पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत क्यों रहता है अशांत, क्या है ताज़ा तनाव के पीछे की वजह

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- Author, फरहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, बलूचिस्तान
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है. यह पाकिस्तान में सबसे अधिक प्राकृतिक संसाधनों वाला लेकिन सबसे कम विकसित प्रांत है.
बलूचिस्तान नाम का इस्तेमाल एक व्यापक भौगोलिक इलाके के रूप में किया जा सकता है. इसमें ईरान और अफ़ग़ानिस्तान की जमीन भी शामिल है.
पिछले हफ्ते ईरान और पाकिस्तान ने 'आतंकवादियों' को निशाना बनाते हुए एक-दूसरे की सीमाओं में हमले किए.
इस तनाव को समझने के लिए यहां हम बलूचिस्तान को समझने की कोशिश करेंगे, जिसकी एक ख़ास सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है.

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बलूचिस्तान की अहमियत?
बलूचिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान में आता है.
पाकिस्तान का बलूचिस्तान देश की कुल जमीन का करीब 44 फीसदी हिस्सा समेटे है. लेकिन यहां पाकिस्तान की करीब 25 करोड़ आबादी में से केवल छह फीसदी हिस्से का घर है.
बलूचिस्तान का इतिहास चरमपंथ और मानवाधिकारों के उल्लंघन से भरा हुआ है.
बलूचिस्तान की ईरान और तालिबान के नियंत्रण वाले अफ़ग़ानिस्तान के साथ एक अस्थिर सीमा है. अरब सागर का एक विशाल समुद्र तट भी इसके हिस्से में है.
बलूचिस्तान का नाम बलूच नाम की जनजाति पर आधारित है. यह सदियों से यहां रहती आई है. बलूच सबसे बड़ा जातीय समूह है, उसके बाद पश्तून हैं. बलूच पाकिस्तान के पड़ोसी ईरानी प्रांत सिस्तान-बलूचिस्तान के साथ-साथ अफ़ग़ानिस्तान में भी रहते हैं.

बलूचिस्तान गैस, खनिजों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मामले में पाकिस्तान के सबसे अमीर प्रांत के रूप में जाना जाता है.
चीन की ओर से वित्त पोषित अरबों की परियोजना चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) का एक बड़ा हिस्सा यहीं है.
यह परियोजना चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 'बेल्ट एंड रोड' पहल का हिस्सा है. इसमें ओमान की खाड़ी के पास ग्वादर शहर में बने बंदरगाह को एक महत्वपूर्ण प्वाइंट के रूप में देखा जाता है.
चीन इस इलाके में खनन परियोजनाओं और ग्वादर में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण से भी जुड़ा हुआ है. इसका पाकिस्तान के चरमपंथी समूह बढ़-चढ़कर विरोध करते हैं.
वहीं कनाडाई खनन कंपनी, बैरिक गोल्ड की बलूचिस्तान में रेको डिक नाम की खदान में 50 फीसदी हिस्सेदारी है. इसे तांबे और सोने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अविकसित साइटों में से एक माना जाता है.

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पाकिस्तान और ईरान के बीच तनाव
पाकिस्तान और ईरान दोनों के स्थानीय समूह बलूचिस्तान में अधिक स्वायत्तता के लिए दशकों से संघर्ष कर रहे हैं.
16 जनवरी को पाकिस्तान पर ईरान की ओर से किए गए हमले के बाद से तनाव बढ़ गया. पाकिस्तान का कहना है कि ईरान के हमले में दो बच्चों की मौत हो गई.
पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में ईरानी क्षेत्र के अंदर मिसाइल हमला किया. ईरान का कहना है कि इस हमले में नौ लोगों की मौत हो गई.
ईरान का दावा है कि वह चरमपंथी समूह 'जैश अल-अद्ल' को निशाना बना रहा था, जो उसके खिलाफ सक्रिय है.
वहीं पाकिस्तान का कहना है कि उसका लक्ष्य ईरान के दो 'आतंकवादी' समूहों, 'बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी' (बीएलए) और 'बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट' (बीएलएफ) के ठिकानों को निशाना बनाना था.
पाकिस्तान का हमला 1980 के दशक के बाद से ईरान पर किसी दूसरे देश का पहला जमीनी हमला था.
पाकिस्तान ने यह हमला तब किया है जब ग़ज़ा युद्ध तेज़ होने से मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ गया है. ईरान ने उसी हफ़्ते इराक और सीरिया में भी हमले किए, जिस हफ़्ते उसने पाकिस्तान पर हमला किया था.
पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत पिछले काफी लंबे समय से अपने प्राकृतिक संसाधनों के बड़े पैमाने पर हो रहे दोहन से जूझ रहा है.
वहां विद्रोह और अशांति बढ़ने का यह एक प्रमुख कारण है. स्थानीय लोग, खासकर बलूच सरकारों पर बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन कर मुनाफा कमाने और इलाके के विकास की उपेक्षा करने का आरोप लगाते रहे हैं.
ब्रिटिश साम्राज्य से पाकिस्तान की आजादी के बाद बलूचों के लिए एक अलग देश की मांग को लेकर 1948 से ही चरमपंथी विद्रोह की शुरुआत हो गई थी.
यह विद्रोह 1950, 1960 और 1970 के दशक तक कई चरणों में हुआ. लेकिन सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में 2003 से विद्रोही गतिविधियां काफी बढ़ गईं. उन्होंने बलूचिस्तान में चरमपंथ के खिलाफ कई अभियान चलाए.
सबसे विवादास्पद अभियानों में से एक में मशहूर बलूच नेता नवाब अकबर खान बुगती की हत्या कर दी गई.

