ईरान-पाकिस्तान संबंध: बात आख़िर यहाँ तक कैसे और क्यों पहुँची?

ईरान का हमला

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, ईरान ने पाकिस्तान से पहले सीरिया और इराक़ में भी हमले किए
    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

ईरान की ओर से पाकिस्तान में कथित चरमपंथी संगठन जैश अल-अद्ल के ठिकानों पर हमलों से मध्य पूर्व में जारी हिंसा की आंच अब इस क्षेत्र के बाहर तक जाने की आशंका बढ़ा दी है.

पाकिस्तान की सरकार ने इन हमलों की पुष्टि की है और बताया है कि इसमें दो बच्चों की मौत हो गई है.

पाकिस्तान ने हमलों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है और कहा कि ये एकदम 'अस्वीकार्य' है.

पाकिस्तान ने ईरान को चेतावनी दी है और कहा कि "बिना उकसावे के हमारे हवाई क्षेत्र का उल्लंघन करने और देश के भीतर हमला करने की हम निंदा करते हैं. ये पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं."

ईरान दावा करता है कि पाकिस्तान से सटती उसकी सीमा के पास सक्रिय सुन्नी चरमपंथी गुट जैश-अल-अद्ल को अमेरिका और इसराइल का समर्थन मिलता है. अतीत में इस संगठन ने ईरान के सुरक्षाबलों पर हुए कई हमलों की ज़िम्मेदारी भी ली है.

हालांकि, फिर भी जानकार मानते हैं कि कड़े शब्दों में हमले की निंदा करने के बावजूद पाकिस्तान को ये अच्छे से पता है कि इन सबमें बहुत कुछ दांव पर है और इसलिए वह जैसे-को-तैसा वाला रुख अपनाने से बचेगा.

पाकिस्तान में ईरान के सबसे बड़े अधिकारी को ताज़ा घटनाक्रम पर नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए तलब किया गया.

ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के इराक़ और सीरिया में कई ठिकानों पर मिसाइल हमले करने के अगले ही दिन ईरान की सेना ने पाकिस्तान में हमला किया. पाकिस्तान के पूर्व मंत्री और विदेश नीति विशेषज्ञ मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं कि अचानक हुआ हमला पाकिस्तान के लिए भी चौंकाने वाला था.

वह कहते हैं, "ताज़ा घटनाक्रम से चंद घंटे पहले ही ईरान के विदेश मंत्री ने पाकिस्तान के केयरटेकर पीएम से दावोस में बड़े अच्छे से मुलाकात की. इस्लामाबाद स्तब्ध है. इस एक्शन पर दोनों देशों के बीच न तो कोई संवाद था और न ही तालमेल."

"मेरी नज़र में ईरान रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के इस गुप्त अभियान के गहरे मायने हैं और इसे व्यापक स्तर पर देखा जाना चाहिए."

दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई हाई प्रोफ़ाइल मुलाकात ही नहीं बल्किन ईरान और पाकिस्तान के नौसेनाओं ने होरमुज़ स्ट्रेट में एक दिवसीय अभ्यास भी किया था. ईरान की समाचार एजेंसी ईरना ने इस बारे में मंगलवार को ही ख़बर भी प्रकाशित की थी.

पाकिस्तान-ईरान

कैसे दूर होते गए ईरान-पाकिस्तान

मुशाहिद कहते हैं कि हमले द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है. ये ऐसे समय में इस्लामी एकता को कमज़ोर कर रहा है जब पहले ही 'ग़ज़ा में जनसंहार हो रहा है.'

वह ईरान के रवैये की आलोचना करते हुए कहते हैं कि अपना ग़ुस्सा इसराइल की ओर मोड़ने की बजाय ईरान ने 24 घंटे के अंदर तीन मुस्लिम देशों पर हमला कर दिया.

वह कहते हैं, "इस तरह के पाखंड और दोहरे मापदंडों की कड़ी निंदा होनी चाहिए."

इतिहास में भी पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. ईरान पहला देश था जिसने 1947 में पाकिस्तान को देश के तौर पर मान्यता दी थी. ईरान में ही पाकिस्तान ने अपना पहला दूतावास खोला था. शीत युद्ध के समय भी दोनों देश एक-दूसरे का सहयोग करते रहे और एक ही भूराजनीतिक धड़े का हिस्सा रहे.

वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान ईरान ने पाकिस्तान का साथ दिया था. हालांकि, साल 1979 में ईरान में हुई क्रांति और 'अफ़ग़ान जिहाद ' के दौरान पाकिस्तान का सऊदी से प्रेरित इस्लाम के वहाबी स्वरूप के प्रति झुकाव ने गलतफ़हमियां पैदा कर दीं.

पाकिस्तान-ईरान
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

1990 के दशक में ईरान पर पाकिस्तानी शियाओं के ज़रिए, देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं. वहीं ईरान को भी पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार को समर्थन गवारा नहीं था.

भारत के साथ ईरान की बढ़ती दोस्ती और पाकिस्तान की अमेरिकी से नज़दीकियों ने दोनों देशों को और दूर कर दिया.

