पाकिस्तान में सक्रिय वह संगठन, जिस पर ईरान ने मिसाइल से किया हमला

ईरान की सेना मिसाइल दागते हुए

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    • Author, स्नेहा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाक़े में ईरान के मिसाइल हमले की वजह से दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल है.

पाकिस्तान ने कहा है कि ईरान की ओर से किए गए इस हमले में दो बच्चों की मौत हुई है और तीन अन्य घायल हैं.

वहीं, ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया है कि ईरान ने पाकिस्तान में चरमपंथी समूह 'जैश अल-अदल' के दो ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया है.

ईरान लंबे समय से इस संगठन पर आरोप लगाता रहा है कि इसके सदस्य सीमा पार करके ईरान में घुसते हैं और उनके सुरक्षाकर्मियों की हत्या करते हैं.

हालांकि, पाकिस्तान ने ईरान की इस कार्रवाई को अवैध क़रार देते हुए कहा कि इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं.

दोनों ही देश क़रीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं.

इसमें मुख्य रूप से सिस्तान-बलूचिस्तान का इलाक़ा है. ईरान ने पाकिस्तान में जिस चरमपंथी संगठन पर कार्रवाई की बात कही है, वो लंबे समय से दोनों मुल्कों के बीच तनाव का बड़ा मुद्दा रहा है.

जैश अल-अदल ने हमले के बारे में क्या कहा?

ईरान-पाकिस्तान की सीमा

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ईरान के हमले पर चरमपंथी समूह जैश अल-अदल का भी बयान आया है.

जैश अल-अदल ने टेलीग्राम चैनल 'अदल मीडिया' पर कहा, "ईरान रिवॉल्युशनरी गार्ड्स ने संगठन के कुछ सदस्यों के घरों को निशाना बनाया. इस हमले में कम से कम छह आत्मघाती ड्रोन और कई मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें दो सदस्यों के घर नष्ट हो गए और उनके परिवार के सदस्यों की मौत हुई और वो घायल भी हुए."

समूह ने कहा है कि इस हमले में दो बच्चे की मौत हुई और दो महिलाएं और एक किशोरी गंभीर रूप से घायल हैं.

ईरान-पाकिस्तान संबंध पर क़मर आग़ा

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ईरान ने ये हमला तब किया है, जब पाकिस्तान के केयरटेकर प्रधानमंत्री अनवर उल-हक़ काकड़ की मुलाक़ात दावोस में ईरानी विदेश मंत्री से हुई है.

इसराइल-हमास युद्ध, लाल सागर में हूती विद्रोहियों के मालवाहक जहाजों पर हमले और अमेरिकी कार्रवाई के बीच ईरान के इस क़दम को भूराजनीतिक दृष्टिकोण से बड़े क़दम के रूप में देखा जा रहा है.

जैश अल-अदल संगठन क्या है?

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जैश अल-अदल एक सुन्नी चरमपंथी समूह है. ये संगठन ख़ुद को ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में सुन्नी अधिकारों का रक्षक बताता है.

पिछले कुछ सालों में इसका ईरान के सुरक्षा बलों के साथ ख़ूनी संघर्ष चल रहा है और समूह ने ईरान में कई हमलों की ज़िम्मेदारी भी ली है.

अमेरिका के डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस के अनुसार, जैश अल-अदल नाम का समूह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में "सबसे सक्रिय और प्रभावी" सुन्नी चरमपंथी संगठन है.

इस संगठन का नाम जुनदल्लाह हुआ करता था लेकिन साल 2012 में इसका नाम बदल गया.

नेशनल इंटेलिजेंस की वेबसाइट के अनुसार, इसे 'पीपल्स रेसिस्सटेंस ऑफ़ ईरान' भी कहा जाता है.

अब्दुल मलिक रेगी ने 2002 या 2003 में इस संगठन को बनाया था और वो कई साल तक इसके नेता रहे.

ईरान ने साल 2010 में उन्हें गिरफ़्तार करके मौत की सज़ा दी.

साल 2011 से सलाहुद्दीन फ़ारूकी इस समूह के नेता हैं और जैश अल-अदल उन्हें 'अमीर' और 'बलूचिस्तान जिहाद' का नेता बताता है.

बीबीसी फ़ारसी सेवा के अनुसार, ईरान इस समूह को सऊदी अरब और अमेरिकी खु़फ़िया एजेंसियों से जुड़ा हुआ और आतंकवादी संगठन मानता है. इसे 'जैश-अल-ज़ुल्म' बताता है.

ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल इस संगठन को ट्रेनिंग करने के लिए करने दे रहा है.

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26 अक्टूबर, 2013: इस संगठन ने ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में एक सैन्य चौकी पर हमले की ज़िम्मेदारी ली. इसमें ईरान के 14 बॉर्डर गार्ड्स मारे गए थे.

आठ फ़रवरी 2014: इस संगठन ने ईरान के पांच बॉर्डर गार्ड्स को पाकिस्तान की सीमा के नज़दीक से अपहरण करने की ज़िम्मेदारी ली.

17 फरवरी, 2014: ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर ईरान में पाकिस्तान के राजदूत को तलब किया. बाद में इनमें से चार को रिहा कर दिया गया.

26 अप्रैल, 2017: इस संगठन के साथ झड़प में 10 ईरानी बॉर्डर गार्ड्स मारे गए.

28 सितंबर 2018: आईआरजीसी के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद पाकपुर ने कहा कि उनके नेतृत्व में सुरक्षाबलों ने जैश अल-अदल के दूसरे कमांडर मुल्ला हाशीम नोकरी को मार गिराया है.

दो जुलाई, 2019: अमेरिका ने इसे जुलाई, 2019 में आतंकवादी संगठन घोषित किया.

