ईरान और अमरीका एक-दूसरे के दुश्मन क्यों?

ट्रंप और रुहानी

इमेज स्रोत, Reuters

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

ईरान और अमरीका की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है. गाहे-बगाहे दोनों देशों के बीच तनाव की ख़बरें सारी दुनिया में हलचल पैदा कर देती है.

अब ईरान के सबसे ताक़तवर सैन्य कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी के अमरीकी हवाई हमले में मौत के बाद एक बार फिर दोनों देशों की दुश्मनी अपने चरम पर पहुँच गई है.

आख़िर अमरीका को ईरान फूटी आँखों क्यों नहीं सुहाता है? क्या है इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि?

1953 - तख़्तापलट से दुश्मनी की शुरुआत

अमरीका के साथ ईरान की दुश्मनी का पहला बीज पड़ा 1953 में जब अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान में तख़्तापलट करवा दिया. निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक़ को गद्दी से हटाकर अमरीका ने सत्ता ईरान के शाह रज़ा पहलवी के हाथ में सौंप दी.

मोहम्मद मोसद्दिक़

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सीआईए ने ईरान के पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक़ को सत्ता से बेदख़ल करवाया था

इसकी मुख्य वजह थी - तेल. धर्मनिरपेक्ष नीतियों में विश्वास रखने वाले ईरानी प्रधानमंत्री ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे. वो ईरानी शाह की ताक़त पर भी लगाम लगाना चाहते थे.

ये पहला मौक़ा था जब अमरीका ने शांति के दौर में किसी विदेशी नेता को अपदस्थ किया था. इस घटना के बाद इस तरह से तख़्तापलट अमरीका की विदेश नीति का हिस्सा बन गया.

1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा थी 1979 की ईरानी क्रांति.

1979: ईरानी क्रांति

1971 में ईरान के ख़ूबसूरत और ऐतिहासिक शहर पर्सेपोलिस में एक शानदारी पार्टी हुई.

ईरान के शाह ने इसमें यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो, मोनाको के प्रिंस रेनीअर और प्रिंसेस ग्रेस, अमरीका के उपराष्ट्रपति सिप्रो अग्नेयू और सोवियत संघ के स्टेट्समैन निकोलई पोगर्नी को बुलाया.

लेकिन विदेशों में निर्वासन की ज़िंदगी बिता रहे ईरान के एक नए नेता ने आठ साल बाद इस पार्टी को शैतानों की पार्टी बताते हुए शाह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

1979 की क्रांति के बाद निर्वासन से लौटते आयतोल्लाह ख़ुमैनी

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, 1979 की क्रांति के बाद निर्वासन से लौटते आयतोल्लाह ख़ुमैनी

उस नेता का नाम था आयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी. 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले ख़ुमैनी तुर्की, इराक़ और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे.

ख़ुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमरीका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे.

ख़ुमैनी के नेतृत्व में शाह के ख़िलाफ़ ईरान में असंतोष की बयार ने क्रांति का रूप ले लिया. देश में महीनों तक धरना-प्रदर्शन-हड़ताल होने लगे.

आख़िरकर 16 जनवरी 1979 को ईरानी शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.

दो सप्ताह बाद, 1 फ़रवरी 1979 को ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता के रुप में आयतोल्लाह ख़ुमैनी निर्वासन से लौटे. तेहरान में उनके स्वागत के लिए 50 लाख लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी.

फिर एक जनमत संग्रह हुआ. और 1 अप्रैल 1979 को ईरान को एक इस्लामी गणतंत्र घोषित कर दिया गया.

अयातुल्लाह ख़ुमैनी

इमेज स्रोत, Getty Images

ख़ुमैनीः क्रांतिकारी जो बन गया रुढ़िवादी

एक ऐसा देश जिसने क्रांति कर सत्ता पलटी, वो रूढ़िवादी राष्ट्र कैसे बन गया, इसे लेकर एक अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संस्था प्रोजेक्ट सिंडिकेट ने अपनी एक रिपोर्ट में जर्मन दार्शनिक हना एरेंट की एक टिप्पणी का उल्लेख किया है.

एरेंट ने कहा था, ''ज़्यादातर उग्र क्रांतिकारी क्रांति के बाद रूढ़िवादी बन जाते हैं.''

कहा जाता है कि ख़ुमैनी के साथ भी ऐसा ही हुआ. सत्ता में आने के बाद ख़ुमैनी की उदारता में अचानक से परिवर्तन आया. उन्होंने ख़ुद को वामपंथी आंदोलनों से अलग कर लिया.

उन्होंने विरोधी आवाज़ों को दबाना शुरू कर दिया और इस्लामिक रिपब्लिक और ईरान की लोकतांत्रिक आवाज़ में एक किस्म की दूरी बननी शुरू हो गई.