साल 2018 में ईरान अपनी बंदरगाह चाबहार के एक हिस्सा का नियंत्रण भारत को देने से संबंधित एक समझौता किया था. इस्लामाबाद को बात पसंद नहीं आई थी.

पाकिस्तान में चाबहार समझौते को गवादर पोर्ट के सामरिक महत्व को कम करने के लिए उठाया कदम माना गया था.

लेकिन कई बार रिश्तों में तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच कभी कोई बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ था. हालांकि दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों को अपने पूरी संभावनाओं तक लाने में असफल ही रहे हैं.

इस्लामाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ की रिसर्च फ़ैलो अरहामा सिद्दिक़ा के मुताबिक साल 2021 के बाद से दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधार की दिशा में थे.

वे कहती हैं, “द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना हो चुका है. सरदह की सुरक्षा से बारे में दोनों देशों के बीच सहयोग, समन्वय और कम्युनिकेशन बढ़ा है. नियमित सैन्य अभ्यास हुए हैं. कई बॉर्डर मार्केटों का गठन हुआ है ताकि स्मगलिंग को रोका जा सके. हाल ही मेंदोनों देशों के बीच एक बिजली वितरण की लाइन भी चालू की गई थी.”

अरहामा कहती हैं कि इस वक्त भी ईरान का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में मौजूद है.

ईरान ने पाकिस्तान पर क्यों किया सरप्राइज़ अटैक?

 पाकिस्तान के केयरटेकर पीएम अनवारुल हक़ काकड़

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के केयरटेकर पीएम अनवारुल हक़ काकड़

पाकिस्तानी सेना के प्रमुख असीम मुनीर ने जुलाई 2023 में तेहरान का दौरा किया था. वहां वो अपने समकक्ष से मिले थे. सेनाध्यक्ष बनने के बाद मुनीर का किसी भी मुल्क का ये पहला दौरा था. पिछले साल अगस्त में ईरान के विदेश मंत्री दो दिन के इस्लामाबाद दौरे पर आए थे जहां अफ़ग़ानिस्तान पर बातचीत हुई थी.

इस पृष्ठभूमि में ईरानी हमलों को समझ पाना मुश्किल हो रहा है.

अरहामा कहती हैं, “पाकिस्तान बड़े ध्यान से हालात पर निगरानी रख रहा है. वो अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकता पर साथ ही वो अपने लिए एक और फ़्रंट नहीं खोलना चाहता. भारत और अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्ते पहले ही तनावपूर्ण हैं. पाकिस्तान नहीं चाहता कि एक और पड़ोसी के साथ उसके रिश्तों में खटास आए.”

पाकिस्तान के पूर्व डिप्लोमेट इकरम सहगल कहते हैं कि ईरान और सऊदी अरब के बीच रिश्तों में पाकिस्तान अब तक एक संतुलन बनाने में सफल रहा है. पाकिस्तान के तेहरान के साथ संबंध ठीक-ठाक रहे हैं.

ऐसे मौके आए हैं जब पाकिस्तान सऊदी कैंप का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. वर्ष 2015 में सऊदी गठबंधन ने यमन के गृह युद्ध में हस्तक्षेप करना शुरू किया था. उसने पाकिस्तान को भी इसमें शामिल होने की पेशकश की थी लेकिन पाकिस्तान से इससे इंकार कर दिया था.

पाकिस्तान का फ़ैसला सऊदी अरब को नाग़वार गुज़रा था लेकिन पाकिस्तान ने यमन के युद्ध ईरान की भूमिका के मद्देनज़र ही सऊदी गठबंधन में शामिल होने से मना किया था.

पाकिस्तान नहीं चाहता था कि यमन के शिया-सुन्नी संघर्ष का साया उसके देश पर भी पड़े. हालांकि हाल के दिनों में सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों की पिघली बर्फ़ से पाकिस्तान के ऐसे दवाबों से मुक्त कर दिया है.

इकरम सहगल कहते हैं कि ईरान भी नहीं चाहेगा की वो अपने एक और पड़ोसी के साथ अपने संबंध ख़राब करे.

सहगल कहते हैं कि ईरान पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहा है. इसके अलावा वो यमन, सीरिया और फ़लस्तीन में कई क्षेत्रीय संघर्षों में शामिल है. आर्थिक प्रतिबंधों को झेलते हुए आख़िर ईरान कितनों संघर्षों में खुद को शामिल कर सकता है.

इकरम सहगल कहते हैं, “मुझे यक़ीन है कि दोनों देश इस मसले को सुलझा लेंगे और हालात बदतर नहीं होंगे. पाकिस्तान को ऐसे सभी गुटों से सख़्ती से निपटना चाहिए जो सीमा पार जाकर हमले करते हैं. उसे अपनी ज़मीन का प्रयोग किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ नहीं होने देना चाहिए. साथ ही ईरान को भी भविष्य में ऐसे क़दम नहीं उठाना चाहिए.”

“ईरान को चाहिए कि ऐसे हमले करने से पहले वो पाकिस्तान सेना के साथ अपनी बात साझा करे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्षेत्र में एक और युद्ध का ख़तरा मंडरा सकता है. ऐसा युद्ध जो यहां के लोगों के लिए बोझ होगा.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)