'इंडिया आउट' नारा देने वाले मुइज़्ज़ू बने मालदीव के राष्ट्रपति, भारत पर क्या होगा असर

मालदीव राष्ट्रपति चुनाव

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    • Author, प्रियंका झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मालदीव में हुए राष्ट्रपति चुनावों में मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने जीत हासिल की है. वहीं, भारत के समर्थक माने जाने वाले मौजूदा राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को हार मिली है.

मालदीव में नौ सितंबर को राष्ट्रपति चुनाव हुए थे लेकिन किसी भी उम्मीदवार को 50 फ़ीसदी से अधिक वोट न मिल पाने की वजह से 30 सितंबर को दूसरे राउंड का चुनाव हुआ.

मोहम्मद मुइज़्ज़ू को प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव (पीपीएम) की अगुवाई वाले उस गठबंधन का समर्थन प्राप्त है जिसे चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों के लिए जाना जाता है.

मुइज़्ज़ू अपने चुनावी अभियान में सोलिह सरकार पर ये आरोप लगाते रहे हैं कि देश के नीतिगत फ़ैसलों में भारत के दखल से 'मालदीव की संप्रभुता और आज़ादी' कमज़ोर पड़ी है.

इब्राहिम सोलिह के कार्यकाल के दौरान मालदीव और भारत के रिश्ते मज़बूत हुए थे.

अब मालदीव के अगले राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुइज़्ज़ू को चुनाव में मिली जीत की बधाई दी है.

ये माना जा रहा था कि रणनीतिक वजहों से चीन और भारत दोनों देशों की मालदीव के चुनाव में दिलचस्पी थी. लेकिन अब चुनाव नतीजों को जानकार भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं मान रहे.

भारत पर क्या होगा असर?

भारत - मालदीव

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इमेज कैप्शन, पिछले साल निवर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह भारत दौरे पर आए थे

एक हज़ार से अधिक द्वीपों वाले मालदीव की आबादी सिर्फ़ 5 लाख़ 57 हज़ार के आसपास है. लेकिन ये भारत और चीन दोनों के लिहाज़ से अहम देश बन गया है.

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दरअसल, हिंद महासागर में मालदीव की लोकेशन रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. चीन अपनी नौसेना को तेज़ी से बढ़ा रहा है और वो मालदीव में अपनी पहुंच बढ़ाने के प्रयास करता रहा है.

भारत हमेशा से मालदीव में चीन के प्रभाव को सीमित करने के प्रयास करता रहा है.

खाड़ी के देशों से तेल यहीं से होकर गुज़रता है. चीन इसे भी सुरक्षित करना चाहता है.

मालदीव के निवर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह को भारत के साथ मज़बूत रिश्तों के समर्थक के तौर पर देखा जाता रहा है. मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े इब्राहिम सोलिह ने अपने कार्यकाल के दौरान ‘इंडिया फ़र्स्ट’ यानी भारत को प्राथमिकता देने की नीति लागू की.

वहीं, 54 फ़ीसदी वोट पाने वाले मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने अपने चुनाव अभियान में ‘इंडिया आउट’ यानी भारत को देश से बाहर करने का नारा दिया था. मुइज़्ज़ू चीन के साथ बेहतर रिश्तों के पक्षधर हैं.

प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव (पीपीएम) और उससे जुड़ी पार्टियों ने अपने चुनाव अभियान में खुलकर भारत की आलोचना की थी.

इन पार्टियों का एक सबसे बड़ा मुद्दा मालदीव से भारत के सैन्य अधिकारी और उपकरणों को हटाया जाना था. पीपीएम और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि भारतीय सैनिकों को मालदीव से चले जाना चाहिए.

पीपीएम नेता अब्दुल्ला यामीन जब राष्ट्रपति थे तब भारत विरोधी अभियान के तहत सैकड़ों लोग सड़क पर उतरने लगे थे.

तब मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने भारत से अपने दो हेलिकॉप्टरों और एक डॉर्नियर एयरक्राफ़्ट ले जाने को कहा था.

ये हेलिकॉप्टर और एयरक्राफ़्ट भारत ने मालदीव में खोजी और राहत बचाव अभियान के लिए लगा रखे थे. मालदीव का तब कहना था कि अगर भारत ने इसे उपहार में दिया है तो इस पर पायलट मालदीव के होने चाहिए न कि भारत के.

पिछली सरकार के अनुभवों को गिनाते हुए दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अरविंद येलरी कहते हैं कि मोहम्मद मोइज़्ज़ू उसी सोच को आगे बढ़ाएंगे जो पिछली सरकार में दिखी थी.

