भारत-मालदीव विवाद: लक्षद्वीप में इसराइल कौन सी तकनीक देना चाह रहा है?

मोदी

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मालदीव की एक मंत्री के भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिए गए बयान के बाद दोनों देशों के बीच तनाव है. 

पीएम मोदी के लक्षद्वीप दौरे के बाद उनकी शेयर की गईं तस्वीरों पर मालदीव की मंत्री मरियम शिउना ने आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं. 

उनमें से एक टिप्पणी में उन्होंने पीएम मोदी को इसराइल की कठपुतली तक कह दिया था. मालदीव के इसराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं. 

मालदीव की स्वतंत्रता के बाद 1965 से लेकर 1974 तक दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध थे लेकिन 1974 में इन्हें निलंबित कर दिया गया. 

आज भी दोनों देशों के बीच में पूरी तरह से राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हो सके हैं लेकिन मालदीव जाने वाले इसराइली पर्यटकों की संख्या आज भी अच्छी ख़ासी है. 

बीते साल 7 अक्तूबर को हमास के इसराइल पर हमले के बाद शुरू हुए इसराइल-ग़ज़ा युद्ध के बाद फ़लस्तीनियों के समर्थन में मालदीव में भी प्रदर्शन हुए थे. 

प्रदर्शनकारियों की एक मांग ये भी थी कि इसराइली पर्यटकों को मालदीव आने से रोका जाए. 

लेकिन भारत-मालदीव विवाद में इसराइल की एंट्री तब हो गई थी जब भारत में इसराइल के दूतावास ने अपने एक्स (पहले ट्विटर) हैंडल से लक्षद्वीप की ख़ूबसूरत तस्वीरें साझा की थीं. 

इसराइल ने क्या कहा था?

लक्षद्वीप

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सोमवार को लक्षद्वीप की कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए भारत में इसराइली दूतावास ने बताया था कि उनकी एक टीम वहां पर गई थी. 

इसराइली दूतावास की ओर से कहा गया था कि, ''हम सरकार के अनुरोध पर डिसेलिनेशन प्रोजेक्ट के सिलसिले में बीते साल लक्षद्वीप गए थे." 

"इसराइल इस परियोजना पर काम करने को तैयार है. जो लोग लक्षद्वीप की ख़ूबसूरती को अब तक नहीं देख पाए हैं, उनके लिए ये तस्वीरें हैं.''

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पीएम मोदी पर मालदीव की मंत्री की टिप्पणी के बाद लक्षद्वीप की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थीं. 

कई चर्चित हस्तियों ने तो यहां तक कह दिया था कि लोगों को मालदीव की जगह अपने देश में मौजूद लक्षद्वीप की सुंदरता को जाकर देखना चाहिए. 

वहीं भारत से हुए विवाद के कारण मालदीव में लोगों को ये डर भी है कि इसकी क़ीमत पर्यटन उद्योग को चुकानी होगी.

हालांकि, लक्षद्वीप जाने वाले पर्यटकों की संख्या काफ़ी कम है और उसकी सबसे बड़ी वजह सुगम यात्रा और इन्फ़्रास्ट्रक्चर का न होना है. 

भारत सरकार इसी दिशा में कई क़दम उठाने जा रही है. ऐसी रिपोर्टें हैं कि लक्षद्वीप में एक नया एयरपोर्ट बनाए जाने की तैयारी है. 

वहीं इसराइली दूतावास के ट्वीट के बाद लक्षद्वीप में बनाए जाने वाले प्रस्तावित इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर बहस शुरू हो गई. 

वो तकनीक जिसकी इसराइल बात कर रहा है

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इसराइली दूतावास ने ट्वीट करके बताया था कि वो लक्षद्वीप में डिसेलिनेशन प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है. 

आसान शब्दों में कहें तो ये डिसेलिनेशन प्रोजेक्ट असल में खारे पानी से नमक और खनिज निकालने की एक प्रक्रिया है ताकि उस पानी का इस्तेमाल पीने के लिए और बाकी कामों में किया जा सके.

दुनियाभर में साफ़ पानी के बहुत कमी है. संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के मुताबिक़ दुनियाभर में दो अरब से ज़्यादा लोगों के पास साफ़ पीने का पानी तक नहीं है. 

समुद्र के पानी का सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसमें नमक की सघनता 35,000 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) होती है और डिसेलिनेशन प्रक्रिया से इसे 10 पीपीएम पर लाया जा सकता है और इस पानी को पीने के लिए सही माना जाता है.

एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में पीने के पानी का सिर्फ़ एक फ़ीसदी ही डिसेलिनेशन प्रक्रिया से आ पाता है. 

लक्षद्वीप छोटे-छोटे द्वीपों का समूह है जहां पर मीठे पानी की समस्या होना आम बात है और खारे पानी को मीठा करने की तकनीक में इसराइल माहिर है. 

इसराइल डिसेलिनेशन की प्रक्रिया को आज से नहीं बल्कि पांच दशकों से इस्तेमाल कर रहा है. उसके समुद्र तट पर अलग-अलग जगह पर पांच डिसेलिनेशन प्लांट हैं जबकि वो दो प्लांट और तैयार कर रहा है. 