29 जनवरी, 2019: इस संगठन ने सिस्तान-बलूचिस्तान की राजधानी में दो विस्फ़ोट की ज़िम्मेदारी ली.

18 फरवरी, 2020: इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद पाकपुर ने सऊदी अरब पर इस संगठन को हथियार मुहैया कराने का आरोप लगाया.

15 दिसंबर, 2023: संगठन ने अपने टेलीग्राम चैनल पर सिस्तान-बलूचिस्तान के एक कस्ब के पुलिस थाने पर हमले की जिम्मेदारी ली.

ईरान-पाकिस्तान संबंध

जैश अल-अदल

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पिछले कुछ दिनों में इराक़ और सीरिया के बाद पाकिस्तान तीसरा देश है, जहाँ ईरान ने हमला किया है.

पाकिस्तान और ईरान के आपसी संबंध नाजुक ज़रूर हैं लेकिन अब तक ठीक ही रहे हैं और सीमा को लेकर भी उनके बीच विवाद नहीं है.

ये हमला ठीक उसी दिन हुआ है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और ईरान के विदेश मंत्री दावोस में मिले थे. और ईरान तथा पाकिस्तान की नौसेना ने फ़ारस की खाड़ी में संयुक्त सैन्य अभ्यास किया था.

ईरान पाकिस्तान को एक देश के रूप में सबसे पहले मान्यता देने वाले राष्ट्रों में से एक है.

दोनों देशों के संबंध ख़ास तनावपूर्ण नहीं रहे हैं लेकिन कुछ मुद्दों को लेकर तनातनी रहती है. इनमें मादक पदार्थों की तस्करी और सीमापार से चरमपंथी समूहों के हमले जैसे मुद्दे शामिल हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं कि दोनों देशों के बीच 'लव एंड हेट' वाला संबंध है. सीमा से लगे इलाक़े को लेकर दोनों ही देश समय-समय पर अपनी चिंताएं ज़ाहिर करते हैं.

शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल पाकिस्तान में इस सीमा के पास पहले भी हमले होते रहे हैं.

अप्रैल 2023 में पाकिस्तान की सेना ने कहा था कि बलूचिस्तान में एक चरमपंथी हमले में चार पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हुई थी.

उसका कहना था कि ईरान से सटी सीमा की तरफ़ से आए चरमपंथियों ने इस घटना को अंजाम दिया है.

बलूचिस्तान क्यों रहता है चर्चा में

बलूचिस्तान का पूरा इलाक़ा पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत, ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत और अफ़ग़ानिस्तान के निमरूज़ और हेलमंड समेत कुछ इलाकों से मिलकर बना है.

आर्थिक और सामाजिक पैमानों पर पाकिस्तान का बलूचिस्तान सबसे पिछड़े हुए राज्यों में से एक है.

क्षेत्रफल के हिसाब से ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी सबसे कम है.

इसकी सीमाएं ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है और यहां प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं.

यहां गैस, कोयला, तांबा और कोयला के बड़े भंडार हैं. लेकिन अब भी बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे ग़रीब प्रांत है.

इसके बाद भी ये विकास की वजह से तो बेहद कम और हिंसा की वजहों से ज़्यादा चर्चा में रहता है.

इस बारे में क़मर आग़ा कहते हैं, "इसकी कई वजहें हैं. संसाधन होने के बाद भी वहां ग़रीबी काफ़ी है. जनसंख्या भी काफ़ी कम है. पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को हमेशा एक उपनिवेश की तरह देखा है."

"यहाँ के लोग पाकिस्तान के साथ जुड़ना भी नहीं चाहते थे. यहां कई आंदोलन भी हुए हैं. इसमें कुछ सेक्युलर मिलिटेंट आंदोलन हैं, कुछ अलगाववादी ग्रुप्स हैं, कुछ इस्लामिक ग्रुप्स हैं."

आग़ा कहते हैं, "इस इलाक़े में हालात बहुत ख़राब हैं. चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर का फ़ायदा स्थानीय लोगों को मिल नहीं रहा है और इसकी वजह से इसका विरोध भी हुआ है."

"यहां बड़ी संख्या में चीनी मूल के लोग आ रहे हैं. कई-कई किलोमीटर के इलाक़े की घेराबंदी हो रखी है. चीन इसमें काम के लिए चीनी मूल के लोगों को साथ लाता है."

"ठेकेदारी भी पंजाब प्रांत के लोगों के हिस्से में ज़्यादा जाती है. यहां कोई बड़ा लीडर भी नहीं है. कई सारे छोटे समूह हैं, जिनके बीच आपस में भी लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं."

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चीन पाकिस्तान के बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट को शिनजियांग प्रांत से जोड़ने की परियोजना पर काम कर रहा है.

वहीं, भारत ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में चाबहार पोर्ट विकसित कर रहा है.

भारत के लिए चाबहार परियोजना रणनीतिक तौर पर एक महत्वपूर्ण रही है. भारत इसके ज़रिए ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग स्थापित करना चाहता है.

ईरान की पूर्वी सीमा में सिस्तान बलूचिस्तान प्रांत है जो पाकिस्तान के पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत से जुड़ा है. सीमा के पास के इन इलाक़ों में कम ही आबादी रहती है.

ईरान में बलोच लोगों की बड़ी आबादी सिस्तान-बलूचिस्तान में ही रहती है और ये सुन्नी हैं.

इनका दावा है कि शिया बहुल देश में इनके साथ प्रशासन भेदभाव करता है और इन्हें प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है.

ये ईरान के वंचित राज्यों में से एक है और मादक पदार्थ तस्करी का भी अहम मार्ग है.

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