वो कहते हैं, "ये चुनाव परिणाम भारत के पक्ष में तो नहीं हैं. क्योंकि मुइज़्ज़ू जिस गठबंधन से आते हैं, उसका पहले ही चीन का समर्थन करने का रिकॉर्ड रहा है. अब्दुल्ला यामीन चीन के बहुत करीब माने जाते रहे हैं.

"मुइज़्ज़ू भी चीन के प्रति झुकाव के लिए जाने जाते हैं. मुइज़्ज़ू ने मालदीव में मौजूद भारतीय सेना के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खड़ा किया था. हां, ये जीत चीन के लिए फ़ायदेमंद है. क्योंकि चीन लगातार मालदीव में अपने पैर जमाने की कोशिश में लगा हुआ है. चीन की कोशिश रही है कि वो मालदीव में भारत के प्रभाव को कम करे. ऐसे में मुइज़्ज़ू का जीतना एक तरह का असंतुलन पैदा करेगा, जो चीन के पक्ष में जाएगा."

क्या मालदीव से 'इंडिया आउट' संभव है?

अब्दुल्ला यामीन

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पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने स्थानीय मीडिया से ये कहा था कि 2023 का राष्ट्रपति चुनाव "भारत और मालदीव में उसके प्रभाव को हराने के लिए होगा".

अब्दुल्ला यामीन के राष्ट्रपति रहते हुए ही मालदीव भारत से दूर और चीन के करीब गया.

फिलहाल यामीन भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में जेल में बंद हैं. ये माना जाता है कि मालदीव में विपक्ष के चलाए 'इंडिया आउट' अभियान के पीछे यामीन ही थे.

जानकारों की माने तो पिछले 15 से 20 सालों में मालदीव में जिस तरह की राजनीति हो रही है, वो भारत के ख़िलाफ़ या चीन के ख़िलाफ़ होने के बीच बंटी है. ऐसे में यामीन की पार्टी की वापसी का मतलब है कि उनकी नीतियां भी वापस आएंगी, जो पिछले कार्यकाल में भारत के ख़िलाफ़ थीं.

इब्राहिम सोलिह सरकार पर यामीन और उनकी सहयोगी पार्टियां ये आरोप लगाती रही हैं कि मालदीव की धरती पर भारतीय सैनिकों मौजूदगी से देश की संप्रभुता का उल्लंघन हुआ.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कॉन्फ़्लिक्ट रेज़ोल्यूशन में पढ़ा रहे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा मुइज़्ज़ू की जीत को भारत के लिए चिंता की बात मानते हैं.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "अभी का जो वैश्विक दौर है, उसमें भारत ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनकर उभरा है, खासतौर पर पिछले दो-तीन सालों में. भारत के जितने भी पड़ोसी देश हैं चाहे वो बांग्लादेश हो, नेपाल हो या भूटान हो, वो भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने राष्ट्रहितों के प्रतिनिधि के तौर पर देखते हैं. साथ ही भारत के अमेरिका से बेहतर संबंध हैं. मालदीव के लिए भारत की इस भूमिका को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है."

'ग्लोबल साउथ' फ्रेज व्यापक रूप से लातिन अमेरिका, एशिया, अफ़्रीका और ओसिआनिया के इलाक़ों के लिए किया जाता है. ग्लोबल साउथ के ज़्यादातर मुल्क कम आय और राजनतिक-सांस्कृतिक रूप से हाशिए के देश हैं.

डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "चुनाव के समय जो आप नारे इस्तेमाल करते हैं और पॉलिसी के स्तर पर फ़ैसले लेते हैं, उनमें ज़मीन-आसमान का अंतर होता है, क्योंकि तब आपकी जवाबदेही होती है. राजनीति कभी भी अर्थव्यवस्था पर हावी नहीं हो सकती. उस मोर्चे पर देखें तो भारत के मालदीव में जितने भी डिवेलपमेंट प्रोजेक्ट हैं वो रहेंगे ज़रूर. हां, इनकी रफ़्तार ज़रूर धीमी पड़ सकती है."

भारत के अल्पसंख्यकों का मालदीव से कनेक्शन

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इमेज कैप्शन, मुइज़्ज़ू की जीत के बाद उनकी पीपल्स नेशनल कांग्रेस पार्टी के समर्थकों ने जश्न मनाया

आमतौर पर किसी देश के राष्ट्रीय चुनाव में घरेलू मुद्दे हावी होते हैं. लेकिन छह लाख से भी कम आबादी वाले मालदीव के चुनाव में भारत और चीन दोनों का ही ज़िक्र बार-बार उठता रहा.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की फ़्रंटलाइन मैगज़ीन के एक आलेख में ये बताया गया है कि कैसे भारत के ख़िलाफ़ फर्ज़ी ख़बरें चुनावी अभियान के पहले दौर का अहम हिस्सा थीं.

