मालदीव-लक्षद्वीप विवाद: क्या सोशल मीडिया से तय होंगे विदेश नीति से जुड़े सवाल

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से 4 जनवरी को लक्षद्वीप की तस्वीरें शेयर कर यहां घूमने की अपील के बाद मालदीव के कुछ मंत्रियों की मोदी और भारत विरोधी टिप्पणी ने दोनों देशों के बीच एक नया विवाद पैदा कर दिया है.
हालांकि मालदीव सरकार ने मामले को ठंडा करने के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मंत्रियों को निलंबित कर दिया और कहा कि इस तरह के बयानों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
लेकिन सोमवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने भारत में मालदीव के हाई कमिश्नर इब्राहिम शाहिब को बुला कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सोशल मीडिया में आपत्तिजनक टिप्पणी पर गंभीर चिंता जताई.
दरअसल इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया पर ही तूल पकड़ा.
पीएम मोदी ने 4 जनवरी को लक्षद्वीप के दौरे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर लक्षद्वीप घूमने की अपील की थी. इसके बाद कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर ये कहना शुरू किया कि पर्यटकों को अब मालदीव नहीं लक्षद्वीप जाना चाहिए.

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मालदीव के कुछ सोशल मीडिया एक्टिविस्टों और राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की सरकार के कुछ मंत्रियों को लक्षद्वीप से मालदीव की तुलना बुरी लगी और उन्होंने प्रधानमंत्री और भारत के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी की.
इन टिप्पणियों के बाद भारत में भी कुछ आम यूजर्स और सेलिब्रिटीज विवाद में कूद पड़े और उन्होंने मालदीव के बहिष्कार का नारा दे दिया.
ट्रैवल कंपनी 'इज माई ट्रिप' ने तो मालदीव की बुकिंग ही कैंसिल कर दी.
वहीं, मालदीव समर्थक अपने देश के समुद्र तटों की तस्वीरें साझा करते हुए इसकी खूबसूरती बताने लगे.
मालदीव में फिलहाल राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की सरकार है. मुइज़्ज़ू पीपुल्स नेशनल कांग्रेस के सदस्य हैं और वो गठबंधन सहयोगी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे थे.
मालदीव सरकार का रुख भारत विरोधी रुख क्यों

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मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने मालदीव्स डेमोक्रेटिक पार्टी के मोहम्मद सोलीह को हराया था जो भारत समर्थक माने जाते हैं. उनकी पार्टी ने चुनाव से पहले 'इंडिया आउट' का नारा दिया था.
मुइज़्ज़ू ने कहा था कि चुनाव जीतने के बाद वो मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस जाने को कहेंगे.
बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में मुइज़्ज़ू ने कहा था कि भारतीय सैनिकों की मौजूदगी मालदीव को जोखिम में डाल सकती है, खास कर तब जब चीन और भारत के बीच सीमा विवाद को लेकर तनातनी चल रही हो.
उन्होंने कहा था, "मालदीव काफी छोटा देश और वो बड़ी ताकतों के बीच शक्ति परीक्षण में फंसने का जोखिम नहीं ले सकता. मालदीव ऐसा करेगा भी नहीं."
हालांकि पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद सोलीह का कहना था कि मालदीव में भारतीय सेनाओं की मौजूदगी के बारे में कुछ ज्यादा ही डर पैदा किया जा रहा है.
लक्षद्वीप विवाद और राष्ट्रवाद

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लेकिन विश्लेषकों का कहना है मुइज़्ज़ू और उनकी पार्टी का रुझान शुरू से चीन की ओर रहा है.
चुनाव जीतने के बाद पहले तुर्की और फिर चीन की उनकी यात्रा को वो इस बात के सुबूत के तौर पर पेश करते हैं. इससे पहले मालदीव का कोई भी नया राष्ट्रपति पहले भारत का दौरा करता था.
मुइज़्ज़ू की जीत के बाद मालदीव में भारत विरोधी और चीन समर्थक ज्यादा मुखर हुए हैं और इसकी बानगी चार-पांच दिन पहले शुरू हुए लक्षद्वीप-मालदीव विवाद में दिखी.
मालदीव समर्थकों ने अपने देश की शान में कसीदे काढ़े और भारत, भारतीय नागरिकों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की तो भारत समर्थक भी पीछे नहीं रहे.
भारत में कई सेलिब्रिटीज मालदीव के बहिष्कार अपील कर रहे थे. जिस तरह कि टिप्पणियां की जा रही थीं उनसे ऐसा लग रहा है था वो भारत की विदेश नीति के गैर आधिकारिक प्रवक्ता हो गए हों.