इस इलाके में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों के खूनी उग्रवाद विरोधी अभियानों और कार्रवाई में कथित तौर पर हजारों लोग लापता हो गए.
कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने 'इन लोगों को उठाया और टार्चर करने के बाद उन्हें मार दिया.' हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता है.
वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स (वीबीएमपी) के मुताबिक, बलूचिस्तान से 7,000 से ज्यादा लोग लापता हैं. लेकिन जबरन गायब किए जाने के मामलों की जांच करने वाले आयोग का कहना है कि अक्टूबर 2023 तक बलूचिस्तान में इसके केवल 454 सक्रिय मामले हैं.
वहीं पाकिस्तान के केयरटेकर प्रधानमंत्री ने हाल ही में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि यह संख्या 'अतिरंजित' है. उनका दावा था कि बलूचिस्तान में केवल 50 लोग ही लापता हैं.
इनमें से कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. पीड़ित परिवार की महिलाओं और अन्य सदस्यों का एक बड़ा समूह इस्लमाबाद में प्रदर्शन कर रहा है.
उनकी मांग है कि लापता लोगों को वापस लाया जाए और इलाके में लोगों की हत्या और अगवा करना रोका जाए.

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बलूचिस्तान में कौन से चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं?
बलूचिस्तान प्रांत में कई चरमपंथी समूह सक्रिय हैं. लेकिन इनमें से दो सबसे अधिक सक्रिय हैं. ये हैं बीएलएफ और बीएलए.
ये दावा किया जाता है कि समूह पाकिस्तानी जमीन पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ काम करते हैं. हालांकि पाकिस्तान का दावा है कि ये दोनों संगठन ईरान और कभी-कभी अफ़ग़ानिस्तान में भी अपने ठिकाने बनाते हैं.
पाकिस्तान ईरान सरकार पर इन समूहों के नेताओं और चरमपंथियों को पनाहगाह देने का आरोप लगाता रहा है, हालांकि ईरान इससे इनकार करता है. पाकिस्तान ये आरोप लगाता है कि भारत बलूचिस्तान में कुछ गुटों की आर्थिक मदद करता है. भारत इन आरोपों से इनकार करता है.
बीते दो सालों में पाकिस्तान सरकार ने बीएलए और पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) के संयुक्त हमलों की खबरों पर अत्यधिक चिंता जताई है.
टीटीपी अफ़ग़ान पाकिस्तान सीमा पर सक्रिय सशस्त्र इस्लामी चरमपंथी समूहों का एक अंब्रेला आर्गेनाइजेशन हैं.

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बीएलए पाकिस्तान की सत्ता को सबसे अधिक चुनौती देने वाला चरमपंथी संगठन है. ब्रिटेन और अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने इस समूह को 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन' घोषित किया हुआ है.
हाल के सीलों में बीएलए ने अपने हमले तेज़ कर दिए हैं. उसने अब बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को निशाना बनाना छोड़कर इलाके की परियोजनाओं में काम कर रहे चीनी नागरिकों पर ध्यान देना शुरू किया है.
अन्य चरमपंथी संगठनों की तरह बीएलएफ बलूचिस्तान में अक्सर गैस परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा चौकियों को निशाना बनाता है.
यह समूह 2011 से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, विदेशी मजदूरों, सरकारी सहयोगियों और पत्रकारों पर हमले कर रहा है.
बीएलएफ की स्थापना 1964 में सीरिया में हुई थी. शुरू में यह ईरानी बलूच विद्रोह में शामिल था. यह ईरानी सरकार के खिलाफ बलूच समूहों का विद्रोह था.
पांच साल के संघर्ष के बाद बीएलए ने ईरान के शाह के खिलाफ लड़ाई खत्म करने के लिए बातचीत की.
इसके बाद, बीएलएफ और अन्य बलूच संगठन 1970 के दशक में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ हो गए. इन संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान में शरण ली.
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