भारत में मुसलमानों के प्रति बर्ताव, मणिपुर में जारी हिंसा और यहां तक कि संसद में बीजेपी नेता रमेश बिधूड़ी का एक मुसलमान सांसद को लेकर दिया आपत्तिजनक बयान तक मालदीव चुनावों में मतदाताओं को व्हाट्सऐप पर भेजा गया.

इसी आलेख में कहा गया है कि पीपीएम के लिए भारत में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा बर्ताव चुनावी प्रोपेगेंडा का एक बहुत बड़ा पहलू था. मालदीव में 98 फ़ीसदी से अधिक आबादी सुन्नी मुस्लिम है. इस लेख में बताया गया है कि कैसे मतदाताओं के बीच वोटिंग से पहले भारत में मुसलमानों की स्थिति जानने की उत्सुकता थी.

लेकिन क्या भारत के घरेलू मुद्दों का मालदीव राष्ट्रपति चुनाव पर असर पड़ा है?

इस सवाल पर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "लोकलुभावन राजनीति के दौर में इस तरह का कुछ हिस्सा ज़रूर रहता है. पूरी दुनिया में कोई ऐसी बात हो, तो राजनीतिक पार्टियां उसको अपने हिसाब से उपयोग और दुरुपयोग करना जानती हैं. राष्ट्रीय चुनाव, राष्ट्रीय संवेदनाओं से जुड़े होते हैं. अब अगर मालदीव के संदर्भ में ही देखें तो इंडिया आउट जैसे कैंपेन चलाने के लिए क्या आधार रखेंगे?"

"संप्रभुता एक मुद्दा था, लेकिन बहुत से लोग इसे उतना नहीं समझ पाते, जितना धार्मिक मामले को समझते हैं. लोगों को अगर लगता है कि किसी भी तरह से उनकी पहचान को चोट पहुंच रही है, तो ऐसे मामलों का असर तो होता ही है. हालांकि, मेरा मानना है कि इस चुनाव में उसका इतना व्यापक इस्तेमाल नहीं हुआ."

मालदीव में बढ़ेगी चीन की भूमिका?

मोहम्मद मुइज़्ज़ू

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बीते दस सालों में भारत ने मालदीव को दो हेलीकॉप्टर और एक छोटा विमान दिया है. साल 2021 में मालदीव डिफेंस फोर्स ने बताया था कि भारत के 75 सैन्य अधिकारी मालदीव में रहते हैं और भारतीय एयरक्राफ़्ट का संचालन और रखरखाव करते हैं.

कोरोना महामारी के समय भारत ने मालदीव को कोविशील्ड वैक्सीन गिफ़्ट के तौर पर दी थी. मालदीव के साथ भारत का व्यापार पिछले साल 50 करोड़ डॉलर से अधिक का रहा था.

इसी साल मालदीव में हनीमाधू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की नींव जब रखी गई तो इस समारोह में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी मौजूद रहे. इसके बाद मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी मालदीव का तीन दिवसीय दौरा किया.

लेकिन आर्थिक मोर्चे पर चीन का प्रभाव भी मालदीव में साल 2013 से ही बढ़ता जा रहा है. चीन मालदीव में टूरिज़म और निवेश का एक बड़ा ज़रिया बन चुका है.

मालदीव ने अपने इंफ़्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए चीन से भारी लोन लिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार मालदीव पर चीन का 3.4 अरब डॉलर कर्ज़ है.

दोनों देशों के बीच 2017 में हुए मुक्त व्यापार सौदे का उस समय विपक्षी पार्टियों ने जमकर विरोध किया था.

मालदीव और चीन के संबंध में कुछ जानकार ये कहते हैं कि मुइज़्ज़ू सरकार यामीन के कार्यकाल में की गई गलतियां दोहराने से बचेगी.

शिव नाडर इंस्टिट्यूट ऑफ़ एमिनेंस के इंटरनेशनल रिलेशंस एंड गवर्नेंस स्टडीज़ डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेबिन टी जैकब कहते हैं, "अब्दुल्ला यामीन को छोड़कर मालदीव में जो भी राष्ट्रपति रहे, उन्हें भारत को महत्व देना ही पड़ा है. इस बार भी मोहम्मद मोइज़्ज़ू ने भले ही इंडिया आउट कैंपेन चलाया हो लेकिन अब उनके सलाहकार कह रहे हैं कि भारत हिंद महासागर में एक अहम भागीदार है."

जैकब ये भी कहते हैं कि शायद मोइज़्ज़ू का पहला आधिकारिक दौरा भी भारत का हो, इसलिए कैंपेन में जो हुआ उसे छोड़कर अब ज़मीनी स्तर पर क्या होगा, ये समय के साथ देखना पड़ेगा.

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