ईरान के हमलों से क्या मध्यपूर्व और ख़तरनाक जगह बन गया है?

ईरान

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    • Author, लीस डुसेट
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मौजूदा वक्त में हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वो मध्य पूर्व के लिए बड़े बदलाव का वक्त है.

इस सप्ताह, एक अभूतपूर्व घटना में ईरान ने अचानक अपने पड़ोसी "दोस्त" पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों में मिसाइलें दाग़ दीं.

नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई की और पहले से ही संवेदनशील सीमा के पार ईरान के इलाक़े में मिसाइलें दाग़ दीं.

इस घटनाक्रम ने इसराइल-हमास जंग के कारण पहले से तनाव से घिरे मध्य पूर्व के इलाक़े में चिंता और परेशानी को और भी बढ़ा दिया.

ईरान का मकसद साफ था. वो स्पष्ट तौर पर देश के भीतर लोगों तक और देश के बाहर दूसरे मुल्कों तक एक संदेश पहुंचाना चाहता था.

जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय और मध्य पूर्व मामलों के प्रोफ़ेसर वली नस्र कहते हैं, "ईरान ने न केवल ये दिखाया कि उसकी सेना के पास मिसाइलें हैं बल्कि ये भी दिखा दिया कि वो इनका इस्तेमाल करने के लिए भी तैयार है."

"ग़ज़ा पट्टी पर इसराइल और हमास के बीच जारी जंग के बीच, जिसमें ख़ासकर अब लेबनान और यमन भी शामिल होते जा रहे हैं, हो सकता है कि ये संदेश इसराइल और अमेरिका के लिए हो."

अन्य पर्यवेक्षकों की तरह वो भी मानते हैं, "फिलहाल ईरान नहीं चाहता कि तनाव और बढ़े’’

तनाव फैलने की आशंका

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बीते साल 7 अक्टूबर को हमास ने इसराइल के दक्षिणी हिस्से में हमला किया. इस हमले में 1,200 से अधिक लोगों की जान चली गई.

इसके बाद इसराइल ने जवाबी कार्रवाई में ग़ज़ा पर ताबड़तोड़ हमले किए जो तीन महीनों बाद अब तक नहीं रुके हैं. इस बीच ये चिंता जताई जाने लगी कि ये तनाव इसराइल और ग़ज़ा से बाहर निकलकर पूरे इलाक़े में फैल सकता है.

इस बीच लेबनान की तरफ से इसराइल पर हमले हुए और यमन की तरफ से हूती विद्रोहियों ने इसराइल के विरोध में लाल सागर से गुज़रने वाले जहाज़ों पर हमले शुरू किए.

लेकिन न तो ईरान, न ही उसका मुख्य सहयोगी हिज़बुल्लाह और न ही इसराइल का साथ दे रहा अमेरिका इस मामले को और बढ़ाना चाहते हैं.

छद्म युद्ध के जटिल जाल के ज़रिए ईरान जंग लड़ रहा है. मध्य पूर्व में ईरान की स्थिति उस अहम बिंदु पर है जिसे हम "प्रतिरोध की धुरी" कह सकते हैं.

इस पूरे इलाक़े के अलग-अलग देशों में ईरान समर्थित सशस्त्र विद्रोही गुट हैं. ग़ज़ा में हमास, लेबनान में हिज़बुल्लाह,यमन में हूती विद्रोही और इराक़ और सीरिया में ताकतवर सशस्त्र गुट.

इनमें से अधिकतर विद्रोही गुटों को पश्चिमी मुल्कों ने आंतकवादी संगठन करार दिया है.

इन विद्रोही संगठनों की सैन्य ताकत काफी हद तक ईरान के हथियार मुहैया कराने और ट्रेनिंग देने के आधार पर टिकी है.

हालांकि हर संगठन का अपना-अपना एजेंडा है और अपने अलग लक्ष्य हैं.

हाल के वक़्त में ये सभी मोर्चों किसी न किसी स्तर पर सक्रिय रहे हैं, जिससे कभी-कभी तनाव बढ़ जाता है.

इस ख़तरे को कम करने की भी लगातार कोशिश होती रहती है ताकि इस कारण उन्हें इसराइल और अमेरिका की तरफ से बदले की कार्रवाई न झेलनी पड़े.

ईरान

ईरान-पाकिस्तान तनाव

दो पड़ोसी ईरान और पाकिस्तान के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने पहले पाकिस्तान के इलाक़े पर हमला किया.

हालांकि पाकिस्तान अकेला नहीं था, जिस पर ईरान ने मिसाइल हमले किए. उसने अपने दो और दोस्त देश इराक़ और सीरिया पर हमले किए.

ईरान ने ये समझा होगा कि उसके आसपास की "प्रतिरोध की धुरी" में ये वो देश हैं जहां से उसे कम विरोध देखने को मिल सकता है.

ईरान की इस एलीट फोर्स ने इराक़ के उत्तर में कुर्दिस्तान के इलाक़े में कई बैलिस्टिक मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन दाग़े.

ईरान का कहना था कि उसने इसराइल की जासूसी एजेंसी मोसाद के ख़ुफ़िया सेंटर को निशाना बनाया.

इसके अलावा ईरान ने सीरिया के विद्रोहियों के कब्ज़े वाले हिस्से में "ईरान विरोधी आतंकी गुटों" को भी निशाना बनाया जिनमें इस्लामिक स्टेट शामिल हैं.