साल 2019 तक इसराइल अपनी 70 फ़ीसदी पानी की ज़रूरत इसी डिसेलिनेशन प्रक्रिया से पूरी करता था. इसके अलावा उसका 25 फ़ीसदी पीने का पानी इसी प्रक्रिया से आता है. 

इसराइल ने डिसेलिनेशन के अलावा सीवेज वाटर ट्रीटमेंट में भी कामयाबी हासिल की है. उसका वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग रेट 90 फ़ीसदी हो गया है. इस पानी का इस्तेमाल वो कृषि और दूसरी दैनिक ज़रूरतों में करता है. 

संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में 80% वेस्टवॉटर को बिना ट्रीट या इस्तेमाल किए वापस ईको सिस्टम में बहा दिया जाता है. 

इसराइल ने पानी की एक-एक बूंद का इस्तेमाल कर ख़ुद को वॉटर मैनेजमेंट और ट्रीटमेंट तकनीक की एक नज़ीर के तौर पर पेश किया है. उसका दावा है कि उसके मैनेजमेंट और तकनीक के ज़रिए पानी की कमी की समस्या को सुलझाया जा सकता है.

इसमें हैं काफ़ी चुनौतियां भीं

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किसी ख़ास तकनीक की कुछ ख़ास ख़ामियां भी होती हैं. डिसेलिनेशन प्रक्रिया भी उससे अछूती नहीं है. 

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनियाभर में हर रोज़ डिसेलिनेशन प्रक्रिया से 100 अरब लीटर पानी मिलता है लेकिन इसके ज़रिए उसी मात्रा में खारा पानी भी पीछे छूट जाता है. 

इस पानी को वापस समुद्र में बहाने से ईको सिस्टम पर गंभीर असर हो सकता है. हालांकि इस पानी को वापस इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया जा रहा है. 

डाउन टू अर्थ वेबसाइट के मुताबिक़, डिसेलिनेशन प्रक्रिया को लेकर दूसरी चुनौती इसका काफ़ी ख़र्चीला होना भी है. एक डिसेलिनेशन प्लांट लगाने में करोड़ों डॉलर ख़र्च हो सकते हैं. 

वेबसाइट से एक वॉटर इंडस्ट्री एक्सपर्ट क्रिस्टोफ़र गैसन कहते हैं कि इसराइल ने इसमें इसलिए कामयाबी पाई क्योंकि उसके पास पैसे की व्यवस्था थी और कम मज़दूर लागत ने उसकी तकनीक को किफ़ायती बनाया जो कि पूरी दुनिया के लिए वैसा नहीं हो सकता है.

वहीं विश्लेषक इसमें एक और बड़ी चुनौती ऊर्जा खपत को मानते हैं. इस प्रक्रिया में बिजली का काफ़ी इस्तेमाल होता है और इसराइल अपनी कुल बिजली का 10 फ़ीसदी इसी प्रक्रिया में ख़र्च करता है.

विश्लेषक इसकी भी काट ढूंढ लाए हैं और उनका मानना है कि इसमें रिन्यूएबल एनर्जी अहम भूमिका निभा सकता है. एक शोध के मुताबिक़, सोलर पावर और स्टोरेज सिस्टम के ज़रिए साल 2050 तक डिसेलिनेटेड वॉटर की लागत कम हो सकती है.

वहीं डिसेलिनेशन प्रक्रिया से मिले पीने के पानी को लेकर भी चिंताएं हैं. यूनेस्को के मुताबिक़, इस प्रक्रिया से मिले पानी में मैग्निशियम की कमी होती है जो हमारी डेली डाइट के लिए बेहद ज़रूरी है. 

यूनेस्को का कहना है कि इसकी कमी से दिल से संबंधित बीमारियों का ख़तरा है और इसराइल में जहां जहां डिसेलिनेशन वॉटर इस्तेमाल होता है वहां दिल से जुड़ी बीमारियां आम हैं.

भारत में डिसेलिनेशन प्लांट

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डिसेलिनेशन की प्रक्रिया भारत में बहुत पुरानी नहीं है. साल 2010 में तमिलनाडु के मिंजुरिन में भारत का पहला डिसेलिनेशन प्लांट लगाया गया था. 

आज भारत के तीन राज्यों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और गुजरात) में चार बड़े डिसेलिनेशन प्लांट मौजूद हैं जबकि महाराष्ट्र ऐसा चौथा राज्या है जिसने डिसेलिनेशन प्लांट बनाने की घोषणा की है. 

भारत के बड़े शहरों में और ख़ासकर समुद्र तट के नज़दीक शहरों में पानी की समस्या अब आम बात हो गई है. मिंजुरिन में बना पहला डिसेलिनेशन प्लांट चेन्नई की पांच लाख की आबादी को साफ़ पानी मुहैया कराता है. 

महाराष्ट्र ने जिस प्लांट की घोषणा की है वो मुंबई को पानी देगा. वहीं देश का दूसरा सबसे बड़ा डिसेलिनेशन प्लांट गुजरात के जामनगर में है. गुजरात की योजना आठ नए डिसेलिनेशन प्लांट बनाने की है.

हालांकि, इसराइल लक्षद्वीप में किस तरह का डिसेलिनेशन प्लांट बनाएगा या वहां भारत सरकार की मदद करेगा, इसके बारे में कोई योजना अभी तक सामने नहीं आई है.

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