मालदीव में क्या चीन को रोकने के लिए भारत ने उठाया ये बड़ा क़दम?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और चीन के लिए पूर्वी लद्दाख अगर एक सैन्य टकराव का थिएटर है तो मालदीव और हिंद महासागर के अन्य देश दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संघर्ष के अखाड़े से कम नहीं.
गुरुवार को विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद के बीच वीडियो कॉन्फ़्रेंस के माध्यम से हुई एक बैठक के बाद यह घोषणा की गई कि भारत सरकार मालदीव को एक वित्तीय पैकेज देगा, जिसमें 10 करोड़ डॉलर का अनुदान होगा और 40 करोड़ डॉलर की नई लाइन ऑफ़ क्रेडिट होगी.
इसके अलावा 25 करोड़ डॉलर की अलग सहायता पर भी बात हुई है.

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इस पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलीह ने अपने एक ट्वीट में कहा, "मालदीव-भारत के सहयोग में आज का दिन एक ऐतिहासिक क्षण है जब हमें 25 करोड़ डॉलर की बजट सहायता और ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के लिए 50 करोड़ डॉलर की भारतीय सहायता प्राप्त हुई."
उन्होंने इसी ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की जनता को शुक्रिया भी अदा किया.
प्रधानमंत्री मोदी ने जवाब में कहा, "भारत COVID-19 महामारी के आर्थिक प्रभाव को कम करने में मालदीव का समर्थन करना जारी रखेगा. हमारी विशेष मित्रता हिंद महासागर के पानी की तरह हमेशा गहरी रहेगी."
भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज़ में कहा कि यह मालदीव में सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना होगी, जो पड़ोसी द्वीपों विलिंग्ली, थिलाफूशी और गुलहिफाहु के साथ माले (मालदीव की राजधानी) को जोड़ती है. दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने इस बात पर संतुष्टि ज़ाहिर की कि दोनों देशों के बीच रिश्ते गहरे हैं.
विशेषज्ञ कहते हैं कि मालदीव पर मोदी की पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते घनिष्ठ करने वाली "पहले पड़ोसी" की विदेश नीति खरी उतरी है.
उनके अनुसार ख़ास तौर से मोदी सरकार के पहले पांच सालों में मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश में चीन के बढ़ते असर के परिपेक्ष्य में मालदीव के साथ दोस्ती में क़रीबी आई है जो सराहनीय है.

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लेकिन क्या मालदीव पर चीन का असर कम होगा?
पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने अपनी किताब में मोदी की विदेश नीतियों पर गहराई से लिखा है.
वो कहते हैं कि मालदीव में चीन के असर को कम करने में समय लग सकता है.
उनके मुताबिक़, चीन विदेश में कोई भी प्रोजेक्ट लेता है उसे जल्द ख़त्म कर देता है जबकि भारत एक प्रोजेक्ट को ख़त्म करने में अधिक समय लेता है.
लेकिन राजीव डोगरा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लोगों को चीन और भारत की सहायता में फ़र्क़ समझना ज़रूरी है.
वो कहते हैं "भारत पड़ोसी देशों को सहायता आर्थिक फ़ायदे के लिए या सियासी दबाव डालने के लिए नहीं देता. चाहे वो भूटान का हाइड्रो-एलेक्ट्रिक्ट प्लांट हो या अफ़ग़ानिस्तान के संसद की इमारत का निर्माण. जबकि चीन जब सहायता देता है तो उसका उद्देश्य होता है कि सहायता लेने वाले देशों को अपने चंगुल में फंसा दे"

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चीन के बारे में अक्सर ये कहा जाता है कि वो देशों को क़र्ज़ों के जाल में फंसा देता है जिससे देश बहार निकल नहीं सकते.
राजीव डोगरा के अनुसार, भारत सहायता देकर किसी देश का शोषण नहीं करता.
हाल के सालों में मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश में चीन का प्रभाव भारत के द्विपक्षीय सुरक्षा संबंधों और रणनीतिक हितों के लिए ठीक नहीं रहा है.
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के समय में मालदीव चीन का गहरा दोस्त बन गया था. श्रीलंका में महेंद्र राजपक्षे की सत्ता में वापसी चीन के लिए एक बड़ी खुशख़बरी रही जबकि भारत के लिए एक चिंताजनक घटना, क्योंकि राजपक्षे अपने पहले काल में चीन के काफी निकट चले गए थे और उस समय श्रीलंका ने खुले तौर पर चीन की पीएलए नौसेना की पनडुब्बी की मेजबानी की थी और चीन के साथ पहले ही गहरे आर्थिक संबंध स्थापित कर लिए थे.
लेकिन बात केवल आर्थिक मदद की नहीं है.
अधिकतर देशों में चीन की तुलना में भारत की छवि कहीं बेहतर है. डोगरा कहते हैं कि भारत के प्रति अफ्रीका, पड़ोसी देशों और मुस्लिम मुल्कों में मालदीव के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है भारत से दोस्ती रखना सद्भावना है. चीन सारे पैसे खर्च करके भी इस सद्भावना को नहीं ख़रीद सकता.
भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान काफी अच्छी तरह से संभाला था, लेकिन अब बांग्लादेश के साथ भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.
भारत के प्रमुख थिंक टैंकों में से एक, ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF), की डॉ. राजेश्वरी पिलाई राजगोपालन, अपने एक लेख में कहती हैं, " भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) ने, जिसे मुसलमानों को निशाना बनाने के रूप में देखा जाता है, भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में दरार पैदा कर दी है."
पाकिस्तान के साथ रिश्तों में खटास कोई नयी बात नहीं लेकिन चीन और नेपाल के साथ रिश्ते ठीक चल रहे थे. अब इन देशों के साथ भी संबंधों में तनाव पैदा हो गया है.
दूसरी तरफ भारत-अफ़ग़ानिस्तान रिश्ते पहले की तरह मज़बूत हैं. राजीव डोगरा कहते हैं भारत की विदेश नीति पड़ोसी देशों में सरकार के बदलने से तुरंत बदल जाती है ऐसा नहीं है.
उनके अनुसार रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते मोदी के दौर में काफी मज़बूत हुए हैं.
मालदीव को सहायता देना भारत के लिए कोई नयी बात नहीं है.
भारत के वहां कई प्रोजेक्ट्स अब भी चालू हैं. लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार अभी दी जाने वाली मदद के पीछे वजह मालदीव को महामारी के बुरे असर से बचाना है.
विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ भारत ने अब तक 64 देशों को 30.66 बिलियन डॉलर की मदद दी है. महामारी और लॉकडाउन के बाद से भारत ने 90 देशों को दवाइयाँ और दूसरे मेडिकल उपकरण पहुँचाए हैं. इन देशों में मालदीव भी शामिल है
मालदीव की मजलिस (संसद) के स्पीकर मोहम्मद नशीद ने हाल में कहा था कि मालदीव को स्मार्ट विकल्प बनाने में बुद्धिमान होना चाहिए, और विकास और समृद्धि के लिए "भारत के साथ हाथ मिलाना चाहिए."
मालदीव के महत्वपूर्ण भौगोलिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, "मुझे यह भी पूरा अंदाज़ा है कि मालदीव और उनके चुने हुए नेता बुद्धिमान होंगे और हमारी विदेश नीति और हमारे निकटतम सहयोगियों और पड़ोसियों के साथ हमारे संबंधों के बारे में समझदारी से निर्णय लेंगे. भारत इन देशों में हमारे सबसे नज़दीक है."
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