसके लिए संघर्षपूर्ण स्थिति ज़िम्मेदार होती है या शांतिकाल में राहत एवं बचाव अभियान की वजह से ऐसा नहीं हो पाता. ऐसे में जेएलओटीएस काम आता है."
फ़ॉगबो क्या है और उसकी भूमिका क्या है?

इमेज स्रोत, Reuters
फ़ॉगबो एक निजी कंपनी है जिसका नेतृत्व अमेरिकी सेना में मरीन कॉर्प के पूर्व लेफ़्टिनेंट कर्नल सैम मंडी के हाथों में है. सैम मंडी ने इससे पहले मध्य पूर्व में सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व किया है.
इसके साथ ही मिक मलरॉय भी इस कंपनी का नेतृत्व संभालते हैं. वह अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के पैरामिलिट्री ऑफ़िसर और मध्य पूर्व के लिए असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ़ डिफेंस रहे हैं.
इस कंपनी की भूमिका के बारे में अब तक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गयी है.
लेकिन इसकी जानकारी रखने वाले एक शख़्स ने बीबीसी को बताया है कि फ़ॉगबो ऑपरेशन को आंतरिक रूप से 'ब्लू बीच प्लान' के रूप में जाना जा रहा है. इसका प्राथमिक उद्देश्य राहत सामग्री के ग़ज़ा तक पहुंचने के बाद उसका वितरण कराना है.
कंटेनर में आई राहत सामग्री को ट्रकों पर चढ़ाकर ग़ज़ा के अंदर वितरण के लिए तय की गई जगहों तक पहुंचाया जाएगा.
इस अभियान को अमेरिका और इसराइल के बीच राहत सामग्री पहुंचाने के लिए तय योजना के तहत चलाया जा रहा है.
बीबीसी को बताया गया है कि फ़ॉगबो अभी भी निवेशकों की तलाश कर रहा है और यूरोप से लेकर मध्य पूर्व के कई देशों की सरकारों को अपनी योजना से अवगत करा रहा है.
फ़ॉगबो ग़ज़ा में मदद पहुंचाने के लिए भविष्य में दानदाताओं की ओर से चलाई जाने वाली फाउंडेशन भी खड़ी कराना चाहता है.
किसकी क्या होगी ज़िम्मेदारी?

सैन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि इस योजना की सफलता सुरक्षा पर निर्भर करती है. एक तरफ़ शत्रु पक्ष की ओर से गोलीबारी की संभावना है क्योंकि ये अभी संघर्षरत इलाक़ा है.
वहीं, दूसरी ओर राहत सामग्री का इंतज़ार कर रही आम लोगों की भीड़ के राहत सामग्री लेकर आ रहे ट्रकों की ओर दौड़ने की आशंका है.
अमेरिकी नौसेना में 32 साल तक सेवाएं देने वाले सेवानिवृत्त रियर एडमिरल मार्क मोंटगोमरी को इस तरह के राहत अभियानों को अंजाम देने का अनुभव है.
मोंटगोमरी के मुताबिक़, इस अभियान को ज़मीन और छिछले पानी में एक सुरक्षा कवच चाहिए होगा.
वह कहते हैं, "आप आम लोगों को पियर पर नहीं आने दे सकते. उनमें से कोई शख़्स अपने बच्चों के लिए खाना तलाश रहा बेबस माँ या पिता हो सकता है. वे किसी की हत्या करने की कोशिश कर सकते हैं. ऐसा होने पर पूरा काम बंद हो जाएगा."

