पाकिस्तान-ईरान हमले: दोनों पड़ोसी एक दूसरे पर क्यों कर रहे हमले, क्या तनाव और बढ़ेगा

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- Author, रूहान अहमद
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, इस्लामाबाद से
पाकिस्तान ने गुरुवार सुबह कहा कि उसने ईरान के दक्षिण में सिस्तान-बलूचिस्तान इलाक़े के एक गाँव में आतंकवादियों के ठिकानों पर हमला किया.
इन हमलों में अब तक नौ लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है.
पाकिस्तानी के विदेश मंत्रालय ने 18 जनवरी सुबह किए गए हमलों के बारे में बताया, "गुरुवार सुबह पाकिस्तान ने ईरान के सिस्तान बलूचिस्तान प्रांत में आतंकवादियों के चिह्नित ठिकानों पर सुनियोजित हमले किए हैं."
पाकिस्तान की सेना ने इन हमलों के बारे में एक बयान जारी कर कहा, "हमने ईरान के भीतर पाकिस्तान विरोधी विद्रोही गुटों के ठिकानों को निशाना बनाया है. ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर 'मर्ग बर सर्मचार' नाम का अभियान (ईरान में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के आतंकवादियों के नेता के ख़ात्मे का अभियान) चलाया गया था."
पाकिस्तान के हमलों से पहले ईरान की मिसाइलों ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कथित तौर पर आतंकवादी संगठन जैश-अल-अदल के ठिकानों को निशाना बनाया था.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, ईरान के हमलों में दो बच्चों की जान गई और तीन लड़कियां घायल हो गईं. इस हमले की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने तेहरान में मौजूद अपने राजदूत को वापस बुला लिया.
लेकिन एक दूसरे के इलाक़ों के भीतर हमले करने के बाद भी दोनों दावा कर रहे हैं कि हमलों का निशाना आम नागरिक नहीं बल्कि आतंकवादी थे. पाकिस्तान और ईरान दोनों ने कहा है कि उन्होंने अपने पड़ोसी की ज़मीन पर बलोच विद्रोहियों के ठिकानों पर हमले किए हैं.
पाकिस्तान के हमलों के बारे में जो पता है

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पाकिस्तानी सेना ने कहा है कि उन्हें मिली ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर उन्होंने ईरान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ़) के ठिकानों को निशाना बनाया है. इन दोनों गुटों पर पाकिस्तान के भीतर हमलों को अंजाम देने का आरोप है.
आर्मी का कहना है कि उन्होंने इन हमलों में आत्मघाती ड्रोन, रॉकेट, मिसाइलों और दूसरे हथियारों का इस्तेमाल किया. सेना ने कहा कि उन्होंने पूरी सतर्कता बरती ताकि इस अभियान में 'किसी आम नागरिक' को कोई नुक़सान न हो.
अपने बयान में सेना ने कई "आतंकवादियों" के नाम भी साझा किए जिनका कथित तौर पर इन ठिकानों पर नियंत्रण है. सेना ने कहा कि "पाकिस्तान के लिए उसकी क्षेत्रीय अखंडता और अपने नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है."
वहीं ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के डिप्टी गवर्नर जनरल अली रेज़ा मरहमाती ने एक ईरानी टेलीविज़न को बताया कि हमला स्थानीय समयानुसार 4 बज कर 5 मिनट पर हुआ. ये जगह ईरान की राजधानी तेहरान से क़रीब 1800 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में है.
बलोच लिबरेशन आर्मी, बलोच लिबरेशन फ्रंट और जैश-अल-अद्ल कौन हैं?

बीते कई दशकों से पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कई बलोच अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं.
पाकिस्तान में सुरक्षाबलों, पुलिस और अन्य अहम जगहों पर घातक हमलों के लिए ये अलगाववादी संगठन ज़िम्मेदारी लेते रहे हैं.
इनमें दो अहम संगठन हैं- बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ़) जिसका नेतृत्व डॉक्टर अल्लाह नज़र बलोच करते हैं और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) जिसका नेतृत्व बशीर ज़ेब करते हैं.
बीते कुछ सालों से पाकिस्तानी अधिकारी दावा करते रहे हैं कि इन अलगाववादी संगठनों से जुड़े कुछ विद्रोहियों ने सीमा पारकर ईरान में पनाह ली है.
पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद बलोच लिबरेशन फ्रंट ने एक बयान जारी कर संगठन का कोई ठिकाना ईरान में होने की बात से इनकार किया है. साथ ही बयान में ये भी दावा किया गया है कि हमले में उसके कोई लड़ाके घायल नहीं हुए हैं.
माना जाता है कि बीएलएफ़ नाम का ये संगठन बलूचिस्तान के मकरान और इसके आसपास के इलाक़ों में सक्रिय है. हाल के दिनों में पाकिस्तानी सुरक्षाबलों पर हुए कई हमलों की ज़िम्मेदारी बीएलएफ़ ने ली है.
बीएलएफ़ एक प्रतिबंधित संगठन है. जनवरी 2022, में बीएलएफ़ ने बलूचिस्तान के ग्वादर में पाकिस्तानी सेना के एक सुरक्षा नाके पर हमला किया था. इस हमले में सेना के 10 जनाव मारे गए थे.
इसके अलावा बीएलएफ़ के लड़ाके इस इलाक़े में काम करने के लिए आ रहे प्रवासी मज़दूरों और प्रांत के आम नागरिकों पर हमले करते रहे हैं.