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लक्षद्वीप विवाद के बाद भारत की एक बड़ी ट्रैवल कंपनी 'ईज माई ट्रिप' के सीईओ प्रशांत पित्ती ने कहा कि उनकी कंपनी ने मालदीव की बुकिंग रोक दी है. उनके लिए किसी भी 'निजी हित' से राष्ट्रवाद ऊपर है.
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने अपनी कंपनी की मालदीव बुकिंग कैंसिल करने की सूचना दी और कहा कि वो चाहते हैं कि लक्षद्वीप और अयोध्या जैसी जगहें इंटरनेशनल टूरिस्ट स्पॉट बन कर उभरें.
बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार ने अपने ट्वीट में कहा, "हम अपने पड़ोसियों के लिए अच्छा रुख रखते हैं लेकिन बगैर किसी वजह से फैलाई गई नफरत क्यों बर्दाश्त की जाए. मैं कई बार मालदीव गया हूं और हमेशा यहां की तारीफ की है लेकिन हमारी गरिमा सबसे ऊपर है. आइए अब हम भारतीय द्वीपों पर जाएं और अपने देश के पर्यटन को मदद करें."
इन टिप्पणियों के बाद ये सवाल भी जोर-शोर से उठ रहा है कि क्या पड़ोसी देशों के आपसी रिश्तों जैसे गंभीर मसलों में सरकारों का रुख सोशल मीडिया पर की जा रही उत्तेजित टिप्पणियों से प्रभावित हो सकता है.
हालांकि मीडिया ख़बरों के मुताबिक़ मालदीव सरकार ने सोशल मीडिया पर भारत और नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मंत्रियों को निलंबित कर दिया है लेकिन भारत सरकार की ओर से मालदीव के राजदूत को बुलाकर आपत्ति जताए जाने के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या दो देशों के संबंधों से जुड़े विमर्श सोशल मीडिया पर की जाने वाली इस तरह की टिप्पणियां तय करेंगी.
सोशल मीडिया पर विदेश नीति का विमर्श कितना सही?

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दो देशों के रिश्तों को लेकर सोशल मीडिया में इस तरह की मुखर राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के क्या खतरे हो सकते हैं?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉन्फ़्लिक्ट रेज़ोल्यूशन में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "मालदीव के तीन उप मंत्रियों ने गलती ये कि उन्होंने पॉपुलर पॉलिटिकल नैरेटिव को मालदीव का आधिकारिक रुख बना लिया. आपको याद होगा कि नुपुर शर्मा मंत्री नहीं थी, बीजेपी की प्रवक्ता थीं लेकिन उनके एक बयान ने भारत को कितनी मुश्किल में डाल दिया था."
प्रेमानंद मिश्रा का मानना है कि विचारधारा के आधार पर विदेश नीति नहीं चलाई जा सकती. भारत जैसी बड़ी ताकतें इस तरह की विदेश नीति के जरिये काम नहीं कर सकतीं.
उनके मुताबिक़, "मालदीव को लेकर भारत सरकार को अपने यहां उठ रही भावनाओं पर जितनी जल्दी हो लगाम लगा देना चाहिए ताकि मालदीव में जो भारत का स्पेस बचा है. वो भी खत्म न हो जाए. ऐसी स्थिति न आए कि भारत समर्थक विपक्ष भी इसके ख़िलाफ़ हो जाए क्योंकि आखिर उसे भी वहां चुनाव जीतना है."
वो कहते हैं, "सोशल मीडिया पर कभी अच्छी गंभीर बहस होती है और कभी उथली. इसलिए उथली विचारधारा से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद को उस स्तर नहीं ले जाना चाहिए कि किसी देश को दूसरे पर धौंस जमाने वाले के तौर पर देखा जाए. भारत को एक मैच्योर डिप्लोमेसी अपनाना चाहिए."
'सोशल मीडिया को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं'