इस परियोजना से अवगत दो लोगों ने बीबीसी को बताया है कि सुरक्षा घेरे के बाहरी घेरे की ज़िम्मेदारी इसराइली सेना के हाथ में होगी जो लोगों को समुद्र तट तक पहुंचने से रोकेगी ताकि इस क्षेत्र को सुरक्षित बनाए रखा जा सके.
वहीं, खाद्य सामग्री का वितरण करने की ज़िम्मेदारी फ़लस्तीनियों पर होगी जिनके पास हथियार नहीं होंगे.
फ़ॉगबो की ज़िम्मेदारी माल ढुलाई से जुड़ी हुई है. वह खाद् सामग्री का वितरण नहीं करेगी.
पेंटागन ने कहा है कि अमेरिकी सेना ग़ज़ा की ज़मीन पर पैर नहीं रखेगी. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि असलियत इससे कहीं जटिल हो सकती है.
मोंटगोमरी का कहना है, "कुछ लोगों की ओर से स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे कि किस कोण पर आगे बढ़ना है और किस तरह की रेत पर पियर को लगाना है. वे ये सुनिश्चित करेंगे कि प्लेटफॉर्म को सही जगह पर जोड़ा जा रहा है या नहीं."
मोंटगोमरी कहते हैं कि समुद्र तट पर मौजूद शख़्स अगर अमेरिकी सैनिक नहीं होगा तो वह एक अनुभवी कॉन्ट्रेक्टर होगा जो कि पहले शायद सेवानिवृत्त अमेरिकी सैनिक रहा हो.
इस राहत सामग्री से क्या असर पड़ेगा?

इमेज स्रोत, Reuters
अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक़, इस अस्थाई बंदरगाह के ज़रिए हर रोज़ बीस लाख खाद्य पैकेट ग़ज़ा तक पहुंचाए जा सकते हैं. माना जा रहा है कि ग़ज़ा की 23 लाख की आबादी के लिए ये पर्याप्त होंगे.
खाद्य सामग्री की ये मात्रा फिलहाल रफ़ाह क्रॉसिंग के ज़रिए ग़ज़ा में पहुंच रही राहत सामग्री की तुलना में बहुत ज़्यादा होगी.
फिलहाल ग़ज़ा में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए रफ़ाह क्रॉसिंग और एयर ड्रॉप का सहारा लिया जा रहा है.
इस हफ़्ते की शुरुआत में अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा था कि समुद्री रास्ते के ज़रिए राहत सामग्री पहुंचाने की दिशा में विचार करने की वजह दूसरे विकल्पों का पर्याप्त नहीं होना है.
हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रकों के ज़रिए राहत सामग्री भेजने का कोई विकल्प नहीं है. ऐसे में वे उसके लिए दबाव बनाना जारी रखेंगे.
ग़ज़ा में तुरंत और सबसे प्रभावशाली ढंग से मदद पहुंचाने का ज़रिया सड़क मार्ग ही है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का कहना है कि इसराइली प्रतिबंधों की वजह से ज़रूरत की तुलना में बहुत कम मदद ग़ज़ा पहुंच पा रही है.

इमेज स्रोत, World Central Kitchen
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि जब तक ये योजना अमल में नहीं आती है तब तक ज़मीनी रास्ता ही एक विक्लप है.
मोंटगोमरी कहते हैं, "सब कुछ ठीक चला तब भी ये बंदरगाह एक प्रभावशाली डिलीवरी मैकेनिज़्म के रूप में दो महीने से पहले तैयार नहीं होगा."
पियर बनने से पहले भी इस बंदरगाह की आंशिक शुरुआत हो सकती है.
बीबीसी को लगता है कि फ़ॉगबो समुद्र तट की ड्रेज़िंग करने पर विचार कर रहा है ताकि छोटे जहाज़ों को समुद्र तट के क़रीब ले जाया जा सके और ट्रकों पर माल चढ़ाया जा सके.
कई और मुल्क भी समुद्री रास्ते पर विचार कर रहे हैं क्योंकि ज़मीनी रास्ते से काफ़ी कम राहत सामग्री ग़ज़ा तक पहुंच पा रही है.
पिछले सोमवार को ही सायप्रस से दो सौ टन राहत सामग्री लेकर एक जहाज़ ग़ज़ा की ओर बढ़ा है जो ग़ज़ा के तट पर अमेरिकी चैरिटी संस्था की ओर से बनाई गई एक छोटी-सी जैटी पर उतरने की उम्मीद कर रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