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रही बात बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए की, तो ये संगठन 1970 की शुरूआत में उस वक़्त अस्तित्व में आया था, जब बलूचिस्तान में पाकिस्तान सरकार के ख़िलाफ़ एक सशस्त्र विद्रोह उठ खड़ा हुआ था. उस वक़्त देश में प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भूट्टो के नेतृत्व की सरकार थी.
सैन्य तानाशाह नेता ज़िया उल-हक़ के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद बलोच राष्ट्रवादी नेताओं के साथ बातचीत हुई. इसके बाद यहां हुए सशस्त्र विद्रोह अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया और बीएलए की हरकतें दिखनी भी बंद हो गईं.
हालांकि पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के शासनकाल में एक बार फिर ये संगठन सिर उठाने लगा. बलोच राष्ट्रवादी नेता नवाब ख़ैर बख़्श मर्री को हाई कोर्ट के एक जज की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद बीएलए फिर से सक्रिय हो गया.
साल 2000 के आसपास बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाक़ों में सरकार से जुड़ी इमारतों और सुरक्षाबलों पर कई सिलसिलेवार हमले हुए हैं. हाल के दिनों में इन हमलों में बढ़ोतरी हुई है और हिंसा बलूचिस्तान के दूसरे इलाक़ों में भी फैल रही है.
बीएलए इनमें से अधिकतर हमलों की ज़िम्मेदारी लेता रहा है. साल 2006 में पाकिस्तान सरकार ने इस संगठन को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में डाल दिया.
बलूचिस्तान की ज़मीन से काम करने वाला ये संगठन चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का विरोध करता रहा है. हाल के दिनों में इस संगठन के लड़ाकों ने आत्मघाती हमलों के ज़रिए पाकिस्तान में चीन के ठिकानों को निशाना बनाया है.
इस तरह के पहले हमले की ज़िम्मेदारी बीएलए ने साल 2018 में ली थी. अगस्त 2018 में संगठन ने दलबन्दिन शहर में सेन्दाक सोने और तांबे की ख़ान में काम करने के लिए मज़दूरों को ले जा रही एक बस पर हमला किया था. बस में चीनी मज़दूर सवार थे. हमले में आत्मघाती हमलावर क मौत हुई जबकि अन्य लोग बच गए थे.
इसके बाद नवंबर 2018 में कराची में चीन के कंसुलेट पर हमला हुआ, इसकी ज़िम्मेदारी बीएलए ने ली. तीन बंदूकधारियों और आत्मघाती हमलावरों ने चीनी कंसुलेट पर हमला किया था जिसमें कम से कम चार लोगों की जान गई थी.

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जैश अल-अद्ल (यानी न्याय और समानता के लिए सेना) एक सशस्त्र विद्रोही गुट है जो ईरान की सरकार के ख़िलाफ़ है.
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में सक्रिय ये संगठन ख़ुद को "सुन्नी मुसलमानों के हक़ों की रक्षा करने वाला" बताता है. ईरान ने पाकिस्तान में इसी संगठन के ठिकानों को निशाना बनाया था.
हाल के वक्त में सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ईरान के सुरक्षाबलों पर कई हमलों हुए हैं जिसकी ज़िम्मेदारी इस संगठन ने ली है. ईरान का कहना है कि इस संगठन को अमेरिका और इसराइल का समर्थन हासिल है.
अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग का कहना है कि साल 2005 में ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदिनेजाद पर हुए हमले के तार इसी संगठन से जुड़े हैं.
2009 में ईरान ने इस विद्राही संगठन के प्रमुख अब्दुल मलिक रेगी को गिरफ्तार किया था. उन पर ईरानी सुरक्षाबलों पर बम हमला करने का आरोप हैं साथ ही उन्हें ईरान ने अमेरिका और यूके का एजेंट बताया. ईरान ने साल 2010 में मौत की सज़ा दी.
रेगी की गिरफ्तारी के बारे में उस वक्त ईरान में पोस्टेड पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक मोहम्मद अब्बासी ने कहा था कि उनकी गिरफ्तारी में पाकिस्तान की अहम भूमिका थी.