ईरानी प्रदर्शनकारियों ने 52 अमरीकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ईरानी प्रदर्शनकारियों ने 52 अमरीकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा

1979-81: ईरानी दूतावास का बंधक संकट

क्रांति के परिणामों के तत्काल बाद ईरान और अमरीका के राजनयिक संबंध ख़त्म हो गए.

तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह ने अमरीकी दूतावास को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और 52 अमरीकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था.

कहा जाता है कि इसमें ख़ुमैनी का भी मौन समर्थन था. अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से इनकी मांग थी कि शाह को वापस भेजें. शाह न्यूयॉर्क में कैंसर का इलाज कराने गए थे.

बंधकों को तब तक रिहा नहीं किया गया जब तक रोनल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति नहीं बन गए.

आख़िरकार पहलवी की मिस्र में मौत हो गई और ख़ुमैनी ने अपनी ताक़त को और धर्म केंद्रित किया.

सद्दाम हुसैन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ईरान-इराक़ युद्ध के शुरुआती दौर में इराक़ी शासक सद्दाम हुसैन

1980-88: ईरान-इराक़ के बीच आठ साल लंबी लड़ाई

1980 में सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला बोल दिया. ईरान और इराक़ के बीच आठ सालों तक ख़ूनी युद्ध चला.

इस युद्ध में अमरीका सद्दाम हुसैन के साथ था. सोवियत संघ ने भी सद्दाम हुसैन की मदद की थी.

यह युद्ध एक समझौते के साथ ख़त्म हुआ. युद्ध में कम से कम पांच लाख ईरानी और इराक़ी मारे गए थे.

कहा जाता है कि इराक़ ने ईरान में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था और ईरान में इसका असर लंबे समय तक दिखा.

ईरान-इराक़ युद्ध

इमेज स्रोत, Getty Images

यह वही समय था जब ईरान ने परमाणु बम की संभावनाओं को देखना शुरू कर दिया था.

ईरान ने परमाणु कार्यक्रम पर जो काम करना शुरू किया था वो 2002 तक छुपा रहा.

अमरीका का इस इलाक़े में समीकरण बदला इसलिए नाटकीय परिवर्तन देखने को मिला.

अमरीका ने न केवल सद्दाम हुसैन को समर्थन करना बंद किया बल्कि इराक़ में हमले की तैयारी शुरू कर दी थी.

कहा जाता है कि अमरीका के इस विनाशकारी फ़ैसले का अंत ईरान को मिले अहम रणनीतिक फ़ायदे से हुआ.

हालांकि ईरान अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रसिद्ध टर्म 'एक्सिस ऑफ इविल' में शामिल हो गया था.

ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों ने हमेशा संदेह किया

परमाणु कार्यक्रम की तैयारी

आगे चलकर यूरोप ने ईरान से परमाणु कार्यक्रम पर बात करना शुरू किया. हाविय सालोना उस वक़्त यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधि के तौर पर ईरान से बात कर रहे थे.

उन्होंने प्रोजेक्ट सिंडिकेट की एक रिपोर्ट में कहा है कि ईरान में 2005 का चुनाव था और इस वजह से बातचीत पर कोई कामयाबी नहीं मिली. 2013 में जब हसन रूहानी फिर से चुने गए तो विश्व समुदाय ने परमाणु कार्यक्रम को लेकर फिर से बात शुरू की.

दशकों की शत्रुता के बीच ओबामा प्रशासन 2015 में जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ ऐक्शन पहुंचा. इसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी के तौर पर देखा गया.

ईरान में एक प्रदर्शन

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, अमरीकी राष्ट्रपति के प्रतिबंध लगाने के बाद तेहरान में प्रदर्शन

ट्रंप के दौर में टकराव

इस बार अमरीका में चुनाव आया और ट्रंप ने एकतरफ़ा फ़ैसला लेते हुए इस समझौते को रद्द कर दिया. ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए.

यहां तक कि ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा कि ईरान से व्यापार जो करेगा वो अमरीका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा.

इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान पर अमरीका और यूरोप में खुलकर मतभेद सामने आए. यूरोपीय यूनियन ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को बचाने की कोशिश की लेकिन ट्रंप नहीं माने.

ईरानी क्रांति के बाद पिछले चार दशकों में ईरान और अमरीका के बीच अदावत के कई नाज़ुक मोड़ आए हैं.

ईरानी जनरल की अमरीकी हवाई हमले में मौत के बाद एक बार फिर दोनों देशों की दुश्मनी एक नए मुक़ाम पर पहुँच गई है.

वीडियो कैप्शन, ईरान की इस्लामी क्रांति के 40 साल

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)