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प्रोफ़ेसर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "मालदीव ने इस मामले में कार्रवाई की है और भारत ने भी उसके हाई कमिश्नर को बुलाकर अपनी बात रखी है. अब भारत को इस मामले को यहीं रोक देना चाहिए."
हालांकि विदेश नीति की समझ रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया को भारत की विदेश नीति पर बहस करने से रोका नहीं जा सकता.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी कहते हैं, "मालदीव को लेकर भारतीय सोशल मीडिया में इसलिए इतनी तीखी प्रतिक्रिया हुई कि ये देश भारत से काफी नजदीकी से जुड़ा हुआ है. काफी भारतीय पर्यटक वहां जाते हैं और इससे मालदीव की अर्थव्यवस्था को अच्छा-खासा राजस्व मिलता है. लेकिन जब मालदीव के सोशल मीडिया यूजर्स और मंत्रियों की ओर से भारत और इसके पीएम पर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई तो लोगों का गुस्सा भड़क गया."
वो कहते हैं, "ये कहना गलत है कि सोशल मीडिया के ऊपर इस तरह की बहसें भारतीय विदेश नीति को कमजोर कर सकती हैं. मैं तो मानता हूं कि ऐसी बहस होनी चाहिए."
अरविंद येलेरी कहते हैं, "सोशल मीडिया पर लिखने या विमर्श चलाने वाले लोगों की पृष्ठभूमि अमूमन अच्छी होती है और वो गंभीर बहस चला सकते हैं. लेकिन ये भी अहम है कि सोशल मीडिया ये तय नहीं कर सकता कि किसी देश की विदेश नीति कैसी हो. ये याद रखा जाना चाहिए कि सोशल मीडिया एक प्रतिक्रिया है, इससे विदेश नीति का विमर्श तय नहीं हो सकता."
क्या मालदीव में भारत विरोधी रवैया उफान पर है?

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हालांकि दिल्ली के शहीद भगत सिंह कॉलेज में असिस्स्टेंट प्रोफेसर और पूर्वी एशिया मामलों की विशेषज्ञ ऋत्युषा तिवारी कहती हैं, "इस तरह का अति राष्ट्रवाद राजनीतिक दिक्कतें पैदा कर सकता है. इसे घरेलू राजनीति से जोड़ कर भी देखा जा सकता है और इसका दो देशों के रिश्तों पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है."
ऋत्युषा तिवारी कहती हैं कि भारत में आने वाले दिनों में चुनाव होने वाले हैं इसलिए इस तरह की प्रतिक्रियाओं को राजनीति से जोड़ कर देखा जा सकता है. और इसका लाभ उठाने की कोशिश भी हो सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि मालदीव की बड़ी आबादी भारत समर्थक है. विपक्षी राजनीतिक दल भारत समर्थक और भारत के लिए वहां काफी स्पेस है.
लक्षद्वीप-मालदीव विवाद में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ की गई टिप्पणियों के बाद जिस तरह से वहां के जाने-माने लोग और विपक्षी राजनेता भारत के समर्थन में आगे आए उससे ये बात साबित हो गई है.
खुद मालदीव के विदेश मंत्री मूसा ज़मीर ने कहा कि भारत के ख़िलाफ़ इस तरह की टिप्पणियां मंजूर नहीं की जा सकती. ये मालदीव की सरकार का आधिकारिक रुख नहीं है.

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पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलीह ने कहा कि दोनों देशों के बीच सालों पुरानी दोस्ती पर नकारात्मक असर डालने वाले इस तरह के संवेदनहीन बयान देने की इज़ाज़त नहीं दी जानी चाहिए. सोलीह के राष्ट्रपति रहते हुए भारत और मालदीव के संबंध क़रीबी रहे थे.
मालदीव के कुछ और नेताओं ने भी भारत को लेकर की गई टिप्पणियों का विरोध किया था.
मालदीव के पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद का कहना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को मर्यादा बनाए रखनी चाहिए. उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि सोशल मीडिया एक्टिविज़्म और नहीं होगा और लोगों को देश के हितों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी निभाएंगे.
"मालदीव के एक और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद मालदीव सरकार की मंत्री मरियम एक ऐसे प्रमुख सहयोगी देश के लिए भयावह भाषा बोल रही हैं, जो मालदीव की सुरक्षा और समृद्धि के लिए अहम हैं. मुइज़्ज़ू सरकार को ऐसे बयानों से दूर रहना चाहिए."
विशेषज्ञ मालदीव में भारत को मिलने वाले इसी समर्थन की ओर इशारा कर रहे थे. उनका कहना है कि भारत को मालदीव के ख़िलाफ़ इतना कड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए कि भारत समर्थक लोगों को भी अपने रुख पर सोचना पड़े. अच्छा होगा कि भारत एक बड़ी ताकत होने के नाते परिपक्वता दिखाए और इस मामले को यहीं रोक दे.
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