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जो हो रहा है वो अभी क्यों हो रहा है?
विश्लेषक सैय्यद मोहम्मद अली ने बीबीसी को बताया कि मौजूदा वक्त में ईरान पर काफी अधिक दबाव था- उस पर आंतरिक दबाव तो था ही, उस पर उसके सहयोगी चरमपंथी संगठनों हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती विद्रोहियों की तरफ से पुख़्ता क़दम उठाने को लेकर दबाव था.
वो कहते हैं कि ईरान ने इराक़, सीरिया और फिर पाकिस्तान के इलाके़ में हमला किया. इसका उद्देश्य उसके आंतरिक मुद्दों और मध्य पूर्व में स्थिति से दुनिया का ध्यान भटकाना था.
सैय्यद मोहम्मद अली कहते हैं कि जिस रात ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मिसाइलें दाग़ी, उसी दिन दावोस में पाकिस्तानी और ईरानी अधिकारियों की मुलाक़ात हुई थी. लेकिन पाकिस्तान पर ईरान का हमला बिना उकसावे के हुआ था, इस कारण इसकी प्रतिक्रिया हुई और पाकिस्तान ने ईरान पर हमले किए.
वॉशिंगटन में मौजूद न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रेटेजी एंड पॉलिसी के डॉक्टर कामरान बुखारी कहते हैं, "पाकिस्तान ने प्रतिक्रिया देने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि वो नहीं चाहता कि जिस तरह ईरान इराक़ के साथ बर्ताव करता है, वैसा बर्ताव पाकिस्तान के साथ भी करे."
वहीं क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय संबंध मामलों के विभाग के प्रोफ़ेसर कन्दील अब्बास ने बीबीसी को बताया कि ईरान और पाकिस्तान की सीमा के पास दोनों ही तरफ के इलाक़ों में अलगाववादी संगठन और विद्रोही गुट फैले हुए हैं जो दोनों के लिए चुनौती बने हुए हैं.
वो कहते हैं कि ईरान और पाकिस्तान दोनों ने ही एक दूसरे की सहमति से सीमा के पार विद्रोहियों के ठिकानों को निशाना बनाया है, हालांकि दोनों ही मुल्कों के अधिकारियों ने न तो इसकी पुष्टि की है, न ही इससे इनकार किया है.
वो कहते हैं कि साल 2013 तक सीमा के आसपास एक हज़ार किलोमीटर के इलाक़े में मानव तस्करी, नशे की तस्करी और हिंसा की गतिविधियों के बावजूद न तो ईरान ने और न ही पाकिस्तान ने सैनिकों की तैनाती की थी.
वो कहते हैं कि पाकिस्तान और ईरान दोनों ही विद्रोही संगठन जैश अल-अद्ल (जिसे ईरान ने निशाना बनाया) को ख़तरा मानते रहे हैं. ऐसे में दोनों ही इस मौक़े का फायदा अपने हिसाब से करना चाहते हैं.
अब आगे क्या होगा?

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ईरान और पाकिस्तान पर नज़र रखने वाले जानकार मानते हैं कि दोनों मुल्कों के बीच पैदा हुआ मौजूदा तनाव का नकारात्मक असर मध्य पूर्व के पूरे इलाक़े पर पड़ सकता है
डॉक्टर कामरान बुखारी कहते हैं, "दोनों मुल्कों के बीच हमलों का पहला दौर ख़त्म हो चुका है और गेंद एक बार फिर ईरान के पाले में है. ये देखना होगा कि सिस्तान-बलूचिस्तान में पाकिस्तान के हमले के बाद वो क्या प्रतिक्रिया देता है."
वो कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि अब और हमले नहीं होंगे.
वो कहते हैं कि ईरान की ज़मीन पर ईरानी नागरिकों या चरमपंथी संगठनों की बजाय पाकिस्तान विरोधी आतंकवादी संगठनों को निशाना बनाने के पाकिस्तान के फ़ैसले की वजह से ये हो सकता है कि ये माना जाए कि पाकिस्तान ने बिना उकसावे का कार्रवाई तो की लेकिन वो तनाव को और बढ़ाना नहीं चाहता. हालांकि वो तनाव और बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं करते.
हालांकि पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक बक़ीर सज्जाद मानते हैं कि आने वाले वक़्त में दोनों मुल्कों के बीच तनाव और बढ़ सकता है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "ऐसा नहीं लगता कि ईरान के भीतर विद्रोही संगठनों को निशाना बनाने की जवाबी कार्रवाई के बाद दोनों मुल्कों में तनाव आसानी से कम हो जाएगा."
"ईरान के कट्टरपंथी सरकार पर पाकिस्तान से बदला लेने के लिए दवाब डालेंगे. ऐसे में बलूचिस्तान के इलाक़े में एक बार फिर आतंकी गुट सक्रिय हो सकते हैं जो दोनों मुल्कों के बीच पहले ही भरोसे की कमी को और हवा दे रहे हैं."
वो कहते हैं, "इससे इस पूरे इलाक़े में पहले से ही जटिल हुई सुरक्षा स्थिति और जटिल हो सकती है."
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