ईरान के अनुसार उसके हर अभियान के पीछे प्रतिक्रिया की एक वजह थी.

ईरान का कहना था कि उसने पाकिस्तान के दक्षिणपश्चिम ईरानी मूल के बलोच विद्रोहियों को निशाना कर कर हमला किया था.

तेहरान यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर सैयद मोहम्मद मरांदी कहते हैं, "हमला तो होना ही था." वो कहते हैं कि बीते महीने ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में हमला हुआ था जिसमें 22 ईरानी पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई थी.

पाकिस्तान ने दो दिन पहले ईरान के दक्षिणी इलाके में ये कहते हुए हमला किया था कि यहां बलूच राष्ट्रवादियों के अड्डे हैं.

पाकिस्तान ने इन्हें ‘आतंकवादियों के ठिकाने’ करार दिया. सीमा के दोनों ओर तनाव कई दशकों से खदबदा रहा था लेकिन अब ये सबसे बुरे दौर में पहुंच चुका है.

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ईरान के नेताओं के लिए मुश्किल वक़्त

इराक और सीरिया ग़ज़ा के नजदीक हैं, जहां इस समय हमास और इसराइल के बीच संघर्ष चल रहा है.

प्रोफ़ेसर मरांदी कहते हैं, "इराक और सीरिया में होने वाले हमले केरमान में हो रहे अत्याचार का जवाब हैं.’’

वो पिछले महीने दमिश्क के बाहर हुई एक राजनीतिक हत्या का जिक्र कर रहे थे.

यहां आईआरजीसी के सबसे वरिष्ठ शख्स सैयद रज़ी मोसावी की हत्या कर दी गई थी

इस महीने की शुरुआत में कासिम सुलेमानी की कब्र पर दोहरा फिदाइन हमला हुआ था. सुलेमानी ईरान के शीर्ष कमांडर थे जिन्हें चार साल पहले अमेरिका ने इराक में एक ड्रोन हमले में मार दिया था.

इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी. यह 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे ख़तरनाक हमला था.

इस क्षेत्र का बारीक विश्लेषण करने वाले अमवाज़ मीडिया के संपादक मोहम्मद अली शबानी का कहना है, "ईरान पर इस हमले के अलावा हमास और हिजबुल्ला के कमांडरों की हत्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दबाव था."

उनका कहना था, "हम आने वाले समय में तनाव के हालात बने दिखेंगे."

ईरान की सत्ता में बैठे में सर्वोच्च धार्मिक नेताओं के लिए ये कठिन समय है. क्योंकि देश में महिलाओं ने ज्यादा आजादी की मांग को लेकर बड़े आंदोलन किए.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था भी दबाव में है. कथित भ्रष्टाचार के मामलों और कुप्रबंधन की वजह से अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो गई है.

इस संघर्ष के भीतर कई संघर्ष है. पाकिस्तान के अपने पड़ोसी भारत और अफ़ग़ानिस्तान के साथ तनाव है. दोनों हालात पर बारीक नज़र रखे हुए हैं.

ईरानी मिसाइल

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ईरान की रणनीति अब क्या होगी?

लंबे वक़्त से दोनों ओर से दुश्मन ताकतों को शरण दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं.

पिछला सप्ताह इसराइल और हमास के बीच युद्ध का ख़तरा और बढ़ता दिखा. ऐसे में किसी भी एक से अधिक मोर्चे पर तनाव भड़का तो इस क्षेत्र में लंबे समय तक की संघर्ष की स्थिति बन सकती है. 7 अक्टूबर से पहले ही यहां विवाद की रेखाएं गहरी खींची हुई थीं.

बहरहाल संघर्षों की वजह से जो तनाव पैदा हुआ है उसकी ईरान ने कीमत भी चुकाई है.

इराक में अमेरिका ने ईरानी ठिकानों पर जो हमले किए थे उससे उसके अहम इन्फ्रास्ट्रक्चर के ध्वस्त होने की ख़बरें हैं.

अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन का कहना है यमन में हूती विद्रोहियों पर हमले उसने लाल सागर में अहम समुद्री मार्गो पर किए गए हमलों के जवाब में किए हैं. इन हमलों में हूती विद्रोहियों के एक चौथाई हथियार भंडार के ध्वस्त होने की भी ख़बरें हैं.

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इसके बावजूद ईरान और उसके सहयोगी मानते हैं कि उसे हार से ज्यादा जीत मिल रही है. ग़ज़ा में फ़लस्तीनियों के साथ खड़ा होने से खाड़ी देशों में ईरान की लोकप्रियता बढ़ी है. यमन के हूती विद्रोही इस वक़्त पूरी दुनिया की निगाहों में हैं.

चैटहैम हाउस में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीकी प्रोग्राम की डायरेक्टर सनम वकील का कहना है, "ईरान एक व्यापक खेल खेल रहा है. उसे लग रहा है कि ग़ज़ा पर कब्जे के बाद इसराइल उसके प्रति और हमलावर हो सकता है. इसलिए वो लंबी लड़ाई की तैयारी में लगा है."

ईरान के दीर्घकालिक लक्ष्य में से एक ये भी है कि वह अमेरिका को अपने बैकयार्ड से बाहर रखे. साथ ही वो इसराइल और अमेरिका से सीधे भिड़ने से परहेज करे.

इसका मतलब ये है कि वो इसका आकलन करे कि ख़तरनाक इलाके में कहां और कैसे हमला करना है. ऐसे इलाके में जहां गलत आकलन खतरनाक हो सकता है.

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